Friday, 29 October 2010

पराली का जलाना: सरकारी सलाह पर यकीन नहीं, समय सीमा भी

-रोटा वेटर से छह बार खेत में बाही करना पड़ता है
-मैनेज करने में आने वाला दो हजार रूपये प्रति एकड़ का खर्च देख डर रहा किसान
-कहा कृषि विशेषज्ञ व सरकार बेहतर विकल्प सुझाए

भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की उपज लेने के बाद और रबी की अगली फसल गेहूं के लिए बिजाई करने में तब भी समय कम होता है जब धान की फसल जल्द आ जाए इस बार तो धान ही काफी देरी से पक कर आ रहा है ऐसे में गेहूं की बिजाई को कहीं 20 दिन तो कहीं एक महीने का समय कटाई से बुआई के बीच रह गया है, ऐसे में सरकार की ओर से दी जा रही सलाहों पर यकीन नहीं हो रहा। महमूदपुर गांव के परमजीत सिंह का यह सवाल एयरकंडीशनर कमरों में बैठ कर पंजाब में पराली, प्रदूषण और पर्यावरण पर चर्चा करने वालों को सकते में डाल देता है।
डकाला रोड स्थित फन विल में दवा लेने पहुंचे परमजीत सिंह महमूदपुर कहते है कि उन्हें पता है कि खेत में कटाई के बाद बचे किरचों को आग लगाने से प्रदूषण फैलता है, मिट्टी के अंदर मौजूद मित्र कीट भी इसके साथ ही जल जाते है, धरती के अनावश्यक रूप से ज्यादा गर्म होने पर उर्वरा शक्ति में भी कमी आती है, और खाद ज्यादा डालनी पड़ती, पर वे भी क्या करें मजबूरी है, समय की भी सीमा है।
वहीं राजला गांव के सरपंच कश्मीर सिंह बताते है कि बेहतर विकल्प मौजूद नहीं है। सरकार, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और कृषि वैज्ञानिक मिल बैठ कर ऐसा हल सुझाए जिससे पराली का पूरी तरह से चूरा कर खेत में ही मिलाए जाने का उपाय किया जा सके मौजूदा उपकरण काफी नहीं है। और मंहगाई इतनी ज्यादा है कि आप अगली फसल में देरी करने का रिस्क नहीं उठा सकते। ऐसे में सारी समझ के बावजूद भी किसान अपनी ही जमीन के साथ ये आग लगाने का पाप कर गुजरता है।
पर्यावरण पर काम करते आ रहे और शानदार परिणाम देने वाले फाइव ऐलीमेंट हेल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है कि किसान यदि चाहे तो पराली को खेत में ही दबा कर गेहूं की फसल और ज्यादा बढिय़ा ले सकता है, जमीनी सच्चाई ये है कि पराली के मौजूद रहते गेहूं की बिजाई करने वाली जीरो टिल ड्रिल में ये किरचे फंस जाते है और बिजाई ढ़ंग से नहीं होती और यदि किसान पराली को खेत में गलाने का प्रयास करता है तो साधारण तरीके से जनवरी महीना आ पहुंचता है। डा. टाईगर कहते है कि रोटा वेटर से खेत की बाही कर फिर पानी छोडऩा और फिर बाही करने का सिलसिला कम से कम छह बार दोहराना पड़ता है। तभी सख्त पराली खेत में मिक्स होती है और अगली फसल के लिए खाद का काम करेगी और आप अच्छी फसल ले सकते है।
डा. टाईगर कहते है कि पराली को मैनेज करने में आने वाला करीब दो हजार रूपये प्रति एकड़ का खर्च देख किसान इसके दुषपरिणमों को नजरअंदाज कर देता है।

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