-मार्च, 2009 के बाद पहली बार 52 रूपये के पार हुआ डालर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
एक ओर जहां डॉलर के 21 नवंबर को 52 रूपये का स्तर तोडऩे के बाद रिजर्व बैंक आफ इंडिया के हाथ पांव फूल रहे हैं उस पर देश का शेयर बाजार ना केवल गिरते डालर के साथ नीचे आ रहा है अपितु बाजार को भी नीचे की ओर खींच रहा है। वहीं एक्सपोर्टर के चेहरे डॉलर की चढ़ाई के साथ खिलने लगे हैं।
फारेक्स ट्रेडिंग के बाजार से जुड़े जानकार बताते हैं कि डॉलर के दाम का 45 रूपये से 50 रूपये के बीच में रहने से किसी को एतराज नहीं था और इसे ट्रेडिंग के अलावा आयात निर्यात के लिहाज से भी ठीक ही समझा जा रहा था। यही वो रेंज थी जिसे भारतीय बाजार ने पिछले दो सालों से होल्ड कर रखा था पर बीते दो महीनों अथवा भारत में सर्दी व त्यौहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही डॉलर की तुलना में रूपये में गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ जो इस सप्ताह भी जा रही है।
ट्रेड जंक्शन पर फारेक्स में डील करते रवि एस आहलुवालिया बताते हैं कि तीन मार्च को डालर ने 52 रूपये का स्तर तोड़ा था और अब इसी सप्ताह 21 नवंबर को में 52.37 तक जाने के बाद 52.18 रूपये पर बंद हुआ और 22 नवंबर को 52.69 का रिकार्ड बनाया है। तीन महीने में सात फीसदी की बढ़ोतरी के बाद दो दिनों में तीन फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है। जिस तरह के हालात हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अगले छह महीनों में 54 रूपये के स्तर भी दिखाए जा रहे हैं। एक बार ये उपर निकला तो फि र उपर के स्तर का कुछ नहीं कहा जा सकता।
वहीं ब्रोकर आशीष गोयल कहते हैं कि पंजाब में बात लुधियाना की हो या अमृतसर की या फिर चंडीगढ़ के किसी ट्रेडर या कंपनी की च्यादातर ने 50 रूपये तक डॉलर के जलाने की उम्मीद के साथ ही 'हैजिंगÓ कर रखी थी लेकिन 21 नवंबर को एक ही दिन मेंं दो फीसदी अथवा एक रूपये की गिरावट ने हर किसी का हिला कर रख दिया है, इसके अगले ही दिन 22 को फिर एक फीसदी की बढ़ोतरी हुई, लेकिन निर्यातकों को इसका लाभ तय है। तीन फीसदी की लाभ में अतिरिक्त बढ़ोतरी वो भी सीजन के दौरान कम नहीं आंकी जा सकती।
याद रहे कि पूरे ढ़ाई साल में डालर ने दस फीसदी का उतार और चढ़ाव देखा है ऐसे में दो फीसदी को आप बोनान्जा ही कहेंगे।
भूपेश चट्ठा, पटियाला
एक ओर जहां डॉलर के 21 नवंबर को 52 रूपये का स्तर तोडऩे के बाद रिजर्व बैंक आफ इंडिया के हाथ पांव फूल रहे हैं उस पर देश का शेयर बाजार ना केवल गिरते डालर के साथ नीचे आ रहा है अपितु बाजार को भी नीचे की ओर खींच रहा है। वहीं एक्सपोर्टर के चेहरे डॉलर की चढ़ाई के साथ खिलने लगे हैं।
फारेक्स ट्रेडिंग के बाजार से जुड़े जानकार बताते हैं कि डॉलर के दाम का 45 रूपये से 50 रूपये के बीच में रहने से किसी को एतराज नहीं था और इसे ट्रेडिंग के अलावा आयात निर्यात के लिहाज से भी ठीक ही समझा जा रहा था। यही वो रेंज थी जिसे भारतीय बाजार ने पिछले दो सालों से होल्ड कर रखा था पर बीते दो महीनों अथवा भारत में सर्दी व त्यौहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही डॉलर की तुलना में रूपये में गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ जो इस सप्ताह भी जा रही है।
ट्रेड जंक्शन पर फारेक्स में डील करते रवि एस आहलुवालिया बताते हैं कि तीन मार्च को डालर ने 52 रूपये का स्तर तोड़ा था और अब इसी सप्ताह 21 नवंबर को में 52.37 तक जाने के बाद 52.18 रूपये पर बंद हुआ और 22 नवंबर को 52.69 का रिकार्ड बनाया है। तीन महीने में सात फीसदी की बढ़ोतरी के बाद दो दिनों में तीन फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है। जिस तरह के हालात हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अगले छह महीनों में 54 रूपये के स्तर भी दिखाए जा रहे हैं। एक बार ये उपर निकला तो फि र उपर के स्तर का कुछ नहीं कहा जा सकता।
वहीं ब्रोकर आशीष गोयल कहते हैं कि पंजाब में बात लुधियाना की हो या अमृतसर की या फिर चंडीगढ़ के किसी ट्रेडर या कंपनी की च्यादातर ने 50 रूपये तक डॉलर के जलाने की उम्मीद के साथ ही 'हैजिंगÓ कर रखी थी लेकिन 21 नवंबर को एक ही दिन मेंं दो फीसदी अथवा एक रूपये की गिरावट ने हर किसी का हिला कर रख दिया है, इसके अगले ही दिन 22 को फिर एक फीसदी की बढ़ोतरी हुई, लेकिन निर्यातकों को इसका लाभ तय है। तीन फीसदी की लाभ में अतिरिक्त बढ़ोतरी वो भी सीजन के दौरान कम नहीं आंकी जा सकती।
याद रहे कि पूरे ढ़ाई साल में डालर ने दस फीसदी का उतार और चढ़ाव देखा है ऐसे में दो फीसदी को आप बोनान्जा ही कहेंगे।
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