Monday, 14 February 2011

पटियाला पैग पोस्टर में हंगामा फेसबुक पर

'हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो...
-किसी ने सरकार पर गुस्सा निकाला तो, किसी को सिस्टम ही खराब लगा
-कांगे्रस अकालियों को छोड़ निजाम बदलने की सलाह भी दी
-शराब पर बने पंजाबी गानों पर प्रतिबंध से शुरूआत की मांग भी उठी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
आईएस जोहर की लोकप्रिय पैरोडी '...है ये अंगूर की बेटी...होती जो बेटा तो क्या गजब ढ़ाहतीÓ शराब से मचने वाले उत्पात की कहानी दशकों पहले ही साफ कर चुकी है और अनुमान भी लगाती है कि थोड़ा सा बदलाव क्या गजब ढ़ाह सकता है। दुनिया के मानचित्र पर अपने बड़े साइज के पैग के लिए मशहूर पटियाला के बस स्टैंड परिसर में लगा एक पोस्टर चंद घंटों में ही सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर हंगामा मचाए हुए है।
हर तरफ से टिप्पणियां आ रही है। शिलांग से अजय सिंहा लिखते है 'सरकार और स्थानीय सरकार क्या कर रही है...ये तो प्रतिबंधित है।
Ó इस पर संगरूर के वकील कमल आनंद लिखते है 'स्थानीय सरकार विज्ञापनउ दाताओं से टैक्स और रिश्वत लेने में व्यस्त हैÓ पैप्सू अकाली दल के पहले प्रधान और सुनाम व संगरूर से पूर्व विधायक के पौत्र जगमान समरा एसजीपीसी पर के साथ लिखते है कि ' ये तो स्कूल जाने वाले बच्चों को दिखाने लगाया गया हैÓ ।
यहीं पर अमृतसर के छायाकार बिृज बेदी कहते है कि सरकार 'गुड गवर्नेसÓ की बात करती है। स्पेन से करमेंदर सिंह औलख की टिप्पणी आती है कि इंडिया में इस तरह की फोस्टर एड सीडी व कैसेट्स के रूप में हर ओर देखी जा सकती है।
अमृतसर का नाम इस बार रश्मि तलवार के साथ आता है पेशे से टीचर का कहना है कि 'लीकर की सेल से सेहत पर खर्च बढ़ेगाÓ इस प्रकार कांगे्रस अकालियों को छोड़ निजाम बदलने की सलाह भी दी गई है यहां तक की गुस्सा पंजाबी गानों पर भी निकला है, ऐसे गानों पर प्रतिबंध से शुरूआत करने की मांग भी उठी है। दिलचस्प है कि सत्ताधारी पार्टी के एक पूर्व विधायक के मीडिया सलाहकार ने जब फेसबुक पर अपनी ओर से लिखा की कुछ सरकारी विभागों ने ग्रीन बैल्ट व लैंड स्केप विकसित करने पर विज्ञापन करने की छूट देनेे दिलचस्पी जताने को कहा है। इस पर भी जब टिप्पणियां आने लगी तो उन्होंने अपनी उक्त बात हटा कर बस इतना भर लिख दिया कि हां मैंने भी वो देखा है।
इस संबंध में मेयर अजीतपाल सिंह कोहली कहते है कि यह पोस्टर बस स्टैंड के परिसर के भीतर है और यहां विज्ञापन से आय लेना पैप्सू रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन का काम है और यह भी उन्हीं ने तय करना है कि क्या छपे? क्या ना छपे? याद रहे कि ऐसे फोस्टर विज्ञापनों पर तकनीकि रूप से किया कुछ भी नहीं जा सकता लेकिन जागरूकता कि गति इतनी है कि लगभग चंद मिनटों के बाद कोई ना कोई अपने विचार जरूर दे रहा है।

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