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Friday, 21 December 2012
पंजाबी पानी के बाद मिट्ïटी भी हुई बेदम!
-मिट्टी को कौनसी चाहिए टॉनिक? बताएगा कृषि विभाग
-किसान का नुकसान कम करने फसलें भी सुझाई जाएंगी और कुछ से दूर रहने को भी कहा जाएगा: विशेषज्ञ
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पांच पानियों की धरती पंजाब का पानी गड़बड़ हुआ तो पहले शहरों के घरों में फिल्टर लगे और अब गांवों में पीने का साफ पानी उपलब्ध करवाने पंचायतों में आरओ लग रहे हैं। आलम ये है कि देश के अन्न भंडार में दो तिहाई तक हिस्सा डालने वाले पंजाब की मिट्टी भी बेदम हो गई है। यूरिया, फास्फेट जैसे हरित क्राति के ताकतवर तत्व अब बेमानी हो गए हैं। ऐसे में कृषि विभाग आने वाले दिनों में इससे एक कदम आगे की मिट्टी की टॉनिक सुझाने जा रहा है।
विभागीय अधिकारियों अनुसार अभी तक कृषि विभाग मिट्टी का परीक्षण केवल तीन तत्वों का ही करता था अब इसे माइक्रो न्यूट्रीएंट्स स्तर पर ले जाया जाएगा। नाइट्रोजन, फास्फोरस, केलशियम व जैविक तत्वों की मात्रा ही जांची जाती थी अब बदले हालात में मैग्नीज, जिंक, आयरन व गंधक की जांच की जाएगी।
डिप्टी डायरेक्टर बीज रह चुके मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि खेती जिस स्तर पर पहुंच गई है वहां से इसे लाभदायक बनाने के लिए या तो हमे शोध कर लागत कम करनी होगी या फिर उपज के उत्पादन के स्तर को बनाया रखना होगा। इसके लिए जिन तत्वों की कमी है केवल उन्हें ही खेत में डालने की सिफारिश की जाएगी। यह मिट्टी की जांच के दौरान ही पता चल जाएगा। इसके लिए फसल पर एक तत्व विशेष की कमी का असर देखे जाने तक का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इसी के आधार पर किसान को सुझाया जाएगा कि कौनसी फसल की बिजाई करे अथवा किस फसल से बिलकुल दूर रहें। संभव है कि मिट्टी के परीक्षण के बाद किसान को कुछ नुकसान करने वाली फसलें हमेशा के लिए छोडऩी पड़ें।
डा. सोहल कहते हैं कि अभी तक कई किसानों ने सिर्फ एक दूसरे से सुन कर ही यूरिया खेत में डाल लिया, इसने खेत के जिंक तत्वों को खासा नुकसान पहुंचाया है। जहां जरूरत नहीं थी वहां भी प्रयोग करने से पहले किसान ने यूरिया पर पैसे खर्चे और अब जिंक पर करेगा। ऐसे ही हम एक तय माप अनुसार रसायनिक खादों का प्रयोग करते जाते हैं, जिसका प्रभाव हम 15 दिनों अथवा कई बार तो एक महीने बाद फसल पर बीमारी के रूप में या फिर पौधे की ग्रोथ के रूप में देखते हैं, जबकि पहले माइक्रो न्यूट्रीएंटस की जांच करने पर हमे इस तरह के मंहगे व रिस्की तर्जुबे नहीं करने पड़ेंगे।
बाक्स
बदलती है टॉनिक की मात्रा, पर होता है विपरीत प्रयोग
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि जहां मिट्टी में ज्यादा नमी है वहां नहरी पानी की तुलना में खाद का प्रयोग मात्र दो तिहाई हिस्सा ही करना होता है जबकि रेतली जमीन पर ये एक तिहाई रह जाता है। जबकि किसान रेतली जमीन में ज्यादा खाद डाल कर अधिक उपज लेने का प्रयास करता है। इसी प्रकार अगर गेहूं को सिफारिश की गई फास्फोरस वाली खाद डाली गई हो तो उन खेतों में धान, कपास, मक्की, मूंगफली आदि के लिए इस खाद की जरूरत नहीं होती लेकिन ऐसी स्थिति में अगर टेस्ट में नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा आ जाए तो इसका प्रयोग करना पड़ता है।
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