Showing posts with label punjab election. Show all posts
Showing posts with label punjab election. Show all posts

Tuesday, 6 March 2012

समाना का 'श्राप' पटियाला ग्रामीण पर आया!, after polling result, punjab election, patiala,


जागरण विशेष
भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश में सत्ता के दूसरे बड़े केंद्र के रूप में जाने जाते पटियाला जिले का समाना विधान सभा ऐसा चुनावी क्षेत्र रहा है जहां के विधायक को 'सत्ता का सुखÓ नहीं मिल पाता लेकिन डी-लीमिटेशन के बाद इस क्षेत्र को तोड़ कर बने पटियाला ग्रामीण की स्थिति भी अब कुछ ऐसी हो गई है कि कांग्रेस के उम्मीदवार ने चुनाव तो जीता पर तमाम अनुमानों-अटकलों व 'परंपराओंÓ के बावजूद कांग्रेस प्रदेश की सत्ता पर काबिज नहीं हो सकी है। ऐसे में पहली प्रतिक्रिया यही आ रही है कि जिस तरह से समाना विधान सभा क्षेत्र पर विपक्ष में बैठने का 'श्रापÓ लगा था अब वो पटियाला ग्रामीण शिफ्ट हो गया है।
समाना से इस बार 2012 में सुरजीत सिंह रखड़ा चुनाव जीते हैं और पहली ही विकास रैली में पार्टी प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने उन्हें चुनाव जीतने पर कैबिनेट मंत्री बनाने की घोषणा कर दी थी, जबकि पिछली बार 2007 में वे इसी सीट पर चुनाव हारे पर पार्टी राज्य की सत्ता में आ गई। ठीक इसी तरह 2002 में वे चुनाव जीते और कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा चुनाव हरे तो प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता बनी। इस बार समाना से पटियाला ग्रामीण आए कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा भारी मतों से चुनाव जीते हैं पर राज्य में कांग्रेस आ गई है। यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा है। बस एक बार अपवाद 1997 में हुआ लेकिन तब शिरोमणि अकाली दल की लहर में इसी पार्टी के उम्मीदवार जगतार सिंह राजला चुनाव जीते पार्टी सत्ता में आई तो राजला जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा के साथ सर्व हिंद शिरोमणि अकाली दल में जा विपक्ष में बैठ गए।

मुखमैलपुर ने जलालपुर को  'भाजीÓ लौटाई
घनौर सीट से 2007 में निर्दलीय के रूप में 732 वोटों से चुनाव जीते मदन लाल जलालपुर को मुखमैलपुर ने 'भाजीÓ लौटा दी है। हालांकि इस बार अजैब सिंह मुखमैलपुर के स्थान पर उनकी पत्नि हरप्रीत कौर मुखमैलपुर 1778 वोटों के अंतर से जीत पाई हैं। याद रहे कि पिछला चुनाव जीतने के बाद जलालपुर पहले अकाली हुए और फिर कांग्रेस का टिकट लेने में कामयाब रहे।

किराए के मकान से निकल राजपुरा के 'मूल निवासीÓ हुए कंबोज
राजपुरा सीट पर भारी बहुमत से जीतने वाले हरदयाल कंबोज पर 2007 में राजखुराना की 'बिरादरीÓ से 'बाहरीÓ उम्मीदवार के रूप में जूझे पर हार गए। पांच साल राजपुरा अपडाउन करते रहे अंत में किराए पर मकान लेने वाले कांग्रेस के हरदयाल कंबोज ने मतदान के बाद और चुनाव परिणाम आने से पहले ही राजपुरा में मकान खरीद लिया है। अब उन्हें यहां की जनता ने 'मूल निवासीÓ होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया है।

लाल सिंह ने बताया 'अनुभवÓ क्या चीज है?
सनौर में कांटे की टक्कर बताई जा रही थी हुआ भी कुछ ऐसा ही लेकिन अंत में घाघ सियासतदान लाल सिंह ने बता ही दिया कि पढ़ाई लिखाई अपनी जगह है पर 'अनुभवÓ बड़ी चीज है।

पटियाला ने फिर चुकाया कैप्टन का 'कर्जÓ, पर परनीत कौर को झटका

पटियाला शहर के वोटरों ने पूर्व रियासत के महाराजा कैप्टन अमरिंदर सिंह का 'कर्जÓ एक बार फिर से चुका दिया है, हालांकि तमाम प्रयासों के बाद पुत्र रणइंद्र सिंह के हार जाने से विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर को झटका जरूर लगा है।

बनिंदर कौर लूंबा को मिली 765 वोटों की 'सहानुभूतिÓ
सर्वाधिक ग्रामीण व पिछड़ा क्षेत्र कहे जाने वाले शुतराणा सीट पर अकाली दल की बनिंदर कौर लूंबा के हिस्से में इस बार 765 वोटों की 'सहानुभूतिÓ आई है। याद रहे कि यहां से पहले अकाली और फिर कांग्रेसी के रूप में चुनाव जीतते रहे निर्मल सिंह शुतराणा 'धक्का हुआÓ के नारे पर लड़ते रहे हैं पर इस बार लूंबा 'साडी मदद करोÓ ज्यादा भारी पड़ा।

Sunday, 5 February 2012

कुंडियां दे सिंग फस गए केहड़ी नितरू...pre poll, punjab election,


- नहीं हुआ डोर-टू-डोर प्रचार, हुआ जोड़ तोड़
- गुप्त बैठकें कर भितरघात करवाने की चली राजनीति
भूपेश चट्ठा, पटियाला
विधानसभा चुनावों में आयोग के आदर्श चुनाव आचार संहिता के डंडे के चलते इस बार के चुनाव में अंदाजा लगाना खासा मुश्किल कर दिया कि ऊंट किस करवट बैठेगा। हर सीट पर आलम ये है कि कुंडियां दे सिंग फस गए केहड़ी नितरू बड़ेमें खाणी...
चुनाव प्रचार का निर्धारित समय समाप्त होने अथवा लाउड स्पीकर का शोर थमने व रैलियों चुनावी सभाओं के दौर के बाद और मतदान से ठीक एक दिन पहले आम तौर पर डोर टू डोर प्रचार में प्रत्याशी जुटते हैं। इस बार का चुनाव इस मामले में भी पिछले चुनावों से अलग रहा। प्रत्याशियों की बदली रणनीति में जहां बड़ी सभाएं नदारद रही तो पूरे अभियान के दौरान चली पैदल यात्राओं और बिना लाउडस्पीकर के हुई छोटी चुनावी सभाओं में ही उम्मीदवार व्यस्त रहे।
दिलचस्प है कि ऐसे हालात में जिस किसी उम्मीदवार से बात हुई वो ड्राइंग रूम पालिटिक्स में ही अंतिम दिन जुटा रहा। डोर-टू-डोर जाने की बजाए जोड़ तोड़ में ज्यादा मेहनत की गई है। एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रणनीतिकार ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि उम्मीदवार की पत्नि सुबह से ही कहीं गई हुई हैं, जबकि प्रचार की कमान संभालने वाले घर के सदस्य दिन भर घर में ही रहने वाले हैं और उम्मीदवार का देर शाम तक कोई कार्यक्रम नहीं है।
वहीं क्षेत्रीय दल से चुनाव लड़ रहे एक अन्य उम्मीदवार की निगाह विपक्षियों की गतिविधियों पर जमी रही कि कहीं कोई पैसे अथवा शराब तो नहीं बांट रहा। जहां कहीं से खबर आती उसी तरफ गाडिय़ां दौड़ा दी जाती। इसके साथ ही जिला प्रशासन से चुनाव आयोग तक के  फोन घनघना दिए जाते।
इतना ही नहीं राजनीतिक दलों में एक दूसरे का बंदा तोड़ दल बदलवाने वाले काम की संभवत अब जरूरत नहीं महसूस की जा रही आज के दिन असंतुष्टों के साथ गुप्त बैठकें कर भीतरी घात करवाने की राजनीति का दौर खासा सरगर्म रहा।


टेली मार्केटिंग का लिया सहारा
आम तौर पर इंश्योरेंस अथवा मोबाइल कनेक्शन बेचने आने वाली टेली मार्केटिंग के आने वाले फोन काल इस बार प्रचार के अंतिम दिन कई स्थानों पर सुनाई दिए गए। जिसमें उम्मीदवार के कार्यालय से बोलने का हवाला देकर वोट डालने की अपील के साथ ही एक रटी रटाई आवाज में चुनाव निशान भी बताया जा रहा हैं। नंबर कहां से लिया? और डू नॉट डिस्टर्ब की सेवा लिए जाने की बात पर सॉरी सर...चुनाव है, का हवाला दे दिया जाता है।

Tuesday, 31 January 2012

चुनावी चटकारे punjab election, 2012, patiala, chtkare- 7


क्या पोजीशन है?

नेता, कार्यकर्ता, समर्थक से लेकर वो आम आदमी जो हर सरकार से दुखी है और वोट देने की बजाए घर बैठ कर टेलीविजन का आनंद लेना चाहता है, आज एकमत से एक ही सवाल लिए खड़ा है कि क्या पोजीशन है? सही भी है आपे राच्य में आपके उपर हुकूमत करने एक सरकार बनने जा रही है और आपको खबर दही ना हो तो ये यही नहीं है।
लेकिन चटारे तब शुरु हो जाते हैं जब घाघ सियासतदान भी अदने से व्यक्ति से सवाल करने लग जाते है कि पोजीशन क्या है? और वो  बंदा भी टीवी एक्सपर्ट बन पूरा विश्लेषण देता है और फिर किसी ओर से पूछता  है कि यार पजीशन की है? एंवे ही है ना।

नाम रिसोर्ट का ही बताओ कुल्चे चाहे बाहर रेहड़ी पर हो जाएं

चुनावी सीजन में अपने बंदों के रिश्तेदारों को एक विधान सभा क्षेत्र विशेष में ले जाकर उम्मीदवार से मिलवाने का पूरा जोर लग रहा है। डोर-टू-डोर से कहीं आगे हो कर चल रही पर्सन-टू-पर्सन की मार्किंग में खर्च भी खासा हो रहा है।और आदर्श चुनाव आचार संहता पर तीखी निगाह रखने वाले किसी आब्जर्वर के बूते की भी बात नहीं है कि इस तरह के खर्च को दर्ज कर सके। लेकिन अपने बंदे ठहरे अपने बंदे वे भी 'शरीफ प्रचारकोंÓ का पूरा ख्याल रखे हुए हैं। किसी जमाने में लंच करने वाले अब जब भोजन पर आ गए हैं तो नाम लिया जाने लगा कि रास्ते में पड़ते रिसार्ट पर रुकते हैं। हुआ भी कुछ ऐसा ही लेकिन चटकारे तब शुरु हुए जब कुछ ने रिसार्ट के अंदर लंच किया तो कुछ ने रिसार्ट के बाहर रेहड़ी पर कुल्चे से पेट की च्वाला शांत की, पर नाम दोनों ही पक्षों ने रिसार्ट का लिया।

फोटो में वोटर का चेहरा ना आए

एक जमाना था जब लीडर अपने वोटरों की पहचान सार्वजनिक कर दावा करते थे कि ये उसके वोटर हैं जिसके दम पर वो चुनाव जीतेगा। दांव पेच कीद राजनीति हालांकि चलती रहती थी पर वो बड़े लीडरों अथवा रणनीतिक बढ़त देने वाले समर्थकों को तोडऩे तक सीमित रहती थी, लेकिन अब आलम ये है कि जो काम समर्थक आपके नाम पर किया करते थे और वोटर को किसी एफडी की तरह कैश किया करते थे अब वो सौदे सीधे होने लगे हैं तो लीडरों ने मीडिया पर ही पाबंदी लगाने के प्रयास शुरु कर दिए हैं। शहर के साथ लगते एक  क्षेत्र में नेता जी ने जैसे तैसे समर्थक तो जुटा लिए पर फोटो में वोटर का चेहरा ना आए इसके निर्देश लगातार देते रहे। अब या तो वोटर फिसलने का डर था या फिर आउट सोर्सिंग से मंगवाया गया वोटर पकड़े जाने का डर।

ओ बक्श दो यारों...

