Friday, 16 September 2011

बारिश ने तबाह कर डाली धान की 1121 किस्म, bad weather, paddy,


-पॉलीनेशन नहीं होने से दाने बल्लियों में पूरे नहीं पड़ते: डा. सोहल
-पछेती को भी नुकसान पर अगेती के दाने बदरंग होने की संभावना बढ़ी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बल्लियां या धान की 'मुजंरेंÓ निकलने के ठीक उपर आई बारिश ने धान की पीएयू-1121 किस्म को लगभग तबाह कर डाला है, हालांकि कृषि विशेषज्ञों व पंजाब सरकार की ओर से इस किस्म को ना लगाने की सिफारिश की थी।
दुनिया भर में अपने सबसे लंबे चावल के लिए मशहूर धान की यह किस्म है तो साधारण लेकिन देखने में बासमती चावल का रंग रूप लिए होती है। अंतर सिर्फ इतना है कि इसमें बासमती जैसी खुशबू नहीं होती। इसके बावजूद दाम के मामले में ये साधारण धान की तुलना में दो से तीन गुना तक मंहगा बिकता है। खाड़ी देशों में ज्यादा मांग के चलते केंद्र सरकार की निर्यात नीति इसके दामों को आए सीजन प्रभावित करती रहती है। जिससे दाम शेयर बाजार की तरह अर्श से फर्श के बीच झूलते रहते है।
आठ व नौ सितंबर को हुई बारिश के बाद बीते दिन की बौछारों पर नौगावां केकुलजिंदर सिंह औलख बताते हैं कि जिस एकड़ में मुजंरें निकल रही थी वहां बारिश की बूंदों ने सारा सिट्टा सफेद कर दिया है और जहां दाने में दूध आ चुका था वहां पर अब आई बारिश ने इसे काला करना तय कर दिया है।
सितंबर मध्य की इन दो बौछारों ने धान की अन्य किस्मों को भी विपरीत रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। फसल कितने फीसदी खराब हुई है इसका आंकलन तो धूप निकलने के  बाद ही हो पाएगा लेकिन बारिश ने धान की गुणवत्ता पर सीधा-सीधा असर डाल दिया है। धर्मेहड़ी के गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि इस साल बराबर अंतराल पर हुई बारिशों ने धान के फसल को खासा तगड़ा कर रखा था। भारी हुए पौधे पर इन दिनों की बारिश ने कुछ ऐसे हालात बना दिए हैं जैसे किसी के मुंह पर आप लगातार थपड़ मारते रहो। दाने का थोथा रह जाना अथवा कम वजन का होना उतना ही खतरनाक है जितना ना बनना। ऐसे फोके दाने पंखा लगाते ही कचरे के रूप में कबाड़ में जा गिरते हैं।
पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज, डा. बीएस सोहल बताते हैं कि सितंबर के इन दिनों में होने वाली बारिश को ठीक कहा ही नहीं जा सकता और इसके बाद आने वाली बारिश और ज्यादा खतरनाक साबित होगी। धान के पौधे पर सीधे पड़ी पानी की बौछारें और साथ में चली हवा से बल्लियों में से दाने झड़ जाते हैं और जहां पर दाने नहीं हुए हैं वहां पानी लगने से थोथे रह जाते हैं। अन्य फसलों पर तो विशेष असर नहीं होता पर प्रदेश की खरीफ की मुख्य फसल धान के मामले में पॉलीनेशन नहीं होने से दाने बल्लियों में पूरे नहीं पड़ते हैं।
 डा. सोहल कहते हैं जहां बल्लियां निकलने को होती हैं और हवा से पौधे गिर गए हैं उनमें बाद में बनने वाला बीज छोटा रह जाता है। इतना ही नहीं दाने का छिलका बदरंग हो जाता है। धान का छिलका काला होने पर इससे निकला चावल बदरंग अथवा मटमेला भूरा होता है। जिससे मंडी में धान के बेचने में भी खासी परेशानी आती है।
ऐसे ही लखविंदर सिंह बताते हैं कि  जिन किसानों ने धान की बिजाई और रोपाई देरी से की थी उन्हें इससे पहले नुकसान नहीं हुआ है। पर अब हालात बदल रहे हैं। पंजाब हरियाणा सीमा पर बाढ़ की मार तले आने वाले ज्यादातर क्षेत्र में कुछ ऐसा ही माहौल है। अगेती रोपाई पर जहां मार पड़ी है पर ज्यादा लाभ पछैती को भी नहीं है अलबत्ता नुकसान अब बढ़ेगा।

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