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Friday, 18 May 2012

अकाली दल से नेता पुत्र-पत्नियां अभी से मेयर दौड़ में, Long queue for Mayer, before M.C election


निगम चुनाव: गठबंधन की गतिविधियां
-अकाली दल के हिस्से के 35 वार्ड में 217 दावेदार
भूपेश चट्ठा पटियाला
प्रदेश में शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की सरकार सत्ता पर काबिज है और विधान सभा चुनावों के बाद पंजाब में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों का 'अनुभवÓ ध्यान में रखते हुए इस बार कम से कम अकाली दल का नेताओं के नगर निगम के चुनाव में पार्षद बनने से पहले ही मेयर पद की दौड़ में नेता पुत्र-पत्नियां शामिल हो गई हैं।
पार्टी में चल रही लाबिंग पर सूत्र बताते हैं कि जिस तरह से पिछली बार पूर्व केबिनेट मंत्री सुरजीत सिंह कोहली विधान सभा चुनाव हारने के बावजूद अपने पुत्र अजीतपाल सिंह कोहली को मेयर बनाने में कामयाब रहे। ठीक उसी फार्मूले को गुरु मंत्र की तरह अपनाते हुए पार्षद बनने से पहले ही मेयर की रेस में दर्जन भर ऐसे ही नाम आगे आए हैं। जिन्होंने पटियाला शहर के कुल 50 वार्डों में से अकाली दल के हिस्से में आने वाले 35 वार्डों से टिकट की उम्मीदवारी जताने के साथ ही मेयर के लिए ताल ठोकनी शुरु कर दी है। दिलचस्प है कि विधान सभा चुनाव में पिता की लगभग पूरी कमान संभाल हार गए अजीतपाल सिंह कोहली भी खुद को इस दौड़ में जैसे तैसे रखे हुए हैं।
पार्टी में उभर कर आगे आ रहे नामों में पिछड़ी श्रेणी आयोग के चेयरमैन व शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान रह चुके प्रो. कृपाल सिंह बडूंगर के पुत्र शमशेर सिंह बडूंगर, केबिनेट मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा के पुत्र सुखी रखड़ा, पूर्व मंत्री हरमेल सिंह टोहड़ा के पुत्र व पंथ रत्न स्व. जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा के नाती हरिंदर पाल सिंह टोहड़ा, जिला जत्थेदार व इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के चेयरमैन इंद्र मोहन सिंह बजाज के पुत्र अमरिंदर सिंह बजाज, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य छच्जू राम सोफत की पत्नि और कर्मचारी वेलफेयर बोर्ड के प्रधान सुरिंदर पहलवान की पत्नि और मजीठिया परिवार से सीधे संपर्क रखने वाले हरपाल जुनेजा के नाम आगे हैं। इनमें पार्षद जसपाल प्रधान व उनके पुत्र के अलावा तीन बार के पार्षद सुखमिंदर पाल सिंह मिंटा की पत्नि का नाम शामिल किया जा सकता है।
पार्टी के ही एक वरिष्ठ नेता बताते हैं टिकट के लिए आवेदन करने वाले कुल 217 दावेदारों में और कितने खुद को इस श्रेणी में रखते हैं कुछ नहीं कहा जा सकता। पहली बार अकाली दल में कार्यकर्ता कम और नेताओं की संख्या बढ़ी है। पार्टी के लिए किसने? क्या किया? इसका अनुमान जिले में विधायकों की संख्या से लगाया जा सकता है।  


भाजपा के 15 वार्ड में 120 दावेदार

गठबंधन में से भाजपा के हिस्से में आए 15 वार्डों में कुल 120 दावेदारों ने टिकट के लिए अपनी उम्मीदवारी जताई है। जिला प्रधान अरूण गुप्ता ने बताया कि आवेदन करने वालों में सभी पार्षद शामिल हैं। चुने गए उम्मीदवारों के नामों की घोषणा 22 मई को प्रदेश प्रधान अश्वनी शर्मा चंडीगढ़ में प्रदेश कार्यालय से करेंगे।

