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Thursday, 10 January 2013

पंजाबी किसान को पानी में नहीं रही दिलचस्पी!


-परीक्षण को मंत्री के गांव में लगे कैंप के दो दिनों में पांच सौ में से मात्र 71 ने करवाई जांच
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाबी किसानों का खून पानी के नाम पर उबलता रहा है। पड़ोसी राज्यों व केंद्र के खिलाफ मोर्चे लगाने वाले किसान को अब अपने ही पानी में दिलचस्पी नहीं रही है। कृषि विभाग के कार्यालय में बनी प्रयोगशाला में आकर अपने पानी की जांच करवाने में शायद किसान को पैसा व समय व्यर्थ जाता हो लेकिन अगर किसान के गांव में जाकर कैंप लगा कर पानी की मुफ्त जांच की जाए तो भी किसान को खासी दिलचस्पी नहीं रहती।
किस टयूबवेल का पानी कैसा है? कितनी और कौनसी खाद डलेगी? फसल उगाए या मछली पाले जैसी बेहद अहम जानकारी घर बैठे ही किसान को उपलब्ध करवाने वाली राज्य सरकार की महत्वकांक्षी योजना में ग्रामीण विकास एंव पंचायती राज मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा के गांव में ही लगाए गए पहले कैंप में सिर्फ 71 किसानों ने दिलचस्पी दिखाई, जबकि गांव में पांच सौ से च्यादा टयूब्वेल हैं और कृषि विभाग का स्टाफ दो दिनों तक डेरा जमाए बैठा रहा।
हालांकि योजना के सवाल पर पंचायती राज व ग्रामीण विकास के अधिकारी कहते हैं कि यह वाटर सप्लाई एंव सेनिटेशन विभाग की योजना है। जहां से राशि लेकर कृषि विभाग की आत्मा योजना के पास शिफ्ट की गई है। वही इसे सिरे चढ़ा रहे हैं। जबकि वाटर सप्लाई एंव सेनिटेशन विभाग के एक एक्सीयन कहते हैं कि राज्य सरकार के आदेश पर भूमिगत जल में हैवी मटैल जांचे जा रहे हैं। पानी की जांच को लगभग 25 से 30 पैरामीटर का प्रयोग किया जाता है। हैवी मैटल ज्यादा होने पर आरओ लगाने की सिफारिश की जाती है। हालांकि फसलों की सिफारिश करने के सवाल पर वे कहते हैं कि ये काम उनका नहीं है। कृषि विभाग करवा रहा है।
 डिप्टी डायरेक्टर बीज रह चुके मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि खेती जिस स्तर पर पहुंच गई है वहां से इसे लाभदायक बनाने के लिए या तो हमे शोध कर लागत कम करनी होगी या फिर उपज के उत्पादन के स्तर को बनाया रखना होगा। फसल व खाद का चयन पानी के आधार पर होगा। योजना के तहत अब गांव में ही जाकर किया जाएगा। पहले प्रयोगशाला में किसान आकर परीक्षण करवाता था अब उसके घर पर जा कर किया जा रहा है।

पंजाब में खेती को जिंदा रखना है: रखड़ा

पंजाब की कृषि को ना केवल जिंदा रखना है अपितु उसे लाभदायक भी बनाना है। किसानों को पेश आ रही मुश्किलों को हल करने के लिए राज्य की प्रकाश सिंह बादल की सरकार किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत कर रही है, जिससे ना तो केंद्र पर निर्भर रहना पड़े और ना ही कोई अन्य प्रकार का समझौता करना पड़े। टयूबवेलों का पानी जांच कर मौके पर ही किसानों को रिपोर्ट दी जाएगी। इसके अलावा इन रिपोर्ट का निरीक्षण करने के बाद केंद्रीय कृषि शोध संस्थान व कृषि यूनिवर्सिटी लुधियाना को भेजा जाएगा। इसके बाद अगला प्रोजेक्ट तैयार किया जाएगा।

क्या है योजना?

