भूपेश चट्ठा, पटियाला
नेता जी का पर्सनल नंबर
-चुनाव सिर पर हैं और कई नेताओं का टिकट भी लगभग पक्का है पर पांच साल के आराम से पीछा नहीं छूटा है और ना ही पुराना हैंग ओवर उतर रहा है। ऐसे में एक पुराने कार्यकर्ता के मन में नेता जी के साथ पुराना प्यार जागा तो किसी तरह से रूटीन वाले नंबर पर ट्राई करने के बाद बात ना बनी तो नए मोबाइल नंबर का जुगाड़ कर लिया।
वहीं जब नंबर देने वाले ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी और नेता जी का पर्सनल नंबर दे कर कह डाला ये पर्सनल नंबर है, खुद ही उठाएंगे, अगर जाग रहे हुए तो...
ये क्या मुसीबत है?
जिले के दक्षिणी हिस्से का एक विधान सभा क्षेत्र का कुछ हिस्सा किसी के जुगाड़ के चलते शहर के उत्तरी क्षेत्र तक आ गया है। चूंकि नेता जी क्षेत्र नया था ऐसे में नए लोगों के बीच तुरंत ही जाना पड़ा। खाली आने जाने का अब जमाना नहीं रहा ऐसे में आखिरी साल में काम करवाने भी जरूरी हैं, सो ईशारा मिलने के अगले ही दिन से भाग दौड़ शुरु हो गई। नेता जी ने सैंकिड लाइन की तलाश कर उनसे जरूरतें पूछी और अपने रसूख का इस्तेमाल कर संपर्क भी दे दिए पर सैकिंड लाइन के अपने मुद्दे होते हैं। बैठक में जब भी बात सिरे चढऩे को हो सैकिंड लाइन का प्रतिनिधि अपनी चला दिया करे। थोड़ी ही देर में अफसरों को लोकतंत्र की शक्ति का अहसास हुआ तो नेताजी को भी लगा कि ये क्या मुसीबत है? पर साथ ही अपनी मजबूरी भी सामने आ गई तो कहने लगे ईनू हजे कर लेण दे।
चुनावी चटकारे
विवाह में नेता जरूर पर गनमैन घटे
विधान सभा चुनावों से पहले आए आखिरी विवाह सीजन में नेता जी को अपने ही विधान सभा क्षेत्र की एक से दो हजार की गैदरिंग आराम से मिल रही है, और नेता जी ने भी अपने बंदे लगा रखे हैं कि किसी के यहां शगुन देने का काम रह ना जाए। ऐसे में जहां पिछले सीजन तक घर के ही अन्य लोग हाजरी लगाने जा रहे थे और ऐसे समारोहों में गनमैन कुछ च्यादा ही चमकते थे पर अब इसमें बदलाव आ गया है। समझदार हुए नेता जी कहते हैं कि अच्छा नहीं लगता, क्यों? दिलचस्प है कि अब लगभग हर निमंत्रण पत्र पर नेता जी खुद पहुंच रहे हैं और वो भी बिना या कम फौज के। इसके साथ ही साथ रहने वाले लोगों का पूरा ध्यान रखते हुए कैडर के कद के अनुसार पूरा समय दिया जाता है। गनमैनों को अब शक्ति प्रदर्शन के रूप में ना दिखा कर सुरक्षा के लिहाज से जरूरी तो बताया जाता है पर दूर खड़ा कर आम पब्लिक को मिलने देने में किसी तरह की परेशानी ना हो इस तरह की हिदायतें भी दी गई हैं। पर ये पब्लिक है सब जानती है...
