Thursday, 29 March 2012

पंच नहीं पब्लिक होगी परमेश्वर, village general body will be supreme


-पंचों को दबाव में ला कर सरपंच को कठपुतली बना दिया गया था
-अब गांव में सीधे तौर पर होंगे दो धड़े
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 पंजाब में सरपंच का चुनाव करने वाली ग्राम सभा एक बार फिर जिंदा हो गई है। जबकि परमेश्वर की भूमिका में आ गए पंच अब धरातल पर आ गए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति के समान सरपंच का प्रत्यक्ष चुनाव 80 के दशक में फिर शुरू किया था, अब फिर चलन में आएगा।
राज्य विधान सभा में ताजा पारित किए गए प्रस्ताव के बाद स्थानीय निकाय स्तर पर संसदीय प्रणाली लागू करने ग्रामसभा अथवा पूरे गांव के मतदाताओं के बहुमत की जरूरत पड़ेगी। जबकि इससे पहले के  एक्ट अनुसार सिर्फ पंच ही बहुमत के आधार पर सरपंच को बना और बदल सकते थे। ग्रामीण राजनीति के जानकार बताते हैं कि ग्राम सभा की ओर से सरपंच चुने जाने के बाद हालांकि पूरा गांव दो गुटों में बंट जाएगा।
इतना ही नहीं पंचों को चुनाव भी अब वार्ड के आधार पर होगा। जिससे हर किसी को अपनी भूमिका का पता होगा और किस धड़े से संबंधित है यह भी तय हो जाएगा। दिलचस्प है कि पिछले पांच सालों के दौरान पंचायत सचिव, डायरेक्टर और सबसे अधिक शिरोमणि अकाली दल की ओर से पार्टी स्तर पर नियुक्त किए गए विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी, चाहे वे हारे उम्मीदवार हों या जीते हुए विधायक, के समर्थकों का पलड़ा जिस ओर झुका हो वही सरपंच बन रहा है।
गांव की राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखने वाले बताते हैं कि पंचायत की ओर से पहली बार चुने गए सरपंच के दो साल पूरे होते ही राजनीति शुरू हो जाती है और इसके बड़े खिलाड़ी पंच ना होकर सत्ताधारी दल के क्षेत्रीय नेता होते हैं। उन्हीं के इशारे पर सचिव व डायरेक्टर भी एक तरह से राजनीतिक प्यादे की भूमिका निभाते हैं। पंचों की संख्या 'समÓ हो तो भी बैठक बुला ली जाती है और अपने बंदे पूरे व सामने वाले के एक कम होने पर भी फटाफट पहले से तैयार किया हुआ प्रस्ताव पारित कर अपना बंदा सरपंच बना दिया जाता है। हालात ऐसे हो गए कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थक सरपंचों की संख्या 80 फीसदी के पार होने के बाद भी बढ़ती रही। बीडीओ, पंचायत सचिवों को बाकायदा निर्देश देकर सत्ताधारी दल के हल्का इंचार्ज की पसंद थोपी गई।
 यहां यह भी बताना जरूरी है कि ग्राम सभा की भूमिका सीमित करने प्रक्रिया इससे पहले आई कांग्रेस सरकार ने के कार्यकाल में शुरू हुई और अकालियों ने प्रक्रिया पूरी कर व्यवस्था का पूरा लाभ लिया। जबकि अप्रत्यक्ष चुनाव का प्रयोग पहले भी राज्य में किया गया और असफल रही थी बदलाव के नाम पर इसमें सरपंच का न्यूनतम कार्यकाल तय किया गया लेकिन अब अकाली-भाजपा सरकार ने इसे संशोधित कर पुन: लागू कर दिया है।
इसी संबंध में रुड़की गांव के अवतार सिंह और कामीकलां गांव के मंजीत सिंह कहते हैं कि ये स्वागत योग्य कदम है।

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