Wednesday, 13 October 2010

देसी बाथू ने किया कमाल

उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
साठ के दशक में हरित क्रांति से ठीक पहले देश में अन्न की कमी पर अमेरिका के साथ पीएल-480 जैसे शर्मनाक समझौते हुए इनके साथ ही भारत को गेहूं दिया गया, इसी गेहूं के साथ अमेरिका से आए जहाजों पर बिन बुलाए मेहमान कोकरोज इस धरती पर आए और तोहफे में मिली कांग्रेस घास। इन दोनों को ही लाइलाज बीमारी मान लिया गया। कोकरोज तो खत्म नहीं हुए अलबत्ता कांग्रेस घास का इलाज जरूर तलाश लिया गया है। यह कारनामा कर दिखाया जोगिंदर टाइगर ने। उन्होंने देसी बाथू के साथ प्रयोग किया और बरसात के दो ही सीजन में देखा गया कि जहां बाथू के बीज छिड़के थे वहां से कांग्रेस घास बिलकुल गायब है डकाला रोड पर फनविल स्थित फाइव एलिमेंट हेल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी चला रहे जोगिंदर टाइगर बताते है कि हर बीमारी का इलाज आसपास ही मौजूद होता है, लेकिन हम अपने जुकाम का इलाज अमेरिका में बनी दवा से तो दांत का दर्द चीन से ठीक करवाना चाहते हैं। यहीं से त्रासदी शुरू होती है और फिर नहीं रुकती। इसे रोक पाना खासा मुश्किल हो जाता है। वे याद करते हैं कि वर्ष 2002 में जब उनके पास सांस, दमा, चमड़ी, फेंफड़ों में इन्फेक्शन जैसी बीमारियों के रोगियों की संख्या बढ़ी तो इस ओर ध्यान गया, अध्ययन के बाद सामने आया कि 1993 की बाढ़ के बाद कांग्रेस घास का फैलाव तेजी से हुआ है और बीमारियां भी बढ़ी। 2004 आते-आते सब कुछ स्पष्ट हो गया। दो सालों के परीक्षणों के बाद सामने आया कि जहां कहीं बाथू लगा है वहां कांग्रेस घास नहीं उगी है। इसके बाद जोगिंदर टाइगर ने बाथू की खेती शुरू की, बारिशों से ठीक पहले इसके बीजों को सड़क किनारे छिड़कना शुरू किया। दो ही सीजन में सकारात्मक परिणाम आ गए। आज पटियाला-डकाला, पटियाला-समाना, पटियाला-चंडीगढ़ रोड पर हर बरसात के बाद बाथू के पौधों को देखा जा सकता है, कांग्रेस घास नहीं। दिलचस्प है कि जोगिंदर टाइगर के मित्र जहां कहीं भी रहते हैं उनके घरों के आस पास भी कांग्रेस घास नहीं है। दो से तीन साल के इस क्रम के बाद अब नदी किनारे हर मानसून में थोड़ी थोड़ी मात्रा में बाथू के बीज रखे जा रहे है। यहीं से फैलाव हो रहा है।उधर, पर्यावरण दिवस का नाम लेते ही जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि गोल्फ कोर्स व इको टूरिजम के नाम पर आज जंगल उजाड़े जा रहे है। चंडीगढ़ का गोल्फ कोर्स कुछ इसी तरह से फैल रहा है, जो लोग आज सौ-सौ एकड़ जंगल लीज पर ले इको टूरिजम की बात करते हैं वे ही इसका सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे हंै। कुछ ही सालों में यहां होटलें, कालोनियां, फार्म हाउस दिखाई देंगी। हमारे वन अधिकारी बड़े- बड़े सेमिनार करते है, शाही दावतों की तरह से खेत खलियान की चर्चा एसी कमरों में बैठकर करते है। वे देशी हैबीटाट उजाड़ कर विदेशी पौधे मंगवाते है। चार-पांच साल बाद वो तो चलता नहीं और अपने पौधे भी मर जाते है। ऐसे ही धरती बंजर होती जा रही है।

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