चुनावी फीवर है नहीं उतरेगा
ावी लोकतंत्र में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने वालों को चुनावी फीवर होना आम है। दिलचस्प है पंजाब में विधान सभा के चुनाव लगाता
चुनावों में नेताओं कम से कम चुनाव सर्दियों में ही होते आ रहे हैं। इस बार के चुनाव के अलावा पिछले दो में भी सर्दी की भूमिका रही है। याद रहे कि इक्का दुक्का नेताओं को छोड़ दें तो शेष सभी वही हैं जो नब्बे के दशक के अंत में थे पर अब उनकी सेहत वैसी नहीं है जो तीन-चार चुनाव पहले हुआ करती थी। ऐसे में चुनावी फीवर का असर इस बार कुछ च्यादा है। शुगर-ब्लड प्रैशर-युरिक एसिड की कभी कभार होने वाली जांच अब दिनचर्या का हिस्सा बन गई है। परहेज भी पूरे हैं पर फीवर शरीर के उपरी हिस्से में है ऐसे में दवाओं का असर नहीं हो रहा जो फीवर उतार सके पर चैकअप जारी है।
500 का शगुन 100 में चलता रहा
चुनावी चटकारे
मैं प्रधान हां
हाल ही में हुई एक के बाद एक रैली से उत्साहित एक नेता जी अपने चंद चुने हुए दोस्तों की टीम को लेकर थकान उतारने शॉपिंग माल में जा पहुंचे, पहले बात फिल्म देखने तक थी पर चूंकि थकान कुछ च्यादा थी सो शक्ति वाटर का इस्तेमाल करने की सलाह दे दी गई जिसे स्वीकार भी कर लिया गया। चूंकि मामला प्रधान जी का था तो माल में कुछ कायदे कानून किनारे कर सप्लाई कार तक सुनिश्चित कर दी गई। इतने में भीड़ में से गुजर रहा एक मोटर साइकिल कार से टकरा गया। बस फिर क्या था प्रधान जी पुरानी फार्म में आ गए और बंदा धुन दिया गया। पब्लिक भी आजकल जागरुक है ऐसे में विपक्ष भारी पड़ा तो प्रधान जी के दोस्त भी पिछली कार से आ गए, सत्ता समीकरण पूरे ना बैठे तो नेता जी ने पुलिस बुलवा ली अब नेता जी पहचाने नहीं जा रहे थे तो बताना पड़ा के मैं प्रधान हां। बताया जा रहा है कि देर रात बुजुर्गों ने बीच बचाव कर समझौता करवा दिया।
ये आचार संहिता कब लागू होगी?
एक ओर फटाफट काम निपटाए जा रहे हैं तो दूसरी ओर से एक ही सवाल उठ रहा है कि ये चुनाव आचार संहिता कब लागू होगी? बात इसी महीने से शुरु होती है। फिर अंतिम सप्ताह तक जाती है, थोड़ी गणना और अपने चंडीगढ़ के खास बंदे का हवाला दिया जाता है, फिर एकदम से बताया जाता है कि 15 को हो जाएगी, जबकि सामने वाला अगर थोड़ा भी प्रशासन से जुड़ा हुआ है और पुराने चुनाव देख चुका है तो सेफ प्ले में बताया जाता है कि 20 से 24 दिसंबर के बीच लागू हो जाएगी। इस आंकड़े को मान भी लिया जाता है। अरे भई जो पांच साल में नहीं हुआ वो पांच दिन में क्या बदल जाएगा। कर लेने दो किसी के तो पल्ले पउ़ रहा है। बाकि कोड कंडक्ट ये अगर किसी को पता है तो वो अकेला चुनाव आयोग।
पांच दिन बाद पिक्चर क्लीयर होगी
विधान सभा चुनावों की तारीख तय नहीं हुई, चुनाव आचार संहिता लागू नहीं हुई, यहां तक की राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों को टिकट भी अलाट नहीं किए हैं लेकिन विधायक तो अलग, सरकार और मुख्यमंत्री तक के नामों की घोषणा हो रही है। हर दिन, हर गली मुहल्ले के साथ ही सरकार बदल भी रही है। ऐसे में अब एक नया जुमला चल निकला है कि नौकरशाही अभी नहीं बोल रही पर आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के पांच दिन बाद में पूरी पिक्चर क्लीयर हो जाएगी। दिलचस्प है कि बाजारू विश्लेषकों को किसी तरह के सहायक आंकड़ों की भी जरूरत नहीं है।
भाई साहब मुझे भी एडजस्ट करो
