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Monday, 19 November 2012

चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ा था पराली प्रदूषण अभियान

भूपेश चट्ठा, पटियाला
कृषि व कृषक हितैषी कही जाने वाली पंजाब सरकार पिछले साल पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम करने में पूरी तरह से असफल रही थी। कारण सिर्फ और सिर्फ चुनावी था। इस साल हुए विधान सभा चुनाव से ठीक पहले के सीजन में सरकार और प्रशासन ने किसानों को सिर्फ 'जागरुकÓ ही किया है। किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई करने से बचती रही।
बीते साल ही मोगा के गांव में खेत में जल रही पराली में एक आटो रिक्शा में बैठे तीन बच्चों के चपेट में आने से मौत हो गई थी। दिलचस्प है कि उन दिनों पंजाब सरकार के लिए धान की खरीद व लिफ्टिंग में जुटे विशेष सचिव दरबारा सिंह गुरु लगातार कहते रहे कि 'पहले लोगों को जागरुक करना जरूरी है।Ó हालांकि बाद में उन्होंने भी चुनाव लड़ा।
कांग्रेस के शब्दों में शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में चाहे कुछ ना किया हो लेकिन वर्ष 2007 से 2011 तक की सरकार ने पंजाब में सब सोयल एक्ट(धान की बिजाई 10 मई से और रोपाई 10 जून से करवाना) को सफलता पूर्वक लागू करने के अलावा पराली को जलाए जाने प्रति कड़ाई से कानून की पालना करवाना। दो महत्वपूर्ण कामों के लिए जाना जाएगा। फिर भी चुनावी साल में अपने सबसे बड़े वोट बैंक के आगे यह सरकार भी पिछले साल नतमस्तक हो गई थी।


पराली जलाने की रोकथाम पर कानूनी
 कानून अनुसार अभी तक केवल धारा 144 के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है। इसी के तहत पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सिफारिश पर जिले में तैनात डिप्टी कमिश्नर अपने जिला मैजिस्ट्रेट के अधिकारों का प्रयोग करते हुए प्रतिबंध लगाता है और इसी धारा के तहत कृषि अधिकारी व एसडीएम के माध्यम से पराली जलाए जाने वालों पर एफआईआर दर्ज करवाता है।

दो दशक में सफलता मात्र 20 फीसद

90 के दशक में पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण का मुद्दा उठाने वाले पर्यावरण वैज्ञानिक और वर्तमान में पीपीसीबी में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत डा. चरणजीत सिंह नाभा कहते हैं कि दो दशक तक लोगों को समझाने के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाए हैं और आज भी केवल जागरुक ही कर रहे हैं। सफलता का परिणाम 20 फीसद से थोड़ा ही ज्यादा है।
क्या है विकल्प
पराली से गत्ता बनाने और बायोमॉस प्लांट लगा कर बिजली बनाने वाले कामर्शियल उपयोग के अलावा पराली को खेत में ही खुर्द-बुर्द कर खाद में तबदील करने वाले उपायों पर मुख्य कृषि अधिकारी  डा. बीएस सोहल कहते हैं कि अभी में मिनी टिल ड्रिल अथवा रोटावेटर ही चलन में। इससे किसान आंशिक तौर पर मोटे किरचे जला कर शेष को खेत में कुतर लेता है। पूरी तरह से जलाए बिना पराली को खेत में खपा देने वाले हैप्पी सीडरों की संख्या ज्यादा नहीं है। इनके सस्ता होने अथवा कंबाईन की तरह लोकप्रिय होने के बाद आपको पराली कहीं जलती हुई नहीं दिखेगी।

वक्त बदला मंजर नहीं

पटियाला के मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल अनुसार जिले में 2.33 लाख हैक्टेयर में धान की फसल लगी है। इसकी कटाई की शुरुआत हो चुकी है। मोटे अनुमान अनुसार धान का पौधा ठीक ठाक रहे तो प्रति हैक्टेयर 15-16 टन पराली पैदा होती है। ऐसे में साधारण गणित अनुसार 30 से 35 लाख टन पराली का बनना तय है।
वहीं पराली से उपजने वाली गैसों पर कृषि विज्ञानी बताते हैं कि पराली के जलाने से वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटीरियल, फास्फोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जलकर आसमान में चले जाते हैं हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें भी होती हैं, जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक सूर्य की किरणों को 33 फीसदी तक रोके रखती हैं।
इतना ही नहीं पराली जलने से खेत में मित्र कीटों के साथ धरती के नीचे खाद बनाने वाली प्राकृतिक फैक्ट्री को भी हर साल जल जाती हैं। पराली जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के अलावा धरती की उर्वरा शक्ति भी क्षीण होने लगी है।
पटियाला में अभी धान की कटाई शुरु ही हुई है और डिप्टी कमिश्नर जीके सिंह ने धारा 144 के तहत पराली का जलाया जाना प्रतिबंध कर रखा है। फिलहाल किसी तरह की दुर्घटना सामने नहीं आई है।

Friday, 16 November 2012

क्यों न मुफ्त बिजली बंद करे सरकार!


 युवा संपादक पेज के लिए
लोगो : पराली का जलाना
- प्रदूषण फैलाने वाले किसानों की बिजली सब्सिडी बंद करने की मांग उठने लगी
मिताली गोयल, पटियाला
पराली के जलाए जाने से हो रहे प्रदूषण से त्रस्त आम आदमी हालांकि खुलकर कुछ नहीं कह पा रहा, पर अब दबी जुबां से ये मांग जरूर करने लगा है कि जब सरकार कृषि क्षेत्र को मुफ्त बिजली देकर आम आदमी पर अतिरिक्त बोझ डालती है तो कम से कम पराली जलाकर प्रदूषण फैलाने वाले किसानों की मुफ्त बिजली क्यों न बंद कर दी जाए।
सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा.पीपी खोसला कहते हैं कि पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड दो दशक से किसानों को 'जागरुकÓ करता आ रहा है। इस कड़ी में कानूनी रूप से भी धारा-144 के तहत प्रतिबंध लगाया गया है, लेकिन बीते साल वर्ष 2011 में 188 मामले दर्ज हुए तो इस साल इनकी संख्या दो सौ के थोड़ा ऊपर ही निकल पाई है। जबकि राज्य में 12 लाख से ज्यादा ट्यूबवेल कनेक्शन हैं और लगभग हर गांव में पराली जल रही है। डा.खोसला कहते हैं कि कुछ साल पहले पीपीसीबी ने ही उन सभी किसानों पर मामले दर्ज करने की बात कही थी, जहां पर आग लगने से औरों को नुकसान हुआ अथवा फायर बिग्रेड ने पहुंचकर आग पर काबू पाया हो। यहां तक कि रजिस्टर में शिकायत दर्ज होने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं हुई।
अगर सब सॉयल एक्ट के तहत धान की बिजाई नियंत्रित की जा सकती है तो कटाई क्यों नहीं? किसान को चेतावनी दें, खर्चा लगाने व कनेक्शन काटने की सलाह तक दे दी गई है तो पराली जलाने वालों को मुफ्त बिजली बंद क्यों नहीं हो सकी है।

बाक्स
...कहते हैं अधिकारी
मुख्य कृषि अधिकारी डा.बीएस सोहल कहते हैं कि किसान सबसे अधिक कानून मानने वाला समुदाय है। सब सॉयल एक्ट के तहत जब किसान से भूमिगत जल स्तर बचाने को धान की बिजाई 10 मई से और रोपाई 10 जून से करने को कहा गया तो उसने पूरे प्रदेश में बिना किसी विरोध के इसे लागू किया। ठीक ऐसे ही पराली जलाए जाने के बारे में किसान जागरुक है। कुछ सुधार हुआ है, बाकी भी विकल्प मिलते ही दिखाई देगा।

...कहते हैं किसान
पराली जलाए जाने को किसान भी न्यायोचित नहीं ठहराते, लेकिन उनका ये भी कहना है कि लोग उनकी परेशानी नहीं देखते। बाजार में और प्रदेश में पराली के गट्ठर बांधने वाली बेलर मशीनें हर तरफ उपलब्ध नहीं हैं। इसी प्रकार धान की कटाई के साथ ही गेहूं की बिजाई करने वाली हैप्पी सीडर जैसी मशीनें उपलब्ध नहीं है।
इस साल धान की बिजाई व रोपाई दोनो ही लेट हुई हैं। ऐसे में फसल की कटाई देरी में हो चुकी है। गेहूं का सीजन 25 अक्टूबर से शुरु हो चुका है, पर खेत खाली नहीं हुए। ऐसे में पराली जलाकर गेहूं की बिजाई करने के अलावा कोई और चारा बचा नहीं है।

Monday, 12 November 2012

इलाज है पर 'जुगाड़' के इंतजार में सरकार?


