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Sunday, 20 November 2011

सोने के रखवालों का शरीर हुआ मिट्टी, food, storage, grain, employee, fci, wheat,

-एफसीआई के गोदामों में काम करने वाले मजदूरों-कर्मियों का स्नायू तंत्र प्रभावित
-धरती पर, गेहूं की बोरी में, बोरियों के उपर, हवा में एयर चार्जिंग के लिए छिड़के रसायनों का असर

-मैलाथीन महीने में दो बार, डीडीवीपी 21 दिनों पर, डेल्टा मैथलीन तीन महीने पर और सल्फास सदा के लिए

भूपेश चट्ठा, पटियाला

अनाज के गोदामों में रखे गए सोने को संजोए रखने होने वाले रसायनों के छिड़काव ने इसके रखवालों का शरीर मिट्टी का बना दिया है। फूड कारपोरेशन आफ इंडिया सहित हर खरीद एजेंसी के गोदामों में रखी गई गेहूं से होने वाले प्रभाव से अंजान कोई नहीं है पर ईलाज के नाम पर भी च्यादा कुछ नहीं है।

गोदामों में रखी गई बोरियों में दवा डालने के अलावा इसकी जमीन व हवा को भी 'सुरक्षितÓ रखने के चक्कर में पूरा वातावरण जहरीला किया जाता है। एफसीआई के वीके बत्ता बताते हैं कि बोरी रखते ही इस पर डेल्टा मैथलीन का स्प्रे कर दिया जाता है। हर तीन महीने पर यह प्रक्रिया दोहराई जाती है। इसके तुरंत बाद खाली जगह में डीडीवीपी का छिड़काव होता है, एयर चार्जिंग के नाम पर किसी पतंगे को भी ना फटकने देने वाला यह स्प्रे 21 दिनों के अंतराल पर रिपीट होता है। हवा में उड़ती 'भुंडीÓ, 'भमक्कड़Ó इस वायु के संपर्क में आते ही जमीन पर ऐसे गिरते हैं मानों किसी ने एंटी एयरक्राफ्ट गन से गिराया हो।

इन सबके बावजूद यदि कीड़ा लगने की संभावना होने पर एल्मोनियम फास्फेट का प्रयोग होता है। ये वो गेहूं की बदनाम गोली है जिसे सल्फास कहते हैं और पंजाब में खुदकुशी करने वालों में प्रचलित रही है। वीके बत्ता बताते हैं कि इससे बीमारी की बात ना करें ये तो जान लेती है, गोली पानी के संपर्क में आते ही जहरीली गैसें छोड़ती है।

बात यहीं समाप्त नहीं धरती के नीचे से कार्रवाई करने वाले दीमक अथवा दाने में पैदा होने वाली 'सुसरीÓ के लिए मैलाथीन का स्प्रे महीने में दो बार जरूरी है, तभी गेहूं को बचाया जा सकता है कीट पतंगों और कीड़े मकौड़ों की जान लेने वाले ये रसायन इंसानों के लिए भी कम घातक नहीं हैं।

इसी क्रम में जतिंदरवीर सिंह कहते हैं कि कर्मियों को नियमित खांसी आम है, दमा और हाईपर टेंशन से शायद ही कोई बचा हो, लंबा समय रहने पर अस्थमा व सांस के रोग घेर लेते हैं। सरकार के पास दस्ताने व मास्क देने से च्यादा कुछ नहीं है। जबकि जालंधर जैसे मुख्य शहरों को छोड़ दें तो अन्य जगहों पर ऐसे अस्पतालों से ही कोई समझौते नहीं किए गए हैं जिसके तहत कर्मी जा कर चिक्तिसा जांच करवा सकें।

वहीं कम्यूनिटी मेडिसीन में एमडी और एपिडमोलोजिस्ट डा. अमर सिंह आजाद कहते हैं कि इन रसायनों से इंसान की बीमारी से लडऩे की क्षमता ही खत्म हो जाती है। जुकाम से लेकर कैंसर तक की हर बीमारी की पकड़ में ऐसा व्यक्ति जल्दी आता है। प्राकृति से हमें तोहफे में मिले इम्यून सिस्टम में कमजोरी आती जाती है। जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण हो जाती है।