कार की किश्तें एक ही चुनाव से पूरी करने के इच्छुक एक  ब्रोकर को सुबह की सैर करने वालों का एक समूह यार कम और बगार च्यादा कहता रहा है। आलम ये है कि उनके आने से पहले ही यार...बगार, यार...बगार के नारे लगने लगते हैं। जनाब का दिल तो पहले ही चुनाव आयोग की आर्दश चुनाव  आचार संहिता तोड़ चुकी है, अब जब घर पर भी ताने सुनने सुनते समझ आने लगे तो जनाब भी दुहाई देने लगे हैं। ओ बक्श दो यारों...बस करो यारों...

इधर जाउं या उधर जाउं...

मतदान होने में दस तो चुनाव प्रचार खत्म होने में एक सप्ताह से कुछ च्यादा समय ही बचा है। लेकिन देरी से होमवर्क करने वाले कुछ लोगों के लिए अब भी सोचने का ही समय चल रहा है। पहले पहल सेफ प्ले का नारा देने वाले ये लोग अब पूरी तरह से उलझन में हैं ऊंठ किस करवट बैठेगा पहले इस आंकलन में समय निकाल दिया और अब सुबह उठते ही शुरु हो जाते हैं कि इधर जाउं कि उधर जाउं... जनाब गाड़ी छूट चुकी है अब कहीं ना जाइए और शांति से बैठ जाइए।

उनकी भी कुछ मजबूरियां रही होंगी

हर तरफ बटोरने का सीजन चल रहा है, कोई वोट बटोर रहा है तो कोई बोटी और कोई वोट के नाम पर रोट बटोर रहा है। मतलब हर किसी को अपने धंधे पानी से है। लोकतंत्र में अगले पांच साल क्या होगा? ये सब बाद में देखा जाएगा अभी तो अपना काम निकलवाना ही सर्वोपरि है। लेकिन इंसान को झटका तब लगता है जब उम्मीद टूटती है। ऐसा ही झटका एक सलाहकार को लगा जब वो बेगानों को तो दुरुस्त करता चल गया पर 'अपनोंÓ को ग्रेस अंक देता कहता चला गया, आखिर उनकी भी कुछ मजबूरियां रही होंगी।



माघ है देखते हैं किसने तिल खाएं हैं और दान किए हैं

चुनावी चटकारे punjab election, 2012, patiala, chtkare- 6


 ये मोबाइल भी 30 शाम पांच बजे तक

चुनावी दौर में हर तरफ बदलाव दिखाई दे रहे हैं। जिस किसी नेता को लोकतंत्र में चुनाव लडऩे का मौका किसी ना किसी पार्टी के टिकट पर अधिकृत प्रत्याशी के रूप में मिला है और नेता जी पहले से चुनाव लडऩे का अनुभव रखते हैं तो उन्होंने पहला काम तो अपना मोबाइल नंबर बदलने का किया है। हालांकि जो नंबर पहले नेता जी के हाथ में हुआ करता था वो अब उनके आफिस की शोभा बढ़ाता हुआ लोगों के साथ संपर्क साधे हुए है, वहीं किसी करीबी की पहचान पर लिया गया नया नंबर हालांकि तेजी से अपनी पहचान बना रहा है पर चुनावी चटकारे लिए जा रहे हैं कि इसे भी च्यादा तवच्जो देने की जरूरत नहीं है। नया नंबर भी 30 जनवरी शाम पांच बजे तक के लिए है। इसके बाद ये भी आउट आफ कवरेज एरिया ही मिलेगा।

इना दे लारे ने मैं तां सीट...

दो पार्टियों से लगातार पांच सालों में टिकट लेने के मामले में खता खा चुके और चुनावों से ठीक पहले दोनों को ही दगा दे चुके एक नेता जी शुरु से ही किंग की तरह रहे और जिए फिर लोकतंत्र में किंग मेकर की भूमिका में रहे। इस बार खुद हाथ आजमाने निकले हैं। नेता जी का मानना है कि लोगों के लिए बहुत किया है अब देखना है कि हमे कितना पसंद करते हैं? इसी जोर आजमाइश के बीच किसी सलाहकार ने अपने हक समझते हुए बताया कि आपके बारे में इस बार का हाईकमान अच्छा सोच रहा है अगली बार आपकी टिकट पक्की है । इस पर तुरंत जवाब आया ऐह तां इना दे लारे ने, करदे कित्थे ने, मैं तां सीट कड्ड रेहा हां।

पंजाब में मीरी पीरी का शासन रहा है

भजन-कीर्तन-पाठ-पूजा कर आम दिनों में आम आदमी की सेवा में मसरूफ रहने के साथ ही अपने लिए भी काम की तलाश कर चुके नेता जी को भी इन दिनों अपना मुख्य काम मिला हुआ है और राष्ट्रीय स्तर के नेता जी प्रदेश भर में दौरे कर अपने नए ग्राहक तलाश रहे हैं, जिनके दम पर अगले चुनाव तक रोटी चलानी है। हालांकि नेता जी का अपना फंडा तो क्लीयर है कि क्या करना है? पर जब एक समर्थक ने पूछ लिया कि ये तो हमारा काम नहीं है। हमारी दाल-रोटी जहां से निकल रही है वहीं च्यादा ध्यान लगाना चाहिए। इस नेता जी ने मूर्ख भक्त को प्रवचन दे डाले अरे हमारा संविधान भी इसे ही मुख्य काम बताता है और उपर से पंजाब है यहां तो मीरी पीरी का राज रहा है।

लड्डू फूटा क्या?

पुरानी कहावत है कि लड्डू फूटेगा तो चूरा होगा और फैल कर बिखरेगा। एक व्यक्ति के लिए ये संभव नहीं कि आराम से फूटे हुए लड्डू को खा ले, ऐसे में लड्डू के मालिक की मजबूरी हो जाती है कि बांट ही दिया जाए। लेकिन ये तभी होगा जब लड्डू फूटेगा, इसके बांटने का चलन चलता आ रहा है। लेकिन इन चुनावों में हालात कुछ ऐसे बने हुए हैं कि चूर-भूर का इंतजार करने वालों को अब तक मायूसी ही मिली है। आलम ये है कि अब चारों ओर से आवाजें आ रही हैं कि लड्डू फूटा क्या?

यार तू तो दो दिन से एमएलए बनने से रह गया

दिखने में टीम अन्ना के सदस्य सा लगने वाला एक उत्साही युवक बीते दिन नामांकन पत्र दाखिल करने अकेला ही अपनी पीठ पर बैग लटकाए निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में जा पहुंचा। बात नामांकन पत्र के दाखिले से शुरु हुई तो दस्तावेज थमाते हुए उक्त युवक ने अपना पर्चा लेने के लिए। इस पर चुनाव अधिकारी उसे अकेला देख समझाने बुझाने लग गए, वहीं पूरी तरह से कुछ ऐसे ही सवालों के जवाबों से लेस होकर आए उक्त युवक को आखिरकार कागज जांचने भेज दिया गया। जांच में पाया गया कि मात्र दो दिनों की आयु कम होने के चलते नामांकन पत्र दाखिल नहीं हो पाया तो चटकारे भी शुरु हो गए कि यार तू तो दिन से एमएलए बनने से रह गया।

ये राजनीति है डियर, राज नहीं है

दूसरी बार चुनाव लड़ रहे एक नेता जी अपनी आलीशान हवेली में से निकल कर चुनाव प्रचार में धूल फांकने निकले एक युवा नेता को जब कस्बे की गलियों में नुक्कड़ सभा में अपनी ही पार्टी के युवा कार्यकर्ता की सलाहों से दो चार होना पड़ा तो नेता जी तुनक गए और माथे पर बल लाकर बोल 'ले तू ही बोल लेÓ। इस पर मुहल्ले में तुरंत ही प्रतिक्रिया शुरू हो गई कि ये राजनीति है डियर, राज नहीं है। यहां बहुत कुछ सुनना और बर्दाश्त भी करना पड़ता है।

मैं तां बहुत शरीफ हां

चुनावों में जुगाड़ी राजनीति करने के माहिर एक नेता जी को क्षेत्र की राजनीति विशेष रूप से एक दल की दलगत राजनीति का खासा अनुभव है। वे अपने इस काम में खासी महारत भी रखते हैं, उनकी इसी बात पर सभी कायल भी हैं लेकिन पता नहीं क्या बात है चुनाव खत्म होने के साथ ही कभी नेता जी बदल दिए जाते हैं और कभी नेतृत्व बदल जाता है। इस बार भी नेता जी को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है और अधिकार दिया गया है कि खुल कर खर्च कर लेना बाद में सब हो जाएगा। वहीं नेता जी ने पैसे ना लेने की बात कह मुफ्त में सेवा के बदले आशीर्वाद की मांग रख दी साथ ही दोस्तों में कहना शुरु किया या मैं तां बहुत शरीफ हां।

ये शादी आखिर है किसकी, चलो छड्डो...

चुनाव आयोग की आदर्श चुनाव आचार संहिता का डंडा किस कदर चल रहा है, इसके परिणाम अब वास्तिवक रूप में दिखने लगे है। पंजाब में जहां आम दिनों में छठा दरिया बहता रहता है वहीं चुनाव के दिनों में ये पूरे उफान पर रहता है, लेकिन इस बार आलम ये है कि खुद चुनावी लोकतंत्र में भाग ले चुके पार्षद स्तर के नेता भी शाम को इंतजाम ना होने की सूरत में भटक रहे होते हैं। आलम ये है कि एक नेता जी शादी की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम में किसी के बुलाने पर पहुंच गए। सीधी पहचान तो थी नहीं सो मौके पर ही करीबी से पूछने लगे ये शादी आखिर है किसकी? इसी बीच लोगों को आता देख चलो छड्डो... कह कर छठे दरिया की ओर बढ़ गए।  

चुनावी चटकारे punjab election, 2012, patiala, chtkare


 सनडे मतलब मेनटेनेंस डे

आदर्श चुनाव आचार संहिता लगी हो तो हर तरफ सरकारी बाबू का डंडा चलता नजर आता है, जन प्रतिनिधि के नाम पर मिलने वाली छूट इन दिनों में गायब है पर इन सबके बावजूद सनडे तो सन-डे ही है। सर्दियों में कई दिनों बाद सन दिखाई दे तो सन का महत्व और बढ़ जाता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ चुनाव सिर पर है फिर भी सब कुछ ठीक वैसे ही चल रहा है जैसे लोकतंत्र के राज में चलता है। ऐसे ही लंबी सर्दी के बाद धूप में बाल सुखा रहे एक नेता जी से जब पूछा गया तो उन्होंने टका सा जवाब दिया अरे भई सनडे का मतलब होता है मेनटेनेंस डे। इस दिन आप अच्छे से खुद को संवारे और वे सभी काम करें जो रूटीन में नहीं कर सकते लेकिन किए जाने चाहिए। शरीक की मेनटेनेंस करना भी तो जरूरी है।

तुम बुद्धा बनो बुद्धू नहीं

शहर में आयोजित एक कार्यक्रम में निमंत्रण को लेकर चर्चा चल रही थी। भाई चारे में से ही एक ने आवाज लगाई कि क्या बात है? कहां से आ रहे हैं? बताया गया कि शहर में कुछ खास है नहीं। तुरंत ही जवाब दिया गया कि अरे इतना बड़ा कार्यक्रम हो रहा है तुम गए नहीं। जनाब ने समझा ये तो बड़ी गलती हो गई, इधर उधर हाथ पांव मारने के बाद भी जब कुछ नहीं पता चला तो सुरक्षा एजेंसी में अपनी हाजरी लगवाने कार्यक्रम बताने वालों से ही पूछ डाला कि आखिर वहां हुआ क्या था? इस पर फिर कहा गया कि तुम बुद्धा बनो हमें बस यही चाहिए बुद्धू नहीं, महल छोड़ो और शांति की तलाश में भटको...।