Thursday, 17 March 2011

भाजपा विधायक ईसाइयों की पैरवी में? batala, bjp, politics, riots


-पत्र लिख हिंदू वेलफेयर बोर्ड से कहा मामला वापिस लें
-आरटीआई से हुआ खुलासा किसी भी मामले में अब तक कोई ग्रिफतारी नहीं हुई
भूपेश चट्ठा, पटियाला
आज से करीब एक साल एक महीना पहले अमेरिका में ईसा मसीह के चित्र का अपमान करने पर पंजाब के बटाला शहर में दो समुदायों के बीच भड़के दंगों में सार्वजनिक व निजी संपति को हुए लाखों के नुकसान और पांच मामलों में नामजद एफआईआर होने के बावजूद आज तक किसी की ग्रिफतारी नहीं हुई है और भारतीय जनता पार्टी के बटाला से विधायक दंगाईयों के पक्ष में आ गए है।

'दैनिक जागरण' के पास मौजूद पत्र में भाजपा के विधायक जगदीश राज साहनी की ओर से बटाला को बेहद संवेदनशील शहर बता कर कहा गया है कि शहर के भीतरी हिस्सा हिंदु बहुल है तो बाहरी ईसाई बहुल है। उक्त घटना के बाद दोनों समुदाय शांति से रह रहे है। बटाला का जनप्रतिनिधि होने के नाते हिंदु वेलफेयर बोर्ड से प्रार्थना की गई है कि वो भविष्य के सोहार्द को ध्यान में रखते हुए मामले को वापिस ले लें। यह भी लिखा है कि दंगाइयों की ओर सार्वजनिक प्रापर्टी को नुकसान पहुंचाए जानी की जांच चल रही है जब तक निपट ना जाए तब तक कानूनी कारवाई ना की जाए।

उधर हिंदुओं के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे बोर्ड के पंजाब के चेयरमैन महंत रविकांत की ओर से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए है। बटाला सिटी थाने में बीते साल 20 फरवरी को दर्ज मामले में कोई गवाही नहीं, कोई ग्रिफतार नही। ऐसे ही डेरा बाबा नानक थाने में सही दोष नामजद ना होने के चलते चालान ही तैयार नहीं हुआ। घणीए के बांगर थाने में दर्ज 14 नंबर एफआईआर के भी हालात ऐसे ही है। जबकि यहां 15 नंबर एफआईआर में दोषियों की तलाश जारी है।महंत रविकांत का कहना है कि सरकार ने एक ओर चर्च को हुए मामूली नुकसान पर लाखों खर्च कर पूर्ण जिर्णोद्वार करवा दिया, ईसाइयों को मुआवजे बांटे गए जबकि निजी प्रापर्टी का नुकसान झेलने वाले एक भी हिंदु को मुआवजा नहीं मिला है।

वहीं जगदीश राज साहनी का कहना है कि सारा आंदोलन उनके प्रयास से समाप्त हुआ था और अब उनका फर्ज बनता है कि आगे भी सदभाव बना रहे। रही बात पुलिस की ओर से मामले दर्ज किए जाने की तो पुलिस ने निर्दोष लोगों को ही फंसाया है। प्रापर्टी नुकसान पर वे कहते है कि उनके पादरी ने माफी तक तो मांग ली है। साथ ही विधायक कहते है कि वे भाजपा से जरूर है पर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते है और भाजपा के दरवाजे हिंदुओं के अलावा अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी खुले है।

