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Monday, 12 November 2012

इलाज है पर 'जुगाड़' के इंतजार में सरकार?


जलती पराली
जागरण एक्सकलूसिव
-हर गांव में तीन से चार हैप्पी सीडर हों तो बात बन जाए पर...
-दो साल में संख्या 50 से बढ़कर मात्र दो सौ के पार हुई
भूपेश चट्ठा, पटियाला
कितना अच्छा हो अगर धान की कटाई को जो मशीन खेत में उतारी जाए वह धान की फसल की कटाई के साथ ही गेहूं की बिजाई भी कर दे। इतना ही नहीं एक ही बार में खेत में घूमती मशीन कंबाइन की तरह धान की उपज किसान की ट्राली में डाले तो फसल के किरचों अथवा पराली को कुतर कर मिट्टी में मिला दे जिससे खेत में नाइट्रोजन, पोटाश, फासफोरस आदि तत्वों की कमी भी ना हो। जी हां पराली को जलाने से बचाने और धरती की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने वाली कृषि मशीन 'हैप्पी सीडरÓ को पंजाब में सफलता पूर्वक लांच किए दो साल हो चुके हैं लेकिन सरकार इसे ट्रैक्टर अथवा कंबाइन की तरह लोकप्रिय बनाने में असफल रही है।
कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल बताते हैं कि जैसा की इसका नाम है यह अगली फसल की बिजाई करता है वो भी पिछली फसल की कटाई के साथ एक ही बार में। इसमें एक ही बार डीजल व किसान की मेहनत लगती है और धान की कटाई व गेहूं की बिजाई दोनों हो जाती है। बीज छिड़कने ड्रिलिंग के साथ फर्टीलाइजर का सदुपयोग भी होता है। इतना ही नहीं धान के खेत में मौजूद नमी का प्रयोग गेहूं के पौधे को पनपने में होता है। इससे सिंचाई के  लिए शुरु में पानी की जरूरत नहीं पड़ती। धान की नमी से ही गेहूं का पौधा चल पड़ता है।
डा. सोहल बताते हैं कि खेत में ही पराली खुर्द-बुर्द की जाती है इससे खेत में खाद के रूप में जहां कीट मौजूद रहते हैं वहीं इनकी खुराक भी पूरी रहती है। इतना ही नहीं खेत को दोबारा तैयार करना नहीं पड़ता जिससे महंगा डीजल, मशीनों की घिसाई और मेहनत भी बच जाती है।
दिलचस्प है कि इतने सब फायदे होने के बावजूद प्रदेश में इनकी दो साल में 50 से बढ़कर मात्र दो सौ के पार ही जा पाई है। जबकि एक अनुमान अनुसार हर गांव में तीन से चार हैप्पी सीडर हों तभी बात बन सकती है। राज्य किसान आयोग अनुसार राज्य के 12 हजार गांवों में करीब 40 हजार हैप्पी सीडर की जरूरत बताई गई है।
वहीं आलोचक कहते हैं कि राज्य सरकार की ओर से धान की पराली बिना जलाए हैप्पी सीडर से होने वाली गेहूं की खेती की ओर अपनी ओर से च्यादा प्रयास नहीं किया गया है। करीब एक दशक पहले 90 लाख रूपये का हैप्पी सीडर आस्ट्रेलिया-यूरोप से इंपोर्ट होता था। लुधियाना से इसकी शुरुआत हुई भी पर पटियाला जैसे जिले में इनकी संख्या डेढ़ से दो दर्जन ही हो पाई है। सरकार को इतजार है कि जिस तरह से नाभा, भादसों, अमलोह जैसे कस्बों में छोटे कृषि उपकरण बनाने वालों ने पहले 'जुगाड़Ó बनाए और बाद में पूरी कंबाइन इंडस्ट्री विकसित हो गई। ठीक वैसे ही निजी क्षेत्र में हैप्पी सीडर का छोटा रूप व ट्रैक्टर के साथ लगने वाला रोटावेटर आया है। वैसे ही इससे कुछ आगे का 'जुगाड़Ó हो जाए तो बात बन जाए।

