भूपेश चट्ठा, पटियाला
पश्चिमी गड़बड़ी के चलते मौसम में बीती रात से आए बदलाव के बाद शुक्रवार को चली तेज हवाओं और बारिश ने उन किसानों के जले पर नमक छिड़क दिया है जो जिनकी फसल बाढ़ के चलते देरी से आई और अब तक कटाई नहीं कर पाए। धरती पर उगे सोने पर मानों आसमान से पानी नहीं आग बरस रही हो। बाढ़ प्रभावित पटियाला डिवीजन में मात्र 15 फीसदी ही धान की कटाई हुई है। इनमें संगरूर व बरनाला तो ऐसे जिले है जहां आंकड़ा दहाई में भी नहीं पहुंचा है। जिन किसानों की फसल मंडियों में आ भी गई है नुकसान उनका भी कम नहीं होने वाला। फेडरेशन आफ आढ़ती एसोसिएशन पंजाब के महासचिव सुभाष बांगा कहते है कि जिस किसान की उपज नहीं बिकी है और धान गीला हो गया है, उसके बिकने में भी खासी दिक्कत आनी है। आढ़ती तो दो दिन लेबर और लगा कर मदद कर देगा पर बात यहां लेबर के दोगुना हो जाने की नहीं है। शैलर वाले ऐसा धान लेना पसंद नहीं करते जिसमें नमी ज्यादा हो और गीली हुई उपज के बदरंग होने व डैमेज होने की संभावना खासी बढ़ जाती है। चावल भी घटिया क्वालिटी का रह जाता है ऐसे में नुकसान तो तय है। लेबर के मामले में एक रुपया प्रति कट्टा प्रति दिन का खर्च बढ़ता जाता है। हालांकि यह भी हजारों क्विंटल पर काफी आ जाता है। कृषि विभाग के पास आज के नुकसान की पूरी रिपोर्ट तो आनी है पर आरंभिक अनुमानों अनुसार खड़ी फसल बड़े क्षेत्र में गिरी है। कई जगहों पर कंबाइन चलने लायक ही खेत नहीं रहा और हाथों से दाने सहेजने के से हालात बन पड़े है। अधिकारी कहते है कि बाढ़ की वजह से पहले ही सीजन देर से शुरू हुआ था और अब इसमें और देरी होगी। याद रहे कि एक फीसदी नमी बढ़ने पर 40 रूपये प्रति क्विंटल का नुकसान हो जाता है। बदरंग अथवा टूटे चावल की कीमत 20 फीसदी रह जाती है।
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