पानी की जांच के दौरान इसके अंदर मौजूद इलेक्टो इंडक्टिविटी, ईसी और नमकीन पदार्थों मुख्य रूप से सोडियम से संबंधित तत्वों की जांच की जा रही है। पानी के अनुसार ही किसान को बताया जाता है कि खेत में जिप्सम की जांच की जरूरत है या हरी खाद की। पानी की ईसी ज्यादा होने की स्थिति में किसान को भूमिगत जल के साथ नहरी पानी मिलाने को कहा जाता है। इसके पूरी तरह से अनफिट होने पर किसान को खेती छोड़ मछली पालने तक की सलाह भी दी जा सकती है। हालांकि ऐसी सलाह अभी कम से कम अभी तक नहीं दी गई है।

Saturday, 3 November 2012

अब टयूबवेलों पर लगेंगे बिजली मीटर


-कितनी बिजली गई कृषि क्षेत्र को? और कृषि के नाम पर खपी? पता करेगा पावरकाम
-11.60 लाख टयूबवेलों में से पहले चरण पर दस फीसद पर लगेंगे
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में कृषि क्षेत्र को बिजली चाहे मुफ्त में दी जा रही हो लेकिन इस अनुदान पर कितना खर्च हो रहा है इसकी जानकारी जुटाने का सिलसिला अब शुरु होने जा रहा है। पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने निर्णय लिया है कि कृषि क्षेत्र को दी जा रही बिजली का आंकलन किया जाए,। इसके लिए अब खेतों में लगे टयूबवेलों पर बिजली मीटर लगाए जाएंगे।
उल्लेखनीय है कि बिजली अधिनियम 2003 के तहत किसी भी क्षेत्र को दी जाने वाली बिजली चाहे वह मुफ्त ही क्यों ना हो, उस बिना गणना के नहीं दिया जा सकता पंजाब में उक्त अधिनियम लागू हुए दो साल हो गए हैं। अब पावरकाम की ओर से आटोमेटिड मीटरिंग सिस्टम के तहत देखा जाएगा कि कृषि क्षेत्र को कितनी बिजली दी जा रही है? और कृषि क्षेत्र के नाम पर कितनी बिजली खपाई जा रही है। पावरकाम के अधिकारिक सूत्र बताते हैं कि राच्य के खेतों में लगे 11.60 लाख टयूबवेलों पर मीटर लगाए जाएंगे  इनमें से पहले चरण में दस फीसद कनेक्शनों पर मीटर लगाए जाएंगे।
दिलचस्प है कि पावरकाम के इंजीनियरों पर आरोप लगते रहे हैं कि ट्रांसमिशन एंव डिस्ट्रीब्यूशन लासेज के नाम पर होने वाली बिजली की चोरी को कृषि क्षेत्र के नाम पर डाल दिया जाता है। राच्य में गिरते भूमिगत जल स्तर के चलते हर चार-पांच साल पर मोटर बड़ी लगानी पड़ रही है। जिसके चलते बिजली की खपत लगातार बढ़ रही है।

Tuesday, 6 March 2012

पांव-खुर गलते थे अब टयूबवेलों के पाइप भी नहीं टिकते, river ghagger, under ground water, pollution, tubewell,


नदी प्रदूषण: अंतिम
-पांच-छह साल में पाइप तो 10-12 साल में ही गल जाती है मोटर
फोटो:1, 2
भूपेश चट्ठा, पटियाला
  जिन जंगलों से नदी गुजरती हो वहां आए साल नलकूप खोदने पड़ते हों, ऐसा नहीं है कि नदी किनारे भूमिगत जल स्तर गिर रहा है लेकिन पानी की कमी हो जाती है। कई बार अचानक टयूबवेल पानी ही देना बंद कर देता है। पंजाब हरियाणा सीमा पर बहने वाली घग्गर नदी के पानी की हालत इन दिनों कुछ ऐसी हो गई है कि टयूबवेल के पाइप गलने लगे हैं और कई स्थानों पर अच्छे मैटल की और पानी में ही डूबने के लिए बनी मोटर भी जंग से जूझ रही होती है।
दरिया के किनारे कम से कम एक सौ मीटर तकके  टयूबवेलों की हालत कुछ ऐसी हो चली है कि हर पांच-छह साल में इनके पाइप बदलने पड़ते हैं जबकि मोटर की हालत 10-12 साल में गलने वाली हो जाती है। धर्मेहड़ी के किसान हरभजन सिंह बताते हैं कि पानी यहां 60 फीट पर ही है और काफी समय से टिका हुआ भी है, लेकिन पाइप के गलने के चलते निचली लैंथ बदलनी ही पड़ती है। दो तीन साल बाद ही डर सताने लगता है कि कहीं  निचले पाइप के च्यादा गलने से मोटर ही बोर के अंदर ना गिर जाए।
जीवन के छह दशक देख चुके किसान जगमिंदर सिंह कहते हैं कि पहले घग्गर नदी का पानी सिंचाई के काम में भी आता था नलकूप की जरूरत तो बाद के सालों में ही पड़ी है। पर अब इनके साथ ही नई मुसीबत भी आ गई है। इन्हें फिर से खोद कर मोटर व पाइप निकाले जाते है हालांकि बोर वही रहता है पर पाइप बदलने में खासा खर्च आता है। एक ही टुकड़ा 12 सौ से उपर का है, खुदाई की लेबर व मशीनरी का खर्च अलग से है। कई बार पानी में गल चुकी मोटर भी बदलनी पड़ जाती है।
क्षेत्र के बाशिंदे याद करते हैं कि अब पशु नदी के पास फटकते नहीं हैं, इंसानों के भी पांव गल जाते है और जानवरों के खुर, क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानिटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी  240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिर कर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है।  हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है। और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही है।

