-पिछले साल का उत्पादन 144 लाख पांच हजार टन था तो इस बार 133 लाख 52 हजार टन रहा
-सूखे में खर्च के साथ बढ़ता है उत्पादन, बेमौसमी रही बारिश: लक्खोवाल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
राष्ट्र के चावल उत्पादन में आधे से अधिक का योगदान दे अन्नदाता का तगमा 60 के दशक में हासिल करने वाले पंजाब का कटोरा इस साल 11 लाख टन खाली रह गया है। राच्य में हुई सरकारी व निजी खरीद पिछले साल की तुलना में सात फीसदी कम रही है।
पंजाब मंडी बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि दो महीने चले धान के खरीद सीजन के बाद आए कुल खरीद के आंकड़ों से हर किसी को निराशा हाथ लगनी तय है। राच्य को जहां टेक्स का नुकसान हुआ तो किसान की उपज कम रही और सीधी आर्थिक हानि हुई तो आढ़ती को कमीशन कम मिला, कुछ ऐसा ही हाल शैलर मालिकों का रहेगा लेकिन सबसे बड़ी क्षति देश में उस आम आदमी की होगी जिसे अच्छे मानसून के बावजूद उत्पादन गिरने से सस्ता धान अथवा चावल नहीं मिलेगा।
राच्य में हुई खरीद के आंकड़े भी उल्ट कहानी बताते हैं। केंद्र की इकलौती खरीद एजेंसी फूड कारपोरेशन आफ इंडिया ने पिछले साल 5.14 लाख टन धान की खरीद की थी तो इस साल यह घट कर 1.87 लाख टन रह गई। इसके साथ ही राच्य में एफसीआई का खरीद हिस्सा चार फीसदी से कम हो 1.6 रह गया है।
जबकि निजी क्षेत्र अथवा राइस शैलर्स मिलर्स की खरीद 1.82 लाख टन से बढ़ कर 4.35 लाख टन पर आ गई। ऐसे में हिस्सा 3.7 फीसदी पर आ गया है।
मंडी बोर्ड के चेयरमैन अजमेर सिंह लक्खोवाल कहते हैं कि सात फीसदी उत्पादन कम रहा है और पूरे पंजाब में लगभग समान रूप से गिरावट दर्ज हुई है। बेमौसमी बारिश को जिम्मेदार ठहराते हुए वे कहते हैं कि दाना पडऩे के दिनों में हुई बारिश से झाड़ गिरा है। इसके अलावा वे देसी नुक्ता बता वे कहते हैं कि दाना पडऩे के दिनों में यदि पूर्व से हवा चल जाए तो उपज कम रहती है जबकि पश्चिमी हवाओं से उपज बढ़ती है। तीसरे प्रमुख कारण में सूखा व बारिश के दिनों का अंतर है सूखे में खर्च के साथ उत्पादन बढ़ता है जबकि बारिश च्यादा होने पर उपज कम रह जाती है। राच्य में उत्पादन के सवाल पर वे कहते पिछले साल का उत्पादन 144 लाख पांच हजार टन था तो इस बार 133 लाख 52 हजार टन रहा है।
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