जलती पराली
जागरण एक्सकलूसिव
-हर गांव में तीन से चार हैप्पी सीडर हों तो बात बन जाए पर...
-दो साल में संख्या 50 से बढ़कर मात्र दो सौ के पार हुई
भूपेश चट्ठा, पटियाला
कितना अच्छा हो अगर धान की कटाई को जो मशीन खेत में उतारी जाए वह धान की फसल की कटाई के साथ ही गेहूं की बिजाई भी कर दे। इतना ही नहीं एक ही बार में खेत में घूमती मशीन कंबाइन की तरह धान की उपज किसान की ट्राली में डाले तो फसल के किरचों अथवा पराली को कुतर कर मिट्टी में मिला दे जिससे खेत में नाइट्रोजन, पोटाश, फासफोरस आदि तत्वों की कमी भी ना हो। जी हां पराली को जलाने से बचाने और धरती की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने वाली कृषि मशीन 'हैप्पी सीडरÓ को पंजाब में सफलता पूर्वक लांच किए दो साल हो चुके हैं लेकिन सरकार इसे ट्रैक्टर अथवा कंबाइन की तरह लोकप्रिय बनाने में असफल रही है।
कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल बताते हैं कि जैसा की इसका नाम है यह अगली फसल की बिजाई करता है वो भी पिछली फसल की कटाई के साथ एक ही बार में। इसमें एक ही बार डीजल व किसान की मेहनत लगती है और धान की कटाई व गेहूं की बिजाई दोनों हो जाती है। बीज छिड़कने ड्रिलिंग के साथ फर्टीलाइजर का सदुपयोग भी होता है। इतना ही नहीं धान के खेत में मौजूद नमी का प्रयोग गेहूं के पौधे को पनपने में होता है। इससे सिंचाई के  लिए शुरु में पानी की जरूरत नहीं पड़ती। धान की नमी से ही गेहूं का पौधा चल पड़ता है।
डा. सोहल बताते हैं कि खेत में ही पराली खुर्द-बुर्द की जाती है इससे खेत में खाद के रूप में जहां कीट मौजूद रहते हैं वहीं इनकी खुराक भी पूरी रहती है। इतना ही नहीं खेत को दोबारा तैयार करना नहीं पड़ता जिससे महंगा डीजल, मशीनों की घिसाई और मेहनत भी बच जाती है।
दिलचस्प है कि इतने सब फायदे होने के बावजूद प्रदेश में इनकी दो साल में 50 से बढ़कर मात्र दो सौ के पार ही जा पाई है। जबकि एक अनुमान अनुसार हर गांव में तीन से चार हैप्पी सीडर हों तभी बात बन सकती है। राज्य किसान आयोग अनुसार राज्य के 12 हजार गांवों में करीब 40 हजार हैप्पी सीडर की जरूरत बताई गई है।
वहीं आलोचक कहते हैं कि राज्य सरकार की ओर से धान की पराली बिना जलाए हैप्पी सीडर से होने वाली गेहूं की खेती की ओर अपनी ओर से च्यादा प्रयास नहीं किया गया है। करीब एक दशक पहले 90 लाख रूपये का हैप्पी सीडर आस्ट्रेलिया-यूरोप से इंपोर्ट होता था। लुधियाना से इसकी शुरुआत हुई भी पर पटियाला जैसे जिले में इनकी संख्या डेढ़ से दो दर्जन ही हो पाई है। सरकार को इतजार है कि जिस तरह से नाभा, भादसों, अमलोह जैसे कस्बों में छोटे कृषि उपकरण बनाने वालों ने पहले 'जुगाड़Ó बनाए और बाद में पूरी कंबाइन इंडस्ट्री विकसित हो गई। ठीक वैसे ही निजी क्षेत्र में हैप्पी सीडर का छोटा रूप व ट्रैक्टर के साथ लगने वाला रोटावेटर आया है। वैसे ही इससे कुछ आगे का 'जुगाड़Ó हो जाए तो बात बन जाए।

छोटी मशीनों पर सब्सिडी देते हैं: डायरेक्टर

कृषि विभाग के डायरेक्टर डा. मंगल सिंह संधू कहते हैं कि बड़ी मशीनों का प्रबंध तो नहीं हुआ है पर छोटी मशीनों पर सब्सिडी दी जा रही है इसमें ट्रैक्टर के साथ लगने वाला रोटावेटर, चौपर, हैप्पीसीडर व बोलर मशीन शामिल है। किसान इनका अलग अलग कर प्रयोग कर बिना पराली जलाए गेहूं की बिजाई कर सकता है।