Wednesday, 23 February 2011

...पर अभी और सड़ेगा अनाज

पिछले साल 94 लाख टन था इस साल एक अप्रैल को 87.4 टन होगा

-80 लाख टन भंडारण क्षमता बढ़ानी थी बढ़ी 4.97 लाख

-दोबारा नई नीति के तहत टेंडर आएंगे: एफसीआई

भूपेश चट्ठा, पटियाला

वर्ष 2008-09 का गेहूं पंजाब में पड़ा है, 2009-10 के गेहूं के साथ चावल और धान भी अभी तक यहीं है, और एक महीने बाद करीब 124 लाख टन गेहूं की फसल आ जानी है, लेकिन दिलचस्प है कि देश भर में जहां मंहगाई का कुचक्र चल रहा है वहीं पंजाब में अनाज को सडऩे से रोकने के उपाय करने की दिशा में रेंगने की गति से 'उपलब्धीÓ हासिल की गई है। ऐसे में आम आदमी के नाम खरीदा गया अनाज अभी और सड़ेगा और करदाता इसका भुगतान करेगा।

फूड कारपोरेशन आफ इंडिया और पंजाब के खाद्य एंव आपूर्ति विभाग के अधिकारियों ने पिछले साल किए एक संयुक्त अध्ययन में पाया कि राज्य में 80 लाख टन भंडारण क्षमता बढ़ाने जरूरत है। हालांकि राज्य में 106 लाख टन कवर्ड स्टोरेज क्षमता है तो करीब 90 लाख टन खुले आसमान में भंडार करने की व्यवस्था है। याद रहे कि पिछले साल टेंडर प्रक्रिया शुरू होते ही पंजाब को 71 लाख टन भंडारण करने को कह दिया, यह हिस्सा एक बार फिर कम कर 50 लाख टन कर दिया गया। पर अब 63 स्थानों पर होने वाला नया भंडारण 14 स्थानों पर होगा वो भी मात्र 4.97 लाख टन।

वहीं एफसीआई के डीजीएम असीम छाबड़ा ने 'दैनिक जागरणÓ को बताया कि पंजाब में पिछले साल एक अप्रैल को गेहूं व धान का भंडारण 94 लाख था और इस साल ये कुछ कम हो कर 87.5 लाख टन रहेगा। राज्य से हर महीने 17 लाख टन अनाज देश के अन्य 16 राज्यों को भेजा जा रहा है। पंजाब में भंडारण क्षमता ना बढ़ाने के सवाल पर वे कहते है कि केंद्र की नीति के तहत पांच रूपये प्रति टन से अधिक पर अलाट नहीं किया जा सकता। अब दोबारा 33 लाख टन के लिए दस साल की अवधि के टेंडर निकालने की प्रक्रिया चलाई जाएगी। प्रदेश में 13 लाख टन क्षमता बढ़ी है।

राज्य में आए ज्यादातर टेंडर 6.10 रूपये की दर से थे। इस दर पर क्षमता 40 लाख टन और बढ़ जाती, राज्य की ओर से ऐसी मांग भी रखी गई पर केंद्रीय नीति ने इसकी इजाजत नहीं दी।

स्टोरेज क्षमता बढ़ाने के अलावा उपाय

राज्य की खरीद एजेंसियों की कोआर्डीनेशन कमेटी कहती है कि मामला एक राच्य या एक एजेंसी का नहीं है पूरे देश का है ऐसे में हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है। स्टोरेज के लिए गांव में ही किसान व सरपंच को इंतजाम करने के अलावा आढ़ती की सेवाएं ली जा सकती है। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य मासिक आधार पर तय हो जाए जिससे बिना कोई खर्च किए कालाबाजारी और जमाखोरी दोनों रूकेंगे भी और फायदा किसान को भी ले सकता है। बीपीएल और एपीएल परिवारों के लिए पहले हम गेहूं खरीद कर गोदाम में भेजते हैं फिर वहां से निकाल कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भेजा जाता है जबकि यह कार्य सीधा भी किया जा सकता है।

