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Tuesday, 27 March 2012

गेहूं बीमारी से बचा, पर बादलों में फंसा, wheat yield may increase by 2 percent


 उम्मीद : उत्पादन एक से दो फीसदी बढ़ने की संभावना, पर बारिश हुई तो नुकसान
भूपेश चट्ठा, पटियाला सर्दियों में कभी लंबे समय तक कोहरा तो कभी पाला। यदि दोनों न हों तो तेला और चढे़ पारे की मार। इस बार रबी के सीजन में ऐसा कुछ नहीं हुआ। गेहूं की फसल हर बीमारी से बची रही, पर अब पकने को तैयार है तो बादलों में उलझ कर रह गई है।
 किसान को आशंका है कि कहीं समाप्त होते सीजन में जाते जाते मौसम की मार न पड़ जाए। हालांकि बकौल कृषि माहिर, सब कुछ ठीक रहा तो उपज पिछले साल की तुलना में बढ़नी तय है। डकाला ब्लाक के धर्मेहड़ी गांव के प्रोग्रेसिव किसान गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि इस बार पीली कुंगी जैसी बीमारी की मार नहीं पड़ी है और सब कुछ ठीक चल रहा है, लेकिन आसमान को देखते ही हौसले पस्त हो रहे हैं। ऐसे हालात में अगर बारिश आई तो नुकसान तय है। बारिश के बाद चलने वाली हवा से पौधे का गिरना तय है। इससे न केवल दाने बल्लियों से बाहर बिखरेंगे, बल्कि कंबाइन से कटाई भी मुश्किल हो जाएगी। 
इसी प्रकार घनौर ब्लाक के सील गांव के हरदीप सिंह बताते हैं कि इन दिनों बिलकुल साफ मौसम और तेज धूप की जरूरत गेहूं को है, जिससे दाने भली प्रकार पक जाएं और पौधे से बीमारी छंट जाए। पर आखिरी पानी के समय से आसमान पर बादल छाए हैं जिससे दाने में नमी के आसार बढ़े हुए हैं। 
वहीं मुख्य कृषि अधिकारी डा. राजिंदर सिंह सोही बताते हैं कि इस बार बारिश की मार न पड़े तो झाड़ एक से दो फीसदी बढ़ना तय है, लेकिन बादलों के ऐन उपज लेने के समय आ जाने ने डर बढ़ा दिया है। सीजन के दौरान उपजे हालात पर डा. सोही कहते हैं कि तेले की कहीं-कहीं हल्की मार पड़ी है और येलो रस्ट अथवा पीली कुंगी भी कुछ जगह देखी गई है, लेकिन इससे भी ज्यादा नुकसान की आशंका नहीं है। तेले पर समय रहते दवाओं का छिड़काव करवा दिया गया तो येलो रस्ट की मार सीमित रही है। हवा में से पैदा होने वाली यह कुंगी तापमान के 23 डिग्री पर आते ही स्वत: झड़ जाती है। ऐसे में इससे भी नुकसान की संभावना कम है।