Thursday, 8 November 2012

जहां बिकती है, वहां भी जलती है पराली


जहां दाम हैं वहां भी बेदम करती पराली
जागरण एक्सक्लूसिव
-दो से ढ़ाई हजार रूपये प्रति एकड़ की अतिरिक्त कमाई पराली मात्र से ही की जा सकती है
-कंपनी दे रही मुफ्त मशीन, मिस्त्री, कटर, धागा और 70 रूपये क्विंटल के दाम
- प्लांट को पूरी पराली ना मिली तो गांवों का दायरा बढ़ाना पड़ा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
करे कौन?...आखिर मोल ही क्या है?, सरकार ले जाए खेतों से? खेत साफ करने आग तो फिर भी लगानी पड़ती है। जैसे बेतुके जुमले देकर किसान धान की पराली वहां भी जला रहा है जहां पराली बिक रही है। और तो और सरकार ने पराली जलाने से बचाने के साथ साथ खेत की उर्वरा शक्ति संजोए रखने, किसानों को सालों पहले ही उपाय देते हुए आय का अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध करवा दिया था।
बात पंजाब हरियाणा सीमा पर स्थित घनौर ब्लाक के बघौरा गांव की है। जहां पर 12 मेगावाट का बायोमॉस ईंधन चलित बिजली उत्पादन केंद्र चल रहा है और इस प्लांट में एक लाख टन से अधिक धान की पराली हर साल खप रही है। क्षेत्र के किसानों से इन दिनों में 70 रूपये क्विंटल की दर से पराली खरीद कर स्टोर कर ली जाती है और वर्ष भर बिजली का उत्पादन किया जाता है।
निजी क्षेत्र में लगे इस प्लांट से बिजली लेने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के अधिकारी बताते हैं वर्ष 2006-07 में शुरु किए इस प्लांट का उद्ेश्य 25 किलोमीटर की परिधि में मौजूद करीब सवा सौ गावों से पराली की खरीद करना। इससे बिजली बनाने के अलावा क्षेत्र के लोगों को बीमारियों से निजात मिलना, प्रदूषण से रोकथाम व धरती की उर्वरा शक्ति बनाए रखना और पर्यावरण में संतुलन कायम रखना अन्य लाभ मिलने तय थे। लेकिन अब प्लांट के फ्यूल मैनेजर दलजीत सिंह बताते हैं कि पराली खरीदने अब उनका दायरा बढ़ा है अब वे प्लांट से 40-50 किलोमीटर दूर भूनरहेड़ी क्षेत्र से भी पराली खरीद रहे हैं। प्लांट के लिए हर महीने 10 से 12 हजार टन पराली की जरूरत है तय इलाके से आपूर्ति ना होने की स्थिति में अब 160 से अधिक गांवों का रुख किया गया है।
दिलचस्प है कि मैसर्स पंजाब बायोमॉस की ओर से क्षेत्र में किसानों को एक सौ से अधिक बोलर मशीनें दी गई है। इसके साथ ही कटर व गट्ठे बांधने को धागा व खराब हुई मशीनों को ठीक करने मिस्त्री तक उपलब्ध करवाए गए हैं। किसान को ज्यादा दूर ना जाना पड़े इसके लिए दस कलेक्शन केंद्र भी बनाए गए हैं। इन तक पराली पहुंचाने पर 70 रूपये प्रति क्विंटल की दर से भुगतान भी किया जाता है।
दूसरी ओर सील गांव के प्रोग्रेसिव किसान हरदीप सिंह कहते हैं कि पांच-छह साल पहले कंपनी ने मशीनें देकर पराली खरीदनी शुरू की थी। दाम तब 60 रूपये क्विंटल रखे गए थे, तब से अब तक कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। जबकि धान के एमएसपी में खासी बढ़ोतरी हुई है और डीजल भी मंहगा हो गया है। हालांकि मुख्य रूप से सब्जी की काश्त करने वाले हरदीप सिंह यह भी कहते हैं कि अगर थोड़ी मेहनत कर ली जाए तो दो से ढ़ाई हजार रूपये प्रति एकड़ की अतिरिक्त कमाई पराली मात्र से ही की जा सकती है। दुनिया को प्रदूषण व जीव हत्या से भी बचा जा सकता है। धरती के नीचे प्राकृतिक रूप से चल रही खाद बनाने की फैक्ट्री भी नहीं जलेगी, जो अगली फसल की बिजाई में भी काम करेगी।



चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ा था पराली प्रदूषण अभियान
कृषि व कृषक हितैषी कही जाने वाली पंजाब सरकार पिछले साल पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम करने में पूरी तरह से असफल रही थी। कारण सिर्फ और सिर्फ चुनावी था। इस साल हुए विधान सभा चुनाव से ठीक पहले के सीजन में सरकार और प्रशासन ने किसानों को सिर्फ 'जागरुकÓ ही किया है। किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई करने से बचती रही।
बीते साल ही मोगा के गांव में खेत में जल रही पराली में एक आटो रिक्शा में बैठे तीन बच्चों के चपेट में आने से मौत हो गई थी। दिलचस्प है कि उन दिनों पंजाब सरकार के लिए धान की खरीद व लिफ्टिंग में जुटे विशेष सचिव दरबारा सिंह गुरु लगातार कहते रहे कि 'पहले लोगों को जागरुक करना जरूरी है।Ó हालांकि बाद में उन्होंने भी चुनाव लड़ा।
कांग्रेस के शब्दों में शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में चाहे कुछ ना किया हो लेकिन वर्ष 2007 से 2011 तक की सरकार ने पंजाब में सब सोयल एक्ट(धान की बिजाई 10 मई से और रोपाई 10 जून से करवाना) को सफलता पूर्वक लागू करने के अलावा पराली को जलाए जाने प्रति कड़ाई से कानून की पालना करवाना। दो महत्वपूर्ण कामों के लिए जाना जाएगा। फिर भी चुनावी साल में अपने सबसे बड़े वोट बैंक के आगे यह सरकार भी पिछले साल नतमस्तक हो गई थी।


पराली जलाने की रोकथाम पर कानून
 कानून अनुसार अभी तक केवल धारा 144 के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है। इसी के तहत पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सिफारिश पर जिले में तैनात डिप्टी कमिश्नर अपने जिला मैजिस्ट्रेट के अधिकारों का प्रयोग करते हुए प्रतिबंध लगाता है और इसी धारा के तहत कृषि अधिकारी व एसडीएम के माध्यम से पराली जलाए जाने वालों पर एफआईआर दर्ज करवाता है।

दो दशक में सफलता मात्र 20 फीसद 

90 के दशक में पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण का मुद्दा उठाने वाले पर्यावरण वैज्ञानिक और वर्तमान में पीपीसीबी में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत डा. चरणजीत सिंह नाभा कहते हैं कि दो दशक तक लोगों को समझाने के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाए हैं और आज भी केवल जागरुक ही कर रहे हैं। सफलता का परिणाम 20 फीसद से थोड़ा ही ज्यादा है।

क्या है विकल्प
पराली से गत्ता बनाने और बायोमॉस प्लांट लगा कर बिजली बनाने वाले कामर्शियल उपयोग के अलावा पराली को खेत में ही खुर्द-बुर्द कर खाद में तबदील करने वाले उपायों पर मुख्य कृषि अधिकारी  डा. बीएस सोहल कहते हैं कि अभी में मिनी टिल ड्रिल अथवा रोटावेटर ही चलन में। इससे किसान आंशिक तौर पर मोटे किरचे जला कर शेष को खेत में कुतर लेता है। पूरी तरह से जलाए बिना पराली को खेत में खपा देने वाले हैप्पी सीडरों की संख्या ज्यादा नहीं है। इनके सस्ता होने अथवा कंबाईन की तरह लोकप्रिय होने के बाद आपको पराली कहीं जलती हुई नहीं दिखेगी।



वक्त बदला मंजर नहीं

पटियाला के मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल अनुसार जिले में 2.33 लाख हैक्टेयर में धान की फसल लगी है। इसकी कटाई की शुरुआत हो चुकी है। मोटे अनुमान अनुसार धान का पौधा ठीक ठाक रहे तो प्रति हैक्टेयर 15-16 टन पराली पैदा होती है। ऐसे में साधारण गणित अनुसार 30 से 35 लाख टन पराली का बनना तय है।
वहीं पराली से उपजने वाली गैसों पर कृषि विज्ञानी बताते हैं कि पराली के जलाने से वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटीरियल, फास्फोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जलकर आसमान में चले जाते हैं हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें भी होती हैं, जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक सूर्य की किरणों को 33 फीसदी तक रोके रखती हैं।
इतना ही नहीं पराली जलने से खेत में मित्र कीटों के साथ धरती के नीचे खाद बनाने वाली प्राकृतिक फैक्ट्री को भी हर साल जल जाती हैं। पराली जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के अलावा धरती की उर्वरा शक्ति भी क्षीण होने लगी है।
पटियाला में अभी धान की कटाई शुरु ही हुई है और डिप्टी कमिश्नर जीके सिंह ने धारा 144 के तहत पराली का जलाया जाना प्रतिबंध कर रखा है। फिलहाल किसी तरह की दुर्घटना सामने नहीं आई है।