Friday, 3 December 2010

ਭਾਜਪਾ ਨੇ ਠੋਕਿਆ ਪਟਿਆਲਾ ਸੀਟ ਉੱਤੇ ਦਾਅਵਾ

ਭੂਪੇਸ਼ ਚੱਠਾ , ਪਟਿਆਲਾ
ਵਿਧਾਨਸਭਾ ਚੁਨਾਵਾਂ ਵਿੱਚ 14 ਮਹੀਨੀਆਂ ਤੋਂ ਵੀ ਘੱਟ ਸਮਾਂ ਬਾਕੀ ਰਹਿੰਦੇ ਜੋਸ਼ੀਲਾ ਹੋਈ ਵਿਰਾਸਤੀ ਸ਼ਹਿਰ ਦੀ ਰਾਜਨੀਤੀ ਵਿੱਚ ਭਾਰਤੀਯ ਜਨਤਾ ਪਾਰਟੀ ਨੇ ਵੀ ਆਪਣੀ ਹਾਜਰੀ ਦਰਜ ਕਰਵਾਂਦੇ ਹੋਏ ਪਟਿਆਲਾ ਉੱਤੇ ਆਪਣਾ ਦਾਅਵਾ ਠੋਕ ਦਿੱਤਾ ਹੈ । ਸ਼ਹਿਰ ਦੀ ਰਾਜਨੀਤੀ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਕੋਨੇ ਉੱਤੇ ਖੜੀ ਰਹਿਣ ਵਾਲੀ ਜਿਲਾ ਸ਼ਹਿਰੀ ਭਾਜਪਾ ਨੇ ਫਿਲਹਾਲ ਆਪਣੇ ਹੀ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਆਲਾਕਮਾਨ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਪਟਿਆਲਾ ਨੂੰ ਰੱਖਿਆ ਹੈ ਕਿ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਪੱਧਰ ਉੱਤੇ ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਦੇ ਨਾਲ ਵਿਧਾਨਸਭਾ ਸੀਟਾਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਗੱਲਬਾਤ ਵਿੱਚ ਪਟਿਆਲਾ ਨੂੰ ਵੀ ਲਿਆਇਆ ਜਾਵੇ । ਯਾਦ ਰਹੇ ਖੇਤਰਾਂ ਦੀਆਂ ਸੀਮਾਵਾਂ ਦੇ ਪੁਰਨਨਿਧਾਰਣ ਦੇ ਬਾਅਦ ਜਿਲ੍ਹੇ ਵਿੱਚ ਵਿਧਾਨਸਭਾ ਖੇਤਰਾਂ ਦੀ ਕੁਲ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਤਾਂ ਬਦਲਾਵ ਨਹੀਂ ਆਇਆ ਉੱਤੇ ਸ਼ਹਿਰ ਪਟਿਆਲੇ ਦੇ ਦੋ ਖੇਤਰ ਹੋ ਗਏ ਹਨ ।
ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਕਮਾਨ ਦੇ ਕੋਲ ਰੱਖੇ ਤਰਕਾਂ ਵਿੱਚ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ ਕਿ ਪਟਿਆਲਾ ਹਿੰਦੂ ਬਹੁਲ ਖੇਤਰ ਹੈ । ਉੱਤੇ ਕੋਟੇ ਵਾਲੇ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਆਬਾਦੀ ਦਾ ਅਨਪਾਤਹਿੰਦੁਵਾਂਦੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ 68 ਫੀਸਦੀ ਹੋਰ ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਆਬਾਦੀ 32 ਫੀਸਦੀ ਹੈ । ਕੁੱਝ ਇੰਜ ਹੀ ਹਾਲਾਤ ਪਟਿਆਲਾ ਪੇਂਡੂ ਵਿਧਾਨਸਭਾ ਖੇਤਰ ਦੇ ਬੰਨ ਪਏ ਹਨ । ਇੱਥੇ ਅਨਪਾਤ 60 ਅਤੇ 40 ਫੀਸਦੀ ਦਾ ਹੈ । ਪਾਰਟੀ ਨੇਤਾਵਾਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਪਟਿਆਲਾ ਟੂ ਅਤੇ ਪੇਂਡੂ ਵਿੱਚ ਬਹਾਵਲਪੁਰ ਬਰਾਦਰੀ ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਹੈ , ਮੋਟੇ ਤੌਰ ਉੱਤੇ ਇਹ ਬਰਾਦਰੀ ਅਕਾਲੀਆਂ ਨੂੰ ਤਾਂ ਨਾਪਸੰਦ ਕਰਦੀ ਹੈ ਉੱਤੇ ਭਾਜਪਾ ਦੇ ਨਾਲ ਕੇਂਦਰੀ ਪੱਧਰ ਉੱਤੇ ਜੁੜਤੀ ਰਹੀ ਹੈ । ਭਾਜਪਾ ਦੇ ਸਿਖਰ ਨੇਤਾ ਲਾਲ ਕ੍ਰਿਸ਼ਣ ਆਡਵਾਣੀ ਅਤੇ ਜਿਲਾ ਪੱਧਰ ਉੱਤੇ ਰਾਜ ਖੁਰਾਨਾ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਕੰਮ ਆ ਸਕਦਾ ਹੈ ।