अरे नाम में क्या है, यार तो अपना ही है

शाम की दवा से दूर का भी नाता ना रखने वाले एक नेता जी की खासी इच्जत है और उनके आदर्शवादी रवैये और मिलनसार स्वभाव के साथ हर किसी की मदद के लिए तत्पर रहने के चलते सभी इच्जत भी करते हैं, हालांकि यह भी उनकी आदतों में शामिल है कि कोई इच्जत ना करे तो वे करवा भी लिया करते हैं। हुआ कुछ ऐसा की नेता जी के एक खाने पीने वाले मित्र के नंबर की जरूरत उनके ही एक अन्य मित्र को आन पड़ी। मित्र ने पूरा नाम बता कर जब नंबर मांगा तो नेता जी मुकर गए, कहा ऐसे किसी व्यक्ति को वे नहीं जानते, एक बार फिर याद दिलाने पर नेता जी ने निकनेम ले कहा अरे नाम में क्या रखा है, यार तो अपना ही है। पर चटकारे लिए जा रहे हंै कि असल बात तो दवा ना लेने के चलते कम होती याददाश्त की है...संभालों इसे।


आपने तो पापूलर कर दिया

हाल ही में एक राजनीतिक दल में सताए गए नेता ने अपने ही उम्मीदवार के खिलाफ मोर्चा खोल डाला। मोर्चा भी पूरे पोल खोल अंदाज में। इतना ही नहीं नेताजी ने पक्के पैर हो लिखित शिकायत करते हुए, इन साइड स्टोरी भी बना डाली अपने दल बदलु होने को अपनी योग्यता बताते हुए नेता जी दावा भी ठोक डाला कि जब वे अपने आज के विरोधी के करीबी होते थे तो बहुत से लोग रात में आ कर हाजरी भरते और दिन में अपनी पार्टी के लिए नारेबाजी किया करते थे, अगर उनका मुंह खुलवाया गया तो कोई नहीं बचेगा। पार्टी चाहे तो कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती है। वहीं आरोप झेल रहे नेताजी ने भी राजनीतिक दांव खेल सारा पासा पलटा दिया कहा आपने तो शिकायत कर हमारा काम आसान कर दिया। शिकायत ने तो और पापूलर कर दिया है।


जाओ कहीं भी बात बस चुनाव की

विधान सभा चुनावों केलिए चल रहे नामांकन पत्र भरने के दौर में आप कहीं भी चले जाएं, आपको चुनावी विश्लेषक मिल जाएंगे। विवाह, किटी अथवा मकान के उदघाटन के लिए होने वाले समारोहों में सजी हर मेज पर जहां राजनीति की बिसात बिछी है वहीं बच्चे के बर्थ डे से लेकर बुजुर्ग के संस्कार तक में शामिल होने वाले भी अपना एजेंडा साथ लेकर घर से निकलते हैं और संस्कार में जाते ही सबसे पहले अपनी आडियंस तलाश कर कार्रवाई शुरु कर देते हैं। रीति रिवाज के विपरीत देहांत को मौसम और उम्र से जोड़ सारी बात एक ही सांस में निपटा दी जाती है और फिर चुनाव, चुनाव और चुनाव की रट शुरु हो जाती है।

अब नहीं जलते संतों के लाटू

पर्ची से हथियार और लड्डू से लंगर तक पर अपना डंडा चलाने वाले चुनाव आयोग ने पोस्टर व प्रतिमाओं को तो लपेट लिया पर अभी आत्मा से परमात्मा का मिलन आदर्श चुनाव आचार संहिता से परे है। ऐसे ही प्रतिष्ठित व्यक्ति के यहां हुए देहान्त पर अफसोस प्रकट करने वालों की कतार लगी हुई थी। सेकेंड लाइन नेताओं का भी खासा जमावड़ा लगा। उम्मीदवार भी पहुंचे पर आयोग कहीं उन्हें देखकर खर्चा ना जोड़ दे ऐसे में च्यादा देर नहीं ठहरे। वहीं हर तरफ चुनावी खर्च पर चल रही चर्चा में यह भी बताया गया कि यहां आकर सभी व्यक्ति संत हो जाते हैं और और हर आत्मा महान हो जाती है,पर किसी का लाटू यहां आते ही बुझ जाता है तो किसी का थोड़ी देर बाद तो किसी का जल्दी, और बाकी का शमशान से निकलते ही।


आबजर्वेशन है, तरीके से क्या लेना

चुनाव आयोग के डंडे तले हर तरफ बजते हूटर आबजर्वर के आने की आहट दे देते हैं। आम आदमी को हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता पर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार, उनके रणनीतिकार और कट्टर समर्थकों को अंदर तक डरा देते हैं। संभव है आबजर्वरों को इस बात का अहसास हो लेकिन दिन भर चुनाव आयोग का डंडा चलाते चलाते वे भी बोर होने लगे हैं। ऐसे ही एक अधिकारी दिन में लाटरी का टिकट लेने से लेकर शहर के दशकों पुराने परिचित की तलाश में निकल पड़े। सवाल उठा तो बताया गया कि आबजर्वर हैं, आबजर्वेशन हो रही तरीके से क्या लेना। अरे भाई बात अगर यही है तो लाल बत्ती से भी क्या लेना वैसे ही कर लो।

मंहगाई है... रेट भी दोगुने हो गए हैं

निसंदेह पिछले विधान सभा चुनावों के बाद से मंहगाई खासी बढ़ी है, लेकिन मंहगाई का असर करीब तीन साल पहले हुए लोक सभा चुनावों के बाद से च्यादा दिखाई दे रहा है और मुद्रास्फीति के वास्तविक आंकड़ों का हवाला शहर के एक प्रोफेशनल व्यक्ति ने इन्हीं चुनावों में फीड बैक के रूप में दिया तो पुराना ग्राहक भी दौड़ गया। बताया गया कि आम भाषा के सेवा शुल्क को कंसलटेंसी चार्जेज बताने वाले जनाब ने जब दाम साढ़े चार गुना बताए और साथ ही कहा कि दो गुने दाम तो मंहगाई से वैसे ही हो जाते हैं। अब तो रेट भी दोगुने हो गए हैं। बाकि सरचार्ज है।

पटियाला जिले में मतदान से चार दिन पहले के हालात, punjab election, trends, 4 days before election


 
कांग्रेस- 4 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण, नाभा, सनौर
अकाली-4 समाना, शुतराणा, घनौर, राजपुरा

कड़ा मुकाबला- घनौर, राजपुरा, सनौर


पिछला रिकार्ड
कांग्रेस-6 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण, समाना, शुतराणा, सनौर, घनौर, नाभा
भाजपा- 1 राजपुरा
 अकाली- 1 बनूड़ अब डेरा बस्सी हुई




1 पटियाला शहर
मुकाबला एकतरफा व कैप्टन अमरिंदर के पक्ष में है। 

अकाली उम्मीदवार सुरजीत सिंह कोहली व उनके मेयर पुत्र की ओर से भी हल्का प्रचार ही किया जा रहा है। मेयर एक घंटे में एक ही स्थान पर जा रहे हैं, जबकि कैप्टन अमरिंदर की बेटी रोजाना और पत्नि एक दिन छोड़ कर आ रही हैं।

2 पटियाला ग्रामीण
मुकाबला त्रिकोणीय पर कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा की बढ़त

निर्दलीय सतबीर सिंह खटड़ा के आक्रमक प्रचार के चलते ग्रामीण व युवा वर्ग का वोट बैंक अकालियों कुलदीप कौर टोहड़ा के हाथ से फिसल रहा है, शहर में रूझान उन्हें समझ नहीं आ रहा। जबकि ब्रहम महिंदरा शहर के त्रिपड़ी टाउन में बहावलपुर बिरादरी के अलावा पुराने लोगों को साथ लेने में सफल हो गए हैं।  

3 समाना
अकाली उम्मीदवार सुरजीत रखड़ा बढ़त बनाए हुए हैं। 

कांग्रेस के रणइंद्र सिंह अपने बठिंडा क लोगों को साथ लेने के अलावा दो पूर्व अकालियों पूर्व विधायकजगतार सिंह राजला और गुरकीरत सिंह थूही को साथ लिए घूम रहे है। उनकी उम्मीद परनीत कौर पर ही टिकी है जबकि रखड़ा घबराए हुए जरूर हैं और बेहद संभल कर कदम रख रहे हैं।  

4 सनौर
मुकाबला फंसा है कांग्रेस के लाल सिंह परेशान

अकाली तेजिदंर पाल संधू ने घाघ सियासतदान कांग्रेस के लाल सिंह को कड़ी टक्कर दे रखी है। उम्मीद के विपरीत परीसीमन के बाद जुड़े गांवों में लाल सिंह कमजोर हैं तो पुराने क्षेत्र में उनके विरोध में भी आवाजें आ रही  हैं। इस बार अकाली दल से कोई भी बागी नहीं है।

5 शुतराणा

अकाली दल के पक्ष में हवा बनने लगी
 
कैप्टन अमरिंदर की रैली से उम्मीदें लगाए बैठे निर्मल सिंह शुतराणा दो बार भावनाओं के सहारे जीते हैं लेकिन इस बार अकाली दल का टिकट चुनाव, बनिंदर कौर लूंबा, खासा सही साबित हो रहा है। अकाली बहुल मानी जाती सीट पर परनीत कौर के आने के बाद से हालात बदले रहे थे पर अब सुखबीर का असर दिख रहा है। एसओआई मुद्दा बन रही है।

6घनौर
मुकाबला त्रिकोणीय, गणित अकालियों के पक्ष में आने लगा

अकाली दल के बागी हुए और कैप्टन अमरिंदर के पुराने सहयोगी भाउ भाईचारा के प्रधान बलविंदर सिंह सैफदीपुर ने दोनों के समीकरण बिगाड़ रखे हैं। परीसीमन के बाद दो साल पहले तक अकाली दल के लिए पक्की समझी जा रही सीट का गणित अब अकालियों के पक्ष में आरहा है। भाउ भाईचारा कांग्रेस के वोट ज्यादा तोड़ रहा है, कामरेड व जसजीत रंधावा के समर्थक मदन लाल जलालपुर से दूरी बनाए हुए हैं।

7 राजपुरा
भाजपा के राजखुराना असहज पर अब हालात पक्ष में

बहावलपुरी बिरादरी में कुछ लोगों की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई, कांग्रेस के कंबोज पर लगा बाहरी का ठप्पा अब हल्का पड़ गया है, आसपास के गांवों विशेष रूप से बनूड़ के पास, में कांग्रेस को समर्थन मिल रहा है।    

8 नाभा

लोगों को नही है दिलचस्पी, हवा कांग्रेस के पक्ष में

दोनों ही उम्मीदवारों के बाहर से आने पर स्थानीय वोटर को दिलचस्पी नहीं है। कांग्रेस के साधु सिंह धर्मसोत का खुला विरोध नहीं है वहीं अकाली दल में लालका को टिकट ना दिया जाना चर्चा में है।    

पटियाला जिले में मतदान से दस दिन पहले के हालात,punjab election, trends, 10 days


कांग्रेस- 2 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण
अकाली-2 समाना, शुतराणा
मुकाबले में- 3 सनौर, घनौर, राजपुरा
सुस्त रुझान- 1 नाभा

पिछला रिकार्ड
कांग्रेस-6 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण, समाना, शुतराणा, सनौर, घनौर, नाभा
भाजपा- 1 राजपुरा
 अकाली- 1 बनूड़ अब डेरा बस्सी हुई




