Showing posts with label non conventional source. Show all posts
Showing posts with label non conventional source. Show all posts

Thursday, 8 November 2012

जहां बिकती है, वहां भी जलती है पराली


जहां दाम हैं वहां भी बेदम करती पराली
जागरण एक्सक्लूसिव
-दो से ढ़ाई हजार रूपये प्रति एकड़ की अतिरिक्त कमाई पराली मात्र से ही की जा सकती है
-कंपनी दे रही मुफ्त मशीन, मिस्त्री, कटर, धागा और 70 रूपये क्विंटल के दाम
- प्लांट को पूरी पराली ना मिली तो गांवों का दायरा बढ़ाना पड़ा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
करे कौन?...आखिर मोल ही क्या है?, सरकार ले जाए खेतों से? खेत साफ करने आग तो फिर भी लगानी पड़ती है। जैसे बेतुके जुमले देकर किसान धान की पराली वहां भी जला रहा है जहां पराली बिक रही है। और तो और सरकार ने पराली जलाने से बचाने के साथ साथ खेत की उर्वरा शक्ति संजोए रखने, किसानों को सालों पहले ही उपाय देते हुए आय का अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध करवा दिया था।
बात पंजाब हरियाणा सीमा पर स्थित घनौर ब्लाक के बघौरा गांव की है। जहां पर 12 मेगावाट का बायोमॉस ईंधन चलित बिजली उत्पादन केंद्र चल रहा है और इस प्लांट में एक लाख टन से अधिक धान की पराली हर साल खप रही है। क्षेत्र के किसानों से इन दिनों में 70 रूपये क्विंटल की दर से पराली खरीद कर स्टोर कर ली जाती है और वर्ष भर बिजली का उत्पादन किया जाता है।
निजी क्षेत्र में लगे इस प्लांट से बिजली लेने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के अधिकारी बताते हैं वर्ष 2006-07 में शुरु किए इस प्लांट का उद्ेश्य 25 किलोमीटर की परिधि में मौजूद करीब सवा सौ गावों से पराली की खरीद करना। इससे बिजली बनाने के अलावा क्षेत्र के लोगों को बीमारियों से निजात मिलना, प्रदूषण से रोकथाम व धरती की उर्वरा शक्ति बनाए रखना और पर्यावरण में संतुलन कायम रखना अन्य लाभ मिलने तय थे। लेकिन अब प्लांट के फ्यूल मैनेजर दलजीत सिंह बताते हैं कि पराली खरीदने अब उनका दायरा बढ़ा है अब वे प्लांट से 40-50 किलोमीटर दूर भूनरहेड़ी क्षेत्र से भी पराली खरीद रहे हैं। प्लांट के लिए हर महीने 10 से 12 हजार टन पराली की जरूरत है तय इलाके से आपूर्ति ना होने की स्थिति में अब 160 से अधिक गांवों का रुख किया गया है।
दिलचस्प है कि मैसर्स पंजाब बायोमॉस की ओर से क्षेत्र में किसानों को एक सौ से अधिक बोलर मशीनें दी गई है। इसके साथ ही कटर व गट्ठे बांधने को धागा व खराब हुई मशीनों को ठीक करने मिस्त्री तक उपलब्ध करवाए गए हैं। किसान को ज्यादा दूर ना जाना पड़े इसके लिए दस कलेक्शन केंद्र भी बनाए गए हैं। इन तक पराली पहुंचाने पर 70 रूपये प्रति क्विंटल की दर से भुगतान भी किया जाता है।
दूसरी ओर सील गांव के प्रोग्रेसिव किसान हरदीप सिंह कहते हैं कि पांच-छह साल पहले कंपनी ने मशीनें देकर पराली खरीदनी शुरू की थी। दाम तब 60 रूपये क्विंटल रखे गए थे, तब से अब तक कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। जबकि धान के एमएसपी में खासी बढ़ोतरी हुई है और डीजल भी मंहगा हो गया है। हालांकि मुख्य रूप से सब्जी की काश्त करने वाले हरदीप सिंह यह भी कहते हैं कि अगर थोड़ी मेहनत कर ली जाए तो दो से ढ़ाई हजार रूपये प्रति एकड़ की अतिरिक्त कमाई पराली मात्र से ही की जा सकती है। दुनिया को प्रदूषण व जीव हत्या से भी बचा जा सकता है। धरती के नीचे प्राकृतिक रूप से चल रही खाद बनाने की फैक्ट्री भी नहीं जलेगी, जो अगली फसल की बिजाई में भी काम करेगी।



चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ा था पराली प्रदूषण अभियान
कृषि व कृषक हितैषी कही जाने वाली पंजाब सरकार पिछले साल पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम करने में पूरी तरह से असफल रही थी। कारण सिर्फ और सिर्फ चुनावी था। इस साल हुए विधान सभा चुनाव से ठीक पहले के सीजन में सरकार और प्रशासन ने किसानों को सिर्फ 'जागरुकÓ ही किया है। किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई करने से बचती रही।
बीते साल ही मोगा के गांव में खेत में जल रही पराली में एक आटो रिक्शा में बैठे तीन बच्चों के चपेट में आने से मौत हो गई थी। दिलचस्प है कि उन दिनों पंजाब सरकार के लिए धान की खरीद व लिफ्टिंग में जुटे विशेष सचिव दरबारा सिंह गुरु लगातार कहते रहे कि 'पहले लोगों को जागरुक करना जरूरी है।Ó हालांकि बाद में उन्होंने भी चुनाव लड़ा।
कांग्रेस के शब्दों में शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में चाहे कुछ ना किया हो लेकिन वर्ष 2007 से 2011 तक की सरकार ने पंजाब में सब सोयल एक्ट(धान की बिजाई 10 मई से और रोपाई 10 जून से करवाना) को सफलता पूर्वक लागू करने के अलावा पराली को जलाए जाने प्रति कड़ाई से कानून की पालना करवाना। दो महत्वपूर्ण कामों के लिए जाना जाएगा। फिर भी चुनावी साल में अपने सबसे बड़े वोट बैंक के आगे यह सरकार भी पिछले साल नतमस्तक हो गई थी।


पराली जलाने की रोकथाम पर कानून
 कानून अनुसार अभी तक केवल धारा 144 के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है। इसी के तहत पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सिफारिश पर जिले में तैनात डिप्टी कमिश्नर अपने जिला मैजिस्ट्रेट के अधिकारों का प्रयोग करते हुए प्रतिबंध लगाता है और इसी धारा के तहत कृषि अधिकारी व एसडीएम के माध्यम से पराली जलाए जाने वालों पर एफआईआर दर्ज करवाता है।

दो दशक में सफलता मात्र 20 फीसद 

90 के दशक में पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण का मुद्दा उठाने वाले पर्यावरण वैज्ञानिक और वर्तमान में पीपीसीबी में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत डा. चरणजीत सिंह नाभा कहते हैं कि दो दशक तक लोगों को समझाने के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाए हैं और आज भी केवल जागरुक ही कर रहे हैं। सफलता का परिणाम 20 फीसद से थोड़ा ही ज्यादा है।

क्या है विकल्प
पराली से गत्ता बनाने और बायोमॉस प्लांट लगा कर बिजली बनाने वाले कामर्शियल उपयोग के अलावा पराली को खेत में ही खुर्द-बुर्द कर खाद में तबदील करने वाले उपायों पर मुख्य कृषि अधिकारी  डा. बीएस सोहल कहते हैं कि अभी में मिनी टिल ड्रिल अथवा रोटावेटर ही चलन में। इससे किसान आंशिक तौर पर मोटे किरचे जला कर शेष को खेत में कुतर लेता है। पूरी तरह से जलाए बिना पराली को खेत में खपा देने वाले हैप्पी सीडरों की संख्या ज्यादा नहीं है। इनके सस्ता होने अथवा कंबाईन की तरह लोकप्रिय होने के बाद आपको पराली कहीं जलती हुई नहीं दिखेगी।



वक्त बदला मंजर नहीं

पटियाला के मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल अनुसार जिले में 2.33 लाख हैक्टेयर में धान की फसल लगी है। इसकी कटाई की शुरुआत हो चुकी है। मोटे अनुमान अनुसार धान का पौधा ठीक ठाक रहे तो प्रति हैक्टेयर 15-16 टन पराली पैदा होती है। ऐसे में साधारण गणित अनुसार 30 से 35 लाख टन पराली का बनना तय है।
वहीं पराली से उपजने वाली गैसों पर कृषि विज्ञानी बताते हैं कि पराली के जलाने से वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटीरियल, फास्फोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जलकर आसमान में चले जाते हैं हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें भी होती हैं, जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक सूर्य की किरणों को 33 फीसदी तक रोके रखती हैं।
इतना ही नहीं पराली जलने से खेत में मित्र कीटों के साथ धरती के नीचे खाद बनाने वाली प्राकृतिक फैक्ट्री को भी हर साल जल जाती हैं। पराली जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के अलावा धरती की उर्वरा शक्ति भी क्षीण होने लगी है।
पटियाला में अभी धान की कटाई शुरु ही हुई है और डिप्टी कमिश्नर जीके सिंह ने धारा 144 के तहत पराली का जलाया जाना प्रतिबंध कर रखा है। फिलहाल किसी तरह की दुर्घटना सामने नहीं आई है।