बंदरों के स्कूल जाने में हुई एक साल की देरी
-पटियाला के मोती बाग बीड़ में तहजीब सिखाने खुलना है, एक करोड़ का पुनर्वासन केंद्र
- यहीं पर हुआ करती थी बदनाम, बदमाश व शराबी बंदरों की जेल
-प्रदेश में आबादी 65 हजार के पार, जिले के छह जंगलों के आस पास दस हजार से ज्यादा
भूपेश चट्ठा पटियाला
बंदरों के लिए अपनी तरह का देश का पहला स्कूल बनने में एक साल की देरी हो गई है और इसमें तहजीब सीखने रखे जाने वाले बंदरों का एडमिशन एक साल और नहीं हो सकेगा। कारण बीते साल इन्हीं दिनों के एडमिशन सीजन में पंजाब के वन्य जीव जंतु विभाग की ओर से भेजे गए इस महत्कांक्षी प्रोजेक्ट पर केंद्र सरकार की मुहर नहीं लग पाई है। हालांकि बंदरों के उत्पात से पटियाला के एक क्षेत्र विशेष की जनता को राहत जरूर मिल गई है। दिलचस्प है कि जो काम वन विभाग के दर्जनों कर्मी नहीं कर पाए वो दो लंगूरों ने ना केवल कर दिया अपितु सस्ते में भी निपटा दिया।
डकाला रोड पर हमेशा खड़ी रहने वाली बदरों की बटालियनें अब गायब हो गई है। इसी सड़क पर केले, चने और गुड़ बचने का काम करने वाले बताते है कि एक निजी स्कूल ने चंडीगढ़ से लंगूरों के ठेकेदार मेंहदी और असगर को सड़क के एक छोर से दूसरे छोर तक बंदरों से निजात दिलाने का ठेका पांच हजार में दिया है और यह सात महीनों का कांट्रेक्ट है। प्रत्यक्षदर्शी बताते है कि शुरू में तो चौकस लंगूर अपने मालिक के साथ एक किनारे से दूसरे किनारे तक 'पैट्रोलिंगÓ किया करते थे पर एक ही सप्ताह के भीतर इतना दबदबा तो कायम ही कर लिया है कि अब उनके गले में घुंघरू बांध कर बंद दूकानों के बाहर बांध दिया है और सारी सड़क पर एक भी बंदर दिखाई नहीं दे रहा।
सड़क पर दुर्घटनाओं में कितनी कमी आई यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा पर राहत गुड़-चना बेचने वालों क अलावा सभी को है।
उधार जिला वन अधिकारी एसके सागर से जब बंदरों की समस्या इंसानों से हल ना होने की बात की गई तो वे कहते है कि विभाग की इन्हें तहजीब सिखा पाना तो किसी के बस की बात नहीं है अलबत्ता पुर्नवासन केंद्र का प्रोजेक्ट भेजा गया है जिसे मंजूरी का इंतजार है। रही बात लंगूर की सो ये बंदर के 'बड़े भाईÓ है और बड़ा भाई कई बार किसी चीज को ज्यादा बेहतर ढ़ंग से 'समझाÓ देता है।
याद रहे कि सेंट्रल जू अथारिटी ने पटियाला के डकाला रोड़ स्थित रियासत काल की शिकारगाह मोती बाग बीड़ में करीब एक सौ बंदरों के लिए वस्तुत: बंदरों के तौर तरीके सिखाने पुनर्वासन केंद्र खोलने का प्रस्ताव भेजा गया है। इस प्रोजेक्ट की शुरूआत 17-18 बंदरों के साथ की जानी है। जहां विशेषज्ञ ट्रेनर से लेकर वेटरनरी डाक्टर तक रखे जाने है। जो इन बंदरों को बंदरों की जीवन शैली का पाठ पढ़ा कर पुन: जंगलों का रास्ता दिखाएंगे।
वैज्ञानिक तरीके से सभी तरह की सुविधाओं के साथ इन्हें पुन: इनके सामाज में भेजने लायक बनाया जाएगा, जिससे इन्हें देख कर अन्य बंदर भी कम आतंकी हों और वास्तव में किसी जंगल के मूल बंदर के ओरिजनल रूप में व्यवहार कर सकें। यह बंदरों के लिए एक तरह का अस्थाई घर होगा।
सेंट्रल जू अथारिटी ने हालांकि मोती बाग बीड़ के डियर पार्क को मिनी जू का दर्जा दे दिया है, यहां के लिए सभी तरह की योजनाएं कागजों में सिमटी है। अधिकारी कहते हैं कि पैंथर कहां रखा जाएगा और अजगर कहां होगा ? जैसे सात आठ करोड़ रूपये के प्लान हैं। जिन्हें फाइलों से निकाल मूलरूप दिया जाना है।
जंगल से बाहर निकल मनुष्य की संगत में आने के बाद बंदरों का व्यवहार खासा बदल जाता है, टेलीविजन के एंटीना पकड़ हिलाने से लेकर इंसान पर हमला कर जख्मी करना, स्कूल बैग व टिफन की छीना छपटी करनी, घरों में घुस कर कपड़े फाड़ आतंक फैलाना इनकी आदतों में शुमार हो जाता है। पटियाला के इसी क्षेत्र में ही कभी बदनाम, बदमाश व शराबी बंदरों की जेल हुआ करती थी
। वन विभाग का ही एक स्र्वेक्षण बताता है कि प्रदेश में इनकी आबादी 65 हजार के पार है और जिले के छह जंगलों के आस पास दस हजार से ज्यादा बंदर रह रहे है।
-पटियाला के मोती बाग बीड़ में तहजीब सिखाने खुलना है, एक करोड़ का पुनर्वासन केंद्र