Sunday, 20 November 2011

आए दिन एक्सीडेंट पर कोई मामला दर्ज नहीं, parali, accidents, cases

पराली को जलाए जाने से रोकने कानून बीते एक दशक से लगातार बताया जा रहा है, पर दिलचस्प है कि अभी तक धारा 144 लगाए जाने और पराली जलाने पर लगाए पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद पराली जलाने वाले किसानों पर इस साल एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया है। हालांकि पिछले साल जिले में इनकी संख्या 11 थी। मसला इस बार वोटों का बताया जा रहा है।
हाल ही में तीन बच्चे जिंदा जल गए आए दिन एक्सीडेंट होते हैं। सड़क किनारे जली पराली से उठा धुआं किसी को भी अंधा करने में सक्षम है।
जलती पराली पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव डीएस गुरू कहते है कि किसान पर मामले दर्ज करना तो अंतिम विकल्प होना चाहिए बेहतर तो यह कि उसे प्रेरित किया जाए कि वो ऐसा ना करे। हालांकि पराली को लेकर बने कानून को और कड़ा करने अथवा किसी तरह का बदलाव करने पर टिप्पणी नहीं करते, कहते है कि जो है वो लागू रहेगा। धान की बिजाई रोपाई को नियंत्रित करने वाले सब सॉयल एक्ट के समान कड़ा कानून की संभावना पर चुनावी साल में कोई बोलने को तैयार नहीं है।


-पराली में आर्गेनिक तत्व कम और जहर ज्यादा

भूपेश चट्ठा, पटियाला

धान की फसल जल्द पक जाए तो अक्टूबर का शुरू नहीं तो मध्य तक बच्चों, बुजुर्गों और दमे-एलर्जी के मरीजों को खुली हवा में गैस चैंबर का सा अहसास होता है, लेकिन इस साल ये सिलसिला नवंबर में भी जारी है। इससे बचते तंदरुस्त कहे जाने वाले भी नहीं है आंखों में जलन, गले में खराश, जुकाम-खुजली तो आम हो जाता है। इन सब के पीछे कारण क्या है? यह भी सब को पता है कि खेतों में पराली जलाई जा रही है। इस पराली के साथ जल रहे केमिकल फर्टीलाइजर और पेस्टिसाइड ने इसके धुएं को इस कदर जहरीला बना दिया है कि बारूद का धुआं भी हलका लगने लगा है।

सोशल सांइसेज एंउड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते है कि थोड़ी बहुत यह पहले भी जलती थी पर इतना बुरा हाल नहीं था कि आपको सांस लेने के लिए भी जगह की तलाश करनी पड़ती है। दोपहिया वाहन पर है तो सड़क युद्ध का मैदान नजर आती है और किसी काम को हाथ में लेते है तो आंख के साथ नाक भी टपकने लगती है। वे कहते है कि महत्वपूर्ण यह है कि जब गरीब बेघर तेज सर्दी से बचने के लिए घास फूस एकत्र कर अलाव तप रहा होता है तो आग में से एक भीनी सी खुशबू आ रही होती है। कुछ ऐसा ही अहसास गांव में चुल्हे पर पक रहे भोजन की बात हो या घर को धुंध कोहरे के दिनों में घर के आस पास पेड़ पौधों का कचरा जलाने की हो हमें धुआं परेशान करता। गोबर के उपले जलने को तो मेडिकेटिड धुएं तक का नाम दे उपचार तक करने के दावे होने लगते है।

वहीं लेखक केएस धालीवल कहते है कि आज पराली का नाम आते ही अस्थमे का तंदरुस्त हुआ मरीज भी दहल जाता है। एलर्जी की दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए तो दिवाली का सीजन ही पंजाब हरियाणा में जलने वाली पराली से निकलता है और साल भर की कमाई इन्हीं दो महीनों में हो जाती है। एंटी एलर्जी दवाओं से कुछ नहीं होने वाला बेहतर है कि किसान या तो पेस्टिसाइड व केमिकल फर्टीलाइजर का प्रयोग छोड़ दें या फिर पराली जलाना छोड़ दें। वे कहते है कि इसमें पौधे वाली बात ही नहीं रही। आर्गेनिक तत्व कम ओर जहर ज्यादा हो गया है।

दिलचस्प है कि पराली के स्मोग से परेशान लोगों ने भी एक नायाब तरीका तलाश लिया है वे डाक्टरों के पिछले सालों में लिखी पर्ची को किसी मंत्र की तरह अपने पर्स में रखते है और सांस के उखडऩे के पहले अहसास में ही दवा शुरू कर देते है। जुकाम और आंखों में जलन बर्दाश्त करने की बड़ों को आदत हो गई है कि इन दिनों म त्योहारों की तरह ये भी होना है। जबकि बच्चों के लिए कोई हल नहीं निकला है।

Wednesday, 31 August 2011

..तो बठिंडा जैसे दो थर्मल प्लांट के बराबर मिलेगी बिजली,save electricity, biomass, parali, paddy, straw, pollution,

भूपेश चट्ठा, पटियाला
 सितंबर चढ़ते ही पंजाब-हरियाणा में पराली का जिन्न बाहर निकलने को होता है। धान की फसल आई नहीं होती है पर पराली के धुएं से होने वाली परेशानी हर किसी को याद आने लगती है। अब आने वाले सालों में पंजाब का दामन पराली के दुष्प्रभाव से छूटना तय है। दमे से बेदम करने वाली यह पराली किसी प्लांट में जलेगी तो बठिंडा के थर्मल प्लांट जितने बड़े दो प्लांटों के बराबर बिजली पैदा होगी और वह भी बिना किसी प्रदूषण के।
 पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड की ओर से राज्य में गैरपरंपरागत स्रोतों से बिजली पैदा करने को उत्साहित करने के मद्देनजर बायोमास प्लांटों से बिजली का उत्पादन करने का लक्ष्य 815 मेगावाट कर दिया गया है। पावरकाम के अधिकारी बताते हैं अब तक राज्य में 190.45 मेगावाट बिजली इसी पराली से बनने लगी है। जिन बायोमास प्लांटों पर काम चल रहा है उनसे अगले साल मार्च तक 108 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता और बढ़ जाएगी। याद रहे कि बठिंडा थर्मल प्लांट में उत्पादन की क्षमता 440 मेगावाट है। 
इनके अलावा को-जनरेशन में लगने वाले प्लांटों, जिनमें पराली के साथ-साथ कपास-नरमे की छट्टियां, सरकंडे, सरसों, इत्यादि फसलों का कचरा व गोबर को भी ईधन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, से 67 मेगावाट और बिजली पैदा करने अथवा फसलों के कचरे को ठिकाने लगाने की दिशा में काम चल रहा है। पावरकाम के सदस्य प्रबंधन गुरबचन सिंह बची कहते हैं कि इसी क्रम में सोलर उर्जा से नौ मेगावाट का उत्पादन हो रहा है और साढ़े चौदह मेगावाट पाइप लाइन में है। 2012 में गैर परंपरागत स्रोतों से कुल 300 मेगावाट ऐसी ही बिजली का उत्पादन और शुरू हो जाएगा।
कमर्शियल रेट के बराबर होते हैं रेट
 निजी क्षेत्र में गैर परंपरागत स्रोतों से बिजली पैदा करने को बढ़ावा देने और वातावरण को प्रदूषण मुक्त करने के उद्देश्य से इन प्लांटों से बनने वाली बिजली के लिए पावरकाम काफी उंची दरें चुकाता है। दरें तय करने का काम तो पंजाब स्टेट इलेक्टि्रसिटी रेग्यूलेटरी कमीशन ही करता है लेकिन अब तक तय की गई दरें कमर्शियल रेट के बराबर ही रही हैं। पावरकाम के अधिकारी कहते हैं कि फिर भी ये दरें शार्ट टर्म में केंद्रीय पूल से खरीदी जाने वाली दस रूपये प्रति यूनिट की बिजली से कम ही रहती है।