Tuesday, 27 December 2011

सर्दी से रुका गेहूं के पौधे का विकास, wheat, weather, winter,


गेहूं पर पीली कुंगी का खतरा अभी तक नहीं  यूरिया संयम से डालने की सलाह

भूपेश चट्ठा, पटियाला : पंजाब में फसलों के लिए वरदान कहे जाने यहां के मौसम में थोड़ी सी भी गड़बड़ देश की विकास दर को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। दिसंबर मध्य के बाद भी बारिश न होने से पड़ रही सूखी सर्दी से फसल को नुकसान पहुंच रहा है। इससे गेहूं के पौधे का विकास मानो थम सा गया है।
इन दिनों होने वाली बारिश से पौधे की हल्की सिंचाई हो जाती है। इससे पत्ते पर जमा कोहरा व गर्द धुलने के साथ ही जड़ों को आक्सीजन मिल जाती है। इससे पौधे का विकास होता है। जबकि 'नक्का' तोड़ लगाए जाने वाले पानी से सिंचाई जरूरत से ज्यादा हो जाती है। जिससे जड़ों में पानी जमा हो जाता है और दम घुटने से पौधे का विकास तेजी से नहीं हो पाता।
कृषि विकास अधिकारी डा. एएस मान कहते हैं कि इन दिनों में ऐसा हर साल होता है। इसमें घबराने की जरूरत नहीं है। कई बार फसल के पीला पड़ते ही किसान ज्यादा मात्रा में यूरिया डाल कर अतिरिक्त प्रयास करते हैं। इससे पौधे झुलस जाते हैं। इस साल बीच-बीच में धूप निकलने से गेहूं की फसल पीली नहीं पड़ी। कुछ दिन में पारा चढ़ने पर हालात बदलने की पूरी संभावना है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया चलेगी और फिर जनवरी में पारा चढ़ने पर गेहूं की फसल खिल उठेगी। उनका कहना है कि जल्द आई बारिश अगेती बिजाई वाली गेहूं के लिए तो ठीक रही पर पछैती को मार सहनी पड़ रही है।
कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज, डा. बीएस सोहल बताते हैं कि गेहूं की फसल को प्रदेश में सबसे अधिक मार पहुंचाने वाली बीमारी पीली कुंगी का खतरा अभी तक कहीं भी देखने को नहीं मिला है। धुंध के बाद अगले दिन मौसम के खुल जाने के चलते दिन का तापमान बढ़ जाता है, जिससे नुकसान नहीं हुआ है। अगर इन दिनों बारिश हो जाए तो सोने पे सुहागा होगा। गेहूं के अभी तक बचे रहने के अलावा अन्य फसलों पर पड़ने वाले प्रभाव पर वह कहते हैं कि सीजन में सब्जियों विशेष रूप से आलू-मटर पर कोहरा भारी पड़ सकता है।

Friday, 2 December 2011

'खुशहाल' मौसम की पड़ी मार, धान का उत्पादन गिरा, paddy, weather, yield,



-आम धान का उत्पादन तीन फीसदी तो बासमती का छह फीसदी गिरा
-अच्छे फेवरेवल मौसम में पौधा हरियाली का आंनद लेने लगता है पीढ़ी बचाने, री-प्रोडेक्शन के बारे में तनाव में ही सोचा जाता है: कृषि वैज्ञानिक
भूपेश चट्ठा, पटियाला
फसलों पर मौसम की मार के बारे में ज्यादातर बातें अकाल अथवा सूखे के बाद बाढ़ व ओलावृष्टि की ही पड़ती है लेकिन इस साल आदर्श रहे 'खुशहालÓ मौसम की मार धान के उत्पादन पर पड़ी है। जिससे प्रदेश में धान की उपज गिरी है। मानसून के दिनों और इसके अंत तक रहे अच्छे रहे मौसम के चलते आम धान का उत्पादन तीन फीसदी और बासमती व इसके जैसी किस्मों का उत्पादन छह फीसदी गिर गया है।
पंजाब कृषि विभाग के वैज्ञानिक व कृषि विकास अधिकारी डा. एएस मान उपज के इस सिद्यांत पर बताते हैं कि अच्छे फेवरेवल मौसम में किसी भी फसल का वेजीटेशन फेज बढ़ जाता है, पौधे ज्यादा हरे भरे हो जाते हैं, फैलते भी हैं, फूलते भी हैं पर फलते नहीं हैं। पौधा हरियाली का आंनद लेने लगता है। उसे किसी अन्य बात की फिक्र नहीं रहती, और वो बीज बनाने की ओर ध्यान ही नहीं देता। ऐसे में अपनी अगली पीढ़ी प्रति चिंता मुक्त पौधा उपज नहीं दे पाता।
डा. मान आगे बताते हैं कि यदि मौसम थोड़ा प्रतिकूल होता है तो पौधे तनाव में रहते हैं और वे अपनी नस्ल बचाने की कवायद में रहते हैं। सारा जोर री-प्रोडेक्शन करने में लगा देते हैं। अपना जीवन कम जान कर वे बीज बनाने लग जाते है। जिससे दाने ज्यादा बनते हैं।
दिलचस्प है कि प्रदेश मंडी बोर्ड के आंकड़े भी इसी के समर्थन में बोलते हैं। और पिछले साल की तुलना में उपज में आई गिरावट की कहानी दोहराते हैं।
उधर अपनी थ्योरी के पक्ष में उदाहरण दे डा. मान कहते हैं कि पीढ़ी बचाने के बारे में अक्सर इंसान व पशु भी तनाव में ही ज्यादा सोचता है।
साथ ही वे तर्क देते हैं कि जब कभी हम सुनते हैं कि अमुक फसल में खाद भी खूब डाली थी पर झाड़ कम रह गया इसका भी यही कारण होता है कि पौधे अथवा पेड़ न अपना आनंद तो लेते हैं पर फल कम उतरता है।
 कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि इस बार के हालत भी कुछ ऐसे ही रहे, जब भी जरूरत हुई अंतराल पर बारिश होती रही, धूप भी खिलती रही, ना ही किसी बीमारी ने बड़ा हमला ही किया। फिर भी उत्पादन कम रहा। पिछले सालों का उदाहरण भी वे सामने रखते हैं। याद दिलाते हैं कि जब कभी अकाल की आशंका हुई या सूखे की मार पड़ी तो उपज बढ़ी है। हालांकि उन दिनों में कृषि लागत मुल्य बढ़ा और भूमिगत जल स्तर को जरूर नुकसान भी हुआ है।
धान की आम किस्मों का उत्पादन जहां पटियाला में बीते साल 12 लाख, 2768 टन की तुलना में 11 लाख 67 हजार, 688 टन रहा वहीं बासमती का उत्पादन एक लाख, 1102 टन से कम हो कर 95 हजार, 258 टन रह गया है।  

