सनडे मतलब मेनटेनेंस डे
आदर्श चुनाव आचार संहिता लगी हो तो हर तरफ सरकारी बाबू का डंडा चलता नजर आता है, जन प्रतिनिधि के नाम पर मिलने वाली छूट इन दिनों में गायब है पर इन सबके बावजूद सनडे तो सन-डे ही है। सर्दियों में कई दिनों बाद सन दिखाई दे तो सन का महत्व और बढ़ जाता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ चुनाव सिर पर है फिर भी सब कुछ ठीक वैसे ही चल रहा है जैसे लोकतंत्र के राज में चलता है। ऐसे ही लंबी सर्दी के बाद धूप में बाल सुखा रहे एक नेता जी से जब पूछा गया तो उन्होंने टका सा जवाब दिया अरे भई सनडे का मतलब होता है मेनटेनेंस डे। इस दिन आप अच्छे से खुद को संवारे और वे सभी काम करें जो रूटीन में नहीं कर सकते लेकिन किए जाने चाहिए। शरीक की मेनटेनेंस करना भी तो जरूरी है।
तुम बुद्धा बनो बुद्धू नहीं
शहर में आयोजित एक कार्यक्रम में निमंत्रण को लेकर चर्चा चल रही थी। भाई चारे में से ही एक ने आवाज लगाई कि क्या बात है? कहां से आ रहे हैं? बताया गया कि शहर में कुछ खास है नहीं। तुरंत ही जवाब दिया गया कि अरे इतना बड़ा कार्यक्रम हो रहा है तुम गए नहीं। जनाब ने समझा ये तो बड़ी गलती हो गई, इधर उधर हाथ पांव मारने के बाद भी जब कुछ नहीं पता चला तो सुरक्षा एजेंसी में अपनी हाजरी लगवाने कार्यक्रम बताने वालों से ही पूछ डाला कि आखिर वहां हुआ क्या था? इस पर फिर कहा गया कि तुम बुद्धा बनो हमें बस यही चाहिए बुद्धू नहीं, महल छोड़ो और शांति की तलाश में भटको...।
अरे नाम में क्या है, यार तो अपना ही है
शाम की दवा से दूर का भी नाता ना रखने वाले एक नेता जी की खासी इच्जत है और उनके आदर्शवादी रवैये और मिलनसार स्वभाव के साथ हर किसी की मदद के लिए तत्पर रहने के चलते सभी इच्जत भी करते हैं, हालांकि यह भी उनकी आदतों में शामिल है कि कोई इच्जत ना करे तो वे करवा भी लिया करते हैं। हुआ कुछ ऐसा की नेता जी के एक खाने पीने वाले मित्र के नंबर की जरूरत उनके ही एक अन्य मित्र को आन पड़ी। मित्र ने पूरा नाम बता कर जब नंबर मांगा तो नेता जी मुकर गए, कहा ऐसे किसी व्यक्ति को वे नहीं जानते, एक बार फिर याद दिलाने पर नेता जी ने निकनेम ले कहा अरे नाम में क्या रखा है, यार तो अपना ही है। पर चटकारे लिए जा रहे हंै कि असल बात तो दवा ना लेने के चलते कम होती याददाश्त की है...संभालों इसे।
आपने तो पापूलर कर दिया
हाल ही में एक राजनीतिक दल में सताए गए नेता ने अपने ही उम्मीदवार के खिलाफ मोर्चा खोल डाला। मोर्चा भी पूरे पोल खोल अंदाज में। इतना ही नहीं नेताजी ने पक्के पैर हो लिखित शिकायत करते हुए, इन साइड स्टोरी भी बना डाली अपने दल बदलु होने को अपनी योग्यता बताते हुए नेता जी दावा भी ठोक डाला कि जब वे अपने आज के विरोधी के करीबी होते थे तो बहुत से लोग रात में आ कर हाजरी भरते और दिन में अपनी पार्टी के लिए नारेबाजी किया करते थे, अगर उनका मुंह खुलवाया गया तो कोई नहीं बचेगा। पार्टी चाहे तो कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती है। वहीं आरोप झेल रहे नेताजी ने भी राजनीतिक दांव खेल सारा पासा पलटा दिया कहा आपने तो शिकायत कर हमारा काम आसान कर दिया। शिकायत ने तो और पापूलर कर दिया है।