Tuesday, 4 January 2011

उम्मीद 2011 ना जले पराली, पटाखों में आई कमी रहे जारी

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब और जलती पराली का साथ इस साल थोड़ा कम हो यह उम्मीद हर पर्यावरण विद कर रहा है। 70 लाख एकड़ में उगने वाली धान की फसल का बेहतर बदल अगर कृषि वैज्ञानिक दे दें तो इससे आगे दुआ मांगना भी गलत होगा। लेकिन नए साल में यह उम्मीद किसान से तो की ही जा सकती है कि वो अपनी ही धरती पर अपने मित्र किटों व खुद के खेत में लगी प्राकृतिक रूप से खाद बनाने वाली फैक्ट्री को ना जलाएं। हालांकि अक्टूबर में जलने वाली पराली को रोकने राज्य सरकार दो साल पहले की तरह मामले दर्ज करेगी। ऐसी कामना आदर्श चुनाव आचार संहिता लगने से ठीक दो महीने पहले वोटतंत्र में करना बेतुका ही कहा जाएगा।
पराली के जलने से होने वाले प्रदूषण की खबर किसान को अब हो चुकी है बात तो बस इतनी सी है कि जिस तरह से पंजाब में पटाखे जलाने के चलन में पिछली दिवाली पर समझदारी दिखाई गई है, ठीक उसी तरह से पराली जलाने पर भी स्वैच्छिक रूप से प्रतिबंध लगाना होगा। पराली के मामले में 10 साल में मात्र 20 फीसदी क्षेत्र में ही पराली का जलना रूका है। इस बार चाहे कारण हैप्पी सीडर बने या कोई जुगाड़ तकनीक काम करे हर किसी की इच्छा है कि यह आंकड़ा कम से कम दोगुना हो जाए।
शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन जिस तरह से भूमिगत जल स्तर को संजोने-संभालने बनाए व सफलता पूर्वक लागू किए गए सब सोएल एक्ट के रूप में पर्यावरण संरक्षण के लिए जाना जाएगा। इसमें धान की पराली को बायो फ्यूल के रूप में प्रयोग करने लग रहे प्रोजेक्टों के कमीशन होने में तेजी आए तो पीठ थपथपाने के कारण दो हो जाएंगे।
धान की बिजाई 10 मई और रोपाई 10 जून से करने के सकारात्मक परिणाम आने लगे हैं। बीते साल प्रदेश में 10 जून से दो दिन पहले हुई बारिश के चलते लिए गए लाभ को छोड़ दें तो कहीं भी रोपाई नहीं हुई है। ऐसे में बिजली पानी दोनों की बचत हुई। नए साल में धार्मिक लोगों से प्राकृति प्रति अपना धर्म निभाने और लिखने-पढ़ने वाले व बीमार, बुजुर्गो के प्रति अपना फर्ज निभाने की आस की जा रही है। ध्वनि प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पुलिस व प्रशासन को याद रहें और लोगों को समझाने से ही इसकी शुरूआत की जा सकती है।

Thursday, 30 December 2010

पराली व पटाखों के प्रदूषण की गर्द धुली

भूपेश चट्ठा, पटियाला
अक्टूबर में पराली को जलाने से धुआं छाया तो नवंबर में दिवाली केपटाखों से हुए प्रदूषण ने पूरे प्रदेश को गैस चैंबर ही बना डाला, गैसें तो आसमान में चली गई आसमान में छाई गर्द को जहां तीन महीने बाद आई बारिश ने धो दिया है, वहीं फसलों को भी खासी राहत प्रदान की है। मौसम में मौजूद सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल को धोने और फसलों को टॉनिक देने के लिए इन दिनों हर किसी को बारिश का इंतजार रहता है। हालांकि इसे फतेहगढ़ साहिब में होने वाले शहीदी जोड़ मेले से भी जोड़ कर देखा जाता है।
दिलचस्प है कि इसी महीने के दूसरे सप्ताह में दैनिक जागरण ने बारिश के इंतजार में कुछ कृषि विशेषज्ञों के विचार प्रकाशित किए थे तब फाइव एलीमेंट हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष डा. जोगिंदर टाइगर ने बारिश में हुई देरी से इत्तेफाक नहीं किया था, वे कहते रहे कि गेहूं को बारिश की जरूरत 20 दिसंबर के बाद होती है और तब तक यह हो भी जाएगी। सर्दी की आवश्यकता इसके बाद ही होती है। वीरवार को संपर्क किए जाने पर डा. टाइगर ने कहा कि आजकल की बारिश से गेहूं की उन किस्मों को भी लाभ होगा जिनकी देर से बिजाई की गई है, मानसून के लंबा खिंचने और धान की कटाई में हुई देरी के बावजूद फसल पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं है। अन्यथा कोहरे से ये पछेती किस्में मर जाती हैं।
टाइगर अंग्रेजी महीनों की तारीखों के हिसाब से बिजाई के आगे परंपरागत ज्ञान को अधिक महत्व दे कहते हैं कि पंजाब में लोहड़ी तक देसी गेहूं की बिजाई चलती थी और बैसाखी को शगुन के तौर पर दाती लगा फसल की कटाई होती थी जबकि अब इस दिन तक पूरा सीजन खत्म कर दिया जाता है। वहीं, बारिश के बाद कुछ दिन कोहरे का न होना और तापमान का कम रहना गेहूं के लिए बेहतर बताया जाता है। इतना ही नहीं लगातार हुई बारिश के बाद कोहरे का स्थान ओस ले लेती है।
कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल कहते हैं कि बारिश इन दिनों में सोने पर सुहागा का काम करती है। हर फसल को इससे लाभ है। गेहूं का पौधा कम पारे में लंबाई कम लेगा और इसकी शाखाएं ज्यादा फूटेंगी। इससे उपज बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है, चूंकि कोहरा नहीं होगा तो सूरज की किरणों से पत्तों पर होने वाली प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया लगातार जारी रहने से पौधे का विकास जारी रहेगा। पत्तों के धुलने से होने वाला लाभ अलग है।
उधर, सोशल साइंसिस एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि सूखी सर्दी से निजात दिलाने वाली इस बारिश से जैसे इंसान को फेफड़ों और छाती रोगों से राहत मिलेगी वैसे ही फसलों, पेड़ पौधों को भी लाभ होगा।

