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Friday, 8 February 2013

लुधियाना की डाइंग इंडस्ट्री पर पीपीसीबी का छापा, आठ धरे


-फेस छह व सात में रात दस बजे शुरु हुई जांच सुबह एक बजे तक चली
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
लुधियाना से गुजरने वाले नदी नालों में से जल प्रदूषण कम करने के किए जा रहे तमाम प्रावधानों और इंडस्ट्री के साथ चले लंबे बैठकों के दौर के बाद उपलब्ध करवाई गई सुविधाओं के बावजूद जल प्रदूषण थमने का नाम नहीं ले रहा है। लुधियाना की डाइंग इंडस्ट्री से होने वाले प्रदूषण की जांच करने पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पीपीसीबी की ओर से की गई छापेमारी में प्रदूषण फैलाने वाली आठ इंडस्ट्री धरी गई हैं।
पीपीसीबी के चेयरमैन रविंदर सिंह उक्त जानकारी की पुष्टि करते हुए बताया कि लुधियाना के इंडस्ट्रीयल एरिया के फेस छह व सात में वीरवार को लगभग रात दस बजे पर्यावरण इंजीनियरों के नेतृत्व में गठित की गई दो टीमों ने जांच शुरु की । हर टीम में दो दो एसडीओ के अलावा अन्य स्टाफ भी मौजूद रहा। 14 डाइंग इकाइयों पर की गई जांच शुक्रवार को सुबह एक बजे तक जारी रही। एक टीम ने छह जबकि दूसरी ने आठ इंडस्ट्री की जांच की है।
चेयरमैन का कहना है कि इनमें से दो इंडस्ट्री तो बंद पाई गई जबकि आठ जल प्रदूषण नियमों का उल्लंघन करते पाए गए हैं। सुविधी कॉटस स्पिन प्राइवेट लिमिटेड, डीलक्स फेब्रिक्स, गोल्डन एंटरप्राइजेज, योगी डाइंग, कलर फेब, टेक्नोनेट व एसके डाइंग के एफयूलेंट ट्रीटमेंट प्लांट बंद पाए गए हैं। इन इकाइयों में से अनट्रीटेड पानी बाईपास कर सीवरेज में छोड़ा जा रहा था। जबकि सुप्रीम एग्रो का इटीपी चल तो रहा था, लेकिन इसमें से पीला पानी निकल रहा था। यह भी पूरी तरह से काम नहीं कर रहा था। ऐसे में पीपीसीबी की ओर से सबूत जुटाने के अलावा की गई वीडियो ग्राफी व लिए गए नमूनों के आधार पर अगली कार्रवाई शुरु कर दी है।

Monday, 4 June 2012

जीवनदायनी नदी हो गई डायन!, The river that gave birth turns to killer


- जहां कभी मछलियां पकडऩे के ठेके होते थे वहां पांव-खुर गलने लगे अब टयूबवेलों के पाइप भी नहीं टिकते
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हिमाचल प्रदेश के डगशाई से शुरु हो पाकिस्तान तक बहने वाली घग्गर नदी से पंजाब-हरियाणा के अलावा राजस्थान भी प्रभावित होता है, लेकिन सबसे बड़ा हिस्सा पटियाला व संगरूर जिलों में है। करीब दो सौ किलोमीटर क्षेत्र में बहने वाली इस नदी में कभी मछली पकडऩे के लिए सरकारी स्तर पर ठेके हुआ करते थे। पर जीवन दायनी ये नदी अब करीब करीब डायन का रूप धारण कर गई है।
पंजाब व हरियाणा सीमा पर बहने वाली घग्गर नदी के एक तो अब बरसाती होकर रह गई है। जब भी पानी आता है तो बाढ़ के रूप इसके अलावा दस महीने इसमें बहने वाले पानी की हालत इन दिनों कुछ ऐसी हो गई है कि आसपास के खेतों में ट्यूबवेल के पाइप भी गलने लगे हैं और कई स्थानों पर अच्छे मैटल की और पानी में ही डूबने के लिए बनी मोटर भी जंग से जूझ रही होती है।
क्षेत्र में धर्मेहड़ी गांव के बाशिंदे हरदीप सिंह बताते हैं कि पहले घग्गर नदी का पानी सिंचाई के काम में भी आता था। नलकूप की जरूरत तो बाद के सालों में ही पड़ी है। लोग याद करते हैं कि अब पशु इस नदी के पास फटकते नहीं हैं। अगर मजबूरी में इंसानों को आना जाना पड़ जाए तो पांव गलने लग जाते है। गुरदयालपुरा बीड़ के पास मरोड़ी गांव के कश्मीर सिंह बताते हैं कि जो लोग आसपास पशु चराने ले आते है और नदी के एक से दूसरे छोर पर आना जाना पड़ जाए तो जानवरों के खुर तक गल जाते हैं। नदी का क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानीटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई। जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी 240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिरकर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है। हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही हैं।