छोटी मशीनों पर सब्सिडी देते हैं: डायरेक्टर

कृषि विभाग के डायरेक्टर डा. मंगल सिंह संधू कहते हैं कि बड़ी मशीनों का प्रबंध तो नहीं हुआ है पर छोटी मशीनों पर सब्सिडी दी जा रही है इसमें ट्रैक्टर के साथ लगने वाला रोटावेटर, चौपर, हैप्पीसीडर व बोलर मशीन शामिल है। किसान इनका अलग अलग कर प्रयोग कर बिना पराली जलाए गेहूं की बिजाई कर सकता है।

Friday, 29 October 2010

पराली का जलाना: सरकारी सलाह पर यकीन नहीं, समय सीमा भी

-रोटा वेटर से छह बार खेत में बाही करना पड़ता है
-मैनेज करने में आने वाला दो हजार रूपये प्रति एकड़ का खर्च देख डर रहा किसान
-कहा कृषि विशेषज्ञ व सरकार बेहतर विकल्प सुझाए

भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की उपज लेने के बाद और रबी की अगली फसल गेहूं के लिए बिजाई करने में तब भी समय कम होता है जब धान की फसल जल्द आ जाए इस बार तो धान ही काफी देरी से पक कर आ रहा है ऐसे में गेहूं की बिजाई को कहीं 20 दिन तो कहीं एक महीने का समय कटाई से बुआई के बीच रह गया है, ऐसे में सरकार की ओर से दी जा रही सलाहों पर यकीन नहीं हो रहा। महमूदपुर गांव के परमजीत सिंह का यह सवाल एयरकंडीशनर कमरों में बैठ कर पंजाब में पराली, प्रदूषण और पर्यावरण पर चर्चा करने वालों को सकते में डाल देता है।
डकाला रोड स्थित फन विल में दवा लेने पहुंचे परमजीत सिंह महमूदपुर कहते है कि उन्हें पता है कि खेत में कटाई के बाद बचे किरचों को आग लगाने से प्रदूषण फैलता है, मिट्टी के अंदर मौजूद मित्र कीट भी इसके साथ ही जल जाते है, धरती के अनावश्यक रूप से ज्यादा गर्म होने पर उर्वरा शक्ति में भी कमी आती है, और खाद ज्यादा डालनी पड़ती, पर वे भी क्या करें मजबूरी है, समय की भी सीमा है।
वहीं राजला गांव के सरपंच कश्मीर सिंह बताते है कि बेहतर विकल्प मौजूद नहीं है। सरकार, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और कृषि वैज्ञानिक मिल बैठ कर ऐसा हल सुझाए जिससे पराली का पूरी तरह से चूरा कर खेत में ही मिलाए जाने का उपाय किया जा सके मौजूदा उपकरण काफी नहीं है। और मंहगाई इतनी ज्यादा है कि आप अगली फसल में देरी करने का रिस्क नहीं उठा सकते। ऐसे में सारी समझ के बावजूद भी किसान अपनी ही जमीन के साथ ये आग लगाने का पाप कर गुजरता है।
पर्यावरण पर काम करते आ रहे और शानदार परिणाम देने वाले फाइव ऐलीमेंट हेल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है कि किसान यदि चाहे तो पराली को खेत में ही दबा कर गेहूं की फसल और ज्यादा बढिय़ा ले सकता है, जमीनी सच्चाई ये है कि पराली के मौजूद रहते गेहूं की बिजाई करने वाली जीरो टिल ड्रिल में ये किरचे फंस जाते है और बिजाई ढ़ंग से नहीं होती और यदि किसान पराली को खेत में गलाने का प्रयास करता है तो साधारण तरीके से जनवरी महीना आ पहुंचता है। डा. टाईगर कहते है कि रोटा वेटर से खेत की बाही कर फिर पानी छोडऩा और फिर बाही करने का सिलसिला कम से कम छह बार दोहराना पड़ता है। तभी सख्त पराली खेत में मिक्स होती है और अगली फसल के लिए खाद का काम करेगी और आप अच्छी फसल ले सकते है।
डा. टाईगर कहते है कि पराली को मैनेज करने में आने वाला करीब दो हजार रूपये प्रति एकड़ का खर्च देख किसान इसके दुषपरिणमों को नजरअंदाज कर देता है।