जाओ कहीं भी बात बस चुनाव की
विधान सभा चुनावों केलिए चल रहे नामांकन पत्र भरने के दौर में आप कहीं भी चले जाएं, आपको चुनावी विश्लेषक मिल जाएंगे। विवाह, किटी अथवा मकान के उदघाटन के लिए होने वाले समारोहों में सजी हर मेज पर जहां राजनीति की बिसात बिछी है वहीं बच्चे के बर्थ डे से लेकर बुजुर्ग के संस्कार तक में शामिल होने वाले भी अपना एजेंडा साथ लेकर घर से निकलते हैं और संस्कार में जाते ही सबसे पहले अपनी आडियंस तलाश कर कार्रवाई शुरु कर देते हैं। रीति रिवाज के विपरीत देहांत को मौसम और उम्र से जोड़ सारी बात एक ही सांस में निपटा दी जाती है और फिर चुनाव, चुनाव और चुनाव की रट शुरु हो जाती है।
अब नहीं जलते संतों के लाटू
पर्ची से हथियार और लड्डू से लंगर तक पर अपना डंडा चलाने वाले चुनाव आयोग ने पोस्टर व प्रतिमाओं को तो लपेट लिया पर अभी आत्मा से परमात्मा का मिलन आदर्श चुनाव आचार संहिता से परे है। ऐसे ही प्रतिष्ठित व्यक्ति के यहां हुए देहान्त पर अफसोस प्रकट करने वालों की कतार लगी हुई थी। सेकेंड लाइन नेताओं का भी खासा जमावड़ा लगा। उम्मीदवार भी पहुंचे पर आयोग कहीं उन्हें देखकर खर्चा ना जोड़ दे ऐसे में च्यादा देर नहीं ठहरे। वहीं हर तरफ चुनावी खर्च पर चल रही चर्चा में यह भी बताया गया कि यहां आकर सभी व्यक्ति संत हो जाते हैं और और हर आत्मा महान हो जाती है,पर किसी का लाटू यहां आते ही बुझ जाता है तो किसी का थोड़ी देर बाद तो किसी का जल्दी, और बाकी का शमशान से निकलते ही।
आबजर्वेशन है, तरीके से क्या लेना
चुनाव आयोग के डंडे तले हर तरफ बजते हूटर आबजर्वर के आने की आहट दे देते हैं। आम आदमी को हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता पर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार, उनके रणनीतिकार और कट्टर समर्थकों को अंदर तक डरा देते हैं। संभव है आबजर्वरों को इस बात का अहसास हो लेकिन दिन भर चुनाव आयोग का डंडा चलाते चलाते वे भी बोर होने लगे हैं। ऐसे ही एक अधिकारी दिन में लाटरी का टिकट लेने से लेकर शहर के दशकों पुराने परिचित की तलाश में निकल पड़े। सवाल उठा तो बताया गया कि आबजर्वर हैं, आबजर्वेशन हो रही तरीके से क्या लेना। अरे भाई बात अगर यही है तो लाल बत्ती से भी क्या लेना वैसे ही कर लो।
मंहगाई है... रेट भी दोगुने हो गए हैं
निसंदेह पिछले विधान सभा चुनावों के बाद से मंहगाई खासी बढ़ी है, लेकिन मंहगाई का असर करीब तीन साल पहले हुए लोक सभा चुनावों के बाद से च्यादा दिखाई दे रहा है और मुद्रास्फीति के वास्तविक आंकड़ों का हवाला शहर के एक प्रोफेशनल व्यक्ति ने इन्हीं चुनावों में फीड बैक के रूप में दिया तो पुराना ग्राहक भी दौड़ गया। बताया गया कि आम भाषा के सेवा शुल्क को कंसलटेंसी चार्जेज बताने वाले जनाब ने जब दाम साढ़े चार गुना बताए और साथ ही कहा कि दो गुने दाम तो मंहगाई से वैसे ही हो जाते हैं। अब तो रेट भी दोगुने हो गए हैं। बाकि सरचार्ज है।
No comments:
Post a Comment