- चार सालों में पंजाब में 52 एमओयू पर साइन
- सभी के चालू होने पर भी आने वाले सालों में 650 मेगावाट से च्यादा नहीं
- हर महीने एक-दो नए समझौते हो रहे हैं: पावरकाम
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मंहगे कोयले व गैस की किल्लत से जूझ रहे पंजाब ने परमाणु ऊर्जा से तौबा कर रखी है, लेकिन सैद्धांतिक रूप से गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के प्रयास के बावजूद राज्य में निकट भविष्य में इन साधनों से ज्यादा उत्पादन नहीं होने वाला है। राज्य की ओर से बायोमास ईंधन व माइक्रो हाइडल पन बिजली प्रोजेक्टों के अलावा हर प्रकार के गैर परंपरागत बिजली स्रोतों से बिजली उत्पादन करने का लक्ष्य एक हजार मेगावाट रखा गया है और बार बार दोहराया भी जा रहा है, लेकिन अभी तक मात्र 70 मेगावाट से ही उत्पादन शुरू हो पाया है।
दिलचस्प है कि परंपरागत बिजली उत्पादन पर निर्भरता कम करने की घोषणाएं वर्ष 2002 में कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल से होती रही हैं। उन दिनों ताबड़तोड़ ढ़ंग से मैमोरेंडम आफ अंडरस्टेंडिंग एमओयू पर हस्ताक्षर हुए लेकिन बात सीमित ढंग़ से ही आगे बढ़ पाई। पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड पावरकाम के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि पिछले चार सालों में पंजाब में बायो मास व माइक्रो हाइडल के रूप में छोटी पन बिजली परियोजनाओं सहित गैर परंपरागत बिजली उत्पादन स्रोतों के 52 एमओयू पर साइन हुए हैं। हालांकि सोलर व अन्य बिजली प्रकार के बिजली उत्पादन का हिस्सा इसमें नाममात्र का ही है। लगभग सभी प्रोजेक्ट आधा मेगावाट से 16 मेगावाट तक के हैं और सभी के चालू होने पर भी आने वाले सालों में 650 मेगावाट बिजली पैदा होने लगेगी। फिलहाल राज्य में चल रहे इस प्रकार के सभी प्रोजेक्टों की क्षमता करीब 70 मेगावाट है और पूरी क्षमता पर चलने की स्थिति में इनसे 16 लाख यूनिट से थोड़ा ज्यादा का उत्पादन हो रहा है।
वहीं पावरकाम के प्रवक्ता कहते हैं कि विश्व बाजार में छाई मंदी के कारण निजी क्षेत्र से ज्यादा लोग नहीं आ पाए हैं। बघौरा में प्लांट चला रही पंजाब बायोमास प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनी ही सौ से ज्यादा प्लांट लगाना चाहती है। ऐसी ही कई और कंपनियां हैं लेकिन उंची ब्याज दरों क चलते लोन लेना पूरी रह से व्यवहारिक नहीं महसूस करती। फिर भी लगभग हर महीने एक से दो नए समझौते हो रहे हैं। ऐसे में लक्ष्य से ज्यादा उत्पादन जल्द दिखेगा।
...क्या हैं पेंच
पंजाब से हरियाणा अथवा राजस्थान यहां तक कि दिल्ली को जाने वाले नहरी पानी पर लगने वाले माइक्रो हाइडल प्रोजेक्ट लगाने दो दशक पहले ही हरियाणा ने अड़ंगा लगा दिया था। नहरी फाल पर लगने वाले प्रोजेक्टों से पैदा होने वाली बिजली में से हरियाणा ने यह कहते हुए हिस्सा मांग लिया कि जो पानी हरियाणा को जा रहा है उससे पैदा होने वाली बिजली में से हरियाणा को हिस्सा दिया जाए और नहर पर प्रोजेक्ट लगाने से होने वाली पानी की बंदी से पूर्व हरियाणा से अनुमति ली जाए और इस प्रकार की अनुमति हरियाणा ने कभी नहीं दी।
...हर तरफ पराली और अथाह संभावनाएं हैं पर..
तकनीकि रूप से देखा जाए तो पंजाब में बायो मास ईंधन आधारित बिजली उत्पादन केंद्रों को लगभग हर गांव में लगाया और बिजली उत्पादन किया जा सकता है। इसके साथ ही प्रदूषण-पर्यावरण की समस्या के हल के अलावा किसान को भी आर्थिक रूप से मदद मिलना और बिजली की समस्या का लंबे समय तक हल शामिल है। लेकिन तमाम दावों के बावजूद ऐसा नहीं हो पाया है।
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