Tuesday, 6 March 2012

नापाक हुआ घग्गर किनारे का पानी, river ghagger, water pollution,


जागरण सरोकार : पर्यावरण संरक्षण

...नदी प्रदूषण : एक

फोटो: 1
- सब्जी उगाते हैं, बेचते हैं, पर खाते नहीं हैं
भूपेश चट्ठा, धर्मेहड़ी (पटियाला)
पंजाब के जिस पानी पर अनगिनत लोकगीतों की रचना की गई और जिसे हाथ में लेकर साथ जीने मरने की कसमें खाई जाती थीं, पंजाब के उसी आब को हाथ लगाने की हिम्मत अब नहीं होती। जल प्रदूषण की भेंट घग्गर दरिया इस कदर चढ़ चुका है कि कभी पवित्र निर्मल रहने वाला जल पूरी तरह से नापाक हो चला है।
आलम ये है कि पंजाब-हरियाणा सीमा पर स्थित धर्मेहड़ी गांव के पास से गुजरते घग्गर दरिया के पानी से क्षेत्र के किसान सब्जी उगाते हैं, बेचते भी हैं, पर खाते नहीं हैं। इतना ही नहीं घग्गर के ठीक किनारे पर स्थित खेतों में छोटे-छोटे डेरों पर मोटरें लगी हैं। बिजली भी अपने हिसाब से आती रहती है और ट्यूबवेल चलता भी है, पर यहां के लोग अपने पीने व भोजन के लिए पानी दूसरे की मोटर से लाते हैं।
सीमा पर अंतिम खेत के मालिक हरदीप सिंह बताते हैं कि पहले एक दो बोर से ही गड़बड़ वाला पानी आता था। अब ऐसे कई पंप हैं, जहां से दुर्गंध वाला पानी आता है। जिसके चलते पीने अथवा भोजन के लिए प्रयोग नहीं करते।
 ठीक ऐसे ही गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि उन्होंने कुछ मोटरों को ब्लैक लिस्ट जरूर किया है। पीने का पानी उन मोटरों से नहीं लेते, पर सब्जी उगाने और सिर्फ बाजार में बेचे जाने की बात पूरी तरह से सही नहीं है। हालांकि इच्छा के विपरीत फसलों को तो दिया जा रहा है, पर कोशिश होती है कि सब्जी को न लगाया जाए। यहां जुकाम के दौरान भी दुर्गंध का एहसास हो जाता है। खराबी क्या है? ये तो उन्हें नहीं पता, पर पानी स्वाद नहीं है, गेहूं पीली पड़ जाती है। जो लोग खाद की बात करते हैं, वे यहां पर गलत हैं, कई बार पौध अचानक ही मर जाती है।
ऐसा भी नहीं है कि नदी की सफाई नहीं होती, हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है, पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है। पंजाब हरियाणा को अलग करती घग्गर नदी में बरसाती पानी गुजर जाने के बाद, शहरों का सीवर और फैक्ट्रीयों का प्रदूषित जल आना शुरू होता है। पानी की रफ्तार कम होते ही यह प्रदूषण आसपास के कुओं नलकूपों के पानी को विपरीत रूप से प्रभावित कर रहा है।
वहीं पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डायरेक्टर डा.चरणजीत सिंह कहते हैं कि ऐसा बिलकुल सही नहीं है कि दुर्गंध वाला पानी जमीन के 200 फीट नीचे हो सकता है। वैज्ञानिक ढंग से सोचा जाए तो किसी भी चीज का बायोलॉजिकल पार्ट पानी के साथ धरती के इतना नीचे नहीं जा सकता। ये ऊपर ही रह जाएगा। साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि घग्गर प्रदूषित है और वे किसी तरह से बचाव नहीं कर रहे, लोगों को चाहिए कि नदी में से पानी निकाल कर सिंचाई के लिए प्रयोग न करें। डा.चरणजीत कहते हैं कि संभव है कि किसी एक या दो नलकूप के पास पानी जमा होता होगा और रिसता होगा। इसके आसपास किसी कैप्टी से संबंध नहीं हो सकता। नदी के प्रदूषण पर किसी तरह के सर्वे पर वे कहते हैं कि हाल ही में ऐसा कोई सर्वे नहीं किया गया है।

