-आम धान का उत्पादन तीन फीसदी तो बासमती का छह फीसदी गिरा
-अच्छे फेवरेवल मौसम में पौधा हरियाली का आंनद लेने लगता है पीढ़ी बचाने, री-प्रोडेक्शन के बारे में तनाव में ही सोचा जाता है: कृषि वैज्ञानिक
भूपेश चट्ठा, पटियाला
फसलों पर मौसम की मार के बारे में ज्यादातर बातें अकाल अथवा सूखे के बाद बाढ़ व ओलावृष्टि की ही पड़ती है लेकिन इस साल आदर्श रहे 'खुशहालÓ मौसम की मार धान के उत्पादन पर पड़ी है। जिससे प्रदेश में धान की उपज गिरी है। मानसून के दिनों और इसके अंत तक रहे अच्छे रहे मौसम के चलते आम धान का उत्पादन तीन फीसदी और बासमती व इसके जैसी किस्मों का उत्पादन छह फीसदी गिर गया है।
पंजाब कृषि विभाग के वैज्ञानिक व कृषि विकास अधिकारी डा. एएस मान उपज के इस सिद्यांत पर बताते हैं कि अच्छे फेवरेवल मौसम में किसी भी फसल का वेजीटेशन फेज बढ़ जाता है, पौधे ज्यादा हरे भरे हो जाते हैं, फैलते भी हैं, फूलते भी हैं पर फलते नहीं हैं। पौधा हरियाली का आंनद लेने लगता है। उसे किसी अन्य बात की फिक्र नहीं रहती, और वो बीज बनाने की ओर ध्यान ही नहीं देता। ऐसे में अपनी अगली पीढ़ी प्रति चिंता मुक्त पौधा उपज नहीं दे पाता।
डा. मान आगे बताते हैं कि यदि मौसम थोड़ा प्रतिकूल होता है तो पौधे तनाव में रहते हैं और वे अपनी नस्ल बचाने की कवायद में रहते हैं। सारा जोर री-प्रोडेक्शन करने में लगा देते हैं। अपना जीवन कम जान कर वे बीज बनाने लग जाते है। जिससे दाने ज्यादा बनते हैं।
दिलचस्प है कि प्रदेश मंडी बोर्ड के आंकड़े भी इसी के समर्थन में बोलते हैं। और पिछले साल की तुलना में उपज में आई गिरावट की कहानी दोहराते हैं।
उधर अपनी थ्योरी के पक्ष में उदाहरण दे डा. मान कहते हैं कि पीढ़ी बचाने के बारे में अक्सर इंसान व पशु भी तनाव में ही ज्यादा सोचता है।
साथ ही वे तर्क देते हैं कि जब कभी हम सुनते हैं कि अमुक फसल में खाद भी खूब डाली थी पर झाड़ कम रह गया इसका भी यही कारण होता है कि पौधे अथवा पेड़ न अपना आनंद तो लेते हैं पर फल कम उतरता है।
कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि इस बार के हालत भी कुछ ऐसे ही रहे, जब भी जरूरत हुई अंतराल पर बारिश होती रही, धूप भी खिलती रही, ना ही किसी बीमारी ने बड़ा हमला ही किया। फिर भी उत्पादन कम रहा। पिछले सालों का उदाहरण भी वे सामने रखते हैं। याद दिलाते हैं कि जब कभी अकाल की आशंका हुई या सूखे की मार पड़ी तो उपज बढ़ी है। हालांकि उन दिनों में कृषि लागत मुल्य बढ़ा और भूमिगत जल स्तर को जरूर नुकसान भी हुआ है।
धान की आम किस्मों का उत्पादन जहां पटियाला में बीते साल 12 लाख, 2768 टन की तुलना में 11 लाख 67 हजार, 688 टन रहा वहीं बासमती का उत्पादन एक लाख, 1102 टन से कम हो कर 95 हजार, 258 टन रह गया है।
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