-पायलेट प्रोजेक्ट के तहत महाराष्ट्र और गुजरात से मंगवाए गए पौधे
-छोटी गुठली और बहुतयात में होता है गुदा, तीन साल में फल देने लगता है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बैंगन जब बैंगनी नहीं रहा और सफेद होते ही ये 'बै-गुणÓ से 'ताज वालीÓ एकलौती सब्जी हो गया ऐसे में जामुन भला क्यों जामुनी ही रहने वाली थी। आने वाले सालों में पंजाब में लाल, सफेद, काले और यहां तक की नीले रंग में भी दिखाई देंगी। संभवत तब भी इन्हें जामुन ही कहा जाएगा, लेकिन रस और गुदे के मामले में पेड़ों पर लगने वाली ये जामुनें किसी हलवाई की जामुनों को भी पीछे छोड़ती नजर आएंगी।
पंजाब में इन रंग बिरंगी जामुनों को लाने के पीछे भी मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की दिखाई गई दिलचस्पी है। प्रदेश वन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि प्रकाश सिंह बादल के बीते साल गुजरात व महाराष्ट्र में किए गए दौरे के दौरान उनका सामना रंग बिरंगी जामुनों से हुआ तो पंजाब में ऐसी ही जामुने उगाने की इच्छा जताई गई।
अधिकारी बताते हैं कि हार्टीकल्चर विभाग की तुलना में वन विभाग को जिम्मी सौंपा गया जिसके तहत पायलेट प्रोजेक्ट बनाया गया और महाराष्ट्र और गुजरात से एक हजार पौधे लाए गए। बीते साल लाए गए पौधों में से ज्यादातर का प्रयोग सिंबल के रूप में हुआ, वीवीआईपी की ओर से कहीं स्मृति के रूप में लगवाने के अलावा गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस पर बांटे भी गए हैं। याद रहे कि फलों के पौधे लगाने फरवरी के अलावा सितंबर ही बेहतरीन महीना होता है।
प्रोजेक्ट की शुरुआत करने वाले व वर्तमान में कंजरवेटर के पद पर तैनात धर्मेंद्र शर्मा ने 'दैनिक जागरणÓ को बताया कि इन जामुनों का बीज अथवा गुठली खासी छोटी होती है और गुदा बहुतयात में होता है। आम जामुन की तुलना में इसका पेड़ जल्द फल देने लगता है। तीन साल में ही ये अच्छा खासा फल देने लगता है।
रंग बिरंगी जामुने हाईब्रिड वेरायटी में आती है। आमतौर पर ये विदेशी किस्मों की श्रेणी में ही रखी जाती है, जिसे ग्राफटिंग से तैयार किया जाता है। धर्मेंद्र शर्मा याद करते हैं कि पंजाब में साधारण तय जमोए हुआ करते थे जिनकी गुठली खासी बड़ी होती है। बड़े साइज में ज्यादा गुदे और छोटी गुठली के साथ फिरोजपुर क्षेत्र में ऐसी ही एक किस्म पाई जाती है लेकिन उसकी रंग जामुनी ही होता है
याद रहे कि महाराजा पटियाला के पास भी ऐसी ही किस्म के जामुनों के प्लांट रहे हैं। जिनकी कलमें चोरी छिपे मोती बाग से बाहर जाती रही लेकिन जामुनों की उक्त रसभरी वेरायटी भी अब ज्यादा नहीं दिखाई देती है।
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