1 पटियाला शहर
मुकाबला एकतरफा व कैप्टन अमरिंदर के पक्ष में है। 

अकाली उम्मीदवार सुरजीत सिंह कोहली व उनके मेयर पुत्र की ओर से भी हल्का प्रचार ही किया जा रहा है। मेयर एक घंटे में एक ही स्थान पर जा रहे हैं, जबकि कैप्टन अमरिंदर की बेटी रोजाना और पत्नि एक दिन छोड़ कर आ रही हैं।

2 पटियाला ग्रामीण
मुकाबला त्रिकोणीय पर कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा की बढ़त

निर्दलीय सतबीर सिंह खटड़ा के आक्रमक प्रचार के चलते ग्रामीण व युवा वर्ग का वोट बैंक अकालियों कुलदीप कौर टोहड़ा के हाथ से फिसल रहा है, शहर में रूझान उन्हें समझ नहीं आ रहा। जबकि ब्रहम महिंदरा शहर के त्रिपड़ी टाउन में बहावलपुर बिरादरी के अलावा पुराने लोगों को साथ लेने में सफल हो गए हैं।  

3 समाना
अकाली उम्मीदवार सुरजीत रखड़ा बढ़त बनाए हुए हैं। 

कांग्रेस के रणइंद्र सिंह अपने बठिंडा क लोगों को साथ लेने के अलावा दो पूर्व अकालियों पूर्व विधायकजगतार सिंह राजला और गुरकीरत सिंह थूही को साथ लिए घूम रहे है। उनकी उम्मीद परनीत कौर पर ही टिकी है जबकि रखड़ा घबराए हुए जरूर हैं और बेहद संभल कर कदम रख रहे हैं।  

4 सनौर
मुकाबला फंसा है कांग्रेस के लाल सिंह परेशान

अकाली तेजिदंर पाल संधू ने घाघ सियासतदान कांग्रेस के लाल सिंह को कड़ी टक्कर दे रखी है। उम्मीद के विपरीत परीसीमन के बाद जुड़े गांवों में लाल सिंह कमजोर हैं तो पुराने क्षेत्र में उनके विरोध में भी आवाजें आ रही  हैं। इस बार अकाली दल से कोई भी बागी नहीं है।

5 शुतराणा

कांग्रेस के पक्ष में अभी हवा नहीं
कैप्टन अमरिंदर की रैली से उम्मीदें लगाए बैठे निर्मल सिंह शुतराणा दो बार भावनाओं के सहारे जीते हैं लेकिन इस बार अकाली दल का टिकट चुनाव, बनिंदर कौर लूंबा, खासा सही साबित हो रहा है। अकाली बहुल मानी जाती सीट पर परनीत कौर के आने के बाद से हालात बदले हैं।

6घनौर
मुकाबला त्रिकोणीय, गणित समझना मुश्किल 

अकाली दल के बागी हुए और कैप्टन अमरिंदर के पुराने सहयोगी भाउ भाईचारा के प्रधान बलविंदर सिंह सैफदीपुर ने दोनों के समीकरण बिगाड़ रखे हैं। परीसीमन के बाद दो साल पहले तक अकाली दल के लिए पक्की समझी जा रही सीट का गणित समझना अब मुश्किल है। लेकिन भाउ भाईचारा कांग्रेस के वोट ज्यादा तोड़ रहा है।

7 राजपुरा
भाजपा के राजखुराना असहज हुए

बहावलपुरी बिरादरी में कुछ लोगों की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई, कांग्रेस के कंबोज पर लगा बाहरी का ठप्पा अब हल्का पड़ गया है, आसपास के गांवों में कांग्रेस को समर्थन मिल रहा है।    

8 नाभा

लोगों को नही है दिलचस्पी

दोनों ही उम्मीदवारों के बाहर से आने पर स्थानीय वोटर को दिलचस्पी नहीं है। कांग्रेस के साधु सिंह धर्मसोत का खुला विरोध नहीं है वहीं अकाली दल में लालका को टिकट ना दिया जाना चर्चा में है।    

पर्यावरण बचाने बना मोर्चा पर चर्चा सीमित, punjab election, issues, enviornment,


 मुद्दा पर्यावरण
 भूपेश चट्ठा, पटियाला
हम यूरोप से डेढ़ सौ साल पीछे हैं, जिस इंडस्ट्री को वहां प्रदूषण के चलते बंद कर दिया गया उसे हमारे यहां भेजा जा रहा है और हम प्राकृतिक कानून के विपरीत काम कर रहे हैं, यही वजह है कि पर्यावरण में सुधार और जल संरक्षण की बजाए प्रदूषण का ग्राफ बढ़ रहा है। पंजाब का पर्यावरण बचा जल सरंक्षण को अनिवार्य करने और सभी राजनीतिक दलों में अलख जगाने पर्यावरण प्रेमी एक मंच पर आए जरूर हैं पर राजनीतिक दलों व चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों की ओर इस पर  इस पर चर्चा बिलकुल नहीं की जा रही है।

पंजाब का एकमात्र खनिज है पानी 
देश के हर राज्य में किसी ना किसी तरह के खनिज पदार्थ निकलते है, इसमें कोयला और पत्थर से लेकर सोना और टंगस्टन, बिजली बल्ब का एलीमेंट, तक शामिल हैं और संबंधित राज्यों के चुनावों में हर बार मुद्दा जरूर बनते हैं। यह चाहे रायल्टी के लिए बने या फिर भ्रष्टाचार के रूप में, लेकिन इन पर चर्चा जरूर होती है। इन्हें संरक्षित करने, बचाने, संयम से प्रयोग करने के वायदे किए जाते हैं, पर पंजाब के एकमात्र खनिज पदार्थ पानी को बचाने की दिशा में कोई बात नहीं हो रही  है।
दिलचस्प है कि हिमाचल प्रदेश की ओर से पानी में से बिजली निकाल लेने और पंजाब को 'फोकाÓ पानी देने जैसे मुद्दों पर पंजाब में कभी चुनाव लड़े और जीते भी गए है पर पानी में मिल रहे जहर को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया।

प्राकृतिक स्रोत है मौसम व हवा

सर्दियों में कड़ाके की ठंड और गर्मियों में चिलचिलाती धूप, 0 डिग्री से 48 डिग्री के बीच झूलने वाले पंजाब की आबोहवा ही कुछ ऐसी है कि यहां साल में तीन दमदार फसलें ली जा सकती है, लेकिन प्राकृति के अंधाधुंध तरीके से किए गए दोहन का सिलसिला जारी है।

सब सोयल एक्ट पास कर भी लाभ नहीं

शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने क्या किया? और क्या नहीं? ये एक अलग मुद्दा हो सकता है पर  वर्तमान सरकार धान की फसल की बिजाई और रोपाई का समय सुनिश्चित करने बनाए गए कड़े कानून का लाभ नहीं ले सकी है। दिलचस्प है कि शुरु में खेत मजदूरों की कमी का हवाले दे आलोचना का शिकार हुए इस कानून की अब किसान भी तारीफ कर रहे हैं। किसानों को जल सरंक्षण का आर्थिक लाभ हर तीसरे साल होने वाले बोर के खर्च से बच कर मिला है।

पराली का जलना जारी

धान की पराली को जलाने से होने वाले दुष्प्रभावों पर जागरुकता तो पिछले चुनावों से इन चुनावों के बीच आ गई है पर पराली जलाने का सिलसिला अभी जारी है। याद रहे कि दो साल पहले की तुलना में पिछले अक्टूबर में पराली जलाने पर किसानों पर दर्ज होने वाले मामले नगण्य ही रहे हैं। जबकि एलर्जी व सांस के मरीजों, बच्चों व बुजुर्गो को कई क्षेत्रों में मिली राहत का 'लाभÓ राजनीतिक दल नहीं ले रहे हैं। 

'वातावरण अते समाज बचाओ मोर्चाÓ  

हालांकि इस बार चुनावों से ठीक पहले प्रदेश के पानी और खुराक को जहर मुक्त करने 'वातावरण अते समाज बचाओ मोर्चाÓ का गठन किया गया है। सामूहिक नेतृत्व में चलने वाले इस मोर्चे में खेती विरासत मिशन, कुदरत मानव केंद्रीय सभा, लोक लहर, इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी, पंजाबी सत्थ, भारतीय किसान यूनियन के तीन घटक सिद्धूपुर, डकोंदा, राजेवाल जैसे संगठन शामिल हैं। नेतृत्व करने वालों में बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल, ज्ञानी केवल सिंह, डा. जीपीआई सिंह, प्रो. जगमोहन सिंह, उमेंद्र दत्त जैसे नाम शामिल हैं।
 

प्रदूषित पानी पार्टी या विचारधारा नहीं देखता

खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त कहते हैं कि जिस पानी को पीकर केंसर हो रहा है वो किसी की पार्टी या विचारधारा नहीं देखता। यह किसी को भी हो सकता है और इसके लिए जिम्मेदार भी सभी होंगे। पंजाब में गुजरात व राजस्थान से च्यादा डार्क जोन बन गए हैं। राच्य में जो भी सरकार बने वो पर्यावरण इमरजेंसी घोषित करे और सबसे पहले हमारे प्राकृतिक जल संसाधन बचाने की दिशा में जल संरक्षण अधिनियम समय बद्ध तरीके से लागू करे। 

चुनाव आयोग से मांग 

चुनावी घोषणा पत्र में औपचारिकता के रूप में रखे जाने वाले आदर्श स्लोगनों या लच्छेदार बातों को बाद में राजनीतिक दल भूल ना जाएं इसके लिए पहली बार आस्तित्व में आए इस मोर्चे ने चुनाव आयोग से मांग की है कि राजनीतिक दलों की ओर से जारी होने वाला घोषणा पत्र कानूनी दस्तावेज हो और इसे लागू ना करने वाले दलों को अगला चुनाव लडऩे से रोकने का प्रावधान भी होना चाहिए।  

प्राकृति के नियम के विपरीत करते हैं काम

मालवा के पानी में यूरेनियम के अंश पाए जाने की यूरोप के अध्ययन को सामन रखने वाले कम्यूनिटी मेडिसन के विशेषज्ञ व जाने माने पर्यावरणविद् डा. अमर सिंह आजाद कहते हैं कि पंजाब के अलावा हरियाणा व हिमाचल प्रदेश की इंडस्ट्री का टॉक्सिक जल, कई तरह के हैवी मैटल व रसायनिक तत्वों के साथ और यहां के शहरों का सीवरेज लगातार दरिया व बरसाती नालों में उड़ेला जा रहा है। जो प्राकृति के नियम के विपरीत है। जो पानी एक बार ले लिया जाता है, उसे वापिस नदी अथवा नाले में नहीं डाला जाता, उस पानी का शोधन कर खेती में सिंचाई के लिए प्रयोग करना होता है। लेकिन यहां पर सारी इंडस्ट्री लगाई ही नदी किनारे जाती है, सरकार सोई रहती है और खुद अनुमति देती और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी सारी उम्र में एक भी इंडस्ट्री अथवा प्रदूषण फैलाने वाले को सजा नहीं दिलवा पाता।

जिस पानी की खाते कसमें वो कत्ल करने लगा

सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम डा. पीपी खोसला कहते हैं कि पंजाब के जिस पानी की कसमें खाई जाती थी अब वो पानी कत्ल करने लगा है। जिस पर कभी लोक गीत लिखे जाते थे, वो बहता पानी तो कई साल पहले गंदा कर दिया अब तो रिस कर धरती के नीचे पहुंचा पानी बीमारियां दे रहा है। 

