Showing posts with label park. Show all posts
Showing posts with label park. Show all posts

Tuesday, 4 December 2012

कैसी विकलांग पेंशन? बैसाखी भी नहीं खरीदी सकते


-ढ़ाई सौ रूपये की मासिक पेंशन भी करवाती है तीन महीने का इंतजार
फोटो: 15
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हम धार्मिक इंसानों की बात सुनते हैं और कई बार उन्हें पूजने भी लग जाते हैं लेकिन हमसे दो कदम दूरी पर खड़े जरूरत मंद इंसान की मदद नहीं करते चाहे उसे कितनी भी इमरजेंसी क्यों ना हो। विकलांगता दिवस पर जिला पुर्नवासन केंद्र में आयोजित एक संगोष्ठी में केंद्र के प्रभारी डा. प्रितपाल सिंह सिद्धू की बातें पंजाब सरकार की ओर से विकलांगों को दी जाने वाली पेंशन पर पूरी तरह से सटीक बैठती है। करोड़ों रूपये की जमीन के मालिक से लेकर बड़े उद्योगपतियों को सरकारी अनुदान दिया जाता है। सरकारी नौकरों को भी कई तरह के सुविधा भत्ते दिए जाते हैं लेकिन विकलांगों को दी जाने वाली पेंशन से आप ढ़ंग की बैसाखी भी नहीं खरीद सकते। अगर आप लकड़ी की भारी भरकम बैसाखी से एल्यूमिनीयम की बैसाखी पर शिफ्ट करना चाहें तो आपको कम से कम दो महीने की पेंशन का इन्तजार करना पडेगा। सरकारी पेंशन ढ़ाई सौ रूपये है तो बैसाखी की कीमत साढ़े चार सौ रूपये।
यह बात सिर्फ एक टांग खराब होने वालों के लिए है। अगर आपके दोनों पांव नहीं है या पूरी तरह से दुरुस्त नहीं है और आप जमाने के साथ रेंग कर ही सही पर ट्राई साइकिल पर चलना चाहते हैं तो आपको वाली ट्राई साइकिल खरीदने के लिए आपको दो महीने की पेंशन एडवांस जमा करवानी पड़ेगी। इसके बाद 90 सब्सिडी वाली ट्राई साइकिल को अपने अनुसार दुरुस्त करवाने के लिए दो से तीन पेंशन लगानी पड़ेगी।
विकलांगता दिवस पर 'दैनिक जागरणÓ के इस प्रयास में सामने आया कि सरकार की ओर से दी जाने वाली पेंशन उन विकलांगों के लिए बेमानी है जिनके हाथ या पांव कट गए हैं और वे कृत्रिम अंग लगवाना चाहते हैं। यहां पर पेंशन तो वही रहती है पर आम आदमी के लिए सब्सिडी कम होकर 75 फिसद रह जाती है और दाम हजारों में चला जाता है। छह से आठ महीने की पेंशन खर्च करने के बाद प्राप्त होने वाले हाथ या पांव की उम्र अधिकारिक रूप से दो साल ही है और इसे तीन साल तक चलाया जा सकता है।
दिलचस्प है कि किसी भी उपकरण अथवा अंग के खराब होने की स्थिति में उसे बाजार भाव पर ही रिपेयर किया जाता है। अंगुली भी खराब हुई तो हाथ का दस्ताना पहले फाड़ा जाता है और फिर अंगुली के दाम डेढ़ पेंशन हैं तो दस्ताना दो पेंशन का है। इस पर भी यदि आप पुर्नवासन केंद्र के आसपास नहीं रहते हैं तो आपको रिक्शा से बस तक का किराया भी लगाना होगा।
ध्यान रहे कि इस दौरान आप अपनी विकलांगता की वजह से कहीं गिरें ना जिससे आपको चोट लगे और ना ही किसी तरह की बीमारी का शिकार हों अन्यथा आप एक बार फिर आम आदमी बन जाएंगे और पेंशन की जद से बाहर हो जाएंगे।
इन हालातों से एडीशनल डिवीजनल कमिश्नर अमृत पाल कौर को जब मौके पर ही अवगत करवाया जाता है तो कहती हैं कि वे सारी बातें सुन रही हैं और नोट भी कर रही हैं। सरकार के पास अधिक ग्रांट देने का प्रस्ताव भेजा जाएगा।