Monday, 13 December 2010

ਪ੍ਰਦੂਸ਼ਣ ਦੀ ਗਰਦ ਛੰਟਨੇ ਦਾ ਇੰਤਜਾਰ

ਭੂਪੇਸ਼ ਚੱਠਾ , ਪਟਿਆਲਾ
ਅਕਤੂਬਰ ਵਿੱਚ ਪਰਾਲੀ ਨੂੰ ਜਲਾਣ ਤੋਂ ਧੁਆਂ ਛਾਇਆ ਤਾਂ ਨਵੰਬਰ ਵਿੱਚ ਦਿਵਾਲੀ ਦੇ ਪਟਾਖੋਂ ਤੋਂ ਹੋਏ ਪ੍ਰਦੂਸ਼ਣ ਨੇ ਪੂਰੇ ਰਾਜ ਨੂੰ ਗੈਸ ਚੈਂਬਰ ਬਣਾ ਪਾਇਆ , ਗੈਸਾਂ ਤਾਂ ਅਸਮਾਨ ਵਿੱਚ ਚੱਲੀ ਗਈ ਉੱਤੇ ਗਰਦ ਹੁਣੇ ਵੀ ਛੰਟੀ ਨਹੀਂ ਹੈ । ਮੌਸਮ ਵਿੱਚ ਮੌਜੂਦ ਸਸਪੈਂਡਿਡ ਪਾਰਟੀਕਿਊਲੇਟ ਮੈਟੇਰਿਅਲ ਨੂੰ ਧੋਣੇ ਅਤੇ ਫਸਲਾਂ ਨੂੰ ਟਾਨਿਕ ਦੇਣ ਲਈ ਹਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਮੀਂਹ ਦਾ ਇੰਤਜਾਰ ਹੈ ।
ਕੋਹਰੇ ਦਾ ਨਹੀਂ ਹੋਣਾ ਅਤੇ ਤਾਪਮਾਨ ਦਾ ਘੱਟ ਰਹਿਨਾ ਕਣਕ ਲਈ ਬਿਹਤਰ ਦੱਸ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਮਾਹਰ ਡਾ . ਬੀਏਸ ਸੋਹਿਲ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਜੇਕਰ ਮੀਂਹ ਇਸ ਦਿਨਾਂ ਵਿੱਚ ਹੋ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਸੋਣ ਉੱਤੇ ਸੁਹਾਗਾ ਹੋਵੇਗਾ । ਹਰ ਫਸਲ ਨੂੰ ਇਸਤੋਂ ਮੁਨਾਫ਼ਾ ਹੈ । ਕਣਕ ਦਾ ਪੌਧਾ ਘੱਟ ਪਾਰੇ ਵਿੱਚ ਲੰਮਾਈ ਘੱਟ ਲਵੇਗਾ ਅਤੇ ਇਸਦੀਸ਼ਾਖਾਵਾਂਜ਼ਿਆਦਾ ਫੁੱਟਣਗੀਆਂ । ਇਸਤੋਂ ਉਪਜ ਵਧਣ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਜ਼ਿਆਦਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ , ਲੇਕਿਨ ਜੇਕਰ ਕੋਹਰਾ ਪੈਣ ਲੱਗੇ ਤਾਂ ਸੂਰਜ ਦੀਆਂ ਕਿਰਨਾਂ ਤੋਂ ਪੱਤੀਆਂ ਉੱਤੇ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਦੀ ਪਰਿਕ੍ਰੀਆ ਹੌਲੀ ਹੋਣ ਨਾਲ ਬੂਟੇ ਦਾ ਵਿਕਾਸ ਥੰਮ ਜਾਵੇਗਾ ।
ਫਾਈਵ ਏਲੀਮੇਂਟ ਹੇਲਥ ਐਂਡ ਏਜੂਕੇਸ਼ਨਲ ਸੋਸਾਇਟੀ ਦੇ ਡੇ . ਜੋਗਿੰਦਰ ਟਾਈਗਰ ਮੀਂਹ ਵਿੱਚ ਹੋਈ ਦੇਰੀ ਤੋਂ ਇੱਤੇਫਾਕ ਨਹੀਂ ਰੱਖਦੇ , ਉਹ ਕਹਿੰਦੇ ਹੈ ਕਿ ਕਣਕ ਨੂੰ ਮੀਂਹ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ 20 ਦਿਸੰਬਰ ਦੇ ਬਾਅਦ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਤੱਦ ਤੱਕ ਇਹ ਹੋ ਵੀ ਜਾਵੇਗੀ । ਸਰਦੀ ਦੀ ਲੋੜ ਇਸਦੇ ਬਾਅਦ । ਅੱਜਕੱਲ੍ਹ ਚੱਲ ਰਹੇ ਮੌਸਮ ਤੋਂ ਕਣਕ ਦੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਸਮਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਮੁਨਾਫ਼ਾ ਹੋਵੇਗਾ ਜਿਨ੍ਹਾਂਦੀ ਦੇਰ ਨੂੰ ਬਿਜਾਈ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ , ਮਾਨਸੂਨ ਦੇ ਲੰਮੇ ਖਿੰਚਨੇ ਅਤੇ ਝੋਨਾ ਦੀ ਕਟਾਈ ਵਿੱਚ ਹੋਈ ਦੇਰੀ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਫਸਲ ਉੱਤੇ ਕੋਈ ਵਿਪਰੀਤ ਪ੍ਰਭਾਵ ਨਹੀਂ ਹੈ ।
ਮੀਂਹ ਦੀ ਕਮੀ ਉੱਤੇ ਸਿੰਚਾਈ ਲਈ ਇਲਾਵਾ ਬਿਜਲੀ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਣ ਵਾਲੇ ਭਾਰਤੀ ਕਿਸਾਨ ਯੂਨੀਅਨ ਏਕਤਾ ਉਗਰਾਹਾਂ ਦੇ ਮਹਾਸਚਿਵ ਸੁਖਦੇਵ ਸਿੰਘ ਕੋਕਰੀਕਲਾਂ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਸਿਰਫ ਚਾਰ ਘੰਟੇ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਨੂੰ ਬਿਜਲੀ ਦਿੱਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ ਜਦੋਂ ਕਿ ਮੰਗ ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ ਅੱਠ ਘੰਟੇ ਕੀਤੀ ਹੈ । ਉਹ ਦੱਸਦੇ ਹੈ ਕਿ ਨਰਮਾ ਪੱਟੀ ਵਿੱਚ ਹੁਣੇ ਪਹਿਲਾ ਪਾਣੀ ਹੀ ਨਹੀਂ ਲਗਾ ਹੈ । ਰਾਜ ਭਰ ਵਿੱਚ ਦਸ ਫੀਸਦੀ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਬਿਜਾਈ ਹੋਣੀ ਹੈ । ਅਜਿਹੇ ਵਿੱਚ ਜੇਕਰ ਸਿਰਫ ਦਸ ਦਿਨਾਂ ਲਈ ਹੀ ਠੀਕ ਲਗਾਤਾਰ ਅੱਠ ਘੰਟੇ ਬਿਜਲੀ ਮਿਲ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਕਿਸਾਨ ਬੱਚ ਜਾਵੇਗਾ ।

Saturday, 30 October 2010

जलते केमिकल-पेस्टिसाइड से पंजाब बना गैस चैंबर

पराली में आर्गेनिक तत्व कम और जहर ज्यादा हो गया है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में धान की फसल जल्द पक जाए तो अक्टूबर का शुरू नहीं तो मध्य तक बच्चों, बुजुर्गों और दमे-एलर्जी के मरीजों को खुली हवा में गैस चैंबर का सा अहसास होता है, बचते तंदरुस्त कहे जाने वाले भी नहीं आंखों में जलन, गले में खराश, जुकाम-खुजली तो आम हो जाता है। इन सब के पीछे कारण क्या है? यह भी सब को पता है कि खेतों में पराली जलाई जा रही है। इस पराली के साथ जल रहे केमिकल फर्टीलाइजर और पेस्टिसाइड ने इसके धुएं को इस कदर जहरीला बना दिया है कि बारूद का धुआं भी हलका लगने लगा है।
सोशल सांइसेज एंउड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते है कि थोड़ी बहुत यह पहले भी जलती थी पर इतना बुरा हाल नहीं था कि आपको सांस लेने के लिए भी जगह की तलाश करनी पड़ती है। दोपहिया वाहन पर है तो सड़क युद्ध का मैदान नजर आती है और किसी काम को हाथ में लेते है तो आंख के साथ नाक भी टपकने लगती है। वे कहते है कि महत्वपूर्ण यह है कि जब गरीब बेघर तेज सर्दी से बचने के लिए घास फूस एकत्र कर अलाव तप रहा होता है तो आग में से एक भीनी सी खुशबू आ रही होती है। कुछ ऐसा ही अहसास गांव में चुल्हे पर पक रहे भोजन की बात हो या घर को धुंध कोहरे के दिनों में घर के आस पास पेड़ पौधों का कचरा जलाने की हो हमें धुआं परेशान करता। गोबर के उपले जलने को तो मेडिकेटिड धुएं तक का नाम दे उपचार तक करने के दावे होने लगते है।
वहीं लेखक केएस धालीवल कहते है कि आज पराली का नाम आते ही अस्थमे का तंदरुस्त हुआ मरीज भी दहल जाता है। एलर्जी की दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए तो दिवाली का सीजन ही पंजाब हरियाणा में जलने वाली पराली से निकलता है और साल भर की कमाई इन्हीं दो महीनों में हो जाती है। एंटी एलर्जी दवाओं से कुछ नहीं होने वाला बेहतर है कि किसान या तो पेस्टिसाइड व केमिकल फर्टीलाइजर का प्रयोग छोड़ दें या फिर पराली जलाना छोड़ दें। वे कहते है कि इसमें पौधे वाली बात ही नहीं रही। आर्गेनिक तत्व कम ओर जहर ज्यादा हो गया है।
दिलचस्प है कि पराली के स्मोग से परेशान लोगों ने भी एक नायाब तरीका तलाश लिया है वे डाक्टरों के पिछले सालों में लिखी पर्ची को किसी मंत्र की तरह अपने पर्स में रखते है और सांस के उखडऩे के पहले अहसास में ही दवा शुरू कर देते है। जुकाम और आंखों में जलन बर्दाश्त करने की बड़ों को आदत हो गई है कि इन दिनों म त्योहारें की तरह ये भी होना है। जबकि बच्चों के लिए कोई हल नहीं निकला है।


