-'सोना देने वाले की जात नहीं पूछी जाती, ये पवित्र ही होता हैÓ
-बाढ़ पीडि़तों को ही दिया रोजगार बाढ़ लाने वाली नहर ने
भूपेश चट्ठा, धर्मेहड़ी, पटियाला
कहते हैं कि सोना देने वाले की जात नहीं पूछी जाती ये पवित्र ही होता है और रहता भी है। पंजाब-हरियाणा के बीच पानी की लड़ाई में जहां दोनों राज्यों की सरकारों के बीच एक दूसरे को गलत साबित करने और नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्धा चल रही है और विशेष रूप से पंजाब को हांसी बुटाना नहर से कड़ी आपत्ति है, लेकिन नाटकीय ढ़ंग से यह भी सही है कि इस नहर को बनाने वाले हाथ चाहे मिस्त्री के हों या मजदूर के दोनों में ही पंजाबियों के हैं। अलबत्ता ठेकेदार जरूर हरियाणा का है।
'दैनिक जागरणÓ के समक्ष ये लोग अपना मुंह खोल नाम बताने की बात करना तो दूर कैमरा हाथ से उपर होते ही पांव पकडऩे को हो जाते हैं। कहते हैं कि रोजगार मिला है... वो भी गांव के पास क्यों छीन रहे हो?... मजदूरी कर लेने दो। जबकि पंजाब की सीमा में किंतु नहर के सबसे करीबी गांव धर्मेहड़ी के गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि आप मजदूर व मिस्त्रीयों की बात करते हो इस नहर की रात में चौकीदारी करने के लिए भी पंजाब के ही लोगों को नौकरी पर रखा गया है। वे बताते है कि उनका 'सीरीÓ रामा भी इनके रात में डयूटी पर जाता रहा है। छह हजार रूपये महीना की बंधी रकम थी पर एक दिन रात में सांप काट गया, फिर तबीयत खराब रहने लगी तो छोड़ दिया। अब भी गांव के ही कुछ लोग रात में नौकरी पर जाते है। याद रहे कि नहर पर पिछली बाढ़ में टटियाना गांव के पास जिस स्थान पर नहर टूटी थी उससे धर्मेहड़ी को ही सबसे ज्यादा राहत मिली थी आरोप ये भी लगे की इसी गांव के लोगों ने 'कार्रवाईÓ की थी।
जानकार बताते है कि पहले नहर का निर्माण, फिर साईफन में से मिट्टी निकालने और अब दीवार का निर्माण करने में जिन बड़े ट्रकों, टिपरों की सेवा हरियाणा के ड्रेनेज विभाग की ओर से ली जा रही है, उनमें से कई पटियाला जिले में ही तैनात रहे एक बड़े पुलिस अधिकारी के रिश्तेदार के हैं।
नहर के बाद अब कंकरीट की दीवार बनाने में मजदूर मिस्त्रीयों को रोजगार मिला है, उनमें से ज्यादातर की साइकलें पंजाब के नवां गांव से ही रोज सुबह निकलती हैं। इसी गांव के गुरविंदर सिंह औलख कहते उनका ड्राईवर भी भरे सीजन में ट्रैक्टर छोड़ गया था। नहर पर दिहाड़ी ठीक दी जा रही है मौसम ठीक हो तो ओवर टाइम भी मिलता है। आधा दिन भी काम हो जाए तो पैसे नहीं कटते। ऐसे में हर कोई जाना चाहता है।
दिलचस्प है कि पंजाब के सिंचाई मंत्री के दौरे और मीडिया नहर और दीवार के विवाद की खबरें प्रकाशित होने के बाद नए मजदूर लेने बंद कर दिए गए हैं। हालांकि बाढ़ पीडि़तों को ही रोजगार देने वाली नहर कब बाढ़ लाएगी और नहर से हुई कमाई कितनी बच पाएगी इस पर दबी जुबां से एक मजदूर कहता है कि हमारे पास बाढ़ में खोने के नाम पर इक्का दुक्का पशु हैं या फिर कोठा है। यही हमारी पूंजी है। क्या बचता है? और क्या खो जाता है? ये सब तो कुदरत पर निर्भर करता है, फिलहाल जिंदगी अच्छी चल रही है।