भूपेश चट्ठा, पटियाला
विधानसभा चुनावों में 14 महीनों से भी कम समय शेष रहते सरगर्म हुई विरासती शहर की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हुए पटियाला पर अपना दावा ठोक दिया है। शहर की राजनीति में एक कोने पर खड़ी रहने वाली जिला शहरी भाजपा ने फिलहाल अपने ही प्रदेश आलाकमान के सामने पटियाला को रखा है कि प्रदेश स्तर पर शिरोमणि अकाली दल के साथ विधानसभा सीटों को लेकर होने वाली बातचीत में पटियाला को भी लाया जाए। याद रहे क्षेत्रों की सीमाओं के पुर्ननिधारण के बाद जिले में विधानसभा क्षेत्रों की कुल संख्या में तो बदलाव नहीं आया पर शहर पटियाला के दो क्षेत्र हो गए हैं।
प्रदेश कमान के पास रखे तर्को में कहा गया है कि पटियाला हिंदू बहुल क्षेत्र है। पर कोटे वाले क्षेत्र में आबादी का अनुपात हिंदुओं के पक्ष में 68 फीसदी और सिखों की आबादी 32 फीसदी है। कुछ ऐसे ही हालात पटियाला ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के बन पड़े हैं। यहां अनुपात 60 और 40 फीसदी का है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पटियाला टू अथवा ग्रामीण में बहावलपुर बिरादरी बड़ी संख्या में है, मोटे तौर पर ये बिरादरी अकालियों को तो नापसंद करती है पर भाजपा के साथ केंद्रीय स्तर पर जुड़ती रही है। भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी और जिला स्तर पर राज खुराना का प्रभाव पक्ष में काम आ सकता है।
समीकरणों के आइने में बताया गया कि भाजपा यदि अकाली दल के समर्थन से मैदान में उतरती है तो गठबंधन के हालात कहीं अधिक बेहतर होंगे। बाहरी कालोनियों में ग्रामीण क्षेत्रों से आकर बसा टक्साली सिख मतदाता यदि गठबंधन का समर्थन कर देता है तो काग्रेस को किनारे लगाया जा सकता है।
पटियाला शहरी सीट का इतिहास भी भाजपा के पक्ष में ही जाता है और अकालियों की यहां से हो रही लगातार हार का बढ़ रहा अंतर भाजपा के दावे को मजबूत करता है। 1977 में तत्कालीन जनता पार्टी से बागी होकर लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के समर्थन से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़े शंभू प्रसाद अकाली दल की हवा में मात्र 243 वोटों से हारे और काग्रेस के प्रेमचंद गुप्ता तीसरे नंबर पर रहे। इसके अगले चुनाव में शंभू प्रसाद को भाजपा ने टिकट दिया तो अकाली दल के विधायक रहे सरदारा सिंह कोहली तीसरे नंबर पर जा पहुंचे।
दिलचस्प है कि कांग्रेस से तब विधायक बने ब्रहम महिंदरा अब पटियाला शहरी से चुनाव नहीं लड़ रहे। संभवत: वे समाना के बाद पटियाला ग्रामीण से चुनाव लडें़, ऐसे में इतिहास में हुआ मुकाबला एक बार फिर दोहराया जा सकता है।
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