-धान का सीजन समाप्त, लिफ्टिंग मुकम्मल
-आपात स्थितियों में उत्पादन बढ़ता है: कृषि विशेषज्ञ
-उत्पादन की तुलना में किसान का खर्च ज्यादा बढ़ा: किसान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून के दिनों में प्री मानसून के नाम पर जून में एक भी बारिश नहीं सर्वाधिक जरूरत व जोरदार मानसून वाले जुलाई महीने में हुई तीन से चार बारिश और कुल मिला कर कमजोर कहे जाने वाले मानसून के बावजूद धान की उपज बढ़ गई है। कम से कम पटियाला जिले में पिछले साल की तुलना में धान का उत्पादन बढ़ा है।
मंडियों में आए धान के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल के शानदार मानसून के खरीफ सीजन की तुलना में इस साल धान की उपज सात फीसद ज्यादा रही है। यही आंकड़े एक और दिलचस्प तथ्य उजागर कर रहे हैं। जिसके अनुसार देरी से बिजाई की जाने वाली बासमती किस्मों के उत्पादन को शामिल किया जाए तो कुल बढ़ोतरी दो फीसद ही रह जाती है। यानी बासमती अथवा इसके समतुल्य किस्मों का उत्पादन कम हुआ है।
जिले की 107 मंडियों में पिछले साल जहां 11 लाख 68 हजार 915 टन धान की आवक हुई थी वहीं इस साल इन्हीं पीआर किस्मों की आवक 12 लाख 51 हजार 666 टन धान आया है। जो पिछले साल से सात फीसद ज्यादा है। इसी प्रकार मंडियों में बासमती सहित आए कुल धान की आवक जहां पिछले साल 13 लाख 14 हजार टन रही थी वहीं इस साल ये बढ़कर 13 लाख 41 हजार 260 टन पर आ गई है।
मंडी बोर्ड के अधिकारी बताते हैं कि धान का सीजन अब लगभग समाप्त हो चुका है और मंडियों में से धान की लिफ्टिंग भी मुकम्मल हो चुकी है। संभव है कि एक, दो ट्राली आ जाए पर उम्मीद अब नहीं है।
दूसरी ओर कमजोर मानसून के बावजूद उत्पादन बढऩे के सवाल पर कृषि विशेषज्ञ डा. एएस मान कहते हैं कि आपात स्थितियों में उत्पादन बढ़ता है। पौधों का व्यवहार भी इंसान या अन्य जीवों की तरह होता है। जो खुद को खतरे में पाकर आबादी बढ़ाने लगते हैं। यह लंबे युद्ध अथवा अकाल जैसी परिस्थितियों में देखा गया है। कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि पौधे के लिए मौसम उसके पक्ष में होने अथवा बारिश ठीक ठाक होने की स्थिति में वो फलता फूलता ज्यादा है। वेजीनेशन का आनंद लेने लग जाता है। उसकी लंबाई ज्यादा बढ़ती है पर बल्लियों में बीज पैदा नहीं होता। इस साल भी कुछ हालात ऐसे ही बने कि पौधे ज्यादा नहीं पनपे पर दाने ज्यादा बने हैं।
वहीं भारतीय किसान यूनियन के हरभजन सिंह कहते हैं कि सरकार उत्पादन बढऩे की बात तो करती है पर इसकी तुलना में किसान का खर्च ज्यादा बढ़ा है। उसका जिक्र नहीं करती। मौसम चाहे जैसा हो, सूखे की मार चाहे जितनी पड़े, किसान अपनी फसल को गहने बेच कर या उधारी लेकर पाल ही लेगा। ये भी उसके बच्चों के बारबर ही होती है। जिसे मरने नहीं दिया जा सकता, पर सूखे पर सरकार ने क्या किया?
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