मुद्दा पर्यावरण
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हम यूरोप से डेढ़ सौ साल पीछे हैं, जिस इंडस्ट्री को वहां प्रदूषण के चलते बंद कर दिया गया उसे हमारे यहां भेजा जा रहा है और हम प्राकृतिक कानून के विपरीत काम कर रहे हैं, यही वजह है कि पर्यावरण में सुधार और जल संरक्षण की बजाए प्रदूषण का ग्राफ बढ़ रहा है। पंजाब का पर्यावरण बचा जल सरंक्षण को अनिवार्य करने और सभी राजनीतिक दलों में अलख जगाने पर्यावरण प्रेमी एक मंच पर आए जरूर हैं पर राजनीतिक दलों व चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों की ओर इस पर इस पर चर्चा बिलकुल नहीं की जा रही है।
पंजाब का एकमात्र खनिज है पानी
देश के हर राज्य में किसी ना किसी तरह के खनिज पदार्थ निकलते है, इसमें कोयला और पत्थर से लेकर सोना और टंगस्टन, बिजली बल्ब का एलीमेंट, तक शामिल हैं और संबंधित राज्यों के चुनावों में हर बार मुद्दा जरूर बनते हैं। यह चाहे रायल्टी के लिए बने या फिर भ्रष्टाचार के रूप में, लेकिन इन पर चर्चा जरूर होती है। इन्हें संरक्षित करने, बचाने, संयम से प्रयोग करने के वायदे किए जाते हैं, पर पंजाब के एकमात्र खनिज पदार्थ पानी को बचाने की दिशा में कोई बात नहीं हो रही है।
दिलचस्प है कि हिमाचल प्रदेश की ओर से पानी में से बिजली निकाल लेने और पंजाब को 'फोकाÓ पानी देने जैसे मुद्दों पर पंजाब में कभी चुनाव लड़े और जीते भी गए है पर पानी में मिल रहे जहर को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया।
प्राकृतिक स्रोत है मौसम व हवा
सर्दियों में कड़ाके की ठंड और गर्मियों में चिलचिलाती धूप, 0 डिग्री से 48 डिग्री के बीच झूलने वाले पंजाब की आबोहवा ही कुछ ऐसी है कि यहां साल में तीन दमदार फसलें ली जा सकती है, लेकिन प्राकृति के अंधाधुंध तरीके से किए गए दोहन का सिलसिला जारी है।
सब सोयल एक्ट पास कर भी लाभ नहीं
शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने क्या किया? और क्या नहीं? ये एक अलग मुद्दा हो सकता है पर वर्तमान सरकार धान की फसल की बिजाई और रोपाई का समय सुनिश्चित करने बनाए गए कड़े कानून का लाभ नहीं ले सकी है। दिलचस्प है कि शुरु में खेत मजदूरों की कमी का हवाले दे आलोचना का शिकार हुए इस कानून की अब किसान भी तारीफ कर रहे हैं। किसानों को जल सरंक्षण का आर्थिक लाभ हर तीसरे साल होने वाले बोर के खर्च से बच कर मिला है।
पराली का जलना जारी
धान की पराली को जलाने से होने वाले दुष्प्रभावों पर जागरुकता तो पिछले चुनावों से इन चुनावों के बीच आ गई है पर पराली जलाने का सिलसिला अभी जारी है। याद रहे कि दो साल पहले की तुलना में पिछले अक्टूबर में पराली जलाने पर किसानों पर दर्ज होने वाले मामले नगण्य ही रहे हैं। जबकि एलर्जी व सांस के मरीजों, बच्चों व बुजुर्गो को कई क्षेत्रों में मिली राहत का 'लाभÓ राजनीतिक दल नहीं ले रहे हैं।
'वातावरण अते समाज बचाओ मोर्चाÓ
हालांकि इस बार चुनावों से ठीक पहले प्रदेश के पानी और खुराक को जहर मुक्त करने 'वातावरण अते समाज बचाओ मोर्चाÓ का गठन किया गया है। सामूहिक नेतृत्व में चलने वाले इस मोर्चे में खेती विरासत मिशन, कुदरत मानव केंद्रीय सभा, लोक लहर, इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी, पंजाबी सत्थ, भारतीय किसान यूनियन के तीन घटक सिद्धूपुर, डकोंदा, राजेवाल जैसे संगठन शामिल हैं। नेतृत्व करने वालों में बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल, ज्ञानी केवल सिंह, डा. जीपीआई सिंह, प्रो. जगमोहन सिंह, उमेंद्र दत्त जैसे नाम शामिल हैं।
