Saturday, 3 September 2011

गिदड़बाहा पावर प्लांट पर भी लटकी तलवार!, giderbaha, thermal, power , plants, electricity, generation


- एनटीपीसी ने करना है निर्माण, रेल व कोल लिंकेज के अलावा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेनी है क्लीयरेंस
- एनटीपीसी ने अपनी क्षमता से ज्यादा कर रखे है सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर, पंजाब खुद बनाए प्लांट: इंजी. एसो.
भूपेश चट्ठा, पटियाला
राज्य में बिजली की सप्लाई व खरीद के अलावा उत्पादन के प्रबंध का जिम्मा रखने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन पावरकाम को राज्य के गिदड़बाहा क्षेत्र में लगने वाले पावरप्लांट पर भी तलवार लटक रही है।
 केंद्र सरकार के संस्थान नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन की ओर से स्थापित किए जाने वाले इस प्लांट पर जहां एक ओर आंदोलन की छाया मंडराने लगी है वहीं पंजाब सरकार और एनटीपीसी के बीच हुए समझौते को एक साल होने को है और निर्माण की दिशा में एक इंच भी प्रगति नहीं हुई है।

पावरकाम के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि बीते साल अक्टूबर में एनटीपीसी के साथ 15 हजार करोड़ रूपये की राज्य की सबसे बड़ी बिजली परियोजना के समझौते के तहत राज्य ने केवल जमीन का अधिग्रहण करना था और प्लांट के चालू होने पर बिजली की खरीद करनी थी। इसके अलावा सभी निर्माण कार्य और प्लांट के लिए रेल व कोल लिंकेज की क्लीयरेंस के अलावा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से स्वयं मंजूरी लेनी थी। सूत्र कहते हैं कि इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

जबकि इंजीनियर्स एसोसिएशन के प्रदेश प्रधान इंजी. बेदी कहते हैं कि वे पहले दिन से कह रहे हैं कि प्रदेश के पास प्लांट स्थापित करने की पूरी विशेषज्ञता है और पूर्व में बिजली बोर्ड ने प्लांट लगाए भी हैं। ऐसे में प्लांट एनटीपीसी के हवाले किए जाने का कोई तुक नहीं है। वैसे भी 37 हजार मेगावाट उत्पादन क्षमता वाले एनटीपीसी ने पिछले साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच 40 हजार मेगावाट और उत्पादन के समझौते कर लिए जिन्हें सिरे चढ़ाना संभव नहीं है। एनटीपीसी ने अपनी क्षमता से ज्यादा सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर कर रखे हैं।
वहीं उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की ओर से एनटीपीसी के साइन किए गए एमओयू को रद्द करने के दिए गए वक्तव्य पर पावरकाम के अधिकारी खामोश हैं। नाम ना प्रकाशित करने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि पावरकाम के कागजों में अभी प्लांट पर काम चल रहा है, पर कई तरह की क्लीयरेंस अभी कंपनी को नहीं मिली है, चाहे ये केंद्र का ही संस्थान है।

दिलचस्प है कि चुनावी साल में जमीन को लेकर हर ओर तेज हो रहे किसान आंदोलनों से सहमे अकाली थिंक टैंक को समझ नहीं आ रहा कि तीन गांवों की 2350 एकड़ जमीन में से आधी एक साल पहले तक सैम की मार तले थी, पर अब दाम लगातार बढ़ रहे हैं। आधी जमीन का अधिग्रहण करने के बाद राज्य सरकार दोबारा दूसरे चरण में शेष आधी जमीन पुराने दाम पर खरीदने की स्थिति में नहीं है। और एनटीपीसी को अभी से दाम ज्यादा लगने लगे हैं।

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