पराली न जलाने वाले किसान सम्मानित
संवाद सूत्र, सन्नौर : गांव बावलपुर में संरपच गुरमीत सिंह की अध्यक्षता में आयोजित समारोह के दौरान पराली न जलाने वाले किसानों को सम्मानित किया गया। इस मौके पर मुख्य अतिथि डिप्टी डायरेक्टर पंचायत विभाग पुशपिंदर सिंह उपस्थित हुए। उन्होंने उन गांवों के किसानों को सम्मानित किया, जिन्होंने धान की फसल की कटाई करने के बाद बाकी बचे पराली को आग नहीं लगाई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि ने कहा कि धान की फसल को आग लगाने से गंदा धुंआ निकलता है, इससे तरह-तरह की बीमारियां हो रही हैं। हमें अपने खेतों में आग न लगाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाना चाहिए। इस अवसर पर गांव के उन स्कूली बच्चों को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने ने शिक्षा में नाम रोशन किया है। इस मौके पर गांव के सभी लोग उपस्थित थे।

Friday, 29 October 2010

गाय-भैंसों ने नकारा पराली का 'आचार-मुरब्बा'

देश की दो फीसदी भूमि पर कैमीकल फर्टीलाइजर का दसवां हिस्सा, पेस्टिीसाइड का औसत इससे भी आगे
पराली में अन्य अनाज और थोड़ा काला नमक मिला बनता था 'आचार'
'सन्नी-बंटा' कर सूखी पराली में गेहूं की तूड़ी और गुड़ बना कर बनता था 'मुरब्बा'

भूपेश चट्ठा, पटियाला
देश के कुल क्षेत्रफल का पंजाब चाहे मात्र दो फीसदी ही हिस्सा हो लेकिन यहां पर कैमीकल फर्टीलाइजर की खपत देश में प्रयोग होने वाली रसायनिक खादों का दसवां हिस्सा यहीं खप जाता है। फसलों विशेष रूप से पंजाब के लिए अप्राकृतिक कही जाने वाली धान की फसल की बात आती है तो इस पर छिड़के जाने वाले जहरीले पेस्टीसाइड यह सारी सीमाएं लांघ जाते है और फसल पर हर पंद्रह दिनों बाद जहर छिड़का जाता है। दिलचस्प है कि इंसानों को तो शायद अभी ये बात समझ में आनी है लेकिन पशुओं ने पराली से सदियों से बनते आ रहे 'अचार' और 'मुरब्बे' को नकार दिया है।
पंजाब में सूखे चारे के रूप में पराली का प्रयोग अचार व मुरब्बे के रूप में होता रहा है लेकिन पहले इसे गायों ने नकारा और अब भेंसों को भी इसे खाना पसंद नहीं है। कौरजीवाला गांव के निकट अत्याधुनिक डेयरी चला रहे परविंदर सिंह ढिल्लों बताते है कि उनका परिवार पांच दशक से इस व्यवसाय में है। हरित क्रांति के उतार चढ़ाव भी उनके परिवार ने देखे है। वे कहते है कि अविभाजित पंजाब में भी धान की फसल की बिजाई हुआ करती थी, लेकिन पराली जला कर पर्यावरण से खिलवाड़ नहीं किया जाता था, उन दिनों में पराली में कुछ अनाज मिला कर और थोड़ा काला नमक मिलाकर इसका 'आचार' बना दिया जाता था। चूंकि कृत्रिम सिंचाई के साधन काफी कम थे ऐसे में सूखे की मार पडऩे पर या हरे चारे की कमी आने पर एक वक्त पशुओं को यही आचार खिलाया जाता था।
कुछ इसी तरह से सन्नी (यह सरसों व बिनौले की खल को पांच से छह घंटे भिगोकर रखने के बाद बनती है) व बंटा (मोटा अनाज जो कई घंटा उबाला जाता है) कर सूखी पराली में गेहूं की तूड़ी और गुड़ मिलाकर मुरब्बा बना पशुओं को एक और खुराक दी जाती थी।सूखी पराली में गेहूं की तूड़ी और गुड़ मिला कर 'मुरब्बा' बना कर पशुओं को एक और खुराक दी जाती थी। लेकिन अब छिड़के जा रहे पेस्टीसाइड ने इसे जहरीला कर दिया और स्वाद बिगड़ दिया। पशु इससे मुंह मोडऩे लगे है। बीते आठ दस सालों में तो परंपरागत तरीके से किस तरह से पशुओं का आचार व मुरब्बा बनता रहा पर आज यह लुप्त प्राय है।
वहीं फाइव ऐलीमेंटस हेल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर कहते है कि यदि हालात ना बदले तो पशु गेहूं की उपज लेने के बाद इसके पौधे के शेष बचे हिस्से से बनने वाली तूड़ी को भी नकार देंगे। धान की तुलना में गेहूं का पौधा रसायनों में डूबा नहीं रहता पर धरती में तो पेस्टीसाइड की मात्रा हर साल बढ़ रही है। अगर आप बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को छोड़ दें तो धरती पर मिटटी कहीं भी नहीं बदल रही। ऐसे में पशुओं के जिस तरह से सीमंस आयात हो रहे है, ठीक वैसे ही पशुओं के लिए डिब्बा बंद खुराक विदेशों से मंगवाई जाएगी।

Wednesday, 27 October 2010

70 लाख एकड़ में पराली कितनी जलेगी कितनी बचेगी?