Friday, 28 October 2011

नदी किनारे प्रदूषित नलकूप, गांव वालों ने की तौबा, river ghagger, water pollution, tubewell,



भूपेश चट्ठा, पटियाला
 जिन जंगलों से नदी गुजरती हो वहां हर साल नए नलकूप खोदने पड़ते हैं, पशु नदी के पास फटकते नहीं हैं, इंसानों के भी पांव गल जाते है। क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है। घग्गर नदी में कभी मछली पकडऩे के ठेके होते थे आज जल जीवन तो दूर कई पक्षियों की किस्में ही अब दिखाई देनी बंद हो गई। हालात अब इस कदर बदतर हो चुके हैं कि नदी किनारे लगे नलकूपों का पानी प्रदूषित हो चुका है और गांव व आसपास बसे डेरों के लोगों ने इससे तौबा कर ली है।

ऐसा भी नहीं है कि नदी की सफाई नहीं होती, हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है। पंजाब हरियाणा को अलग करती घग्गर नदी में बरसाती पानी गुजर जाने के बाद, शहरों का सीवर और फैक्ट्रीयों का प्रदूषित जल आना शुरू होता है। पानी की रफ्तार कम होते ही यह प्रदूषण आसपास के कुओं नलकूपों के पानी को विपरीत रूप से प्रभावित कर रहा है। पंजाब हरियाणा सीमा पर किसान पीने के पानी के तौर पर इसका पानी इस्तेमाल नहीं करते हैं।

पटियाला चीका रोड़ पर पंजाब की  ओर अंतिम खेत के मालिक हरदीप सिंह बताते हैं कि धर्मेहड़ी पुलों के पास क्षेत्र में घग्गर किनारे की पहली दो मोटरों का पानी इस्तेमाल नहीं किया जाता और इच्छा के विपरीत फसलों को तो दिया जा रहा पर कोशिश होती है कि सब्जी को ना लगाया जाए। वहीं गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि जुकाम के दौरान भी दुर्गंध का अहसास हो जाता है। खराबी क्या है? ये तो उन्हें नहीं पता पर पानी स्वाद नहीं है, गेहूं पीली पड़ जाती है। जो लोग खाद की बात करते हैं वे यहां पर गलत हैं, कई बार पौध अचानक ही मर जाती है।

 वहीं पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डायरेक्टर डा. चरणजीत सिंह कहते हैं कि ऐसा बिलकुल सही नहीं है कि दुर्गंध वाला पानी जमीन के 200 फीट नीचे हो सकता है। वैज्ञानिक ढंग़ से सोचा जाए तो किसी भी चीज का बायोलॉजिकल पार्ट पानी के साथ धरती के इतना नीचे नहीं जा सकता। ये उपर ही रह जाएगा। साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि घग्गर प्रदूषित है और वे किसी तरह से बचाव नहीं कर रहे, लोगों को चाहिए कि नदी में से पानी निकाल कर सिंचाई के लिए प्रयोग ना करें। डा. चरणजीत कहते हैं कि संभव है कि किसी एक या दो नलकूप के पास पानी जमा होता होगा और रिसता होगा। इसके आसपास किसी कैप्टी से संबंध नहीं हो सकता। नदी के प्रदूषण पर किसी तरह के सर्वे पर वे कहते हैं कि हाल ही में ऐसा कोई सर्वे नहीं किया गया है।

उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानिटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी  240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिर कर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है।  हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है। और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही है।

Wednesday, 10 August 2011

नलकूप हुए बूढ़े और अपाहिज,नए भी जवान नहीं under ground water, save electricity, tubewell, punjab,








जागरण विशेष 
 सिंचाई का दो तिहाई जिम्मा उठाने वाले ज्यादातर नलकूप अक्षम 
पंजाब में कृषि पंपों में बिजली बचत के स्टार रेटिंग का नहीं प्रावधान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में कृषि की लाइफ लाइन कहे जाने वाले नलकूपों (पंप) में से कुछ बूढ़े हो चले हैं तो कुछ अपाहिजों की श्रेणी में हैं। कुल मिलाकर राज्य में सिंचाई का दो तिहाई जिम्मा उठाने वाले ज्यादातर नलकूप अक्षम हैं। हालांकि इन्हें निकाल फेंकना व्यवहारिक नहीं है, लेकिन आने वाले चुनावी वर्ष में जारी होने वाले नए कनेक्शनों के लिए भी किसी तरह की स्टार रेटिंग न होने से तय है कि नए कनेक्शन के तहत लगने वाले पंप भी जवान नहीं होंगे।



 पंजाब में नलकूपों के आंकड़ों की बात करें तो यहां कुल 12 लाख 86 हजार नलकूप हैं। इनमें से 11.91 लाख बिजली से चलने वाले हैं। पावरकॉम के अधिकारी बताते हैं कि ज्यादातर नलकूप जरूरत से अधिक क्षमता के हैं, जो ज्यादा गहराई से पानी खींचते हैं। इससे बिजली की खपत और बढ़ गई। इतना ही नहीं, पुराने पड़ चुके पंप अपनी क्षमता का मात्र 33 फीसदी ही पानी दे रहे हैं। इससे बिजली का करोड़ों यूनिट का नुकसान होने के साथ भूमिगत जल का भी अनावश्यक दोहन हो रहा है। इस बार दिए जाने वाले 75 हजार नए कनेक्शनों के साथ नलकूपों से सिंचाई का आंकड़ा 30 से बढ़कर करीब 36 फीसदी हो जाएगा। न्यूनतम पांच बीएचपी का एक पंप माना जाए तो 135 करोड़ रुपये की सब्सिडी का बोझ निकम्मे पंपों के लिए होगा। उत्तरी भारत के राज्यों में कृषि क्षेत्र में गिरते भूमिगत जलस्तर के सर्वेक्षण को आई विश्व बैंक की एक टीम के सामने पावरकॉम ने माना है कि अक्षम नलकूपों की वजह से करीब 12 सौ करोड़ रुपये की बिजली हर साल बर्बाद हो रही है। इसके अलावा राज्य में पानी के अनावश्यक दोहन से भूमिगत जल का स्तर गिर रहा है। पावरकॉम के ही एक अधिकारी बताते हैं कि कृषि में सालाना एक हजार करोड़ यूनिट बिजली की खपत होती है, तो चार सौ करोड़ यूनिट इसमें से फिजूलखर्च होता है। इसकी अनुमानित कीमत करीब 12 सौ करोड़ रुपये बनती है। इस फिजूलखर्च का मुख्य कारण बूढे़ हो चुके पंप हैं।

 वहीं पावरकॉम के डिप्टी चीफ इंजीनियर स्तर के एक अधिकारी चुनाव आचार संहिता के बीच आईएसआई मार्का और बीआईएस मापदंड की बात तो करते हैं, पर स्टार रेटिंग की नहीं। तर्क देते हैं कि हर पंप पर साधारण बल्ब हटाकर सीएफएल लगाने से पांच सौ मेगावाट बिजली बचाने की योजना पर काम चल रहा है। लेकिन इन बल्ब के दाम मैन्यूफैक्चरर्स ने पांच गुना तक बढ़ा दिए हैं। ऐसे में पंप के मामले में पंजाब एनर्जी डेवलपमेंट अथारिटी को उपाय सुझाने को लिखा गया है।