- यहीं पर हुआ करती थी बदनाम, बदमाश व शराबी बंदरों की जेल
-प्रदेश में आबादी 65 हजार के पार, जिले के छह जंगलों के आस पास दस हजार से ज्यादा
भूपेश चट्ठा पटियाला
बंदरों के लिए अपनी तरह का देश का पहला स्कूल बनने में एक साल की देरी हो गई है और इसमें तहजीब सीखने रखे जाने वाले बंदरों का एडमिशन एक साल और नहीं हो सकेगा। कारण बीते साल इन्हीं दिनों के एडमिशन सीजन में पंजाब के वन्य जीव जंतु विभाग की ओर से भेजे गए इस महत्कांक्षी प्रोजेक्ट पर केंद्र सरकार की मुहर नहीं लग पाई है। हालांकि बंदरों के उत्पात से पटियाला के एक क्षेत्र विशेष की जनता को राहत जरूर मिल गई है। दिलचस्प है कि जो काम वन विभाग के दर्जनों कर्मी नहीं कर पाए वो दो लंगूरों ने ना केवल कर दिया अपितु सस्ते में भी निपटा दिया।
डकाला रोड पर हमेशा खड़ी रहने वाली बदरों की बटालियनें अब गायब हो गई है। इसी सड़क पर केले, चने और गुड़ बचने का काम करने वाले बताते है कि एक निजी स्कूल ने चंडीगढ़ से लंगूरों के ठेकेदार मेंहदी और असगर को सड़क के एक छोर से दूसरे छोर तक बंदरों से निजात दिलाने का ठेका पांच हजार में दिया है और यह सात महीनों का कांट्रेक्ट है। प्रत्यक्षदर्शी बताते है कि शुरू में तो चौकस लंगूर अपने मालिक के साथ एक किनारे से दूसरे किनारे तक 'पैट्रोलिंगÓ किया करते थे पर एक ही सप्ताह के भीतर इतना दबदबा तो कायम ही कर लिया है कि अब उनके गले में घुंघरू बांध कर बंद दूकानों के बाहर बांध दिया है और सारी सड़क पर एक भी बंदर दिखाई नहीं दे रहा।
सड़क पर दुर्घटनाओं में कितनी कमी आई यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा पर राहत गुड़-चना बेचने वालों क अलावा सभी को है।
उधार जिला वन अधिकारी एसके सागर से जब बंदरों की समस्या इंसानों से हल ना होने की बात की गई तो वे कहते है कि विभाग की इन्हें तहजीब सिखा पाना तो किसी के बस की बात नहीं है अलबत्ता पुर्नवासन केंद्र का प्रोजेक्ट भेजा गया है जिसे मंजूरी का इंतजार है। रही बात लंगूर की सो ये बंदर के 'बड़े भाईÓ है और बड़ा भाई कई बार किसी चीज को ज्यादा बेहतर ढ़ंग से 'समझाÓ देता है।
याद रहे कि सेंट्रल जू अथारिटी ने पटियाला के डकाला रोड़ स्थित रियासत काल की शिकारगाह मोती बाग बीड़ में करीब एक सौ बंदरों के लिए वस्तुत: बंदरों के तौर तरीके सिखाने पुनर्वासन केंद्र खोलने का प्रस्ताव भेजा गया है। इस प्रोजेक्ट की शुरूआत 17-18 बंदरों के साथ की जानी है। जहां विशेषज्ञ ट्रेनर से लेकर वेटरनरी डाक्टर तक रखे जाने है। जो इन बंदरों को बंदरों की जीवन शैली का पाठ पढ़ा कर पुन: जंगलों का रास्ता दिखाएंगे।
वैज्ञानिक तरीके से सभी तरह की सुविधाओं के साथ इन्हें पुन: इनके सामाज में भेजने लायक बनाया जाएगा, जिससे इन्हें देख कर अन्य बंदर भी कम आतंकी हों और वास्तव में किसी जंगल के मूल बंदर के ओरिजनल रूप में व्यवहार कर सकें। यह बंदरों के लिए एक तरह का अस्थाई घर होगा।
सेंट्रल जू अथारिटी ने हालांकि मोती बाग बीड़ के डियर पार्क को मिनी जू का दर्जा दे दिया है, यहां के लिए सभी तरह की योजनाएं कागजों में सिमटी है। अधिकारी कहते हैं कि पैंथर कहां रखा जाएगा और अजगर कहां होगा ? जैसे सात आठ करोड़ रूपये के प्लान हैं। जिन्हें फाइलों से निकाल मूलरूप दिया जाना है।
जंगल से बाहर निकल मनुष्य की संगत में आने के बाद बंदरों का व्यवहार खासा बदल जाता है, टेलीविजन के एंटीना पकड़ हिलाने से लेकर इंसान पर हमला कर जख्मी करना, स्कूल बैग व टिफन की छीना छपटी करनी, घरों में घुस कर कपड़े फाड़ आतंक फैलाना इनकी आदतों में शुमार हो जाता है। पटियाला के इसी क्षेत्र में ही कभी बदनाम, बदमाश व शराबी बंदरों की जेल हुआ करती थी
। वन विभाग का ही एक स्र्वेक्षण बताता है कि प्रदेश में इनकी आबादी 65 हजार के पार है और जिले के छह जंगलों के आस पास दस हजार से ज्यादा बंदर रह रहे है।
Good Story,Bhupesh ji infact a monkey rescue centre is need of the hour for both humans and monkey's.They should expediate the process for the same.
ReplyDeletekeep it up