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Friday, 9 December 2011

पटियाला ग्रामीण का जन्म, नाभा आरक्षित, delimitation, election, punjab


भूपेश चट्ठा, पटियाला प्रत्येक 30 सालों बाद होने वाले चुनाव क्षेत्रों के बदलाव ने इस बार पटियाला जिले व लोक सभा क्षेत्र को कुछ अधिक तर्कसंगत बना दिया है। इसी परिसीमन के चलते जिले की विधानसभा क्षेत्रों में हुए भौगोलिक बदलाव के बाद नाभा विधान सभा क्षेत्र आरक्षित हुआ तो पटियाला ग्रामीण के नाम से नए विधान सभा क्षेत्र का गठन हुआ। हालांकि कुल संख्या आठ में बदलाव न होने की वजह बनूड़ क्षेत्र का अस्तित्व समाप्त होना है। डकाला सीट का नाम बदलकर सन्नौर विधानसभा क्षेत्र हो गया है। जिले में अब शुतराणा के साथ नाभा के रूप में दो सीटें आरक्षित होंगी। सबसे प्रमुख बदलाव के तहत बने पटियाला ग्रामीण सीट में पटियाला नगर निगम के 22 वार्ड रखे गए हैं, जबकि ये पहले समाना विधान सभा क्षेत्र का हिस्सा थे। इसमें समाना के 54 और नाभा ब्लाक के 32 गांवों और घन्नौर अधीन आते अर्बन एस्टेट, पंजाबी युनिवर्सिटी व बहादुर गढ़ कस्बे तक के क्षेत्र को जोड़ दिया गया है। राज्य में वोटों के लिहाज से दूसरे और लंबाई में पहले नंबर के समाना सीट के ज्यादा छोटा होने की स्थिति पुराने डकाला क्षेत्र के समाना क्षेत्र के साथ लगते और डकाला गांव के आसपास के 40 गांवों को समाना में जोड़ा गया है। पिछले चुनाव तक 90 किलोमीटर तक की दौड़ लगवाने वाला व ढाई लाख से अधिक मतदाताओं वाला यह क्षेत्र अब भौगोलिक दृष्टि से सिमट गया है। डकाला के स्थान पर बने सन्नौर क्षेत्र में घन्नौर सीट के 42 गांव जोड़े गए हैं, जबकि घन्नौर में यही कमी पूरी करने राजपुरा क्षेत्र से इतने ही गांव निकाल कर घन्नौर में मिला दिए गए हैं। बनूड़ सीट का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया और बनूड़ कस्बा और 25 गांव राजपुरा में मिला दिए गए हैं, जबकि बनूड़ क्षेत्र के अधिकांश हिस्से से डेरा बस्सी क्षेत्र बना है जो पटियाला लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा तो रहेगा लेकिन यहां जिले का नाम एसएसटी नगर अथवा मोहाली हो गया है। इसी प्रकार लोक सभा सीट पटियाला में से संगरूर जिले के लहरागागा और सुनाम को हटा दिया गया है और आनंदपुर साहिब सीट अधीन आते नाभा को पटियाला लोकसभा में मिला दिया गया है।

अकालियों-कांग्रेसियों की वोट सघनता बढ़ी, punjab election, 2012, delimitation


 ...चुनाव 2012 परिसीमन
- पटियाला ग्रामीण-सन्नौर कांग्रेस के लिए और समाना-घन्नौर अकालियों के लिए 'सुरक्षितÓ हुई, नाभा आरक्षित तो काका रणदीप बेघर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोक सभा क्षेत्र व जिले के अंर्तगत आते विधान सभा क्षेत्रों की सीमाओं में हुए बदलाव के बाद राच्य में दो दलों अथवा दो घटकों वाले लोकतंत्र के सिद्धांत को पूरी तरह से बल मिला है। दोनों प्रमुख दलों शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस ने अपनी दो-दो किलों को मजबूती प्रदान कर ली है।
भोगोलिक दृष्टि से चाहे विधान सभा का केंद्र किसी छोर से कितना दूर है इससे परिसीमन में 'बदलावÓ लाने वाले प्रभावशाली नेताओं को तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अपने बंदों अथवा अपनी पार्टी की विचारधारा, बिरादरी के गांवों को एक साथ  लाना रहा है। दिलचस्प है कि यह प्रयास जिस किसी ने भी किया उसने विरोधी खेमे को बराबरी का मौका भी उसी वक्त दे दिया।
हालांकि चुनाव आयोग की ओर से लिए गए निर्णय में नाभा सीट के आरक्षित होने से कांग्रेस के विधायक काका रणदीप सिंह अपनी पुश्तैनी सीट से बेघर हो गए हैं।
वहीं दो-दो सीटों पर कंसोलिडेटेड हुए वोटों से पटियाला ग्रामीण और सन्नौर कांग्रेस के लिए और समाना व घन्नौर अकालियों के लिए 'सुरक्षितÓ सीटें बन गई हैं। इनमें राच्य के दूसरे सबसे बड़े क्षेत्र समाना में से पटियाला शहर का मुख्य रूप से त्रिपड़ी क्षेत्र बाहर होने व पटियाला ग्रामीण कांग्रेसियों के लिए आसान सीट बन गया। पुराने डकाला क्षेत्र के कुछ अकाली पक्षीय गांवों का समाना में शामिल होने से अकालियों को राहत मिल गई।
इसी प्रकार पुराने डकाला से अकाली गांव बाहर निकले और नए नाम से बने सन्नौर क्षेत्र में घन्नौर के चंद कांग्रेसी समझे जाने वाले गांव मिला लेने से सन्नौर कांग्रेस बहुल लगने लगा है। ठीक  यही वजह है कि घन्नौर में अकालियों की स्थिति मजबूत लगती है। जबकि पटियाला लोक सभा क्षेत्र अधीन आते पुराने बनूड़ को तोड़ कर बनाए डेराबस्सी में भी राजपुरा के पास के अकाली गांव मिलाए गए हैं लेकिन ऐसे ही बहावलपुर बिरादरी के गांव शामिल होने से डेरा बस्सी पर स्पष्ट दांव लगाना अब आसान नहीं है।