आजकल नेताओं का खुद मिन्नत करने का दौर चल रहा है। जो कभी आलाकमान से सीधे व पारिवारिक संबंधों की बात करते थे इन दिनों में मिलने के लिए तरस रहे हैं। जिस किसी को इशारा हुआ है उसकी बांछे खिली हुई हैं, लेकिन जिस किसी के सामने इशारा हुआ है उसे लग रहा है कि वो दुनिया का सबसे सताया हुआ आदमी है, उसे लग रहा है कि पार्टी ने उसके साथ न्याय नहीं किया। दिलचस्प है कि इन लोगों में सबसे च्यादा संख्या उनकी है जिन्होंने अच्छे कैरियर के अवसर तलाशने पार्टी व नेता बदले हैं। इस पंक्ति के नेता जी का आलम ये है कि सूझ ही नहीं रहा कि किससे मदद के लिए कहें और किससे नहीं बस एक ही गुहार लग रही है कि भाई साहब मेरी मदद करो, ऐंवे तां धक्का है।
चुनावी चटकारे
प्रस्तुति:- भूपेश चट्ठा, पटियाला
फोटो बड़ी करवा लो
चुनावी सीजन में हर तरफ प्रचार तंत्र की बल्ले बल्ले हो रही है, मीडिया से लेकर सड़क किनारे हो रही पब्लिसिटी अब ड्राइंग रूम तक पहुंच गई है। छोटा हो या बड़ा पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, सिर गिनने वाले लोकतंत्र में हर कोई अपने मतलब के संपर्क सूत्र साधने में लगा है। इसमें सबसे च्यादा भूमिका तस्वीरें निभा रही है। बड़े नेता जी आपके पिताजी के भोग में आए या आपकी बहन की शादी में हर वो तस्वीर कीमती हो गई है जिसमें आपके सबसे करीब बैठे नेता जी आपसे बात करते दिखाई दे रहे हैं। दिलचस्प है कि लेमीनेशन पुरानी हो चुकी तस्वीरों को अब ना केवल बड़ा करवाया जा रहा है, बल्कि उन्हें ऐसे स्थान पर लगाया जाता है, जहां नेता जी से मिलने आने वाला पहले कुछ देर बैठ कर मन बना ले।
दो का टाइम था डेढ़ बजे आ गए रोटी भी...
शहर में एक बड़े नेता जी ने आना था समय भी व्यक्तिगत रूप से घोषित किया गया तो फोन सुनने वालों को लगा कि उन्हें च्यादा महत्वपूर्ण कार्यकर्ता समझ किसी विशेष चुनावी मुद्दे पर चर्चा के लिए बुलाया जा रहा है हो सकता है कि टिकट संबंधी ही चर्चा हो जाए ऐसे में दो का टाइम था तो जनता लंच छोड़ अगली पंक्ति में बैठने के लिए डेढ़ बजे ही पहुंचनी शुरु हो गई। बात तीन-चार बजे तक तो खास नहीं रही पर शाम साढ़े पांच बजे बैठक स्थल पर लाइटें लगनी शुरु हुई तो भूख भी बढऩे लगी और सर्द मौसम में रोटी और किसी पेय पदार्थ की याद आने लगी। इतना ही नहीं एक स्पष्ट वादी ने तो राजनीति को जलालत तक बता डाला और कहा कि की करिए बीओओएस बॉस हैं।
हुण साडी यारी सिधी पै गई ए
पटियाला: हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते। लेकिन ये भी कहा जाता है कि जब वो दिन नहीं रहे तो ये भी नहीं रहेंगे। ठीक ऐसे ही हालात आजकल आनन फानन वाली राजनीतिक रिश्तेदारी में हो गए हैं जहां पहले करीबी रहे बंदे को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया जाता है और जब बात सीधी हो जाए तो सीढ़ी को हटा भी दिया जाता है, मानों सीढ़ी की कभी जरूरत ही नहीं पड़ेंगी। 'हुण साडी यारी सिधी पै गई एÓ के सिद्यांत पर चलने वाले सेकंड लाइन नेतागिरी करने वाले के कुछ लोग अक्सर भूल जाते हैं कि अगर सीढ़ी ना रही तो उतरने पर गिरने के चांस च्यादा रहेंगे।
कभी लिफाफे बांट पब्लिसिटी तो कभी फोन ना उठाना
पटियाला : जिले के एक कद्दावर कहे जाने वाले नेताजी हर काम पैसे के दम पर ही करवाना चाहते हैं, हालांकि उनकी यही आदत पिछली बार छह महीने के लिए उन्हें कोप भवन में ले गई थी और अफसोस से ही बाहर नहीं निकल पाए थे। पर पुरानी आदतें हैं देरी से जाएंगी, जाएंगी भी या नहीं कहा नहीं जा सकता। अब भी नेता जी को जब जरूरत महसूस होती है तो वे लिफाफे बांट कर पब्लिसिटी की उम्मीद करते हैं तो कभी फोन भी खुद उठाना पसंद करते, ऐसे में नेताजी के बंदों की तो मौजें हैं पर नेताजी का क्या होगा? कुछ नहीं कहा जा सकता पर इससे इतना तो तय है कि अपनी बात कहने हर बार लिफाफा भारी करना ही पड़ेगा नहीं तो...