विकलांगता: इलाज से च्यादा रोकथाम जरूरी
-आटो रिक्शा के लगाए गए रिफलेक्टर
फोटो: 1, 2
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
जिला पुर्नवासन केंद्र में विश्व विकलांगता दिवस पर आयोजित किए गए सेमिनार में वक्ताओं ने जहां विकलांगता के इलाज से च्यादा उसकी रोकथाम को जरूरी बताया और कहा कि बहुत से ऐसे काम हैं जिनसे दुर्घटनाएं होने से पहले ही रोकी जा सकती हैं। एडीशनल डिप्टी कमिश्नर विकास अमृत कौर गिल, शहर के ट्रैफिक प्रभारी हरदीप सिंह बडंूगर, केंद्र के प्रभारी डा. प्रितपाल सिंह सिद्धू व पटियाला सोशल वेलफेयर एसोसिएशन के विजय कुमार गोयल ने कहा कि हम दो मिनट के लिए कहीं भी रुक जाते हैं तो ट्रैफिक जाम हो जाता है। इसी देरी को पूरा करने कई लोग रफ्तार बढ़ाते हैं और कई बार जानी नुकसान होता है।
वक्ताओं ने कहा कि सड़क पर सेंस के साथ नैतिक शिक्षा पढ़ाई जानी जरूरी है। इस अवसर पर आटो रिक्शाओं के पीछे रिफलेक्टर भी लगाए गए जिससे कम से कम धुंध के समय में सड़क पर दुर्घटना ना हो।


काम है नहीं, सरकारी कार्यालयों में मिलते धक्के
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
ईश्वर ने जो करना था वो कर दिया...जो सजा लगनी थी लग गई...लेकिन अब हम अपने मां-बाप पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं। सरकार कुछ करती नहीं, इतना पढ़े नहीं कि नौकरी मिल जाए अब तो बस चलता है। जिला पुर्नवासन केंद्र में ट्राई साइकिल लेने आए विकलांगों के अनुभव लगभग एक जैसे ही रहे हैं। हालांकि समस्या एक जैसी होने पर ऐसा स्वभाविक भी है। समाज का उनके प्रति रवैया कम से कम उनकी नजरों में तो नकारात्मक ही है। हालांकि अपनी और से प्रशासन और सरकार को कोसने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। कई मायनों में ऐसा वाजिब भी लगता है।  
फोटो-4,
कर्मजीत सिंह कहते हैं कि वे आठवीं पास हैं और नौकरी मिल नहीं रही अब करें तो क्या? दो बार उन्हें बुलाया भी गया पर आगे धक्के ही मिले, बस चलता कर दिया। हालांकि कर्मजीत से जब कम शिक्षा की बात की जाती है तो वे सहमति भी प्रकट करते हैं। स्वीकार करते हैं कि च्यादा नहीं पढ़ पाए।  
फोटो- 5,
कुलविंदर सिंह कहते हैं कि कम से कम सरकार उन्हें दी जाने वाली चीजों पर तो जुर्माने के रूप में टेक्स ना लगाए। सरकार बड़े जागीरदारों सरमाए दारों पर खर्च कर रही है और उनके लिए जरूरत की चीज भी नहीं दे पाती। ऐसी कैसी सरकार है। एक ट्राई साइकिल मिल रही है। इसे अपने मुताबिक तैयार करवाएंगे। इसमें भी खासा खर्च है।

 फोटो-6
जबकि शहर के ही रहने वाले जगतार सिंह कहते हैं कि जो कर रहे हैं उनके मां-बाप कर रहे हैं। अब तो सारा कुछ बोझ सा लगने लगा है। रोटी और कपड़े का प्रबंध जैसे तैसे घर से किया जा रहा है पर बीमारी के हालात में सब कुछ ईश्वर पर निर्भर हो जाता है। काम कोई करने की स्थिति में नहीं है।

फोटो-7
ऐसे ही गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि आज तक सिवाय धक्के खाने के कुछ नहीं मिला है। प्रशासन के अधिकारियों की ओर इशारा कर वे कहते हैं कि ये लोग भी अगर कुछ देते हैं तो तरसा कर।