Saturday, 2 July 2011

मौसम की मार, मिर्च हुई और लाल, weather, diversification, chili



नुकसान
बारिश से मिर्च के पौधों की जड़ें हुईं कमजोर गलने की आशंका 
 किसान नुकसान को लेकर चिंतित
भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की रोपाई करने वाला किसान चाहे बारिश का स्वागत करने को एक पैर पर खड़ा हो पर अब यही बारिश उसे रुलाने लगी है। साल में दो फसलों के चक्र से निकल कर सब्जियों से डायवर्सिफिकेशन करने वाले किसान अब मिर्च की फसल को लेकर परेशान हैं। दो दिनों से लगातार हुई बारिश और उससे पहले चली तेज हवाओं ने मिर्च के पौधों की जड़ें कमजोर कर दी हैं। वहीं इनके गलने के आसार भी बढ़ गए हैं। याद रहे कि मानसून की बारिश के साथ ही पहाड़ी व शिमला मिर्च गलकर गायब हो जाती है। वहीं साधारण मिर्च बारिश के पानी से और तीखी हो जाती है। नतीजा बाजार में इसकी मांग में गिरावट और दामों में भी कमी हो जाती है। मांग व सप्लाई के सिद्धांत को ठेंगा दिखाते हुए मिर्च के कारोबार पर सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. बलजीत सिंह कहते हैं कि बारिश के बाद न तो ये आचार के लायक रहती है और न इसे सुखाकर लाल ही किया जा सकता है। अलबत्ता इसे थोड़ी मात्रा में ही सही पर खाया जरूर जाना चाहिए। वहीं सन्नौर मंडी में आढ़त का काम करने वाले सुभाष बांगा कहते हैं कि यहां की आबो-हवा और मिट्टी की ही खासियत है कि मिर्च तीखी और बेर बहुत मीठा होता है। लोगों ने अपने यहां खानदानी बीज संजोकर रखे हैं, जो पीढि़यों से लगाए जा रहे हैं, हालांकि अब लोग सन्नौरी मिर्च को छोड़ हाइब्रिड किस्मों की ओर जा रहे हैं। दिखने में बेहद छोटी इस मिर्च का फल यदि फूल से निकलने के साथ ही नीचे यानी धरती की ओर मुड़ जाए तो यह गजब की कड़वी होती है। वहीं हार्टीकल्चर विभाग के डिप्टी डायरेक्टर रंधीर सिंह कहते हैं कि मिर्च की क्वालिटी ही उसके तीखेपन पर निर्भर करती है। बारिश से मिर्च का तीखा होना एक भ्रांति है, लेकिन यदि पौधे की जड़ों में पानी रुक जाए और इसकी निकासी समय रहते न हो तो नुकसान तय है। ऐसे में जड़ों का गलना शुरू हो जाता है। पटियाला में करीब एक हजार एकड़ क्षेत्र में इसकी बिजाई हो रही है। नाभा, भादसों व पातड़ां में इसके अधीन रकबा ज्यादा है। नाभा क्षेत्र में किसान प्लास्टिक शीट का प्रयोग कर अनचाही बारिश से इसका बचाव कर रहे हैं।

