भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में धान की फसल जल्द पक जाए तो अक्टूबर का शुरू नहीं तो मध्य तक बच्चों, बुजुर्गों और दमे-एलर्जी के मरीजों को खुली हवा में गैस चैंबर का सा अहसास होता है, बचते तंदरुस्त कहे जाने वाले भी नहीं आंखों में जलन, गले में खराश, जुकाम-खुजली तो आम हो जाता है। इन सब के पीछे कारण क्या है? यह भी सब को पता है फिर भी पंजाब और जलती पराली का जानलेवा साथ नहीं छूट रहा।
पराली के जलने से होने वाले प्रदूषण से हर कोई वाकिफ हो चुका है और पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड की ओर से किसानों की पराली खरीद कर, बोलर मशीनों से गट्ठे बांध इसका प्रयोग बायोमॉस प्लांटों में बिजली बनाने किया जाने लगा है। लेकिन फिर भी जल रही है पराली, दिलचस्प है कि अभी तक धारा 144 लगाए जाने और पराली जलाने पर लगाए पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद किसी किसान पर अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है।
इसी रोटावेटर जैसी मशीन से पराली को खेत में ही कुतर कर खाद के रूप में इस्तेमाल करने और अगली फसल बेहतर लेने के उपाय भी कृषि विभाग ने सामने रखे है, पर इसका भी सीमित प्रयोग ही हुआ, और किसान अपने अपने तर्क रख जला रहे है पराली। बताया जा रहा है कि जहां पराली ज्यादा हो तो रोटावेटर काम नहीं करता। गीली जमीन हो तो भी बाद में बत्तर नहीं आता। हालांकि अब हैप्पीसीडर के रूप में खासी मंहगी किंतु प्रभावी मशीन बाजार में आई है, इसके कंबाइन बाजार की तरह भारतीयकरण अथवा कई तरह के जुगाड़ लगाए जा रहे है पर कई जिलों में तो इसे देखा ही नहीं है।
प्रदेश में पराली से ही एक हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने का लक्ष्य रखने वाले पावरकॉम के प्रवक्ता कहते है कि तीन बायोमॉस के प्लांट कमीशन हो गए है, दो दर्जन से ज्यादा पर एग्रीमेंट के बाद काम चल रहा है और इतने ही पाइप लाइन में है। अब पराली के अलावा कृषि क्षेत्र का अन्य कचरा भी पहले से ज्यादा दामों पर बिकने लगा है। हर प्लांट के आस पास के कुछ गांवों में पराली जलाने का रिवाज बिलकुल खत्म हो चुका है।
जलती पराली पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव डीएस गुरू कहते है कि किसान पर मामले दर्ज करना तो अंतिम विकल्प होना चाहिए बेहतर तो यह कि उसे प्रेरित किया जाए कि वो ऐसा ना करे। हालांकि पराली को लेकर बने कानून को और कड़ा करने अथवा किसी तरह का बदलाव करने पर टिप्पणी नहीं करते, कहते है कि जो है वो लागू रहेगा।
वहीं किसानों का पक्ष रखते हुए धर्मेहड़ी के प्रोग्रेसिव फार्मर गुरप्रीत सिंह कहते है कि कृषि क्षेत्र में पराली को जलाने से बचाने अथवा विकल्प देने के मामले में जितनी भी मशीने आई है वे या तो खासी मंहगी है या फिर बड़े ट्रैक्टर पर लगने वाली है ऐसे में छोटे किसान की पहुंच से बाहर है। साथ ही वे ये भी स्वीकार करते है कि अब उनके क्षेत्र में लोग ये बात भी करने लगे है कि धरती में मित्र कीट भी होते है, जिन्हें नहीं मारा जाना चाहिए। इन्हें मारना कितना खतरनाक है यह किसान को छोटे समूहों में वर्कशाप अथवा गांव में सीजन के दौरान जा कर समझाया जाए तो वे भावुक हो इस पर जल्द अमल भी शुरू कर देंगे पर कोई एसी कमरे में बैठ भाषण देता है तो किसान उल्टा मतलब निकाल देते है उन्हें लगता है कि इसका खुद का भी फायदा होगा। इसीलिए ऐसे अभियान ठंडे पड़ जाते है।
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