पेशे से चिक्तिसा विशेषज्ञ व राष्ट्रीय स्तर पर कम्युनिटी मेडीसन के क्षेत्र में अच्छी खासी पहचान और अपने काम के प्रति लगन ऐसी कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश के सबसे प्रतिष्ठित 'धनवंतरी पुरस्कार' से सम्मानित हुए। इन उपलब्धियों के साथ ही पुश्तैनी बिस्वेदार-जागीरदार परिवार की पृष्ठभूमि के चलते डा. एएस सेखों को 'एंटीक्स' से कुछ ऐसी मोहब्बत हुई कि वे इन्हें संजोने के इश्क में गिरफ्तार होकर रह गए।
पिछले 30 सालों में पंजाब के विभिन्न मेडीकल कालेजों में अध्यापक से प्रिंसिपल और बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज में रजिस्ट्रार की भूमिका निभाने के बाद आज वे ज्ञान सागर मेडीकल कालेज में डीन के रूप में कार्यरत हैं। जब भी उन्हें पंजाबी परंपरा से जुड़ी कलाकृति दिखाई देती है तो उनका दिल उसे पाने के लिए मचलने लगता है। डा. सेखों इसे स्वीकार भी करते हैं कि काफी लंबे अर्से से इस लगाव के चलते कुछ हद तक उनमें भी एक अच्छे संग्रहकत्र्ता के गुण विकसित हो गए हैं। ऐसे में अगर कोई अच्छी चीज मिले तो कीमत चुकाने में भी एतराज नहीं होता।
डा. सेखों ने उनके पिता व तत्कालीन सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस स. सिआसत सिंह को 1938 में वायस राय ऑफ इंडिया लार्ड लिंलिथगो से मिली छड़ी आज भी संभाल कर रखी है। यही नहीं, पड़दादा स. चरहट सिंह की दो शताब्दी पुरानी तलवार भी उन्होंने हिफाजत के साथ रखी हुई है। इसके दस्तावेजी प्रमाण के रूप में उनके पास 1816 की तस्वीर की नकल भी है, जिसे इंग्लैंड के विक्टोरिया अलबर्ट म्यूजियम लंदन में 'जिमींदार ऑफ पंजाब' के रूप में लगाया गया है। डा. सेखों के पड़दादा के सेकेंड लांसर के रूप में कंधे पर सुशोभित होने वाले बैच आज घर की दीवार पर विशेष रूप से चमकते हैं।
पटियाला रियासत के संस्थापक बाबा आला सिंह के करीबी रहे उनके पूर्वजों ने अमलोह के निकट कौलगढ़ का निर्माण किया था। आज डा. सेखों का आफिसर कालोनी का घर इसी नाम से लगभग वही सामंतशाही पहचान लिए हुए है। दीवारों पर शिकार खेलने वाले हथियार सजे हैं तो डाइनिंग टेबल की क्रॉकरी से लेकर, शैल्फ, अलमारी हर तरफ एंटीक्स बिछाए हुए हैं।
डा. सेखों बताते हैं कि पंजाबी परंपरा से जुड़ी कलाकृतियां संजोने में वे कहीं भी जा पहुंचते हैं, लेकिन लंदन के नॉटिंघम गेट के निकट पोर्टबेलो स्ट्रीट उनकी पसंदीदा जगह है।
पिछले 30 सालों में पंजाब के विभिन्न मेडीकल कालेजों में अध्यापक से प्रिंसिपल और बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज में रजिस्ट्रार की भूमिका निभाने के बाद आज वे ज्ञान सागर मेडीकल कालेज में डीन के रूप में कार्यरत हैं। जब भी उन्हें पंजाबी परंपरा से जुड़ी कलाकृति दिखाई देती है तो उनका दिल उसे पाने के लिए मचलने लगता है। डा. सेखों इसे स्वीकार भी करते हैं कि काफी लंबे अर्से से इस लगाव के चलते कुछ हद तक उनमें भी एक अच्छे संग्रहकत्र्ता के गुण विकसित हो गए हैं। ऐसे में अगर कोई अच्छी चीज मिले तो कीमत चुकाने में भी एतराज नहीं होता।
डा. सेखों ने उनके पिता व तत्कालीन सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस स. सिआसत सिंह को 1938 में वायस राय ऑफ इंडिया लार्ड लिंलिथगो से मिली छड़ी आज भी संभाल कर रखी है। यही नहीं, पड़दादा स. चरहट सिंह की दो शताब्दी पुरानी तलवार भी उन्होंने हिफाजत के साथ रखी हुई है। इसके दस्तावेजी प्रमाण के रूप में उनके पास 1816 की तस्वीर की नकल भी है, जिसे इंग्लैंड के विक्टोरिया अलबर्ट म्यूजियम लंदन में 'जिमींदार ऑफ पंजाब' के रूप में लगाया गया है। डा. सेखों के पड़दादा के सेकेंड लांसर के रूप में कंधे पर सुशोभित होने वाले बैच आज घर की दीवार पर विशेष रूप से चमकते हैं।
पटियाला रियासत के संस्थापक बाबा आला सिंह के करीबी रहे उनके पूर्वजों ने अमलोह के निकट कौलगढ़ का निर्माण किया था। आज डा. सेखों का आफिसर कालोनी का घर इसी नाम से लगभग वही सामंतशाही पहचान लिए हुए है। दीवारों पर शिकार खेलने वाले हथियार सजे हैं तो डाइनिंग टेबल की क्रॉकरी से लेकर, शैल्फ, अलमारी हर तरफ एंटीक्स बिछाए हुए हैं।
डा. सेखों बताते हैं कि पंजाबी परंपरा से जुड़ी कलाकृतियां संजोने में वे कहीं भी जा पहुंचते हैं, लेकिन लंदन के नॉटिंघम गेट के निकट पोर्टबेलो स्ट्रीट उनकी पसंदीदा जगह है।
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