Friday, 17 June 2011

बारिश से धान को आराम विविधीकरण को नुकसान, weather, diversification, crop,

मौसम की मार
30 नॉटीकल मील की गति से आए एक अंधड़ ने बागों पर कहर बरपाया
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला : जेठ-हाड़ तपे तां सौण-भादों हंसे.. बुजुर्गो की कही ये बात इस साल कहीं सही साबित न हो जाए। यह आशंका आज हर किसी के मन में उपज रही है। कारण स्पष्ट है कि इस बार जून में ही पंजाब में पारा कम से कम दो बार दस डिग्री से नीचे लुढ़क चुका है। हालांकि यह 40 डिग्री के पार भी जा रहा है और तकरीबन हर सप्ताह हो रही बारिश ने जहां धान की फसल को आराम दे दिया है। वहीं, विविधीकरण वाली हर दूसरी फसल को नकारात्मक रूप से प्रभावित भी किया है। कृषि विशेषज्ञ डा.बीएस सोहल कहते हैं कि पंजाब में चूंकि इन दिनों में अधिकतर हिस्से में धान की ही रोपाई की जा रही है। ऐसे में कुल मिलाकर तो फायदा ही है। किसान को सिंचाई के लिए कम पानी का प्रबंध करना पड़ रहा है। मौसम में नमी की वजह से वाष्पीकरण भी तुलनात्मक रूप से कम हो रहा है। वहीं, खेतों में खड़ी मक्की और सूरजमुखी की फसलें आंधी से प्रभावित हुई हैं। इनके पौधे गिरने से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। ठीक इसी तरह से कपास तो एक बारगी पूरी ही उजड़ चुकी है। बेमौसमी बारिश और उस पर 30 नॉटीकल मील की गति से आए एक अंधड़ ने बागों पर भी बुरी तरह से कहर बरपाया है। डा.सोहल कहते हैं कि हार्टीकल्चर के ही क्षेत्र में नुकसान है। कच्चे अचारी आम आपको बाजार में सस्ते व ढेरों में दिखाई दे रहे हैं। इसका साफ मतलब है कि पेड़ पर पकने से पहले ही ये आंधी से नीचे आ गिरे हैं। ऐसे ही जो नाशपाती मानसून के दिनों में बाजार में आनी थी, वे फल भी पूरी तरह से विकसित होने से पहले ही झड़ गए हैं। जामुन का बौर शुरुआती आंधी में गिरा, तो झाड़ कम होना तय हो गया। अमरूद जैसे हर उस बाग को नुकसान हुआ है, जहां अभी फूल निकलने की स्टेज चल रही थी। मौसम में आ‌र्द्रता व उमस का स्तर इन दिनों में बारिश आने पर 100 तक भी जा पहुंचा, जबकि अन्य दिनों में ये 25 तक भी गिरा है। पारे के सात से 44 डिग्री के बीच झूलने और उमस के ऊपर नीचे होने ने पौधों को इस तरह से असमंजस में डाला कि सुबह फूल खिलता है और शाम होते होते गिर जाता है। सब्जियों की काश्त करने वाले सील गांव के हरदीप सिंह कहते हैं कि आंधी का आलम यह रहा है कि कद्दू की जमीन से लगी बेल भी उथल पुथल में फंस गई। उलझी बेलें व टूटे फूलों से अब झाड़ पिछले साल से आधा भी हो जाए तो गनीमत है। नींबू टमाटर व मिर्च के यही दिन होते हैं जब इनसे कमाई होती है, बारिशों के बाद मिर्च तीखी हो जाती है और पालक में कीड़ा पड़ जाता है जबकि नींबू-टमाटर की मांग गिर जाती है।