विकलांगता के जारी हुए एक हजार सर्टिफिकेट
हमारे संवाददाता, पटियाला
सिविल सर्जन कार्यालय विकलांग होने पर मेडिकल जांच करने के बाद सर्टिफिकेट जारी करता है। सिविल सर्जन कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक इस साल एक जनवरी से लेकर 3 दिसंबर तक सिविल सर्जन कार्यालय ने एक हजार सर्टिफिकेट जारी किए हैं, जबकि पिछले साल में सिविल सर्जन कार्यालय ने 2024 विकलांग लोगों को सर्टिफिकेट जारी किए थे। विकलांगों की ये वो संख्या है जो आधिकारिक रूप से हर साल बढ़ती जा रही है। जिन लोगों अथवा उनके परिजनों को सरकारी प्रक्रिया की जानकारी है।


बस में चढ़ नहीं पाते, पार्क में घुस नहीं सकते

फ्लैग: विकलांगों के लिए व्यवस्थागत बदहाली
फोटो: 4, 5, 6
-डीसी ने माना समस्या है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
केंद्र अथवा पंजाब की सरकारें अथवा जिले का प्रशासन विकलांगों को आम आदमी को मिल रही सुविधा देने में भी नाकाम रहा है। आलम ये है कि विकलांग व्यक्ति बस में चढ़ नहीं पाता क्योंकि बसें ऐसी नहीं बनी कि इनमें आसानी से चढ़ा जा सके और पार्कों के प्रवेश द्वार ऐसे नहीं कि इनमें व्हीलचेयर अथवा तिपहिया साइकिल के साथ घुसा जा सके।
विकलांगों की आबादी के आंकड़ों को लेकर चाहे विवाद हो लेकिन यह फिर भी पांच सात फीसद से कम नहीं है और वोटों के लिहाज से देखा जाए तो सरकारी दस्तावेजों में पटियाला जिले में ही विकलांगों की संख्या 40 हजार के पार है। हर साल सिविल सर्जन के कार्यालय में विकलांगता प्रमाण पत्र बनवाने वालों की संख्या में एक से दो हजार की बढ़ोतरी हो रही है। दिलचस्प है कि  ये आंकड़ा वोटों का वो अंतर है जो कई विधान सभा सीटों में हार-जीत के एक-दो हजार वोटों के अंतर से कहीं ज्यादा है लेकिन इस वर्ग की सुनवाई कहीं नहीं हो रही।
विकलांगों के लिए व्यवस्थागत सुविधाओं पर 'दैनिक जागरणÓ की ओर से की गई पड़ताल में सामने आया है कि जिला मुख्यालय वाले शहर में पिछले एक-डेढ़ दशक में बने सरकारी भवनों में व्हीलचेयर लाने ले जाने को रैंप बने हैं। इनमें मिनी सचिवालय, निगम व पूडा कार्यालय की बनी इमारतें शामिल हैं। लेकिन इनमें कहीं भी स्थाई रूप से रखी गई व्हीलचेयर नहीं दिखाई देती।
सरकारी अथवा निजी क्षेत्र में चल रही बसें में प्रवेश के लिए द्वार के ही उपर नीचे कर सकने वाली डेक्कन बसों वाली तकनीक कहीं नहीं है। इतना ही नहीं जिले के सबसे बड़े व पीआरटीसी के मुख्यालय वाले शहर के बस स्टैंड में ही विकलांगों का बिना मदद के प्रवेश संभव नहीं है। पार्क में जाने के लिए घूमते जंगले के गेट लगे है। जहां से निकल पाना संभव नहीं है जबकि मुख्य गेट किसी वीआईपी के आने अथवा बड़े कार्यक्रम के अलावा नहीं खुलता है।
निजी क्षेत्र में हालात ज्यादा बुरे हैं। किसी बड़े शो रूम या मार्केट में आने जाने की आसान सुविधाएं नहीं है। इस पर हंस कर यह भी बताया जाता है कि जिसके पास माल खरीदने की क्षमता है, उसके लिए होम डिलीवरी भी है और शॉप को बाहर सड़क तक लाने की सुविधा है। इसके अलावा जो संभावित ग्राहक नहीं है, उसके लिए क्या करें?
वहीं डिप्टी कमिश्नर जीके सिंह से संपर्क करने पर वे स्वीकार करते हैं कि यह समस्या तो है और इस दिशा में काम किया भी जा रहा है। लेकिन समस्या के निराकरण पर भी उतना ही काम हो पाया है जितना अन्य पर।