आने वाली सरकार को परामर्श

 
-आने वाली सरकार को हर दिशा में काम करना होगा
-नियम कानून को सख्ती से लागू करने के अलावा
-घटिया और पुरानी पड़ चुकी तकनीक को पंजाब आने से रोकना होगा, जिससे शराब फैक्ट्रीयों की बाढ़ ना आए, कोयला आधारित थर्मल प्लांट ना आएं।
-पेस्टीसाइड व रसायनिक खादों का प्रयोग कम कर प्राकृतिक खेती की ओर ले जाना 
-शहरों में बड़े पैमाने पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने होंगे
-रेन वाटर हारवेस्टिंग और वाटर रिचार्जिंग अनिवार्य हो
-प्राकृतिक स्रोतों के आसपास के इलाकों को अवैध कब्जों से मुक्त करवाए
-जल स्रोतों में उड़ेले जाने वाले जहर को रोका जाए
-पुराने स्रोतों को पुर्नजीवित किया जाए।

 तभी जीवन चक्र में प्रवेश कर चुके टॉक्सिक ततव निकाले जा सकेंगे अन्यथा कैंसर के रूप में ये फूटते रहेंगे।

मुकाबला अनुभव और युवा विचारों के बीच, punjab election, sanour, constituency,


 विधान सभा क्षेत्र :-सन्नौर
कांग्रेस-लाल सिंह
शिअद-भाजपा-तेजिंदर पाल सिंह संधू
 वोटर:-एक लाख 75 हजार 409


भूपेश चट्ठा, पटियाला
पुराने विधान सभा क्षेत्र डकाला के अधिकांश हिस्सों से बने सन्नौर क्षेत्र को चाहे नया नाम मिल गया हो लेकिन यहां की समस्याएं व चुनावी मुद्दों में कोई च्यादा बदलाव नहीं आया है, अलबत्ता हांसी-बुटाना नहर के नाम से एक नया जिन्न जरूर जुड़ गया है। हालांकि परंपरागत प्रतिद्विंयों की बजाए इस बार मुकाबला अनुभव और युवा विचारों के बीच होने जा रहा है।
तेजिंदर सिंह संधू
ताकत:-
परिवार ने दिए आठ एमएलए, टकसाली अकाली वोट, युवा शिक्षित चेहरा, प्रबंधन कुशलता, पहला चुनाव होने के चलते पार्टी में विरोध नहीं, सभी विरोधी अन्य क्षेत्रों में एडजस्ट
कमजोरी:-
देरी से चुनाव प्रचार शुरू, प्रत्यक्ष चुनाव में भागीदारी पहली बार, मुकाबला 25 सालों से क्षेत्र में डटे घाघ सियासतदान से
किन मुद्दों पर लड़ रहे हैं:-
वर्तमान सरकार की ओर से किए गए विकास कायों के अलावा जनता के सामने चार बार विधायक और दो बार के मंत्री लाल सिंह की ओर से समस्याएं हल ना करवाने की बात रखेंगे। क्षेत्र में पहला गल्र्स कालेज खुलवाना, रोजगार दिलवाने देवीगढ़ रोड पर फोकल प्वाइंट बनवाना और पिछड़े क्षेत्र की सभी सुविधाएं व लाभ दिलवाना, तकनीकि स्र्वे करवा कर बाढ़ की समस्या का स्थायी उपाय करना।

लाल सिंह: फोटो 28
ताकत:-
चार दशकों से क्षेत्र की राजनीति में गहराई से जुड़े हैं, ऊर्जा मंत्री रहते हुए बिजली ग्रिड अंडर लोड किए, मंत्री रहते हुए सड़कें दुरुस्त की, चुनाव लडऩे का लंबा अनुभव, कंबोज बिरादरी का समर्थन
कमजोरी:-
वायदे पूरे नहीं कर सके, बाजीगर व हरिजनों जातियों के लोगो को चार-चार मरले के प्लाट देना, लंबे समय से पंचायती जमीनों पर बसे लोगों को वो अलाट कर किश्तों में मुआवजा लेना, पिछड़े क्षेत्र से निकाले गए गांवों का मुद्दा नहीं उठा सके।

किन मुद्दों पर लड़ रहे हैं चुनाव:-

 घग्गर नदी को चैनेलाइज करने वर्तमान सरकार की असफलता, केंद्र के पैसे का प्रयोग ना करना, जिस तरह से बिजली के मामले में ओवर लोड बलबेड़ा ग्रिड पर से दवाब कम हुआ वैसे ही सारा क्षेत्र करना, मीरांपुर चौ, टांगरी, मारकंडा व पटियाला की राव जैसे बरसाती नालों की पिछली सरकार के समय की गई खुदाई समान सफाई व किनारों की मजबूती करना, एयरकंडीशंड आधुनिक सब्जी मंडी बनवाने का श्रेय लेना।

दो धनाड्डों ने बनाया समाना को अति महत्वपूर्ण सीट, punjab election, samana, constituency,


  विधान सभा क्षेत्र :-समाना
कांग्रेस-रणइंद्र सिंह
शिअद-भाजपा-सुरजीत सिंह रखड़ा
 वोटर:-एक लाख 51 हजार 560

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में विधान सभा चुनावों की बात होती है तो अक्सर मुख्यमंत्री व पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश प्रधानों के ही क्षेत्र चर्चित व प्रतिष्ठित की श्रेणी में आते हैं, लेकिन पटियाला, लंबी, गिदड़बाहा और लहरगागा की कड़ी में अगला नाम समाना का जुड़ गया है। यहां पर दो धनाड्ड आमने सामने है।
एक ओर प्रदेश कांग्रेस के प्रधान व पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के पुत्र युवराज रणइंद्र सिंह है तो उनके सामने शिरोमणि अकाली दल के सुरजीत सिंह रखड़ा है अपने एनआरआई कनेक्शन और मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के करीब 13 सालों से करीबी रिश्तों के चलते नाम कमा चुके हैं।
े समाना क्षेत्र में वोटरों की संख्या में चाहे एक लाख से च्यादा की कटौती हो गई हो लेकिन यहां पर निर्णायक भूमिका एक बार फिर डेरे के ही वोट निभा सकते है, हालांकि इस बार वे किस ओर करवट भरेंगे अभी तक तय नहीं है। इसके अलावा पटियाला शहर के 22 वार्ड यहां से बाहर हो गए हैं और समाना शहर के अलावा ग्रामीण क्षेत्र ही अधिक है।
दिलचस्प है कि प्रदेश में अब तक बनी हाल की सभी सरकारों में समाना से चुना गया विधायक विपक्ष में ही बैठता रहा है। यहां कि जनता जिसे अपना फतवा देती है प्रदेश की शेष जनता उस पार्टी को नकारती रही है। एक बार जगतार सिंह राजला के समय संयोग बदला तो वे जत्थेदार टोहड़ा के नेतृत्व में अकाली-भाजपा सरकार से अलग हो गए।

सुरजीत सिंह रखड़ा
ताकत:-
दस सालों से क्षेत्र के लोगों के सीधे संपर्क में, ग्रामीण क्षेत्र का टकसाली अकाली वोट बैंक, पार्टी में अब विरोध नहीं, सभी विरोधी अन्य क्षेत्रों में एडजस्ट, परीसीमन के बाद डकाला क्षेत्र से टूट कर आए 52 गांव अकाली बहुल माने जाते हैं, पटियाला शहर का त्रिपड़ी क्षेत्र का निकल जाना, 30 करोड़ खर्च कर वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से, सीवरेज, सड़क, अस्पताल, कालेज के बहुप्रतिक्षित काम निपटाए।                              
कमजोरी:-
पूर्व में किए गए वायदे और लोगों की उम्मीदों का खासा च्यादा होना, परंपरागत अकालियों का परंपरागत दबंगई राजनीति ना कर पाना, शहरी हिंदू वोटों पर लिबरल चेहरे के बावजूद पकड़ ना बना पाना।
किन मुद्दों पर लड़ रहे हैं:-
वर्तमान सरकार की ओर से किए गए विकास कायों के अलावा, क्षेत्र में रोजगार बढ़वाने और मौजूदा इंडस्ट्री को पिछड़े क्षेत्र के लाभ दिलवाने फोकल प्वाइंट बनवाना

रणइंद्र सिंह:
ताकत:-
युवा पढ़ा लिखा चेहरा, आधुनिक विचार, सरकार आने पर सत्ता में सीधा हस्तक्षेप, केंद्र में मां परनीत कौर के पास महत्वपूर्ण मंत्रालय, सियासत में परिवार दशकों से लोगों के संपर्क में है, तीन बार की सांसद मां का समाना विधान सभा क्षेत्र से हमेशा लीड लेना, पिता का क्षेत्र से निर्विरोध विधायक बनना। शाही परिवार का अपना ग्लैमर, नया चेहरा खुलकर किसी का विरोध नहीं, नए लोगों को जोडऩे की क्षमता
 
कमजोरी:-
प्रचार में देरी से लगना, क्षेत्र में लोगों से सीधा परिचय ना होना, ग्रामीण भौगोलिक क्षेत्र से अनभिज्ञता, बठिंडा के पुराने नेटवर्क पर अधिक निर्भरता, अकाली दल छोड़ कर आए नेताओं पर प्रचार के लिए च्यादा निर्भर होना, पिछले दो चुनावों में पार्टी के उम्मीदवार ब्रहम महिंदरा के ठीकविपरीत नीति अपनाने से विरोधाभास पैदा होना, हिंदू कार्ड चला पाने में असहज

किन मुद्दों पर लड़ रहे हैं चुनाव:-
क्षेत्र में पटियाला शहर के डीजल लोको मार्डेनाइजेशन वर्कशाप जैसा कोई बड़ा प्लांट केंद्र के खाते से लाना, छोटी इंडस्ट्री के लिए रास्ते खोलने वाले प्रोजेक्ट लाकर क्षेत्र में बेरोजगारी दूर करना, सरकार बनने की स्थिति में हर साल सौ करोड़ रूपये क्षेत्र में खर्च करने का वायदा। बिना भेदभाव के सभी तक सुविधाएं पहुंचाना।


प्रतिद्वंदी वही पर हालात बदले, punjab election, rajpura, constituency,


विधान सभा क्षेत्र :-राजपुरा
कांग्रेस-हरदयाल सिंह कंबोज
शिअद-भाजपा-राज खुराना
 वोटर:-एक लाख 45 हजार 253

भूपेश चट्ठा, पटियाला
गेट वे आफ पंजाब कहे जाने वाले राजपुरा विधान सभा क्षेत्र में प्रतिनिधित्व के लिए होते रहे हाल के चुनाव अक्सर भावनाओं पर अधिक व मुद्दों पर कम लड़े गए हैं, पर प्रतिद्वंदी हर बार बदले जाते रहे हैं। 2012 के होने जा रहे चुनावों में प्रतिद्वंदी तो वही है लेकिन हालात बदल गए हैं।
दो बार कांग्रेस और इस बार भारतीय जनता पार्टी से विधायक राजखुराना को इस बार खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है। वे स्थानीय हैं पर आरोप लग रहे हैं कि पांच साल सत्ता का सुख लेने में च्यादा व्यस्त रहे। चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाने वाली बहावलपुरी बिरादरी पूरी तरह से अपने पत्ते नहीं खोल रही है। वहीं कांग्रेस के टिकट पर दूसरी बार चुनाव लड़ रहे हरदयाल कंबोज पर बाहरी उम्मीदवार का ठप्पा धुला जरूर है पर विरोधी अब भी उनके किराए के मकान पर अंगुली उठा इशारा कर देते है।
 दिलचस्प है कि राजपुरा सीट के लिए अक्सर कहा जाता रहा है कि यहां से दूसरी बार लगातार जीतना मुश्किल होता है लेकिन पुराने रिकार्ड को हिलाने के बाद या फिर पार्टी बदलने के साथ विधायक रिपीट हो गए पर पार्टी नहीं।


राज खुराना
ताकत:-
बीस सालों से क्षेत्र के लोगों के सीधे संपर्क में, बहावलपुरी बिरादरी का अच्छा खासा वोट बैंक, जमीनी स्तर की राजनीति में महारत, मंजे हुए कार्यकर्ताओं का नेटवर्क।