Thursday, 19 May 2011

गेहूं पर बारिश ने भुलाया किसान को बोनस, wheat, weather, may 3rd


-बारिश के बाद चली हवा से ज्यादा नुकसान
-रात में कंबाईन मशीन चलाने की अनुमित देने की मांग उठने लगी

भूपेश चट्ठा, पटियाला

मौसम में लगातार बनी हुई नमी और बीच बीच में होने वाली बारिश और विशेष रूप से रात में चली रही तेज हवाओं ने किसान की सुध-बुध खो दी है। ऐसे में गेहूं पर मिले 50 रूपये प्रति क्विंटल के बोनस को कम से कम वो किसान बिलकुल तव्वजो नहीं दे रहा जिसकी फसल अभी खेतों में खड़ी है। बोनस को भूला किसान ईश्वर के आगे अरदास में लगा है कि किसी तरह से मौसम शुष्क हो और पश्चिमी हवाएं चलें जिससे उपज लेने में आसानी हो और दाना जल्द पक कर सूख जाए तो बेचने में भी कोई दिक्कत ना आए।

प्रदेश में रबी की प्रमुख फसल गेहूं पर देश भर की निगाह टिकी है और गेहूं के परंपरागत सीजन की शुरूआत के बाद और मंडियों में गेहूं के आने में आई तेजी के बाद से फिर शुरू हुई बारिश से राज्य का किसान सहमा है। गेहूं की देर से हुई बिजाई के चलते इन दिनों की बारिश संभवत पौधे बर्दाश्त कर लेते लेकिन साथ आई तेज हवाओं ने रिकार्ड उपज पर सवालिया निशान लगा दिए है। तेज हवाओं से गिरे पौधों ने हालत ऐसे कर दिए है कि कंबाईन तो दूर की बात हाथ से कटाई करनी भी मुश्किल हो गई है।

किसानों की ओर से मांग उठने लगी है कि ऐसे मौसम में रात के दौरान भी कंबाईन मशीन चलाने की अनुमित दी जाए जिससे ठीक मौसम वाले दिन काटाई हो जाए। तर्क यह भी दिया जा रहा है कि रात में कंबाईन चलाने पर तूड़ी ज्यादा बनती है और दाना मोटा रहता है।

वहीं कंर्सोटियम आफ इंडियन फार्मर्स ऐसोसिएशन के प्रदेश प्रधान सतनाम सिंह बहरू कहते है कि पश्चिम से हवाएं चलती हों और मौसम ठीक रहे तो कटाई कभी भी हो सकती है। इस बार तो सभी तरफ नुकसान हो रहा है। देवीगढ़ क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। साथ ही उन्होनें केंद्र की ओर से घोषित किए गए कम बोनस और राज्य की ओर से मध्यप्रदेश, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश सरकारों के समान किसान को अपनी ओर से लाभ ना दिए जाने की कड़ी आलोचना की है।

मौसम बेशक 'प्रतिकूल', पंजाब रहेगा 'कूल' election, save electricity, weather,

 पिछले साल लगे इन दिनों कट, पर अब इंतजाम ऐसे की सरप्लस बिजली बेच रहा पावरकाम

भूपेश चट्ठा, पटियाला

दो साल पहले बेहद खराब रहे मानसून के दौर में कैप्टन कंवलजीत सिंह की मौत के बाद बनूड़ में उपचुनाव हुए तो विधान सभा क्षेत्र में पूरी गर्मियों के दौरान एक घंटा भी बिजली कट नहीं लगा, जबकि तब पूरा प्रदेश बिजली के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा था। अबकी बार पूरे प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन गर्मी चाहे जितनी पड़े, इस बार राज्य की जनता को राहत मिलनी तय है। इसका अहसास पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के आंकड़े करवा रहे हैं कि मौसम चाहे कितना भी प्रतिकूल क्यों न हो बिजली का माहौल कम से कम दस जून तक कूल ही रहने वाला है।

आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल एक मई को महत्वपूर्ण शहरों में आधिकारिक रूप से 50 मिनट का कट था तो जिला मुख्यालयों से कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में ये अवधि बढ़ते हुए तीन घंटे तक जा पहुंची थी। लेकिन इस साल दो मई की सुबह समाप्त हुए 24 घंटे में इंडस्ट्री पर सांयकालीन लगने वाले तीन घंटे के पीक लोड प्रतिबंध के अलावा सभी वर्गो पर कटों की अवधि समान रूप से जीरो है।

दिलचस्प है कि बड़ी मात्रा में खरीदी जाने वाली बिजली के शार्ट टर्म समझौते भी इस साल दस जून की बजाए अप्रैल से किए गए है। इंतजाम कुछ ऐसा है कि सोमवार को दो थर्मल यूनिट मरम्मत के चलते बंद किए गए हैं और राज्य के पास एक मई को 1188 लाख यूनिट बिजली थी तो एक दिन पहले 30 अप्रैल को 1259 लाख यूनिट। जबकि राज्य कुल मिलाकर 1158 लाख यूनिट बिजली का ही इस्तेमाल कर पाया है। ऐसे में स्पष्ट है कि पंजाब के पास फिलहाल 38 से 98 लाख यूनिट तक सरपल्स बिजली है। इसमें से 25 लाख यूनिट अनशैडयूल इंटर चेंज के तहत बेची गई और शेष 2.62 रूपये प्रति यूनिट की दर से अन्य राज्यों के हवाले करने केंद्रीय पूल में डाल दी गई।

वहीं पावरकाम के प्रवक्ता कहते हैं कि राज्य में ट्रांसमिशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन लॉसेज एक फीसदी कम हुए और सिस्टम दुरुस्त होने से हालात बदले हैं। याद रहे कि टीएंडडी लासेज एक फीसदी कम होने पर इन दिनों में 10 लाख यूनिट की बचत हो रही है। इस पर पावरकाम कहता है कि ये मात्रा चाहे काफी कम है लेकिन बिजली का अचानक गुल होना, बार बार फ्यूज उडऩा कम हुआ है। इससे अच्छी गुणवत्ता की सप्लाई मिल रही है।

ट्रांसमिशन सिस्टम दुरूस्त होने से हर जगह पर बिजली पहुंच रही है। इसी प्रकार पिछले साल के बेहतर मानसून से पन बिजली उत्पादन अच्छा बना हुआ है। पंजाब को भाखड़ा ब्यास मैनेंजमैंट बोर्ड से 142 लाख यूनिट और अपना पन-बिजली उत्पादन 123 लाख यूनिट है, जबकि यही आंकड़ा पिछले साल क्रमश 95 लाख और 92 लाख यूनिट रहा था।

