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Tuesday, 31 January 2012

कांग्रेस के शहरी दबदबे में दबा ग्रामीण अकाली, punjab election, nabha, constituency


विधानसभा क्षेत्र नाभा
मतदाता-एक लाख 54 हजार 799
पुरुष- 82 हजार 376
महिला- 72 हजार 423

मतदान केंद्र-131, अति संवेदनशील-22, संवेदनशील-87

भूपेश चट्ठा, पटियाला
नाभा देश का पहला निर्वाचन क्षेत्र है जो रियासती शहर रहा है जिसे आरक्षित सीट घोषित कर दिया गया है। यही वो इकलौती रियासत है जो जिला नहीं बन पाई है। परीसीमन के बाद इसके साथ लगते 32 गांवों को पटियाला ग्रामीण का हिस्सा बना दिया गया और अमलोह क्षेत्र के साथ लगते कुछ गांवों को इसमें जोड़ दिया गया, लेकिन दोनों ही कार्यो के बाद यहां के राजनीतिक झुकाव के हालात नहीं बदले हैं।
अब तक का इतिहास गवाह रहा है कि जब जब कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार के आगे दो या तीन सशक्त बागी नहीं खड़े हुए शिरोमणि अकाली दल व इसके साथ का गठबंधन चुनाव नहीं जीत पाया, हालांकि इस बार भी कांग्रेस में शामिल रहे कुछ लोग अपने आधिकारिक उम्मीदवार साधू सिंह धर्मसोत के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं, पर नाभा शहर के वोटरों के सहारे वे ग्रामीण अकाली वोट बैंक पर बढ़त बनाए हुए हैं।
वर्तमान हालात में अकाली दल की शुरुआती बगावत थम चुकी है, कम से कम बाहर से पार्टी पूरी तरह से एकजुट है, लेकिन उम्मीदवार बलवंत सिंह शाहपुर का जोर गांवों में ही ज्यादा दिख रहा है। वे हैं भी एससी कोटे से। जबकि क्षेत्र में जितने भी अन्य उम्मीदवार हैं वे किसी ना किसी तरह से साधू सिंह के ही वोट काट रहे हैं। इसके अलावा वामपंथियों की चुनाव में मौजूदगी इस बार कांग्रेस को चोट पहुंचा रही है। एससी बहुल क्षेत्र में धर्मसोत का बाजीगर बिरादरी का होना उनके विरोध की एक वजह है। इस पर बाजीगर बिरादरी से ही एक और उम्मीदवार का होना, इसमें भी सेंध लगा रहा है।
एंटी इंकंबैंसी फैक्टर यहां कभी कारगर नहीं रहा है। कांग्रेस के वर्तमान विधायक काका रणदीप के ही परिवार से आठ एमएलए हो चुके हैं, जबकि फायर ब्रिगेड जैसी सुविधा आम आदमी के लिए नहीं है। सड़क सीवरेज के लिए भी अभी शहर जूझ रहा है।
क्षेत्र में डेरा फैक्टर पर अंतिम निर्णय 27 को लिया जाएगा पर अनुमान है कि यह कांग्रेस के पक्ष में ही जाएगा। वहीं शाहपुर को नाभा लाने में पूर्व मंत्री राजा नरिंदर सिंह का बड़ा योगदान रहा है तो धर्मसोत व अमलोह से चुनाव लड़ रहे काका रणदीप का परस्पर समझौता संभव है कि तब तक ही चलेगा जब तक काका रणदीप की स्थिति ठीक ठाक रहती है।
कांग्रेस:-साधु सिंह धर्मसोत
ताकत- कांग्रेस का सशक्त वोट बैंक
कमजोरी- एससी वोटें ज्यादा और बाजीगर कम
अवसर-सत्ता आई तो मंत्री बनने का अवसर
चुनौती-कांग्रेसी बागियों से निपटना

 शिअद-भाजपा:-बलवंत सिंह शाहपुर
ताकत-पार्टी में विरोध नहीं, अमलोह के साथ लगते ग्रामीण क्षेत्र
कमजोरी-कांग्रेस बहुल क्षेत्र में देरी से प्रचार
अवसर-पुन: लोकतंत्र की चुनावी राजनीति में आना
चुनौती-शहरी क्षेत्र में आधार मजबूत करना

Friday, 23 December 2011

कहने को बहुत कुछ, हुआ कुछ भी नहीं, punjab election, 2012, nabha


विधान सभा क्षेत्र:- नाभा

भूपेश चट्ठा, पटियाला
कभी बेल्जियम के बाद हरे कांच की बोतलों का उत्पादन करने में विश्व भर में विख्यात रहे एतिहासिक शहर नाभा की आबादी चाहे कम रही है, रेलवे व सड़क के लिहाज से भी यह प्रमुख मार्ग पर नहीं है, लेकिन साथ लगते फतेहगढ़ साहिब, बरनाला व मानसा जैसे गांवों व कस्बों के जिला बनने के बाद से इसे जिला बनाए जाने की मांग हर बार जिस तरह से उठती है ठीक उसी तरह से बैठती भी रही है। जिला मुख्यालय से मात्र 26 किलोमीटर की दूरी के चलते तकनीकि रूप से इसे खारिज भी कर दिया जाता है। हालांकि अन्य मामलों में ऐसा नहीं हुआ है। नाभा इकलौती रियासत है जो जिला नहीं बनी है। इतना ही नहीं देश की यह इकलौती पूर्व रियासत है जिसे परिसीमन के बाद आरक्षित क्षेत्र बना दिया गया है।
इस विधान सभा क्षेत्र में विकास का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता हैं कि यहां आटो एलपीजी का प्लांट लगा है, आईओसी का बाटलिंग प्लांट है, पर फायर ब्रिगेड की गाड़ी नगर परिषद के पास नहीं है। आग लगने की स्थिति में इसे बाहर से मंगवाना पड़ता है। सीवरेज सिस्टम दुरुस्त नहीं हो पाया है तो मूलभूत सुविधाओं के नाम पर सड़कों की हालत खस्ता है। जहां कहीं इंटर लाकिंग टाइलें लगी हैं वहां विजीलेंस ने नमूने ले रखे हैं।
शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार राजा नरिदंर सिंह का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं चल रहा।


जो विकास हुआ उन्हीं के कार्यकाल में हुआ: विधायक काका रणदीप

नाभा से दो बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने काका रणदीप सिंह के पास कहने को काफी कुछ है। उनके रियासती परिवार ने आजादी के बाद से आठ एमएलए दिए हैं। नेहरू से राजीव गांधी तक पीढ़ी दर पीढ़ी संबंध रखने वाले काका रणदीप कहते हैं कि जो विकास हुआ उन्हीं के समय में हुआ। पहले सैंट्रल रोड फंड और फिर बीओटी के माध्यम से सभी बाहरी सड़कें बनवाई, शहर मेंं आरओबी व रोहटी के पुल बनाए। परिषद को कर्ज मुक्त कर सीवरेज का प्रोजेक्ट लाए जबकि आरोप लगाते हैं कि अकाली सरकार वायदे कर भूलती रही है।

दिलचस्प पहलु
-पंजाब की इकलौती रियासत है जो जिला नहीं बनी
-देश की इकलौती पूर्व रियासत है जिसे परिसीमन के बाद आरक्षित क्षेत्र बनाया गया


क्या नहीं हुआ
-जिला नहीं बन पाया
-सीवरेज सिस्टम नहीं हुआ दुरुस्त
-फायर ब्रिगेड नहीं है
-शहर के भीतर की सभी सड़कें नहीं बन पाई
-सैटेलाइट टाउन में शामिल नहीं हो पाया