भूपेश चट्ठा, पटियाला
इसे भूल-भुलैया अथवा कुछ भी कहा जाए, लेकिन यह कहना सही होगा कि पंजाब का किसान इस समय दोहरी सरकारी नीतियों से परेशान है। भूजल का सर्वाधिक दोहन करने वाली धान की परंपरागत तकनीक से खेती करने वाले किसान इस समय यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे भूजल बचाने के लिए धान की सीधी बिजाई करें अथवा (विदेश से मंगवाई मशीन) पैडी ट्रांसप्लांटर की मदद लें। जहां कृषि विभाग सीधी बिजाई की वकालत कर रहा है, वहीं खेत मजदूरों की कमी का हवाला देकर वह पैडी ट्रांसप्लांटर भी आयात कर रहा है। यह सही है कि हरित क्रांति से प्रभावित होकर प्रदेश में अधिक पानी-अधिक खाद-अधिक उपज के सिद्धांत को लागू करने के लिए ग्राफ्टिंग तकनीक अपनाई गई। इसमें पहले बिजाई कर, तैयार पनीरी की खेत में रोपाई की जाने लगी। कहा गया कि इससे पौधा जल्दी पनपता है। चार दशकों से चली आ रही इस तकनीक ने भूजल का घातक दोहन किया। नदियों के बाद नहरों को सुखा दिया। प्राकृतिक संसाधनों के भरपूर दोहन और मजदूरों की किल्लत ने अन्य प्रयोग करने को मजबूर किया तो सीधी बिजाई (खेत में बीज छिड़क कर खेती करना) की तकनीक सामने आई। इससे उपज एक-दो क्विंटल अधिक निकली और खर्च भी प्रति एकड़ 6-7 हजार रुपये कम हो गया। इसके अंतर्गत रकबा भी बढ़ रहा है। मगर त्रासदी है कि इसके बावजूद जापान से पैडी ट्रांसप्लांटर नामक मशीनें आयात की जा रही हैं। प्राइवेट कंपनियां हर ब्लाक में इनका प्रदर्शन भी कर रही हैं। ऐसे में किसान असमंजस में हैं कि वे क्या करें? अगर सीधी बिजाई इतनी ही अच्छी है तो सरकार मशीनों का प्रचार क्यों कर रही है? बीते बुधवार को एनजीओ खेती विरासत मिशन के उमेंद्र दत्त ने कहा कि सरकार की कोई कृषि प्रौद्योगिकी नीति ही नहीं है। हरित क्रांति से पहले बिना रोपाई के धान की फसल ली जाती थी, जिसे हरित क्रांति ने भुला दिया। कृषि विभाग के निदेशक डा. बीएस सिद्धू स्पष्ट करते हैं कि सरकार असमंजस में नहीं है। विभाग ने किसानों को दो तरह के विकल्प दिए हैं-सीधी बिजाई नई तकनीक है, जिसके लोकप्रिय होने में थोड़ा समय लग सकता है। पानी की बचत को खुल कर स्वीकार करते हुए वह कहते हैं कि हर मिट्टी की अपनी समस्याएं होती हैं। विभाग हल्की जमीन पर सीधी बिजाई की अभी सिफारिश नहीं कर रहा है। पैडी ट्रांसप्लांटरों के आयात पर डा. सिद्धू कहते हैं कि पंजाब है, यहां सब कुछ चलेगा। हाथ से रोपाई भी होगी, सीधी बिजाई भी और मशीन से खेती भी।
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