Monday, 4 April 2011

'हल छड्ड के खेत नूं जांवे जट्टा तेरी जून बुरी...' farmer, crop, weather,


-बारिश के बाद चली हवा से आधे से एक फीसदी का नुकसान
-देरी से बिजाई वाली किस्मों पर पड़ा है प्रभाव पर घबराने की
जरूरत नहीं: कृषि विभाग
भूपेश चट्ठा, पटियाला
'हल छड्ड के  खेत नूं जांवे जट्टा तेरी जून बुरी...' लोक
गीतों ने पंजाब के किसानों की व्यथा सदियों पहले ही बता दिया था
कि तकनीकि जितना ही  विकसित क्यों ना हो जाए वैज्ञानिक चाहे जितनी
ही  उन्नति क्यों ना कर लें किसान की किस्मत तो प्रकृति की मर्जी पर
ही र्निभ र करती है।  खेत से काम निपटा कर अभी  किसान घर पहुंचता
ही नहीं है कि उसे एक बार फिर  खेत की ओर दौडऩा पड़ता है।
बीती रात की बारिश ने इस बार भी  हालात कुछ ऐसे ही बना दिए है।
प्रदेश में रबी की प्रमुख  फसल गेहूं पर देश भर की निगाह टिकी
है और गेहूं की सरकारी  खरीद शुरू होने से ठीक दो दिन
हुई बारिश से राज्य का किसान सहमा है। गेहूं की देर से हुई
बिजाई के चलते इन दिनों की बारिश  संभवत पौधे बर्दाश्त कर लेते
लेकिन साथ आई तेज हवाओं और कहीं-कहीं गिरे ओलों ने
रिकार्ड उपज पर सवालिया निशान लगा दिए है। हालांकि कृषि विभाग
की ओर से लगाए गए शुरूआती अनुमानों में आधे से एक फीसदी उपज
प्रभावित होने की बात की जा रही है।
मुख्य  कृषि अधिकारी सुभाष चंद खुराना कहते है कि देरी से
बिजाई वाली कुछ पछेती किस्मों पर बारिश का विपरीत असर हुआ है,
शेष में तेज हवाओं से गिरे पौधों के अलावा कोई परेशानी
नहीं है, यहां  दाना लगभ ग पक चुका है, ऐसे में कल की बारिश
के बाद आज  निकली  धूप और आने वाले दिनों में खुले रहने वाले
मौसम से स्थिति ठीक हो जाएगी। वे कहते है कि अभी  घबराहट
वाली कोई बात नहीं है।
उधर राजपुरा व आसपास के क्षेत्रों में बीती रात जम कर ओलावृष्टि
हुई है। ठीक ऐसे ही समाचार  कुछ अन्य ग्रामीण क्षेत्रों से भी
मिले है लेकिन ओलों का साइज राजपुरा की तुलना में अन्य क्षेत्रों
में  खासा छोटा ही रहा है।
दिलचस्प है कि बारिश ने आने वाले दिनों के फलों की लोकल
किस्मों में कुछ को अच्छा लाभ  दिया है तो कुछ को बुरी तरह
से प्रभावित किया है। नींबू-आम आदी के फूल झड़े है तो
आड़ू-अमरूद की बीमारी।

Thursday, 3 March 2011

अब बस भी करो मेघा..


गेहूं की जरूरत : तेला धुला पर पीली कुंगी की मार बढ़ने का अंदेशा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 जब गेहूं को ठंड की जरूरत थी तो फरवरी के शुरू में ही तापमान बढ़ गया और अब फसल पकने को है तो पारा लुढ़क कर नीचे आ गया है। रुक-रुक कर लेकिन लगातार हो रही बारिश से मौसम में आई नमी गेहूं की उपज को विपरीत रूप से प्रभावित करने को है। महंगे कीटनाशकों से जूझ रहा किसान अब आसमान से गुहार लगा रहा है,मत बरसो मेघा, मानसून का इंतजार कर लो। धर्मेड़ी गांव के किसान गुरप्रीत सिंह कहते है कि कुदरत के आगे किसी की नहीं चलती, यहां कोई बीमा भी नहीं करवाता, सब कुदरत पर छोड़ा जाता है, और अब कुदरत का बिगाड़ है यही ठीक करेगी। पिछली बार धान के सीजन में भी किसान बाढ़ का शिकार हो गया था और अब भी यही हालात बने हुए हैं। आज गर्म मौसम की जरूरत है, बल्लियां निकलने को हैं और दाना तभी बेहतर ढंग से बनेगा अगर मौसम में नमी नहीं होगी और ज्यादा से ज्यादा शुष्क रहेगा। ऐसे ही संसारपुर में प्रोग्रेसिव फार्मिग करवा रहे हरजिंदर सिंह बदेशां कहते हैं कि तेले की मार से उभरे ही नहीं थे कि अब पीली कुंगी आ गई, ऐसे में मार तो पड़नी तय है। अब कितनी पड़ेगी, यह आने वाले दिनों में खिलने वाली धूप पर निर्भर करता है। हालांकि क्षेत्र में जिन किसानों ने अपनी मनमर्जी से किस्मों की बिजाई की है, वे ज्यादा चपेट में आई है। उधर मुख्य कृषि अधिकारी सुभाष चंद्र खुराना कहते है कि ऐसा मौसम गेहूं को तो यह खराब ही करेगा, बारिश के बाद हवा चली तो नुकसान कई गुना बढ़ सकता है। कृषि अधिकारी बताते हैं कि इन दिनों में बारिश के साथ ओलावृष्टि की संभावना ज्यादा रहती है। जिन किसानों ने फसल को पानी लगा रखा है और उपर से बारिश के साथ हवा चली है वहां पौधे के गिरने की संभावना बन पड़ती है। कृषि विभाग की ओर से 50 फीसदी सब्सिडी पर प्रोपेगोणजोल अथवा टिल्ट स्प्रे करने को कहा गया है। इसकी कम से कम एक और जरूरत पड़ने पर दो स्प्रे 15 दिन के अंतराल पर किए जा सकते हैं। साथ ही वे यह भी कहते है कि किसान अब इस प्रति काफी जागरूक है लेकिन विभाग भी बराबर प्रचार कर रहा है।