2007-08 में 2.90 लाख टन स्टोरेज क्षमता की प्लींथें तोड़ी
सरकार की एक नीति के तहत 2007-08 में वेयरहाउसिंग कारपोरेशन ने पंचायती जमीन पर बनी दो लाख टन स्टोरेज क्षमता की प्लींथें तोडऩे के आदेश जारी कर दिए। विभागीय सूत्र बताते हैं कि छहरटा में तो अगले ही साल 40 हजार टन क्षमता की प्लींथें फिर उसी स्थान पर बना भूल सुधार कर लिया गया। यही उपाय अब फिर किए जा रहे है, सूत्र बताते है कि प्रक्रिया शुरू की जा रही है।

Wednesday, 20 October 2010

धान खरीद में एफसीआई को दिलचस्पी नहीं

डैमेज चावल का प्रतिशत 4.75 से घटाकर तीन फीसदी करने से समस्या बढ़ी
चावल पर लेवी 75 फीसदी जबकि देर तक हुई बारिश से नमी काफी ज्यादा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की खरीद में इस साल एफसीआई की कोई दिलचस्पी नहीं दिख रही है। निजी व्यापारी भी खरीद करने में उतना उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। धान खरीद के आंकड़े चाहे जो कहें और राज्य सरकार की खरीद एजेंसियों ने कितना भी जोर लगा रखा हो पर आंकड़े बता रहे हैं कि स्थिति सुधर नहीं रही है। मंडियों में अब तक आई फसल और बीते साल के आंकड़ों की तुलना बताती है कि इस बार एफसीआई ने मात्र 537 टन धान की खरीद जिले की 97 मंडियों में की है जबकि बीते साल यह आंकड़ा 16 गुना ज्यादा था। इसी प्रकार निजी क्षेत्र अब तक कुल खरीद में 3823 टन का योगदान दिया है जबकि पिछले साल पांच गुना ज्यादा 17 हजार 820 टन धान इस वर्ग ने खरीदा था। धान की कुल खरीद में भी कमी आई है पर ये उतनी नहीं है। जिले में अब तक बीते साल के चार लाख 48 हजार टन के मुकाबले इस साल तीन लाख 45 हजार टन की खरीद की गई है। इस सारे घालमेल पर आढ़ती एसोसिएशन पंजाब के महासचिव व जिला प्रधान जसविंदर सिंह राणा कहते हैं कि निजी व्यापारी अथवा शैलर मिलर इस बार सहमा हुआ है। सरकार ने डैमेज चावल का प्रतिशत 4.75 से कम कर तीन फीसदी कर दिया है और चावल पर लेवी 75 फीसदी रखी गई है। जबकि इस साल देर तक बारिश होने की वजह से नमी काफी अधिक आ रही है। ऐसे में चावल का टुकड़ा और ज्यादा आने की संभावना है। इसके तीन फीसदी से नीचे रहने की कम ही संभावना है। इस पर लेवी के 75 फीसदी पर होने और एफसीआई के पास स्टोरेज की कमी शैलर मालिकों को साफ दिख रही है। ऐसे में उन्हें ये भी लग रहा है कि मिलिंग के बाद एफसीआई ने चावल रखने में आना कानी करने पर ब्याज का भार उन्हीं पर पड़ेगा। दिलचस्प है कि खु़द एफसीआई की ओर से कम खरीद किए जाने के पीछे प्रदेश के महासचिव जसविंदर सिंह राणा कहते हैं कि कुछ साल पहले तक धान की स्पेसिफिकेशन में नमी का हिस्सा 18 फीसदी हु़आ करता था जिसे कम कर 17 फीसदी कर दिया गया। एफसीआई को पता है कि इन शर्तो पर मिलिंग करवाना खासा मुश्किल है। सो खरीद नहीं कर रही। वे आरोप लगाते हैं कि एफसीआई की नीतियों में हर तरफ ब्लैकमेलिंग की गुंजाइश छोड़ी गई है और इस केंद्रीय एजेंसी को छोड़ कर हर कोई फंसता है। चाहे वो मिलर हो या आढ़ती या फिर राज्य की खरीद एजेंसी का अधिकारी-कर्मचारी।