जागरण एक्सक्लूसिव
नीम, हींग व मिर्च से स्टोरेज, राख और सरसों से बीज का ट्रीटमेंट
-एफसीआई धरती पर, गेहूं की बोरी में, बोरियों के उपर, हवा में एयर चार्जिंग के लिए मैलाथीन महीने में दो बार, डीडीवीपी 21 दिनों पर, डेल्टा मैथलीन तीन महीने पर और सल्फास सदा के लिए
भूपेश चट्ठा, पटियाला
नीम के पत्तों से लेकर मिर्च, हींग का प्रयोग गेहूं को कीटों से बचाने के बेहद कारगर देसी तरीके परंपरागत ज्ञान में मौजूद हैं लेकिन जल्दबाजी के आलम में इंसान अपनी ही सेहत से खिलवाड़ कर रहा है। दिलचस्प है कि आर्गेनिक तरीके से उगाई गई फसल को भी रसायनों में 'संभालनेÓ की कोशिश में लगा है।
उपज विशेष रूप से गेहूं की आने वाली फसल के भंडारण को लेकर जहां केंद्र व पंजाब में आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं, वहीं आम पंजाबी अब एक बार फिर देसी तरीकों की ओर खिसकने लगा है। इसमें थोड़े रसायनिक तरीकों में माचिस की डिब्बी का प्रयोग सल्फास की जगह करने का चलन बढ़ रहा है। घरों में होने वाली खुदकुशी एक कारण है तो सेहत का भी ख्याल किया जाने लगा है।
दिलचस्प है कि किसान भी बीज के लिए अलग से नीम के पत्तों व डंडियों को जला कर झाड़ा लगा गेहूं को अगले साल के लिए ट्रीट कर रखने लगा है, जिससे ना केवल खराब होने से बचा रहता है अपितु गुणवत्ता भी बनी रहे।
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त बताते हैं कि मलमल के कपड़े की तीन-चार तह के बीच हींग रख कर गेहूं में डाल देते हैं तो कीड़े इसकी सुगंध से पास नहीं फटकते और किसी तरह का नुकसान भी नहीं है। इसी प्रकार अगर बीज संजो कर रखने हैं तो आप इन्हें सरसों अथवा कड़वे तेल में मल कर राख में रखते हैं तो सालों साल किसी तरह की समस्या नहीं है, ये लॉकर की तरह काम करता है।
वहीं पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज डा. बीएस सोहल बताते हैं कि लोग सल्फास का प्रयोग भी अनावश्यक रूप से करते हैं, गेहूं आने के साथ ही रसायन डाल देते हैं जबकि किसी तरह का कीट इन दिनों के ज्यादा तापमान में नहीं लगता। बरसात के दिनों की नमी ही कीटों को बुलावा देती है। ऐसे में पूरी तरह सुखा कर गेहूं को स्टोर किया जाए और टूटे हुए दाने अलग कर लिए जाएं तो हल्के देसी तरीके बेहद कारगर हैं और गुणवत्ता बनी रहती है। हींग के अलावा मिर्च व नीम के पत्ते डालना शामिल है।
दूसरी ओर एफसीआई के गोदामों में रखी गई बोरियों में दवा डालने के अलावा इसकी जमीन व हवा को भी 'सुरक्षितÓ रखने के चक्कर में पूरा वातावरण जहरीला किया जाता है। एफसीआई के वीके बत्ता बताते हैं कि बोरी रखते ही इस पर डेल्टा मैथलीन का स्प्रे कर दिया जाता है। हर तीन महीने पर यह प्रक्रिया दोहराई जाती है। इसके तुरंत बाद खाली जगह में डीडीवीपी का छिड़काव होता है, एयर चार्जिंग के नाम पर किसी पतंगे को भी ना फटकने देने वाला यह स्प्रे 21 दिनों के अंतराल पर रिपीट होता है। हवा में उड़ती 'भुंडीÓ, 'भमक्कड़Ó इस वायु के संपर्क में आते ही जमीन पर ऐसे गिरते हैं मानों किसी ने एंटी एयरक्राफ्ट गन से गिराया हो।
इन सबके बावजूद यदि कीड़ा लगने की संभावना होने पर एल्मोनियम फास्फेट का प्रयोग होता है। ये वो गेहूं की बदनाम गोली है जिसे सल्फास कहते हैं और पंजाब में खुदकुशी करने वालों में प्रचलित रही है। बात यहीं समाप्त नहीं धरती के नीचे से कार्रवाई करने वाले दीमक अथवा दाने में पैदा होने वाली 'सुसरीÓ के लिए मैलाथीन का स्प्रे महीने में दो बार जरूरी है, तभी गेहूं को बचाया जा सकता है कीट पतंगों और कीड़े मकौड़ों की जान लेने वाले ये रसायन इंसानों के लिए भी कम घातक नहीं हैं।
कम्यूनिटी मेडिसीन में एमडी और एपिडमोलोजिस्ट डा. अमर सिंह आजाद कहते हैं कि इन रसायनों से इंसान की बीमारी से लडऩे की क्षमता ही खत्म हो जाती है। जुकाम से लेकर कैंसर तक की हर बीमारी की पकड़ में ऐसा व्यक्ति जल्दी आता है। प्राकृति से हमें तोहफे में मिले इम्यून सिस्टम में कमजोरी आती जाती है। जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण हो जाती है।