कमजोरी:-
टक्साली अकाली वोट बैंक पर पकड़ नहीं, एंटी इंकंबेंसी फैक्टर, शहर के लोगों की नाराजगी दूर ना कर पाना, पार्टी केडर में विरोध के स्वर पहले जैसा समर्थन नहीं, परीसीमन के बाद कांग्रेस बहुल बनूड़ कस्बे का राजपुरा में आ जाना, भ्रष्टाचार के आरोप,

किन मुद्दों पर लड़ रहे हैं:-
राज खुराना कहते हैं कि इस बार रिकार्ड तोड़ विकास हुआ है। बस स्टैंड के पास एक पुल बन रहा है इसके बाद बस स्टैंड चालू हो जाएगा। बूथ अलाट हुए, थर्मल प्लांट का निर्माण शुरु, मिनी सचिवालय बना, इंजीनियरिंग कालेज बना, जैसी लंबी फैहरिस्त है। पिछले 20 सालों में सबसे शानदार रही है और कोई काम नहीं रहा। यही मुद्दे हैं।

हरदयाल सिंह कंबोज:
ताकत:-
पिछला चुनाव हारने के बावजूद लगातार लोगों के संपर्क में रहना, मोतीबाग महल से करीबी रिश्ते, विपक्ष में रहने के बावजूद सांसद के कोटे से फंड जारी करवा योजनाएं चलवाई, परंपरागत कांग्रेस के साथ ग्रामीण सिख वोट बैंक पर पकड़, बाहरी उम्मीदवार की छवी की परछाई हटाई।
 
कमजोरी:-
कांग्रेस का हिंदू कार्ड खेलने उपयुक्त हालात नहीं, बहावलपुरी बिरादरी का वोट बैंक अब भी सरदर्द, स्टार प्रचारक के रूप में मोतीबाग महल पर अधिक निर्भरता, भ्रम पैदा करने वाले दो अन्य कंबोज उम्मीदवारों की मौजूदगी

किन मुद्दों पर लड़ रहे हैं चुनाव:-
क्षेत्र को नशा मुक्त व दड़े-सट्टे बाजी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करवाना, भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई, लोगों को डंडाराज से मुक्ति दिलवाना, क्षेत्र में बेहतर, बिना भेदभाव का समान विकास करवाना।




पटियाला जिले में चुनावी मुद्दे, punjab election, issues, in patiala, district


राज्य की सत्ता में दो सबसे महत्वपूर्ण जिलों में से एक पूर्व रियासत पटियाला जिले के आठ विधान सभा क्षेत्रों में एक ओर जहां कांग्रेस कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्री काल में हुए विकास को याद दिलाते हुए उन्हें फिर से सत्ता में लाने को चुनाव प्रचार में तरजीह दे रही है। वहीं शिरोमणि अकाली दल के सात व भारतीय जनता पार्टी के एकमात्र उम्मीदवार सरकार की ओर से किए गए विकास कार्यों के नाम पर वोट मांग रहे हैं।

हर तरफ चल रहे मुद्दे जो दोनों पक्ष नारा लगा रहे हैं
-नशे का विरोध
-बेरोजगारी दूर करना
-इंडस्ट्री लाना
-24 घंटे बिजली उपलब्ध करवाना

विधान सभा क्षेत्र अनुसार
1 पटियाला शहर

मुद्दा:-कैप्टन अमरिंदर की दमदार छवि कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा,
तो अकालियों के लिए नगर निगम की ओर से करवाए गए कार्य



2 पटियाला ग्रामीण
मुद्दा:-कांग्रेस की ओर से पूर्व मंत्री व पांच बार के विधायक ब्रहम महिंदरा का बहावलपुरी बिरादरी से होना अंडर करंट है,
तो अकाली दल की ओर से पंथ रत्न जत्थेदार स्व. टोहरा की बेटी कुलदीप कौर टोहड़ा सिखी की दम भर रही है
कांग्रेस यहां विकास की पोल खोल रही है तो अकाली दावे ठोक रहे हैं,
हालांकि वोटों में डेरे का रुख दिशा तय करेगा

3 समाना
मुद्दा:-अकालियों के लिए विकास यहां मुद्दा है तो कांग्रेस के लिए शाही परिवार का ग्लैमर, परनीत कौर की पेठ
निर्णायक यहां भी डेरे का रुख होगा

4 सन्नौर-

मुद्दा:- घग्गर की बाढ़, हांसी बुटाना का जिन्न , सड़कों का आए साल टूटना, लड़कियों का कालेज, फोकल प्वांइट दोनों पक्षों के लिए है तो कांग्रेस कंबोज बिरादरी तो अकाली उम्मीदवार टक्साली वोट बैंक पर च्यादा निर्भर हैं और शिक्षा के क्षेत्र में निजी स्तर पर किए गए कार्य और पारिवारिक समीकरण भुनाए जा रहे हैं।
जबकि लाल सिंह मोती बाग पैलेस से रिश्तों पर कहते हैं 'महाराजा साहिब ने सीएम बनना है ते फेर दास ने वी सीएम तो घट नई होणाÓ


5 घनौर

मुद्दा:- हर साल आने वाली बाढ़, साईफन ना बनना, पानी की किल्लत, हमेशा की तरह दोनों के लिए मुद्दा है, लेकिन पिछली बार की तरह तिकौना मुकाबला दिखाने वाले इस क्षेत्र में निर्दलीय बलविंदर सिंह सैफदीपुर की ओर से चलाए गए मुफ्त राशन बांटने वाले मोदी खाने हैं, जिसने सरकार की आटा दाल योजना को उलझा लिया है। कंबोज बिरादरी के साथ रिफयूजी वोट बैंक यहां निर्णायक हैं।

6 राजपुरा

मुद्दा:-बहावलपुर बिरादरी और बाहरी उम्मीदवार को भाजपा के राजखुराना विकास के नारे के साथ एक बार फिर जोडऩे के प्रयास में हैं तो कांग्रेस के कंबोज खुराना पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को भुना कर क्षेत्र में दड़े सट्टे के कारोबार व भ्रस्ट अफसरों की तैनाती को आगे कर रहे हैं। हिंदू-सिख कार्ड भी चल निकला है पर प्रदेश की स्थितियों के विपरीत यहां कांग्रेस हिंदू कम और सिख च्यादा है तो अकाली भाजपा गठबंधन यहां पर हिंदू ही है।

7 नाभा
मुद्दा:- कांग्रेस के साधू सिंह धर्मसोत को बाजीगर बिरादरी के वोट बैंक पर च्यादा निर्भरता है, तो अकाली बादल के नाम पर वोट मांग रहे है, नाभा को जिला बनाने के दावे प्रति दावे जारी है, दोनों ही उम्मीदवार बाहरी है तो जनता को किसी में च्यादा दिलचस्पी नहीं है।

8 शुतराणा
मुद्दा:-घग्गर की बाढ़, पिछड़ा क्षेत्र, रेलवे लिंक, हमेशा की तरह है पर एक दूसरे को कोसने व भावनात्मक रूप से लोगों को पीछे लगाने के अलावा मंडी की फड़, कालेज जैसे बेहद लोकल मुद्दों पर चर्चा के साथ कांग्रेस के लिए कैप्टन तो अकालियों के लिए बादल के नाम पर ही मदद करने की गुहार लगाई जा रही है।

फिर सजी त्रिकोणीय मुकाबले की बिसात, punjab election,ghanour, constituency,



विधान सभा क्षेत्र- घन्नौर
मतदाता-एक लाख 36 हजार, 606
पुरुष-73 हजार 786
महिला-62 हजार 820

मतदान केंद्र-122, बूथ-172, अति संवेदनशील-15, संवेदनशील-27

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पटियाला जिले व लोक सभा क्षेत्र में सबसे कड़ा व त्रिकोणीय किंतु दिलचस्प मुकाबला देने वाला घन्नौर विधान सभा क्षेत्र का चुनाव परिणाम क्या रहेगा यह तो समय की गर्त में ही है लेकिन इस बार फिर बिसात पूरी तरह से त्रिकोणीय मुकाबले के लिए सज चुकी है।
कांग्रेस से टिकट ना मिलने पर निर्दलीय के रूप में अपना दमखम दिखाने वाले मदनलाल जलालपुर विधायक होते ही अकाली हो गए और पिछले लोक सभा चुनावों से पहले कांग्रेसी हो गए। क्षेत्र के हालातों की तरह चुनावी हालात में एक-दो नामों के अलावा कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार अजैब सिंह मुखमैलपुर के स्थान पर उनकी पत्नि हरप्रीत कौर हैं तो निर्दलीय के रूप में अंतराष्ट्रीय भाऊ भाईचारा के प्रधान व मोदी खानों से लोकप्रियता हासिल करने वाले बलविंदर सिंह सैफदीपुर आ खड़े हुए हैं।
सात सौ वोटों के अंतर से पिछले चुनाव का निर्णय हुआ था और तीनों उम्मीदवारों को 30 से 35 हजार के बीच वोट मिले। मदन लाल जलालपुर विपक्ष में बैठ कर खुद पर से एंटीइंकबैंसी का असर दूर कर चुके हैं। अब ये असर सत्ताधारी दल से होने के चलते पहली बार चुनाव लड़ रही हरप्रीत कौर मुखमैलपुर झेल रही हैं। हालांकि यह भी सही है कि अकाली दल ने यहां से 2007 में विधान सभा चुनाव हारने के बाद 2009 में अकाली दल ने यहां से बढ़त बनाई थी। पर स्थानीय मुद्दों और बढ़ती मंहगाई के बीच होने जा रहे चुनाव में यहां का वोटर अपनी जरूरतें पूरी होते पहले देखना चाहता है।
क्षेत्र की मुख्य सड़कों का ट्रैक रिकार्ड पिछली अकाली-भाजपा सरकार के समय से ही ठीक रहा है। लेकिन सिंचाई के लिए नहरी पानी की पर्याप्त सुविधा नहीं हो पाई है। यहां जब भी पानी आया बाढ़ के साथ ही आया है। जिस जगह पर सतलुज यमुना लिंक नहर का नींव पत्थर रखा गया आज वहां पीने के पानी के लिए भी मशक्कत करनी पड़ती है।  

कांग्रेस:- मदन लाल जलालपुर
ताकत-कंबोज बिरादरी का समर्थन व युवा वर्ग का नेटवर्क
कमजोरी-पुराने वफादारों का ना होना
अवसर-सत्ता में आने पर बड़ी जिम्मेदारी
चुनौती-पिछड़े वोट बैंक को संभालना

 शिअद-भाजपा:-हरप्रीत कौर मुखमैलपुर
ताकत-टक्साली अकाली वोट बैंक
कमजोरी-रिप्लेसमेंट की छवी बनना
अवसर-जीतने और सत्ता में आने पर मंत्री पद
चुनौती-खुद को साबित करना


निर्दलीय:-बलविंदर सिंह सैफदीपुर
ताकत-20-22 हजार लोगों को मासिक मुफ्त राशन
कमजोरी-पार्टी का नेटवर्क नहीं
अवसर-राजनीतिक शक्ति पाना
चुनौती-चुनावी लोकतंत्र का पहला अनुभव



लोगों को क्या चाहिए
-घग्गर की बाढ़ को नियंत्रित कर स्थायी समाधान, एसवाईएल का पंगा दूर करना, भाखड़ा मैन लाइन की नरवाना ब्रांच पर लाछड़ू के पास साइफन बनाना, वर्तमान साइफन बड़े कर दोनों नहरों के बीच बसे 22 गांवों को झील बनने से बचाना, अंबाला की ओर जाने वाले क्षतिग्रस्त पुलों का निमार्ण करवाना, कस्बे में मार्डन बस अड्डा बनवाना आम आदमी की जरूरतों में शामिल है।

समर्थकों में निराशा, उम्मीदवार मायूस, punjab election, shutrana, congress, rally,



