- लोगों को दिखती हैं कमियां, ट्रैफिक पुलिस को नजर नहीं आती
- न हेडलाइट ठीक है न टेल लाइट, कई आटो में नंबर प्लेट भी नदारद
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
वैध रूप से शहर में नगर निगम की सीमा क्षेत्र और निगम सीमा के बाहर अवैध रूप से चलने वाले आटो रिक्शा में सफर करने वालों में 'सुरक्षा' की कम और 'जुगाड़' का सा अहसास ज्यादा होता है। फिर भी मजबूरी में लोग इनमें जान जोखिम में डालकर बैठते भी हैं और शिकायत भी करते हैं।
शहर में चल रहे ज्यादातर आटो रिक्शा का ढांचा पुराना है। कई की जहां हेडलाइट खराब है तो संभव है कि शायद ही किसी में तलाशने पर टेल लाइट ठीक से जलती दिखाई दे। बहुत से आटो तो ऐसे हैं, जिनमें टेल लाइट की जगह ही नदारद है। हालांकि आम आदमी को दिखने वाली ये कमियां सड़क पर चौबीस घंटे मौजूद रहने का दावा करने वाली ट्रैफिक पुलिस को नहीं दिख पाती है। ट्रांसपोर्ट विभाग से पारित क्षमता से बहुत ज्यादा सवारियां बैठाने से नहीं कतराने वाले आटो रिक्शा चालकों से इनमें न बैठने वाले, पर सड़क पर इनके आसपास चलने वाले वाहन चालक भी इन्हें पास देखते ही परेशानी महसूस करने लगते हैं। सर्दी शुरू हो चुकी है और धुंध व कोहरे का सीजन आने को है। ऐसे में दुर्घटनाओं की संभावनाओं को अभी ही रोका जा सकता है।
मार्कल कालोनी के सोनू शर्मा का कहना है कि शहर में बेलगाम घूम रहे आटो रिक्शाओं पर ट्रैफिक पुलिस को रोक लगानी चाहिए। शहर के भीड़ भरे बाजारों में ये तेज रफ्तार से बेधड़क चलते हैं। सनौरी अड्डा के बृज मोहन का कहना है कि सनौरी अड्डा के पास दर्जनों आटो रिक्शा चलते हैं, लेकिन किसी भी आटो रिक्शा पर पूरा नंबर नहीं लिखा होता, जो कानून की सरेआम उल्लंघना है। जबकि पुलिस वाले हर चौक पर नाका लगाकर केवल मोटरसाइकिलों के चालान काट रहे होते हैं।
ऐसे ही राजपाल सिंह बताते हैं कि ज्यादातर आटो रिक्शा की हालत तरस योग्य है, जिनमें बैठना सुरक्षित नहीं है। हालांकि आवाजाही के सीमित साधन होने की सूरत में हर सवारी अपनी जान की जिम्मेवार बनकर बैठी होती है।
दूसरी ओर ट्रैफिक पुलिस के प्रभारी हरदीप सिंह बडूंगर का कहना है कि शहर में करीब 14 आटो रिक्शा यूनियन हैं। इन लोगों को नियमों प्रति जागरुक करने के लिए बैठकें की जा रही हैं। इसके अलावा शहर के सभी आटो रिक्शा चालकों की सूची तैयार की जा रही है, जिससे भविष्य में कोई असुविधा न हो।
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