-सड़े अनाज से बनेगी वोदका और शूगर फ्री व्हीस्की
-धान से भी बीयर बनाने का आया था विचार
-हिमाचल प्रदेश में सड़ते फलों का उपयोग हुआ है वाइन बनाने में
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के गोदामों और अनाज भंडारण के लिए खुले में बनाई गई प्लींथों पर रखे हुए अनाज का एक हिस्सा अब देश में गरीब का निवाला नहीं बन पाएगा। इस पर 'नॉट फिट फॉर हयूमन कन्जंपशन' का ठप्पा लग चुका है। लेकिन निराश होने वाली बात नहीं है, केंद्र सरकार की 'भंडारण नीति' और रेलवे की अनाज 'ढुलाई गति' इस सड़े अनाज को अमीर के प्याले में डालने वाली है वो भी भारी सब्सिडी के साथ।
शराब पर चाहे जितना आबकारी कर लग रहा हो पर शराब बनाने वाली कंपनियों को पंजाब में सड़ चुका करीब 47 हजार टन अनाज इस साल सब्सिडी के साथ अथवा बाजार भाव स एक तिहाई दामों पर मिलने वाला है। अगले साल भी ग्रेन बेस शूगर फ्री व्हीस्की अथवा सस्ती वोदका बनाने वाली किसी कंपनी को 'कच्चे मालÓ की कमी ना आए इसका प्रबंध भी सरकार ने कर दिया है। उक्त मात्रा से चार से पांच हजार टन सड़ा अनाज अगले साल भी नीलाम किया जाएगा। संभव है तब तक हमारी व्यवस्था प्राकृति की आड़ में कुछ ऐसे और 'इंतजामÓ कर दे कि फिर आने वाले सालों में भी कमी ना आने पाए।
राज्य सरकार की अनाज खरीद एजेंसियों की तालमेल कमेटी के चेयरमैन भुपिंदर सिंह कहते हैं कि खराब होने वाली गेहूं का आंकड़ा आधा से एक फीसद ही है। इसे बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जा रहा है, लेकिन अगर अनाज खराब हुआ है, तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए पर आप इसे सिर्फ कर्मियों के सिर पर नहीं थोप सकते। केंद्र सरकार के मापदंड अनुसार गेहूं की सेल्फ लाइफ नौ महीने है पर पंजाब के गोदामों में 2009 का गेहूं भी पड़ा है। 2005 में मामला स्र्वोच्च न्यायालय तक जाने के बाद एएफसीआई ने एक साल में ही गेहूं उठवाने की बात स्वीकार की थी पर अब फिर हालात वहीं के वहीं आ गए हैं।
वहीं पंजाब में एकबारगी सड़कों पर खराब होते धान को ठिकाने लगाने 'नई तकनीकि' की तलाश कर सस्ती बीयर बनाने का विचार भी यहां के नेता दे चुके हैं। वर्ष 2002 के बाद चलाए गए 'डाइवरसीफिकेशन' अभियान के दौरान कहा गया कि द्वी फसलीय चक्र ने जौ व गन्ने की खेती अधीन रकबा खत्म कर दिया है। और हम धान की पैदावार इतनी बढ़ा चुके हैं कि संभल नही रहा। तर्क दिया गया कि हिमाचल प्रदेश के दूर दराज के पहाड़ी क्षेत्रों में फल उगते ज्यादा हैं पर मैदानों तक लाना खासा मंहगा हो जाता है। ऐसे में वहां की सरकारों ने 'वाइन पालिसी' बनाई और राजस्व बढ़ाने के साथ रोजगार भी उपलब्ध करवा दिया। हाल ही के वर्षों का उदाहरण दे उक्त खुलासे के साथ सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि पंजाब के अनाज और देश के हालात का आप इस तरह से नहीं देख सकते। आपको अनाज सडऩे से रोकने के ही उपाय करने होंगे। या तो आप जमीन की कीमत के आधार पर गोदामों का किराया बढ़ाएं या फिर जहां सस्ते गोदाम हैं वहां मानसून आने से पहले गेहूं ले जाएं। डा. खोसला कहते हैं कि गेहूं और धान ही क्यों खराब होता है? केंद्र के संस्थान एफसीआई का चावल तो कभी नहीं सड़ता?