बीते दस सालों में पांचवा हिस्सा भी काम नहीं हुआ
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के करीब-करीब 70 लाख एकड़ में धान की पराली प्रशासन की आंख झपकते ही जलने को तैयार है विकल्प के रूप में सरकार के पास दस फीसदी से भी ज्यादा बचा पाने की क्षमता नहीं है। और तोल के साधारण अनुसार एक एकड़ में 25 से 30 क्विंटल पराली निकलती है। अनुमान लगाया जा सकता है कि क्या होने वाला है। और इस दिशा में अब तक क्या हुआ है। बीते आठ दस सालों में पर्यावरण संजोने की दिशा में दो फीसदी सालाना की गति से पांचवां हिस्सा भी तय नहीं हुआ है।
कृषि विभाग की ओर से अब लगाए जा रहे अनुमानों अनुसार 196 लाख टन पराली जल ही जाएगी, चाहे गलती से ही सही। इसके साथ कार्बनिक तत्व व धरती के नीचे लगभग हर खेत में चलने वाली प्राकृतिक रूप से खाद बनाने वाली लाखों फैक्ट्रीयां भी जल जाएंगी, जिन्हें मित्र कीट भी कहा जाता है।
वर्ष 1999 में अमेरिकी सेटेलाइट की ओर से ली गइ्र्र तस्वीरों और भारत के मौसम विज्ञान विभाग को दी गई चेतावनी कि पंजाब-हरियाणा के आसमान पर स्मोक व फोग क मिश्रण से स्मोग के बादल बन रहे का कोई असर 12 अक्टूबर 2002 त नहीं हुआ जब लोगों ने खुद को लगातार दो तीन दिनों तक भूरे बादलों की परत से ढका पाया।
इसके बाद आए स्र्वेक्षण में सामने आया राज्य की 80 फीसदी धरती पर धान की खेती होती है। 26 लाख हैक्टेयर से ज्यादा भूमि पर पैदा हुई पराली में से 90 फीसदी को तब भी जला दिया जाता था। इससे 233 लाख टन कार्बन डाई आक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल, फासफोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जल कर आसमान में चले जाते है। हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें होती है जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक 13 फीसदी सूर्य की किरणें भी रोके रखती।
इतना ही नहीं बीते तीन दशक में रातें गर्म और दिन ठंडे होते जा रहे है। लुधियाना केदिन के औसत तापमान में 2.1 की गिरावट और रात के तापमान में छह फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पटियाला व बठिंडा की रातें हर साल 0.03 डिग्री की रफ्तार से गर्म होती जा रही है।
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त बताते है कि पराली के जलाए जाने की गति और मात्रा बदलती रहती है पर दे साल पहले सेटेलाइट से उपलब्ध डाटे से सामने आई स्थिति में 12685 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में होने वाली धान की फसल से जलने वाली पराली में से कार्बन गैसों की मात्रा 34.66 ग्राम प्रति किलो, नाइट्रोजन गैसें 2.63 ग्राम प्रति किलो, मीथेन सीएच4, फासफोरस के अवयवों पीएम10 की मात्रा 3.99 ग्राम प्रति किलो और पौटेशियम के पीएम 2.5 ग्राम होती है। उमेंद्र दत्त कहते है कि बठिंडा के नैशनल फर्टीलाइजर लिमिटेड के प्लांट में पांच लाख टन यूरिया पैदा करने के लिए ढ़ाई लाख टन नाईट्रोजन के साथ काफी मात्रा में ऊर्जा, पानी का प्रयोग होता है। जबकि हम पराली जला कर 38.5 लाख टन आर्गेनिक कार्बन, दो हजार टन फासफोरस और 34 हजार टन पौटेशियम जला देते है।
पीएयू अनुसार
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डा. मंजीत सिंह कंग अनुसार पराली के जलाए जाने से पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है वो तो है ही इसके अलावा धरती के बेहद जरूरी न्यूट्रिएंटस भी तबाह हो रहे है। वे बताते है कि एक टन पराली के जलाने छह किलो नाइट्रोजन, एक किलो फासफोरस, और 11 किलो पोटाश भी जल जाती है। और अगर आप डेढ़ लाख टन पराली जलाते है तो दो सौ करोड़ रूपये के न्यूट्रिएंटस हर साल जला रहे है। वे सलाह देते है कि हैप्पीसीडर तकनीक का प्रयोग कर धरती की उर्वरा शक्ति में ये न्यूट्रिएंटस मिलाए जा सकते है।
लाजवाब
ReplyDeleteआंखे खोलने वाली
खेतों में आग लगाकर किसान अपना ही नुकसान करते हैं..
ReplyDeletemujhe nahi ptaa ki hmaare kisaan bhai khud hi apni dharti ma, mittr-keedon ko kyon tabaah kar rhe, paryavaran ko itna nuksaan kyon pahuncha rhe ji.
ReplyDeleteshayad koi laalch kaam aaye, praali khreed kar, unse uthvaa li jaaye ! kuchh sochna nahi karna hoga !
thanks
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