...चुनाव 2012 परिसीमन
- पटियाला ग्रामीण-सन्नौर कांग्रेस के लिए और समाना-घन्नौर अकालियों के लिए 'सुरक्षितÓ हुई, नाभा आरक्षित तो काका रणदीप बेघर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोक सभा क्षेत्र व जिले के अंर्तगत आते विधान सभा क्षेत्रों की सीमाओं में हुए बदलाव के बाद राच्य में दो दलों अथवा दो घटकों वाले लोकतंत्र के सिद्धांत को पूरी तरह से बल मिला है। दोनों प्रमुख दलों शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस ने अपनी दो-दो किलों को मजबूती प्रदान कर ली है।
भोगोलिक दृष्टि से चाहे विधान सभा का केंद्र किसी छोर से कितना दूर है इससे परिसीमन में 'बदलावÓ लाने वाले प्रभावशाली नेताओं को तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अपने बंदों अथवा अपनी पार्टी की विचारधारा, बिरादरी के गांवों को एक साथ लाना रहा है। दिलचस्प है कि यह प्रयास जिस किसी ने भी किया उसने विरोधी खेमे को बराबरी का मौका भी उसी वक्त दे दिया।
हालांकि चुनाव आयोग की ओर से लिए गए निर्णय में नाभा सीट के आरक्षित होने से कांग्रेस के विधायक काका रणदीप सिंह अपनी पुश्तैनी सीट से बेघर हो गए हैं।
वहीं दो-दो सीटों पर कंसोलिडेटेड हुए वोटों से पटियाला ग्रामीण और सन्नौर कांग्रेस के लिए और समाना व घन्नौर अकालियों के लिए 'सुरक्षितÓ सीटें बन गई हैं। इनमें राच्य के दूसरे सबसे बड़े क्षेत्र समाना में से पटियाला शहर का मुख्य रूप से त्रिपड़ी क्षेत्र बाहर होने व पटियाला ग्रामीण कांग्रेसियों के लिए आसान सीट बन गया। पुराने डकाला क्षेत्र के कुछ अकाली पक्षीय गांवों का समाना में शामिल होने से अकालियों को राहत मिल गई।
इसी प्रकार पुराने डकाला से अकाली गांव बाहर निकले और नए नाम से बने सन्नौर क्षेत्र में घन्नौर के चंद कांग्रेसी समझे जाने वाले गांव मिला लेने से सन्नौर कांग्रेस बहुल लगने लगा है। ठीक यही वजह है कि घन्नौर में अकालियों की स्थिति मजबूत लगती है। जबकि पटियाला लोक सभा क्षेत्र अधीन आते पुराने बनूड़ को तोड़ कर बनाए डेराबस्सी में भी राजपुरा के पास के अकाली गांव मिलाए गए हैं लेकिन ऐसे ही बहावलपुर बिरादरी के गांव शामिल होने से डेरा बस्सी पर स्पष्ट दांव लगाना अब आसान नहीं है।
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