नीम, हींग व मिर्च से स्टोरेज, राख और सरसों से बीज का ट्रीटमेंट
-एफसीआई धरती पर, गेहूं की बोरी में, बोरियों के उपर, हवा में एयर चार्जिंग के लिए मैलाथीन महीने में दो बार, डीडीवीपी 21 दिनों पर, डेल्टा मैथलीन तीन महीने पर और सल्फास सदा के लिए
भूपेश चट्ठा, पटियाला
नीम के पत्तों से लेकर मिर्च, हींग का प्रयोग गेहूं को कीटों से बचाने के बेहद कारगर देसी तरीके परंपरागत ज्ञान में मौजूद हैं लेकिन जल्दबाजी के आलम में इंसान अपनी ही सेहत से खिलवाड़ कर रहा है। दिलचस्प है कि आर्गेनिक तरीके से उगाई गई फसल को भी रसायनों में 'संभालनेÓ की कोशिश में लगा है।
उपज विशेष रूप से गेहूं की आने वाली फसल के भंडारण को लेकर जहां केंद्र व पंजाब में आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं, वहीं आम पंजाबी अब एक बार फिर देसी तरीकों की ओर खिसकने लगा है। इसमें थोड़े रसायनिक तरीकों में माचिस की डिब्बी का प्रयोग सल्फास की जगह करने का चलन बढ़ रहा है। घरों में होने वाली खुदकुशी एक कारण है तो सेहत का भी ख्याल किया जाने लगा है।
दिलचस्प है कि किसान भी बीज के लिए अलग से नीम के पत्तों व डंडियों को जला कर झाड़ा लगा गेहूं को अगले साल के लिए ट्रीट कर रखने लगा है, जिससे ना केवल खराब होने से बचा रहता है अपितु गुणवत्ता भी बनी रहे।
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त बताते हैं कि मलमल के कपड़े की तीन-चार तह के बीच हींग रख कर गेहूं में डाल देते हैं तो कीड़े इसकी सुगंध से पास नहीं फटकते और किसी तरह का नुकसान भी नहीं है। इसी प्रकार अगर बीज संजो कर रखने हैं तो आप इन्हें सरसों अथवा कड़वे तेल में मल कर राख में रखते हैं तो सालों साल किसी तरह की समस्या नहीं है, ये लॉकर की तरह काम करता है।
वहीं पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज डा. बीएस सोहल बताते हैं कि लोग सल्फास का प्रयोग भी अनावश्यक रूप से करते हैं, गेहूं आने के साथ ही रसायन डाल देते हैं जबकि किसी तरह का कीट इन दिनों के ज्यादा तापमान में नहीं लगता। बरसात के दिनों की नमी ही कीटों को बुलावा देती है। ऐसे में पूरी तरह सुखा कर गेहूं को स्टोर किया जाए और टूटे हुए दाने अलग कर लिए जाएं तो हल्के देसी तरीके बेहद कारगर हैं और गुणवत्ता बनी रहती है। हींग के अलावा मिर्च व नीम के पत्ते डालना शामिल है।
दूसरी ओर एफसीआई के गोदामों में रखी गई बोरियों में दवा डालने के अलावा इसकी जमीन व हवा को भी 'सुरक्षितÓ रखने के चक्कर में पूरा वातावरण जहरीला किया जाता है। एफसीआई के वीके बत्ता बताते हैं कि बोरी रखते ही इस पर डेल्टा मैथलीन का स्प्रे कर दिया जाता है। हर तीन महीने पर यह प्रक्रिया दोहराई जाती है। इसके तुरंत बाद खाली जगह में डीडीवीपी का छिड़काव होता है, एयर चार्जिंग के नाम पर किसी पतंगे को भी ना फटकने देने वाला यह स्प्रे 21 दिनों के अंतराल पर रिपीट होता है। हवा में उड़ती 'भुंडीÓ, 'भमक्कड़Ó इस वायु के संपर्क में आते ही जमीन पर ऐसे गिरते हैं मानों किसी ने एंटी एयरक्राफ्ट गन से गिराया हो।
इन सबके बावजूद यदि कीड़ा लगने की संभावना होने पर एल्मोनियम फास्फेट का प्रयोग होता है। ये वो गेहूं की बदनाम गोली है जिसे सल्फास कहते हैं और पंजाब में खुदकुशी करने वालों में प्रचलित रही है। बात यहीं समाप्त नहीं धरती के नीचे से कार्रवाई करने वाले दीमक अथवा दाने में पैदा होने वाली 'सुसरीÓ के लिए मैलाथीन का स्प्रे महीने में दो बार जरूरी है, तभी गेहूं को बचाया जा सकता है कीट पतंगों और कीड़े मकौड़ों की जान लेने वाले ये रसायन इंसानों के लिए भी कम घातक नहीं हैं।
कम्यूनिटी मेडिसीन में एमडी और एपिडमोलोजिस्ट डा. अमर सिंह आजाद कहते हैं कि इन रसायनों से इंसान की बीमारी से लडऩे की क्षमता ही खत्म हो जाती है। जुकाम से लेकर कैंसर तक की हर बीमारी की पकड़ में ऐसा व्यक्ति जल्दी आता है। प्राकृति से हमें तोहफे में मिले इम्यून सिस्टम में कमजोरी आती जाती है। जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण हो जाती है।
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