Sunday, 24 October 2010

Punjab and Paddy Straw पंजाब और जलती पराली, नहीं छूट रहा साथ

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में धान की फसल जल्द पक जाए तो अक्टूबर का शुरू नहीं तो मध्य तक बच्चों, बुजुर्गों और दमे-एलर्जी के मरीजों को खुली हवा में गैस चैंबर का सा अहसास होता है, बचते तंदरुस्त कहे जाने वाले भी नहीं आंखों में जलन, गले में खराश, जुकाम-खुजली तो आम हो जाता है। इन सब के पीछे कारण क्या है? यह भी सब को पता है फिर भी पंजाब और जलती पराली का जानलेवा साथ नहीं छूट रहा।
पराली के जलने से होने वाले प्रदूषण से हर कोई वाकिफ हो चुका है और पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड की ओर से किसानों की पराली खरीद कर, बोलर मशीनों से गट्ठे बांध इसका प्रयोग बायोमॉस प्लांटों में बिजली बनाने किया जाने लगा है। लेकिन फिर भी जल रही है पराली, दिलचस्प है कि अभी तक धारा 144 लगाए जाने और पराली जलाने पर लगाए पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद किसी किसान पर अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है।
इसी रोटावेटर जैसी मशीन से पराली को खेत में ही कुतर कर खाद के रूप में इस्तेमाल करने और अगली फसल बेहतर लेने के उपाय भी कृषि विभाग ने सामने रखे है, पर इसका भी सीमित प्रयोग ही हुआ, और किसान अपने अपने तर्क रख जला रहे है पराली। बताया जा रहा है कि जहां पराली ज्यादा हो तो रोटावेटर काम नहीं करता। गीली जमीन हो तो भी बाद में बत्तर नहीं आता। हालांकि अब हैप्पीसीडर के रूप में खासी मंहगी किंतु प्रभावी मशीन बाजार में आई है, इसके कंबाइन बाजार की तरह भारतीयकरण अथवा कई तरह के जुगाड़ लगाए जा रहे है पर कई जिलों में तो इसे देखा ही नहीं है।
प्रदेश में पराली से ही एक हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने का लक्ष्य रखने वाले पावरकॉम के प्रवक्ता कहते है कि तीन बायोमॉस के प्लांट कमीशन हो गए है, दो दर्जन से ज्यादा पर एग्रीमेंट के बाद काम चल रहा है और इतने ही पाइप लाइन में है। अब पराली के अलावा कृषि क्षेत्र का अन्य कचरा भी पहले से ज्यादा दामों पर बिकने लगा है। हर प्लांट के आस पास के कुछ गांवों में पराली जलाने का रिवाज बिलकुल खत्म हो चुका है।
जलती पराली पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव डीएस गुरू कहते है कि किसान पर मामले दर्ज करना तो अंतिम विकल्प होना चाहिए बेहतर तो यह कि उसे प्रेरित किया जाए कि वो ऐसा ना करे। हालांकि पराली को लेकर बने कानून को और कड़ा करने अथवा किसी तरह का बदलाव करने पर टिप्पणी नहीं करते, कहते है कि जो है वो लागू रहेगा।
वहीं किसानों का पक्ष रखते हुए धर्मेहड़ी के प्रोग्रेसिव फार्मर गुरप्रीत सिंह कहते है कि कृषि क्षेत्र में पराली को जलाने से बचाने अथवा विकल्प देने के मामले में जितनी भी मशीने आई है वे या तो खासी मंहगी है या फिर बड़े ट्रैक्टर पर लगने वाली है ऐसे में छोटे किसान की पहुंच से बाहर है। साथ ही वे ये भी स्वीकार करते है कि अब उनके क्षेत्र में लोग ये बात भी करने लगे है कि धरती में मित्र कीट भी होते है, जिन्हें नहीं मारा जाना चाहिए। इन्हें मारना कितना खतरनाक है यह किसान को छोटे समूहों में वर्कशाप अथवा गांव में सीजन के दौरान जा कर समझाया जाए तो वे भावुक हो इस पर जल्द अमल भी शुरू कर देंगे पर कोई एसी कमरे में बैठ भाषण देता है तो किसान उल्टा मतलब निकाल देते है उन्हें लगता है कि इसका खुद का भी फायदा होगा। इसीलिए ऐसे अभियान ठंडे पड़ जाते है।