- जलाभिषेक सम्पन्न, रुद्राभिषेक जारी रहेंगे
- सावन में ही शिव ने किया था विषपान, अग्नि शांत करने कांवडिय़े लाते हैं गंगाजल
- निवास के करीबी मंदिरों में भी जाग जाते हैं शिवालय
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
सावन की त्रयोदशी पर वीरवार को शिवलिंग पर गंगा के पवित्र जल को अर्पित कर कांवडिय़ों ने जहां पुण्य कमाया है, वहीं शिव भूमि से दूर दराज के शिवालयों में भगवान शिव को जगा आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले शिवभक्तों के लिए भी पाप से मुक्ति प्राप्ति के रास्ते खोल दिए हैं।
भगवान शिव का सावन में जलाभिषेक करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण व अंतिम दिन पर शहर के हर शिवालय में भक्तों का तांता लगा रहा। मंदिरों में क्षेत्र के कांवडिय़ों के आने से न केवल उनके परिजनों मिलने वालों में खुशी की लहर थी, अपितु शिव भक्त हर की पौड़ी हरिद्वार से लाए गए गंगा जल के उनके करीबी मंदिर में आने से प्रसन्न रहे। राजपुरा रोड स्थित तुंगनाथ मंदिर से लेकर किला चौंक के शिवालय में श्रद्धापूर्वक जलाभिषेक किया गया है।
वहीं त्रयोदशी के महत्व पर महंत रवि कांत जी मुनी कहते हैं कि शास्त्रों अनुसार गौमुख से गंगा जल लेकर पहले नीलकंठ में जलाभिषेक करने और फिर रास्ते के मंदिरों में जलाभिषेक करते हुए त्रयोदशी के दिन उसी मंदिर में आ कर जलाभिषेक करने का प्रावधान है जहां से आपने यात्रा आरंभ की होती है। लेकिन कालांतर में हरिद्वार हर की पौड़ी से जल ला कर जलाभिषेक करने का चलन हो गया है। मंहत कहते हैं कि शिव ने सावन मास में ही विष पान किया था और विष की उस अग्नि को शांत करने के लिए प्रतिमा पर लगातार जल धारा प्रवाहित की जाती है। सावन में इसका महत्व सर्वाधिक होता है। त्रियोदशी को हालांकि कांवड़ से लाए गए गंगा जल का जलाभिषेक करने का अंतिम दिन होता है, लेकिन रुद्राभिषेक करने का क्रम जारी रहता है। वे बताते हैं कि इन दिनों में शहर में प्राचीन वामन अवतार मंदिर परिसर में स्थित पातालेश्वर मंदिर में काशी से विशेष रूप से बुलाए गए आचार्य ये रुद्राभिषेक पूरे विधि विधान से करवा रहे हैं। जिसका लाभ लिया जा सकता है।