ਸਮੀਕਰਣਾਂ ਦੇ ਆਇਣ ਵਿੱਚ ਦੱਸਿਆ ਗਿਆ ਕਿ ਭਾਜਪਾ ਜੇਕਰ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਦੇ ਸਮਰਥਨ ਤੋਂ ਮੈਦਾਨ ਵਿੱਚ ਉਤਰਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਗੰਢ-ਜੋੜ ਦੇ ਹਾਲਾਤ ਕਿਤੇ ਜਿਆਦਾ ਬਿਹਤਰ ਹੋਣਗੇ । ਬਾਹਰੀ ਕਾਲੋਨੀਆਂ ਵਿੱਚ ਪੇਂਡੂ ਖੇਤਰਾਂ ਨਾਲ ਆਕੇ ਬਸਿਆ ਟਕਸਾਲੀ ਸਿੱਖ ਮਤਦਾਤਾ ਜੇਕਰ ਗੰਢ-ਜੋੜ ਦਾ ਸਮਰਥਨ ਕਰ ਦਿੰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਕਾਗਰੇਸ ਨੂੰ ਕੰਡੇ ਲਗਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ।
ਪਟਿਆਲਾ ਸ਼ਹਿਰੀ ਸੀਟ ਦਾ ਇਤਹਾਸ ਵੀ ਭਾਜਪਾ ਦੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਹੀ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਅਕਾਲੀਆਂ ਦੀ ਇੱਥੋਂ ਹੋ ਰਹੀ ਲਗਾਤਾਰ ਹਾਰ ਦਾ ਵੱਧ ਰਿਹਾ ਅੰਤਰ ਭਾਜਪਾ ਦੇ ਦਾਵੇ ਨੂੰ ਮਜਬੂਤ ਕਰਦਾ ਹੈ । 1977 ਵਿੱਚ ਤਤਕਾਲੀਨ ਜਨਤਾ ਪਾਰਟੀ ਨਾਲ ਬਾਗੀ ਹੋਕੇ ਲੇਕਿਨ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਆਪ ਸੇਵਕ ਸੰਘ ਦੇ ਸਮਰਥਨ ਤੋਂ ਨਿਰਦਲੀਏ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਚੋਣ ਲੜੇ ਸ਼ੰਭੂ ਪ੍ਰਸਾਦ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਦੀ ਹਵਾ ਵਿੱਚ ਸਿਰਫ 243 ਵੋਟਾਂ ਤੋਂ ਹਾਰੇ ਅਤੇ ਕਾਗਰੇਸ ਦੇ ਪ੍ਰੇਮਚੰਦ ਗੁਪਤਾ ਤੀਸਰੇ ਨੰਬਰ ਉੱਤੇ ਰਹੇ । ਇਸਦੇ ਅਗਲੇ ਚੋਣ ਵਿੱਚ ਸ਼ੰਭੂ ਪ੍ਰਸਾਦ ਨੂੰ ਭਾਜਪਾ ਨੇ ਟਿਕਟ ਦਿੱਤਾ ਤਾਂ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਦੇ ਵਿਧਾਇਕ ਰਹੇ ਸਰਦਾਰਾ ਸਿੰਘ ਕੋਹਲੀ ਤੀਸਰੇ ਨੰਬਰ ਉੱਤੇ ਜਾ ਪੁੱਜੇ ।
ਦਿਲਚਸਪ ਹੈ ਕਿ ਕਾਂਗਰਸ ਤੋਂ ਤੱਦ ਵਿਧਾਇਕ ਬਣੇ ਬਰਹਮ ਮਹਿੰਦਰਾ ਹੁਣ ਪਟਿਆਲਾ ਸ਼ਹਿਰੀ ਤੋਂ ਚੋਣ ਨਹੀਂ ਲੜ ਰਹੇ । ਸੰਭਵਤ : ਉਹ ਭਰਨੇ ਦੇ ਬਾਅਦ ਪਟਿਆਲਾ ਪੇਂਡੂ ਤੋਂ ਚੋਣ ਲਡੇਂ , ਅਜਿਹੇ ਵਿੱਚ ਇਤਹਾਸ ਵਿੱਚ ਹੋਇਆ ਮੁਕਾਬਲਾ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਦੁਹਰਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ

Wednesday, 1 December 2010

भाजपा ने ठोका पटियाला सीट पर दावा

भूपेश चट्ठा, पटियाला
विधानसभा चुनावों में 14 महीनों से भी कम समय शेष रहते सरगर्म हुई विरासती शहर की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हुए पटियाला पर अपना दावा ठोक दिया है। शहर की राजनीति में एक कोने पर खड़ी रहने वाली जिला शहरी भाजपा ने फिलहाल अपने ही प्रदेश आलाकमान के सामने पटियाला को रखा है कि प्रदेश स्तर पर शिरोमणि अकाली दल के साथ विधानसभा सीटों को लेकर होने वाली बातचीत में पटियाला को भी लाया जाए। याद रहे क्षेत्रों की सीमाओं के पुर्ननिधारण के बाद जिले में विधानसभा क्षेत्रों की कुल संख्या में तो बदलाव नहीं आया पर शहर पटियाला के दो क्षेत्र हो गए हैं।
प्रदेश कमान के पास रखे तर्को में कहा गया है कि पटियाला हिंदू बहुल क्षेत्र है। पर कोटे वाले क्षेत्र में आबादी का अनुपात हिंदुओं के पक्ष में 68 फीसदी और सिखों की आबादी 32 फीसदी है। कुछ ऐसे ही हालात पटियाला ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के बन पड़े हैं। यहां अनुपात 60 और 40 फीसदी का है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पटियाला टू अथवा ग्रामीण में बहावलपुर बिरादरी बड़ी संख्या में है, मोटे तौर पर ये बिरादरी अकालियों को तो नापसंद करती है पर भाजपा के साथ केंद्रीय स्तर पर जुड़ती रही है। भाजपा के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी और जिला स्तर पर राज खुराना का प्रभाव पक्ष में काम आ सकता है।
समीकरणों के आइने में बताया गया कि भाजपा यदि अकाली दल के समर्थन से मैदान में उतरती है तो गठबंधन के हालात कहीं अधिक बेहतर होंगे। बाहरी कालोनियों में ग्रामीण क्षेत्रों से आकर बसा टक्साली सिख मतदाता यदि गठबंधन का समर्थन कर देता है तो काग्रेस को किनारे लगाया जा सकता है।
पटियाला शहरी सीट का इतिहास भी भाजपा के पक्ष में ही जाता है और अकालियों की यहां से हो रही लगातार हार का बढ़ रहा अंतर भाजपा के दावे को मजबूत करता है। 1977 में तत्कालीन जनता पार्टी से बागी होकर लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के समर्थन से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़े शंभू प्रसाद अकाली दल की हवा में मात्र 243 वोटों से हारे और काग्रेस के प्रेमचंद गुप्ता तीसरे नंबर पर रहे। इसके अगले चुनाव में शंभू प्रसाद को भाजपा ने टिकट दिया तो अकाली दल के विधायक रहे सरदारा सिंह कोहली तीसरे नंबर पर जा पहुंचे।
दिलचस्प है कि कांग्रेस से तब विधायक बने ब्रहम महिंदरा अब पटियाला शहरी से चुनाव नहीं लड़ रहे। संभवत: वे समाना के बाद पटियाला ग्रामीण से चुनाव लडें़, ऐसे में इतिहास में हुआ मुकाबला एक बार फिर दोहराया जा सकता है।