बीते दस सालों में पांचवा हिस्सा भी काम नहीं हुआ
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के करीब-करीब 70 लाख एकड़ में धान की पराली प्रशासन की आंख झपकते ही जलने को तैयार है विकल्प के रूप में सरकार के पास दस फीसदी से भी ज्यादा बचा पाने की क्षमता नहीं है। और तोल के साधारण अनुसार एक एकड़ में 25 से 30 क्विंटल पराली निकलती है। अनुमान लगाया जा सकता है कि क्या होने वाला है। और इस दिशा में अब तक क्या हुआ है। बीते आठ दस सालों में पर्यावरण संजोने की दिशा में दो फीसदी सालाना की गति से पांचवां हिस्सा भी तय नहीं हुआ है।
कृषि विभाग की ओर से अब लगाए जा रहे अनुमानों अनुसार 196 लाख टन पराली जल ही जाएगी, चाहे गलती से ही सही। इसके साथ कार्बनिक तत्व व धरती के नीचे लगभग हर खेत में चलने वाली प्राकृतिक रूप से खाद बनाने वाली लाखों फैक्ट्रीयां भी जल जाएंगी, जिन्हें मित्र कीट भी कहा जाता है।
वर्ष 1999 में अमेरिकी सेटेलाइट की ओर से ली गइ्र्र तस्वीरों और भारत के मौसम विज्ञान विभाग को दी गई चेतावनी कि पंजाब-हरियाणा के आसमान पर स्मोक व फोग क मिश्रण से स्मोग के बादल बन रहे का कोई असर 12 अक्टूबर 2002 त नहीं हुआ जब लोगों ने खुद को लगातार दो तीन दिनों तक भूरे बादलों की परत से ढका पाया।
इसके बाद आए स्र्वेक्षण में सामने आया राज्य की 80 फीसदी धरती पर धान की खेती होती है। 26 लाख हैक्टेयर से ज्यादा भूमि पर पैदा हुई पराली में से 90 फीसदी को तब भी जला दिया जाता था। इससे 233 लाख टन कार्बन डाई आक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल, फासफोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जल कर आसमान में चले जाते है। हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें होती है जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक 13 फीसदी सूर्य की किरणें भी रोके रखती।
इतना ही नहीं बीते तीन दशक में रातें गर्म और दिन ठंडे होते जा रहे है। लुधियाना केदिन के औसत तापमान में 2.1 की गिरावट और रात के तापमान में छह फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पटियाला व बठिंडा की रातें हर साल 0.03 डिग्री की रफ्तार से गर्म होती जा रही है।
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त बताते है कि पराली के जलाए जाने की गति और मात्रा बदलती रहती है पर दे साल पहले सेटेलाइट से उपलब्ध डाटे से सामने आई स्थिति में 12685 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में होने वाली धान की फसल से जलने वाली पराली में से कार्बन गैसों की मात्रा 34.66 ग्राम प्रति किलो, नाइट्रोजन गैसें 2.63 ग्राम प्रति किलो, मीथेन सीएच4, फासफोरस के अवयवों पीएम10 की मात्रा 3.99 ग्राम प्रति किलो और पौटेशियम के पीएम 2.5 ग्राम होती है। उमेंद्र दत्त कहते है कि बठिंडा के नैशनल फर्टीलाइजर लिमिटेड के प्लांट में पांच लाख टन यूरिया पैदा करने के लिए ढ़ाई लाख टन नाईट्रोजन के साथ काफी मात्रा में ऊर्जा, पानी का प्रयोग होता है। जबकि हम पराली जला कर 38.5 लाख टन आर्गेनिक कार्बन, दो हजार टन फासफोरस और 34 हजार टन पौटेशियम जला देते है।
पीएयू अनुसार
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डा. मंजीत सिंह कंग अनुसार पराली के जलाए जाने से पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है वो तो है ही इसके अलावा धरती के बेहद जरूरी न्यूट्रिएंटस भी तबाह हो रहे है। वे बताते है कि एक टन पराली के जलाने छह किलो नाइट्रोजन, एक किलो फासफोरस, और 11 किलो पोटाश भी जल जाती है। और अगर आप डेढ़ लाख टन पराली जलाते है तो दो सौ करोड़ रूपये के न्यूट्रिएंटस हर साल जला रहे है। वे सलाह देते है कि हैप्पीसीडर तकनीक का प्रयोग कर धरती की उर्वरा शक्ति में ये न्यूट्रिएंटस मिलाए जा सकते है।

Thursday, 21 October 2010

धरती के भगवान, बर्बादी से अंजान, बठिंडा में युवक के लिए धुआं बना यमदूत

भूपेश चट्ठा, पटियाला किसानों ने गेहूं की जल्द बिजाई के लिए इंसानों के साथ-साथ मित्र कीटों की हत्या शुरू कर दी है। किसान द्वारा पराली जलाए जाने से फैले धुएं से जहां वीरवार को बठिंडा में हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई है वहीं इससे असंख्य मित्र कीट भी मर रहे हैं। कृषि विभाग पराली के प्रति किसानों को जागरुक करने के लिए हर साल कई कार्यक्रम आयोजित करता है लेकिन अभी तक किसानों ने पराली जलाने का रास्ता नहीं छोड़ा। किसानों द्वारा जलाई गई पराली के कारण मित्र कीट, एंटी फीड, मिली फीड, नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया और केंचुए आग में जल जाते हैं। इससे जमीन की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है और हर साल पैदावार पर असर पड़ता है। सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के प्रवक्ता डा. पीपी खोसला का कहना है कि नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया जमीन के दो इंच नीचे चलने वाली प्राकृतिक खाद फैक्टरी है जो कचरे को खाद में बदल देते हैं। उन्होंने कहा कि जमीन में दीमक का होना भी जरूरी है क्योंकि पिछली फसल की जड़ें यदि खत्म नहीं होंगी तो वह बंजर हो सकती है। दीमक पुरानी फसलों के इसी कचरे को ठिकाने लगता है फाइव एलीमेंट्स एंड एजुकेशनल हेल्थ सोसायटी के चेयरमैन डा. जोगेंद्र टाइगर का कहना है कि किसानों को बार-बार जागरुक किए जाने के बावजूद उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा। यदि किसान विशेषज्ञों की राय पर अमल करें तो पैदावार के साथ-साथ पराली को बेच कर आर्थिक लाभ भी ले सकते हैं क्योंकि पराली का इस्तेमाल करने के लिए सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं। अब तो पराली से बिजली उत्पादन भी शुरू हो गया है। किसानों को चाहिए कि अपने पुराने परंपरागत तरीके एक बार याद करें। बुजुर्गो की बातें सुनें और उन पर अमल करें तो ये खेत इंडस्ट्री के रूप में उनको आय देगा। वे कहते हैं कि मंडी में फसल फेंक कर आने की बजाय बेचने की बात सोची जानी चाहिए। फिरोजपुर स्थित सिविल अस्पातल के एसएमओ डाक्टर बलदेव अरोड़ा के मुताबिक जलती पराली से निकलने वाले धुएं से जहां वातावरण दूषित होता है वहीं यह कई प्रकार की बीमारियां फैलाने में अहम भूमिका निभाता है
जानलेवा बनी पराली की आग
बठिंडा : जिले के गांव बंबीहा में किसान द्वारा धान की पराली को लगाई आग एक युवक के लिए काल बन गई। आग से निकलते धुएं के कारण सड़क पर आ रही बस और मोटरसाइकिल की टक्कर हो जाने से युवक की मौके पर ही मौत हो गई। जानकारी के अनुसार गांव बंबीहा के जगसीर सिंह का इकलौता लड़का सेवक सिंह गांव में लकड़ी के दरवाजे, खिड़की बनाता था। पड़ोस की एक महिला ने बुधवार शाम बताया कि उसका लड़का स्कूल से घर नहीं लौटा है। सेवक सिंह उसे ढूंढने अपनी मोटरसाइकिल से निकला। वह गांव से बाहर निकला ही था कि मुख्य सड़क पर धान के खेत में पराली को किसान ने आग लगाई हुई थी। इस वजह से पूरी सड़क धुएं से भरी थी। लिहाजा सेवक को सड़क पर सामने से आती बस नहीं दिखी और वह अपनी रफ्तार से सड़क पर वाहन चलाता गया। परिणामस्वरूप उसका वाहन तेज रफ्तार बस से टकरा गया और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बस ड्राइवर मौके से फरार हो गया। इसकी सूचना थाना संगत पुलिस को दी गई। पुलिस ने बस के ड्राइवर जसमेल सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। हादसे का कारण बने पराली को आग लगाने वाले किसान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। हालांकि जिला प्रशासन द्वारा पराली जलाने पर पाबंदी लगाई हुई है