Friday, 28 October 2011

नदी किनारे प्रदूषित नलकूप, गांव वालों ने की तौबा, river ghagger, water pollution, tubewell,



भूपेश चट्ठा, पटियाला
 जिन जंगलों से नदी गुजरती हो वहां हर साल नए नलकूप खोदने पड़ते हैं, पशु नदी के पास फटकते नहीं हैं, इंसानों के भी पांव गल जाते है। क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है। घग्गर नदी में कभी मछली पकडऩे के ठेके होते थे आज जल जीवन तो दूर कई पक्षियों की किस्में ही अब दिखाई देनी बंद हो गई। हालात अब इस कदर बदतर हो चुके हैं कि नदी किनारे लगे नलकूपों का पानी प्रदूषित हो चुका है और गांव व आसपास बसे डेरों के लोगों ने इससे तौबा कर ली है।

ऐसा भी नहीं है कि नदी की सफाई नहीं होती, हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है। पंजाब हरियाणा को अलग करती घग्गर नदी में बरसाती पानी गुजर जाने के बाद, शहरों का सीवर और फैक्ट्रीयों का प्रदूषित जल आना शुरू होता है। पानी की रफ्तार कम होते ही यह प्रदूषण आसपास के कुओं नलकूपों के पानी को विपरीत रूप से प्रभावित कर रहा है। पंजाब हरियाणा सीमा पर किसान पीने के पानी के तौर पर इसका पानी इस्तेमाल नहीं करते हैं।

पटियाला चीका रोड़ पर पंजाब की  ओर अंतिम खेत के मालिक हरदीप सिंह बताते हैं कि धर्मेहड़ी पुलों के पास क्षेत्र में घग्गर किनारे की पहली दो मोटरों का पानी इस्तेमाल नहीं किया जाता और इच्छा के विपरीत फसलों को तो दिया जा रहा पर कोशिश होती है कि सब्जी को ना लगाया जाए। वहीं गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि जुकाम के दौरान भी दुर्गंध का अहसास हो जाता है। खराबी क्या है? ये तो उन्हें नहीं पता पर पानी स्वाद नहीं है, गेहूं पीली पड़ जाती है। जो लोग खाद की बात करते हैं वे यहां पर गलत हैं, कई बार पौध अचानक ही मर जाती है।

 वहीं पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डायरेक्टर डा. चरणजीत सिंह कहते हैं कि ऐसा बिलकुल सही नहीं है कि दुर्गंध वाला पानी जमीन के 200 फीट नीचे हो सकता है। वैज्ञानिक ढंग़ से सोचा जाए तो किसी भी चीज का बायोलॉजिकल पार्ट पानी के साथ धरती के इतना नीचे नहीं जा सकता। ये उपर ही रह जाएगा। साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि घग्गर प्रदूषित है और वे किसी तरह से बचाव नहीं कर रहे, लोगों को चाहिए कि नदी में से पानी निकाल कर सिंचाई के लिए प्रयोग ना करें। डा. चरणजीत कहते हैं कि संभव है कि किसी एक या दो नलकूप के पास पानी जमा होता होगा और रिसता होगा। इसके आसपास किसी कैप्टी से संबंध नहीं हो सकता। नदी के प्रदूषण पर किसी तरह के सर्वे पर वे कहते हैं कि हाल ही में ऐसा कोई सर्वे नहीं किया गया है।

उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानिटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी  240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिर कर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है।  हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है। और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही है।

Monday, 8 November 2010

पीपीएसबी के खिलाफ सूचना कमिश्नर के पास पहुची शिकायत

उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
अरनेटू गांव में पीने योग्य पानी न होने के मामले में अब पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) के अधिकारियों पर सार्वजनिक रूप से गलत जानकारी देने का आरोप लगाया है। इसकी शिकायत सूचना कमिश्नर पंजाब के पास भी दी गई है। ये शिकायत गैर सरकारी स्वयं सेवी संगठन संकल्प के प्रतिनिधि जतिन्द्र जैन की ओर से की गई है।
उन्होंने अपनी शिकायत में राज्य सूचना आयोग को सूचित किया है कि उनकी ओर से मई महीने में मागी गई सूचना के मामले में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से ये कहा जा रहा है कि बोर्ड को सूचना मागने की अर्जी 22 सितम्बर को मिली है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ही सीनियर वातावरण इजीनियर हेडक्वार्टर ने 10 मई 2010 को वातावरण इजीनियर क्षेत्रीय कार्यालय संगरूर उनकी अर्जी गलती से भेजे जाने का पत्र सौंपते जतिन्द्र जैन ने कहा है कि उनकी अर्जी के पहले संगरूर कार्यालय के पास भेज दी गई और उन्हें जानकारी देने के लिए कहा गया था। उन्होंने कहा कि जब पत्र मई में गलती से भेजा गया तो फिर यह कैसे संभव है कि मेरा प्रार्थना पत्र सितंबर माह में मिला।
सूचना कमिश्नर से इस मामले में आरटीआई एक्ट 2005 की धारा 20 और आईपीसी की धारा 166 तहत सख्त कार्रवाई किए जाने की माग करते उन्होंने कहा कि इस मामले में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई किए जाने की मांग की है। उल्लेखनीय है कि राज्य सूचना कमीशन ने जिले के अरनेटू गांव के निवासियों की समस्याओं के मामले में गैर सरकारी संस्था संकल्प की ओर से मागी जानकारी समय पर उपलब्ध न करवाने के मामले में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सूचना अधिकारी व जिले के अतिरिक्त डिप्टी कमिश्नर को नोटिस जारी कर दिया था।
संकल्प के प्रतिनिधि जतिन्द्र जैन ने बताया कि राज्य सूचना कमीशन में उन्होंने अरनेटू गाव के निवासियों की समस्याओं की जानकारी देने संबंधी पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व डिप्टी कमिश्नर कार्यालय की ओर से समय पर जानकारी न देने का मामला उठाया। इसकी 21 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व पटियाला के अतिरिक्त डिप्टी कमिश्नर को कारण बताओ नोटिस जारी किए है। उन्होंने बताया कि 13 मई 2010 को यह जानकारी हासिल करने के लिए सूचना के अधिकार के तहत मांगी थी। पंजाब प्रदू्रषण नियंत्रण बोर्ड से उनको 24 सितम्बर 2010 को जवाब मिला जोकि सूचना आयोग ने 10 सितम्बर को नोटिस जारी करने के बाद भेजा गया है। इस तरह डिप्टी कमिश्नर कार्यालय ने उनको जानकारी देने में बिना वजह देरी की गई है। उन्होंने बताया कि कमीशन ने दोनों पक्षों का 11 नवम्बर के लिए नोटिस जारी किए है। जिला सूचना अधिकारी से कहा गया कि क्यों न उन्हें आरटीआई एक्ट की धारा 20 के तहत 250 रुपए रोजाना के हिसाब से जुर्माना किया जाए।