...शुतराणा में कांग्रेस का प्रचार
कैप्टन अमरिंदर सिंह नहीं पहुंचे पातड़ां रैली में
-विदेश राच्य मंत्री परनीत कौर ने बंधाया ढ़ांढस कहा मैं और महाराजा साहिब निर्मल सिंह के साथ
भूपेश चट्ठा, पातड़ां पटियाला
हर अच्छे बुरे वक्त में कैप्टन अमरिंदर सिंह का साथ निभाने वाले शुतराणा से कांग्रेस के उम्मीदवार निर्मल सिंह की रैली में प्रदेश कांग्रेस के प्रधान व पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के ना पहुंचने से उनके समर्थकों में निराशा छा गई जबकि शुतराणा से उम्मीदवार मायूस हो कर रह गए हैं।
अब तक किस्मत का धनी कहे जाने वाले निर्मल सिंह दो बार शुतराणा से विपरीत परिस्थितियों में विधायक बने। दोनों बार प्रदेश में चल रही हवा के विपरीत राजनीतिक दलों में रहते हुए शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस से चुने गए। इसे भी आप निर्मल सिंह के लिए विडंबना ही कहेंगे कि रैली शुरु होने से पहले धूप खिली रही। रैली खत्म होने के बाद भी धूप खिल गई। दोपहर के समय जब कैप्टन अमरिंदर सिंह के हैलीकाप्टर ने जीरा से उड़ान भरनी थी तब मौसम साफ ना होने के चलते वे पातड़ां नही आ सके।
बिना किसी रेलवे लिंक और मात्र दो कस्बे वाले प्रदेश के अत्यंत ग्रामीण व पिछड़े शुतराणा विधान सभा क्षेत्र में आयोजित होने वाली कैप्टन अमरिंदर सिंह की रैली संभावित रूप से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं, समर्थकों में जान फूंकने के लिए खासी जरूरी मानी जा रही  थी। क्षेत्र में कांग्रेस का कार्यकर्ता अकाली दल अथवा वर्तमान सरकार की कथित धक्केशाही और हाल ही में गठित हुए छात्र संगठन स्टूडेंटस आर्गेनाइजेशन आफ इंडिया से कितना त्रस्त है कि स्टेज से हर तीसरा नेता एसओआई को कोस रहा था।
इन सब परिस्थितियों में पातड़ां की अनाज मंडी में आयोजित होने वाली रैली में कैप्टन अमरिंदर के 'खड़कने वाले खूंडेÓ से जहां आम कार्यकर्ता में जोश भरना था वहीं उम्मीदवार से लेकर उसके हर समर्थक का मनोबल बढऩा तय था। इसका साफ परिणाम उसी समय देखने को मिल गया जब रैली स्थल में कविशरी,मसखरी और सैकंड लाइन लीडरशिप के भाषणों के बीच खबर फैल गई कि महाराजा साहिब नहीं आ रहे। इसके तुरंत बाद ही भीड़ छंटनी शुरु हो गई। इतना ही नहीं निर्मल सिंह शुतराणा कुछ समझ पाते और अपील कर पाते इससे पहले ही परनीत कौर ने मौका संभालते हुए मंच से आकर कहा कि वे और महाराजा साहिब निर्मल सिंह की पीठ पर हैं और सदैव साथ खड़े हैं और किसी को घबराने की जरूरत नहीं है। आज तकनीकि खराबी के चलते हैलीकाप्टर नहीं आ सका है। सुबह से शाम चार बजे तक का इंतजार करने वाली जनता ने इसके बाद दस मिनट का भी इंतजार नहीं किया।

नई सीट, दिलचस्प हुआ मुकाबला, punjab election, patiala, rural, constituency,


विधानसभा क्षेत्र- पटियाला ग्रामीण
मतदाता-एक लाख 77 हजार 283
पुरुष-92 हजार 826
महिला-84 हजार 457

मतदान केंद्र-182, अति संवेदनशील-13, संवेदनशील-50

भूपेश चट्ठा, पटियाला
परीसीमन के बाद से आस्तित्व में आया पटियाला ग्रामीण क्षेत्र पुराने समाना और नाभा विधान सभा क्षेत्रों के गांवों और पटियाला शहर के करीब 20 वार्डों से मिलकर बना है। पहली नजर में शहरी क्षेत्र कांग्रेस बहुल और ग्रामीण क्षेत्र में कांग्रेस व शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन में बराबरी का सा अहसास दिलाने वाले इस क्षेत्र में निर्दलीय सतबीर सिंह खटड़ा के आने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
इस क्षेत्र में 2007 चुनाव प्रचार की शुरुआत किसी आम चुनाव की तरह 'विकास के मुद्देÓ से ही हुई थी लेकिन चुनाव के शिखर तक पहुंचने तक 'डेरा सच्चा सौदा के प्रेमियों से समर्थन व विरोधÓ के बीच ही अंत हुआ। हालांकि इस बार डेरा फैक्टर यहां से नदारद है।
अकाली-भाजपा की उम्मीदवार पंथ रत्न स्व. जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा की पुत्री कुलदीप कौर टोहड़ा शहरी क्षेत्र में भारी मशक्कत का सामना कर रही हैं तो कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा को अपने शहर के पुराने समर्थकों का पूरा नेटवर्क तैयार मिला है, उनके लिए नाभा क्षेत्र से आए करीब 32 गांवों में ही पहचान ले जाने की जरूरत है।
दिलचस्प है कि अकाली सरकार के कार्यकाल में जहां क्षेत्र की बाहरी कालोनियों में पहली बार सीवरेज डाला गया तो कांग्रेसी इस बात को भी टूटी सड़कों के रूप में प्रचारित करने में सफल हो रहे हैं, जबकि अकाली दल सिर्फ और सिर्फ टक्साली वोटों के सहारे है।
माइक्रो स्तर पर विधायक ब्रहम महिंदरा को एंटी इंकंबेंसी का सामना करना पड़ रहा है। पांच साल ना दिखाई देने के आरोप भी उन पर लग रहे हैं। हालांकि मिलते ही वे ये दुख दूर भी कर रहे हैं। वहीं प्रदेश सरकार के चलते कुलदीप कौर टोहड़ा स्वयं ही कटघरे में खड़ी हो रही हैं।
मुकाबले को खटड़ा के नेटवर्क ने दिलचस्प बना रखा है। गांवों में यूथ कल्बों के सहारे टीम खड़ी करने वाले खटड़ा किसके कितने वोट तोड़ते हैं? इस पर परिणाम तय होंगे।
क्षेत्र के लोग दुकानदारों की ओर से अपनी हद से बाहर जा कर किए गए नाजायज कब्जों से परेशान हैं। आम राय है कि त्रिपड़ी मैन बाजार की सड़क दुरुस्त होने के बावजूद हालात नहीं बदले हैं। त्रिपड़ी में आधे अधूरे मन से अस्पताल चालू हुआ जबकि सिवरेज सिस्टम दुरुस्त करने लाया गया प्रोजेक्ट भी अभी पूरी तरह से सिरे नहीं चढ़ा है।
हालांकि क्षेत्र में डीएमडब्ल्यू के पास फलाई ओवर की मांग नहीं हुई पूरी, दुख निवारण साहिब के पास एलिवेटिड रोड बना ट्रैफिक समस्या का हल करने पर अभी चर्चा ही हो रही है। छोटी नदी को दुरुस्त किया जाना और बंधा रोड पर से अवैध कब्जे हटा कर डबल रोड उपलब्ध करवाई जानी शेष है।

कांग्रेस:-ब्रहम महिंदरा
ताकत-बहावलपुर बिरादरी का समर्थन व पुराना नेटवर्क
कमजोरी-टक्साली सिख वोटरों में हिंदू की छवि
अवसर-सत्ता में आने पर बड़ी जिम्मेदारी तय
चुनौती-वोट बैंक को संभालना

 शिअद-भाजपा:-कुलदीप कौर टोहड़ा
ताकत-टक्साली अकाली वोट बैंक
कमजोरी-शहरी वोटों पर कम पकड़
अवसर-जीतने और सत्ता में आने पर मंत्री पद
चुनौती-खुद को साबित करना


निर्दलीय:-सतबीर सिंह खटड़ा
ताकत-द पटियाला वेलफेयर सोसायटी का नेटवर्क
कमजोरी-पार्टी का साथ नहीं
अवसर-राजनीतिक शक्ति पाना
चुनौती-चुनावी लोकतंत्र का पहला अनुभव

भुक्की, भांग या दारू, पार कौन उतारू?, punjab election, intoxicant



-दिहाड़ीदारों को भुक्की, तो निठल्लों को भांग, पर छठा दरिया हर ओर बहने लगा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में फसल की बिजाई-कटाई का सीजन हो या विवाह-शादी का शरीर को 'चार्जÓ किए रखने के लिए एक ना एक नशे का सहारा लिया जाता है और चुनावी सीजन में यह वक्त की जरूरत, उम्मीदवारों की मजबूरी और वोटरों के लिए जरूरी चीज बन जाती है। चुनाव प्रचार को अब तक अपने मुताबिक ना पाते हुए अब उम्मीदवारों ने आखिरकार अपना आजमाया हुआ नुस्खा ही बाजार में उतारना शुरु कर दिया है। भुक्की, भांग या दारू के साथ चुनाव मैदान में रात को प्रचार बंद होने के बाद अपनी नैया पार उतारने के प्रयास बड़े स्तर पर शुरु हो गए हैं।

 चुनाव आयोग के आदर्श चुनाव आचार संहिता के  डंडे के चलते अब तक जो नशे दूर दराज के क्षेत्रों में तस्करों की कस्टडी अथवा मिडल मैन के ठिकानों पर ही पड़े थे उन्हें अब 'गंतव्यÓ स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है। इसका असर शनिवार शाम से ही दिखना शुरु हो गया है। नाम प्रकाशित ना किए जाने की शर्त पर एक पूर्व लोक संपर्क अधिकारी बताते हैं लगभग हर क्षेत्र में देर सांय होने वाली बैठक में ठंड के बावजूद जमा होने वाली भीड़ संभावित रूप से इसी 'विचारधाराÓ से जुड़ी है।

वहीं सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला प्रदेश में चल रहे चुनावी ट्रेंड पर बताते हैं कि मेहनत करने वाला छोटा किसान है या खेत मजदूर या फिर दिहाड़ीदार को अब एक बार फिर चुनाव आयोग के 'आदर्शÓ से बाहर निकाला जा रहा है। प्रलोभन के मामले में युवा वर्ग को 'सूटा अथवा टासूÓ निशुल्क उपलब्ध करवाने तो 'सीनियर सिटीजनÓ को भांग हर तरीके से मुहैया करवाई जा रही है। वे कहते हैं कि रोपड़, होशियारपुर, गुरदासपुर जैसे पहाड़ी जिले इस तरह की 'बूट्टीÓ के लिए कुख्यात हैं तो बठिंडा, अबोहर, फिरोजपुर, मुक्तसर जैसे राजस्थान से लगते रेतीले जिले चूरा पोस्त की सप्लाई लिए बैठे हैं जबकि कच्ची, पक्की, ब्रांडेड शराबछठे दरिया के रूप में हर ओर बहने लगा है।

इसी संबंध में शराब के एक कारोबारी बताते हैं कि ठेकों पर से मांग में कहीं भी अतिरिक्त बढ़ोतरी दर्ज नहीं हो रही है लेकिन शराब दिखाई जरूर देने लगी है। निसंदेह ये कहीं बाहर से ही लाई जा रही है। इसे रोका जाना चाहिए। किसने? कहां? और कैसे बनाई है? इसके बारे में ना तो पीने वाले को पता होता है और ना ही बांटने वाले को ऐसे में चुनावी शराब के मामले में किसी बड़ी दुर्घटना की संभावना हमेशा रहती है।

शुतराणा को शुतराणा सीट पर मुश्किल का सामना, punjab election, shutrana, constituency,