प्रदूषित पानी पार्टी या विचारधारा नहीं देखता
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त कहते हैं कि जिस पानी को पीकर केंसर हो रहा है वो किसी की पार्टी या विचारधारा नहीं देखता। यह किसी को भी हो सकता है और इसके लिए जिम्मेदार भी सभी होंगे। पंजाब में गुजरात व राजस्थान से च्यादा डार्क जोन बन गए हैं। राच्य में जो भी सरकार बने वो पर्यावरण इमरजेंसी घोषित करे और सबसे पहले हमारे प्राकृतिक जल संसाधन बचाने की दिशा में जल संरक्षण अधिनियम समय बद्ध तरीके से लागू करे।
चुनाव आयोग से मांग
चुनावी घोषणा पत्र में औपचारिकता के रूप में रखे जाने वाले आदर्श स्लोगनों या लच्छेदार बातों को बाद में राजनीतिक दल भूल ना जाएं इसके लिए पहली बार आस्तित्व में आए इस मोर्चे ने चुनाव आयोग से मांग की है कि राजनीतिक दलों की ओर से जारी होने वाला घोषणा पत्र कानूनी दस्तावेज हो और इसे लागू ना करने वाले दलों को अगला चुनाव लडऩे से रोकने का प्रावधान भी होना चाहिए।
प्राकृति के नियम के विपरीत करते हैं काम
मालवा के पानी में यूरेनियम के अंश पाए जाने की यूरोप के अध्ययन को सामन रखने वाले कम्यूनिटी मेडिसन के विशेषज्ञ व जाने माने पर्यावरणविद् डा. अमर सिंह आजाद कहते हैं कि पंजाब के अलावा हरियाणा व हिमाचल प्रदेश की इंडस्ट्री का टॉक्सिक जल, कई तरह के हैवी मैटल व रसायनिक तत्वों के साथ और यहां के शहरों का सीवरेज लगातार दरिया व बरसाती नालों में उड़ेला जा रहा है। जो प्राकृति के नियम के विपरीत है। जो पानी एक बार ले लिया जाता है, उसे वापिस नदी अथवा नाले में नहीं डाला जाता, उस पानी का शोधन कर खेती में सिंचाई के लिए प्रयोग करना होता है। लेकिन यहां पर सारी इंडस्ट्री लगाई ही नदी किनारे जाती है, सरकार सोई रहती है और खुद अनुमति देती और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी सारी उम्र में एक भी इंडस्ट्री अथवा प्रदूषण फैलाने वाले को सजा नहीं दिलवा पाता।
जिस पानी की खाते कसमें वो कत्ल करने लगा
सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम डा. पीपी खोसला कहते हैं कि पंजाब के जिस पानी की कसमें खाई जाती थी अब वो पानी कत्ल करने लगा है। जिस पर कभी लोक गीत लिखे जाते थे, वो बहता पानी तो कई साल पहले गंदा कर दिया अब तो रिस कर धरती के नीचे पहुंचा पानी बीमारियां दे रहा है।
आने वाली सरकार को परामर्श
-आने वाली सरकार को हर दिशा में काम करना होगा
-नियम कानून को सख्ती से लागू करने के अलावा
-घटिया और पुरानी पड़ चुकी तकनीक को पंजाब आने से रोकना होगा, जिससे शराब फैक्ट्रीयों की बाढ़ ना आए, कोयला आधारित थर्मल प्लांट ना आएं।
-पेस्टीसाइड व रसायनिक खादों का प्रयोग कम कर प्राकृतिक खेती की ओर ले जाना
-शहरों में बड़े पैमाने पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने होंगे
-रेन वाटर हारवेस्टिंग और वाटर रिचार्जिंग अनिवार्य हो
-प्राकृतिक स्रोतों के आसपास के इलाकों को अवैध कब्जों से मुक्त करवाए
-जल स्रोतों में उड़ेले जाने वाले जहर को रोका जाए
-पुराने स्रोतों को पुर्नजीवित किया जाए।
तभी जीवन चक्र में प्रवेश कर चुके टॉक्सिक ततव निकाले जा सकेंगे अन्यथा कैंसर के रूप में ये फूटते रहेंगे।
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