Thursday, 30 December 2010

पराली व पटाखों के प्रदूषण की गर्द धुली

भूपेश चट्ठा, पटियाला
अक्टूबर में पराली को जलाने से धुआं छाया तो नवंबर में दिवाली केपटाखों से हुए प्रदूषण ने पूरे प्रदेश को गैस चैंबर ही बना डाला, गैसें तो आसमान में चली गई आसमान में छाई गर्द को जहां तीन महीने बाद आई बारिश ने धो दिया है, वहीं फसलों को भी खासी राहत प्रदान की है। मौसम में मौजूद सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल को धोने और फसलों को टॉनिक देने के लिए इन दिनों हर किसी को बारिश का इंतजार रहता है। हालांकि इसे फतेहगढ़ साहिब में होने वाले शहीदी जोड़ मेले से भी जोड़ कर देखा जाता है।
दिलचस्प है कि इसी महीने के दूसरे सप्ताह में दैनिक जागरण ने बारिश के इंतजार में कुछ कृषि विशेषज्ञों के विचार प्रकाशित किए थे तब फाइव एलीमेंट हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष डा. जोगिंदर टाइगर ने बारिश में हुई देरी से इत्तेफाक नहीं किया था, वे कहते रहे कि गेहूं को बारिश की जरूरत 20 दिसंबर के बाद होती है और तब तक यह हो भी जाएगी। सर्दी की आवश्यकता इसके बाद ही होती है। वीरवार को संपर्क किए जाने पर डा. टाइगर ने कहा कि आजकल की बारिश से गेहूं की उन किस्मों को भी लाभ होगा जिनकी देर से बिजाई की गई है, मानसून के लंबा खिंचने और धान की कटाई में हुई देरी के बावजूद फसल पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं है। अन्यथा कोहरे से ये पछेती किस्में मर जाती हैं।
टाइगर अंग्रेजी महीनों की तारीखों के हिसाब से बिजाई के आगे परंपरागत ज्ञान को अधिक महत्व दे कहते हैं कि पंजाब में लोहड़ी तक देसी गेहूं की बिजाई चलती थी और बैसाखी को शगुन के तौर पर दाती लगा फसल की कटाई होती थी जबकि अब इस दिन तक पूरा सीजन खत्म कर दिया जाता है। वहीं, बारिश के बाद कुछ दिन कोहरे का न होना और तापमान का कम रहना गेहूं के लिए बेहतर बताया जाता है। इतना ही नहीं लगातार हुई बारिश के बाद कोहरे का स्थान ओस ले लेती है।
कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल कहते हैं कि बारिश इन दिनों में सोने पर सुहागा का काम करती है। हर फसल को इससे लाभ है। गेहूं का पौधा कम पारे में लंबाई कम लेगा और इसकी शाखाएं ज्यादा फूटेंगी। इससे उपज बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है, चूंकि कोहरा नहीं होगा तो सूरज की किरणों से पत्तों पर होने वाली प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया लगातार जारी रहने से पौधे का विकास जारी रहेगा। पत्तों के धुलने से होने वाला लाभ अलग है।
उधर, सोशल साइंसिस एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि सूखी सर्दी से निजात दिलाने वाली इस बारिश से जैसे इंसान को फेफड़ों और छाती रोगों से राहत मिलेगी वैसे ही फसलों, पेड़ पौधों को भी लाभ होगा।