Tuesday, 5 October 2010

जर-जोरू के झगड़े ओके, पर जमीन के क्यों

भूपेश चट्ठा, पटियाला

पुरानी कहावत है कि झगड़े के सिर्फ तीन कारण होते हैं जर यानी रुपया, जोरू यानी महिला और जमीन यानी जायदाद। इनमें से जर-जोरू वाले झगड़े तो संभवत कम नहीं किए जा सकते पर जमीन वाले विवाद राजस्व कानून पूरी तरह से लागू कर और जिम्मेदारिया तय करने से सीमित किए जा सकते हैं।

पंजाब सरकार द्वारा जमीन के मालिकाना हक को लेकर पिता की संपत्ति विशेष रूप से कृषि जमीन में लड़कियों के नाम दर्ज करने का काूनन बनने के बाद जमीन-जायदाद को लेकर बढ़ रही मल्टीपल लीटीगेशन पर फाईव एलीमेंट हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी ने पाया कि राजस्व कानून का स्पष्ट रूप से पालन न करना या होना इन झगड़ों का मूल कारण है, जबकि अचल संपत्ति पर लागू होने वाला ये सबसे स्पष्ट कानून है। अन्य मामलों में व्यक्ति का बदलने वाला व्यवहार शामिल होता है।

सोसाइटी के चेयरमैन डा. जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि जो रिकार्ड दर्ज करने का काम पटवारी और राजस्व अधिकारियों ने खुद करने होते हैं वे लोगों को कार्यालयों में जाकर करवाने पड़ते हैं। कई बार इनके रह जाने पर दावे और प्रति दावे होते हैं। कुर्सीनामे का हवाला दे डा. टाइगर बताते हैं कि दादा की मृत्यु के बाद उनकी जमीन उसके बच्चों अथवा आश्रितों के नाम राजस्व कानून के मुताबिक पटवारी ने गांव में जाकर दर्ज करनी होती है और नबंरदार मौत की पुष्टि करने को होता है। प्रक्रिया सही चल रही है यह सुनिश्चत करना तहसीलदार का काम होता है। ये सिलसिला चले तो कोई विवाद नहीं है पर विरासत इंतकाल का सारा काम लोगों को पटवारखाने में जाकर करवाना पड़ता है। जिसका रह गया तो भविष्य में मालिकाना हक का विवाद भी तय हो गया। राजस्व मामले बढ़ रहे हैं। आजादी से पहले यदा कदा ही जमीन जायदाद के केस न्यायालय तक जाते थे पर अब हर मामूली बात अदालत पहुंचती है और दशकों निपटारा नहीं होता। तभी आपराधिक मामले भी दर्ज होते हैं और अदालतों पर बोझ बढ़ता है।

ऐसे ही बिना मालिक की इच्छा जमीन की गिरदावरी काश्तकार के नाम नहीं की जा सकती और न बदली जा सकती है पर कर दी जाती है। सीजन खत्म होने के बाद भी चलती रहती है। कब्जा तक घोषित कर दिया जाता है। डा. टाइगर कहते हैं कि यदि पटवारी से तहसीलदार तक की जिम्मेदारी तय हो जाए तो अदालतों का बोझ स्वत: घट जाएगा।

वहीं बार काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य एडवोकेट मनोज सोइन बताते हैं कि अदालत में 20 से 30 फीसदी मामले सिर्फ राजस्व रिकार्ड पूरे न होने से आते हैं। ये सेशन स्तर से सुप्रीम कोर्ट तक चलते रहते हैं। मजीठिया कालोनी के निकट एक कालोनी का हवाला दे उन्होंने बताया कि परिवार के मात्र एक सदस्य का नाम कुर्सीनामे में न होने से पूरी कालोनी निवासी अदालत जाने को मजबूर होते हैं। सेल डीड चैलेंज हो जाती है और लोन ब्लाक हो जाता है। ऐसी जमीन खरीदने वाला भी अकसर उलझ जाता है। कई बार तो रिकार्ड पटवारी से दर्ज नहीं होता तो कई बार इसमें कोई पक्ष गड़बड़ी करवाता है जो अंतत: सिविल से फौजदारी तक के मामलों के रूप में अदालतों में पहुंचते हैं।

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