Thursday, 27 December 2012

पंजाब से छोटा किसान हुआ गायब



-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें बड़े ट्रेक्टर, उपकरण व प्रोसेसिंग सिस्टम बेचने पर लगी

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में कृषि योग्य जमीन का रकबा चाहे कम हो रहा है और कंकरीट के जंगल भी बस रहे हैं लेकिन राज्य में बड़े किसानों की संख्या बढ़ रही वहीं छोटा किसान तेजी से गायब हो रहा है। किसानों की जनगणना पर जुटाए गए व संग्रहित किए जा रहे आंकड़ों में देश के रूझान के विपरीत जानकारी सामने आ रही है।
दिलचस्प है कि देश भर में जहां छोटे किसानों की गिनती बढ़ रही है। कृषि विभाग के सांख्यकि विभाग से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि इससे पहले पंजाब में परिवारों के टूटने के पांच एकड़ तक के किसानों की संख्या लगातार बढ़ती रही है। पर अब बड़े खेत बढ़ रहे हैं और स्वभाविक है कि कई दशकों के बाद बड़े जागीरदार भी एक बार फिर से समाज में फलने फूलने लगे हैं।
जनगणना के आंकड़े औपचारिक रूप से अगले साल मार्च-अप्रैल तक ही प्रकाशित होंगे लेकिन आरंभिक संग्रह करने वाले अधिकारी बताते हैं कि पंजाब में छोटा किसान जहां ठेके पर जमीन दे कर खुद खेती से किनारा कर रहा है। ऐसे लीज पर जमीन देने वाले छोटे व मध्यम किसानों की संख्या एक लाख 30 हजार पर आ गई है। जबकि ऐसे ही जमीन बेच देने वालों का आंकड़ा भी 72 हजार है जो अब जमींदार नहीं रहे।
वर्ष 2010-11 की कृषि जनगणना के आने वाले परिणाम जहां बड़े किसानों की संख्या के मामले में चौंकाने जा रहे हैं वहीं उत्पादन के मामले में भी कम आश्चर्यजनक नहीं होंगे। पंजाब की तुलना में गेहूं उत्पादन अन्य राज्यों में बढ़ रहा है जबकि यहां पर लगभग स्थिर है। दस साल पहले मध्यप्रदेश में गेहूं उत्पादन जहां 57 हजार टन था वहीं अब 80 लाख टन है।
वहीं मक्की उत्पादन पर जोर देते मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि अभी तो सारा धान व गेहंू सरकारी खरीद एजेंसियां खरीद रही हैं, लेकिन तब क्या होगा जब यह आपूर्ति अन्य राज्यों से होने लगेगी। सारा सिस्टम निजीकरण की ओर बढ़ रहा है। इसके लिए अभी से जागने की जरूरत है। केंद्र हमारी मक्की नहीं खरीद रहा पर बाजार में बिक रही है, धान का यही एकमात्र सही विकल्प है। वे कहते हैं कि पंजाबियों को अब एक बार चावल खाना कम कर मक्की की रोटी को तवज्जो देनी होगी।
वहीं सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि ये किसान कहीं गायब नहीं हो रहे ये लो अब खेत मजदूर व दिहाड़ीदार हो गए हैं। कर्ज में डूबे किसानों की जमीनें बिक रही हैं। पंजाब के किसान की हालत ठीक वैसी ही हो गई है जैसी देश की सीमा पर लड़ते हुए सिपाही की जो घायल हो गया है। देश का पेट भरने किसान ने अकाल, बाढ़, आतंकवाद जैसे हर हालात में फसल को पाला, हरित क्रांति ने किसानी का लागत मूल्य बढ़ा दिया और खर्चे किसान ने खुद बढ़ा लिए। ऐसे में अब देश की जिम्मेदारी बनती है कि घायल हुए किसान व कृषि का इलाज करे। जबकि बड़े किसानों का फायदा केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होगा जिनकी निगाहें बड़े ट्रेक्टर, उपकरण व प्रोसेसिंग सिस्टम बेचने पर लगी हैं।

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 कृषि जनगणना वर्ष 2010-11

-पंजाब में बड़े किसानों की संख्या बढ़कर 10.28 लाख
-मध्यम किसानों की संख्या घटकर 1.01 लाख रह गई
-20 एकड़ से ज्यादा भूमि वाले किसानों की संख्या 2.79 लाख से ज्यादा
-तीन से चार एकड़ जमीन वाले किसानों की संख्या 3.43 लाख

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 2000-01 में 65 फीसद थे छोटे किसान

वर्ष 2000-01 में हुई जनगणना का हवाला दे पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. रणजीत सिंह घुम्मन की ओर से किए गए शोध में सामने आया है कि दस साल पहले पंजाब में किसानों की कुल संख्या 18.44 लाख थी, इसमें से पांच एकड़ से कम भूमि वाले छोटे किसान 32 फीसद और पांच से दस एकड़ भूमि वाले मध्यम किसानों का हिस्सा कुल आबादी का 33 फीसद था। शेष बड़े किसानों थे।

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