 विधानसभा क्षेत्र- शुतराणा

मतदाता-एक लाख 46 हजार 435
पुरुष-77 हजार 700
महिला-68 हजार 735

मतदान केंद्र-177, अति संवेदनशील-23, संवेदनशील-51

भूपेश चट्ठा, पटियाला
कभी शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर चुनाव जीतने वाले निमर्ल सिंह शुतराणा कांग्रेस से विधायक हैं और लगातार दो बार विधायक रहने के बाद हेटट्रिक करने में शुतराणा को शुतराणा विधान सभा क्षेत्र में इस बार खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
पिछले दोनों चुनावों में भावनात्मक बातों के सहारे विधान सभा में पहुंचने वाले शुतराणा के लिए एक मात्र सहारा कैप्टन अमरिंदर सिंह के रूप में था लेकिन ऐन मौके पर पातड़ां रैली में उनके ना पहुंचने के चलते उनके समर्थकों में जोश भरने वाला काम भी नहीं हो पाया है जबकि मंगलवार की अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल की रैली अकालियों में जान डाल गई है।
पहली बार निर्मल सिंह को अकाली बहुल क्षेत्र में सिर्फ इसलिए जीत मिली अकाली दल ने एक कार्यकर्ता को टिकट दिया जबकि दूसरी बार उनके पक्ष में इसलिए हवा चली की पार्टी ने उसे टिकट ना देकर धक्का किया है। इस बार दोनों ही हालात नहीं है। वहीं वनिंदर कौर लूंबा का परिवार टक्साली अकाली है। उनके पिता व ससुर दोनों ही क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं और विवादों में नहीं रहे।
जबकि शुतराणा के लगातार सत्ता में रहने के चलते माइक्रो स्तर पर एंटी इंकंबैंसी फैक्टर काम कर रहा है। दिलचस्प है कि दोनों ही बार वे जीते पर विपक्ष में बैठे तो क्षेत्र में अपनी ओर से विशेष कुछ भी नहीं करवा सके।
याद रहे कि राच्य व केंद्र में सरकारें बदलती रही पर शुतराणा के हालात नहीं बदले हैं। रेल मार्ग व किसी बड़े शहर से च्यादा दूरी होने के चलते इस क्षेत्र को वास्तविक  रूप से पिछड़ा क्षेत्र कहें तो गलत नहीं होगा। पंजाब हरियाणा सीमा पर बसे इस क्षेत्र में कोई बड़ा शहर भी नहीं आता। जिस घग्गर को सामने रख कर चुनाव लड़े जाते हैं वो तो जहां का तहां रहता है। अलबत्ता दोनों ही प्रमुख दलों के नेता अंतत: भावनात्मक मुद्दों की तलाश में रहते हैं। कौन क्या भला करेगा? इस पर चर्चा कम होती है जबकि किसके साथ कितना धक्का हुआ? इसे सामने जरूर रखा जाता है। हालांकि पिछले चुनाव में सबसे उपर डेरे का मुद्दा ही छाया रहा है।

कांग्रेस:-निर्मल सिंह शुतराणा
ताकत- कैप्टन अमरिंदर सिंह का आशीर्वाद
कमजोरी- भावनाओं पर जीते, मुद्दे की राजनीति नहीं कर पाते
अवसर-सत्ता में आने पर वफादारी को इनाम तय
चुनौती-वोट बैंक को संभालना

 शिअद-भाजपा:-वनिंदर कौर लूंबा
ताकत-मायके व ससुराल की राजनीतिक पृष्ठ भूमि
कमजोरी-नया चेहरा
अवसर-जनप्रतिनिधि के रूप में कैरियर की शुरुआत
चुनौती-खुद को साबित करना

नदियों का पानी निजी कंपनियों को बेचने को विरोध करेंगे: सुखबीर, punjab election, deputy cm, sukhbeer



-प्रस्तावित जल नीति पंजाब की कृषि अर्थ व्यवस्था को तबाह कर देगी
-किसानों की स्थाई दासता को स्वीकार नहीं करेंगे
उपमुख्य संवाददाता, पातड़ां पटियाला
नदियों का पानी निजी कंपनियों को बेचे जाने के केंद्र की कांग्रेस सरकार के किसी भी निर्णय का विरोध किया जाएगा। शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने कहा मंगलवार को संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि नदियों, नहरों का निजीकरण और सिंचाई पर से हर तरह की सब्सिडी हटाने के कांग्रेस व संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की ओर से लाया जा रहा यह प्रस्ताव किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा।
सुखबीर बादल कहते हैं कि केंद्र की प्रस्तावित जल नीति पंजाब की कृषि अर्थ व्यवस्था को तबाह कर देगी और रीपेरियन कानून के तहत पंजाब को मिलने वाले सभी लाभ समाप्त हो जाएंगे। प्रदेश के किसानों के लिए इस तरह की स्थाई दासता को अकाली दल बिलकुल स्वीकार नहीं करेगा और डट कर विरोध किया जाएगा।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में प्राकृतिक संसाधन सौंप देने को पाप से च्यादा कुछ नहीं है इससे देश के 122 करोड़ लोग गुलाम हो जाएंगे। इन लोगों के 1.76 लाख करोड़ रूपये के कामनवेल्थ घोटाले से भी पेट नहीं भरे तो कुदरत को बेचने लगे हैं। नई नीति से मुफ्त बिजली को भी फिजूल खर्ची बताया जाएगा।

कांग्रेस के शहरी दबदबे में दबा ग्रामीण अकाली, punjab election, nabha, constituency


विधानसभा क्षेत्र नाभा
मतदाता-एक लाख 54 हजार 799
पुरुष- 82 हजार 376
महिला- 72 हजार 423

मतदान केंद्र-131, अति संवेदनशील-22, संवेदनशील-87

भूपेश चट्ठा, पटियाला
नाभा देश का पहला निर्वाचन क्षेत्र है जो रियासती शहर रहा है जिसे आरक्षित सीट घोषित कर दिया गया है। यही वो इकलौती रियासत है जो जिला नहीं बन पाई है। परीसीमन के बाद इसके साथ लगते 32 गांवों को पटियाला ग्रामीण का हिस्सा बना दिया गया और अमलोह क्षेत्र के साथ लगते कुछ गांवों को इसमें जोड़ दिया गया, लेकिन दोनों ही कार्यो के बाद यहां के राजनीतिक झुकाव के हालात नहीं बदले हैं।
अब तक का इतिहास गवाह रहा है कि जब जब कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार के आगे दो या तीन सशक्त बागी नहीं खड़े हुए शिरोमणि अकाली दल व इसके साथ का गठबंधन चुनाव नहीं जीत पाया, हालांकि इस बार भी कांग्रेस में शामिल रहे कुछ लोग अपने आधिकारिक उम्मीदवार साधू सिंह धर्मसोत के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं, पर नाभा शहर के वोटरों के सहारे वे ग्रामीण अकाली वोट बैंक पर बढ़त बनाए हुए हैं।
वर्तमान हालात में अकाली दल की शुरुआती बगावत थम चुकी है, कम से कम बाहर से पार्टी पूरी तरह से एकजुट है, लेकिन उम्मीदवार बलवंत सिंह शाहपुर का जोर गांवों में ही ज्यादा दिख रहा है। वे हैं भी एससी कोटे से। जबकि क्षेत्र में जितने भी अन्य उम्मीदवार हैं वे किसी ना किसी तरह से साधू सिंह के ही वोट काट रहे हैं। इसके अलावा वामपंथियों की चुनाव में मौजूदगी इस बार कांग्रेस को चोट पहुंचा रही है। एससी बहुल क्षेत्र में धर्मसोत का बाजीगर बिरादरी का होना उनके विरोध की एक वजह है। इस पर बाजीगर बिरादरी से ही एक और उम्मीदवार का होना, इसमें भी सेंध लगा रहा है।
एंटी इंकंबैंसी फैक्टर यहां कभी कारगर नहीं रहा है। कांग्रेस के वर्तमान विधायक काका रणदीप के ही परिवार से आठ एमएलए हो चुके हैं, जबकि फायर ब्रिगेड जैसी सुविधा आम आदमी के लिए नहीं है। सड़क सीवरेज के लिए भी अभी शहर जूझ रहा है।
क्षेत्र में डेरा फैक्टर पर अंतिम निर्णय 27 को लिया जाएगा पर अनुमान है कि यह कांग्रेस के पक्ष में ही जाएगा। वहीं शाहपुर को नाभा लाने में पूर्व मंत्री राजा नरिंदर सिंह का बड़ा योगदान रहा है तो धर्मसोत व अमलोह से चुनाव लड़ रहे काका रणदीप का परस्पर समझौता संभव है कि तब तक ही चलेगा जब तक काका रणदीप की स्थिति ठीक ठाक रहती है।
कांग्रेस:-साधु सिंह धर्मसोत
ताकत- कांग्रेस का सशक्त वोट बैंक
कमजोरी- एससी वोटें ज्यादा और बाजीगर कम
अवसर-सत्ता आई तो मंत्री बनने का अवसर
चुनौती-कांग्रेसी बागियों से निपटना

 शिअद-भाजपा:-बलवंत सिंह शाहपुर
ताकत-पार्टी में विरोध नहीं, अमलोह के साथ लगते ग्रामीण क्षेत्र
कमजोरी-कांग्रेस बहुल क्षेत्र में देरी से प्रचार
अवसर-पुन: लोकतंत्र की चुनावी राजनीति में आना
चुनौती-शहरी क्षेत्र में आधार मजबूत करना

शिअद-भाजपा गठबंधन जीतेगा 80 सीटें: बादल, punjab election, badal rally


-कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपना मानसिक संतुलन खोया: बादल
-चुनाव आयोग की सारी बातें ठीक नहीं धक्का भी किया है का बादल ने
-डेरा सच्चा सौदा में किसी के जाने पर कोई टिप्पणी नहीं की
फोटो भेजी जाएगी
भूपेश चट्ठा, देवीगढ़, पटियाला
विभिन्न टेलीविजन चैनलों और सर्वेक्षण एजेंसियों की ओर से किए जा रहे प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के परिणामों के लगाए जा रहे अनुमानों के संदर्भ में चार बार मुख्यमंत्री की पारी खेल चुके शिरोमणि अकाली दल के संरक्षक व वर्तमान मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा है कि शिअद-भाजपा गठबंधन राज्य में 80 सीटें जीतने जा रहा है। कांग्रेस की ओर से भी कुछ ऐसे ही सीटों के दावे पर वे कहते हैं कि परिणाम आने तक इनकी कम होती जाएंगी और हमारी बढ़ती जाएंगी।
वहीं सनौर में गठबंधन के प्रत्याशी तेजिंदर पाल सिंह संधू के लिए देवीगढ़ की अनाज मंडी में आयोजित रैली में कांग्रेस के प्रदेश प्रधान कैप्टन अमरिंदर सिंह की ओर से हाल ही में किए गए ब्यानों पर बादल कहते हैं कि कैप्टन अमरिंदर ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है। अगर ऐसे ही मुख्यमंत्री बनने का एक दावेदार विरोधी दलों के लोगों की टांगे तोडऩे लगे तो लोकतंत्र रहेगा नहीं और अराजकता फैल जाएगी।
जबकि चुनाव आयोग की ओर से की जा रही कार्रवाईयों पर बादल कहते हैं कि आदर्श चुनाव आचार संहिता के नाम पर की जा रही सारी बातें ठीक नहीं कही जा सकती। कई जगह पर धक्का भी किया गया है। उनके ही एक सचिव के यहां हुई छापेमारी पर वे कहते हैं कि हथियार, पैसे और ना जाने क्या क्या छिपाए जाने के नाम पर दीवारें तक खोद दी गई।
इसी क्रम में डेरा सच्चा सौदा में कैप्टन अमरिंदर सिंह के जाने पर किसी तरह की टिप्पणी से इंकार करते हुए बादल कहते हैं कि वे इस मसले में नहीं पडऩा चाहते। वे तो विवाद खत्म करना चाहते हैं बढ़ाना नहीं।