-दो दो जगह जमा करवाई फीस फिर भी सांसे अटकी
-अगर पास होने वाले पर केस बना तो पास होने की मान्यता नहीं, पर केस चलेगा: नियम
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में शुरु हुई री-अपियर की परीक्षाओं में ऐसे परीक्षार्थियों की कमी नहीं है जो संभावित रूप से पुर्न मुल्यांकन की परीक्षा में पास हो चुके होंगे। दिलचस्प है कि री-अपियर की परीक्षा देने वाले अपने शौक से नहीं बल्कि मजबूरी में दो दो बार फीस जमा करवाने के बावजूद दो दो जगहों से आने वाले परिणाम के इंतजार में अपनी सांसे थामे हैं।
कारण स्पष्ट है कि पुर्न मुल्यांकन का परिणाम आया नहीं है और री-अपियर की परीक्षाएं शुरु हो गई हैं। परीक्षा शाखा के ही एक कर्मी बताते हैं कि कैंपस में परीक्षा देने आने वाले प्राइवेट छात्रों की संख्या कम नहीं है। जिन्हें लगता है कि उनका मुख्य पेपर ठीक हुआ था पर कुछ नंबरों से फेल हो गए हैं। ऐसे में पांच सौ रूपये फीस के जमा करवा पुर्न मुल्यांकन भर दिया पर री अपियर की परीक्षा इसलिए देनी पड़ रही है क्योंकि ढ़ाई-तीन महीने हुए पुर्न मुल्यांकन का परिणाम नहीं आया है। विभाग के कर्मी इस संबंध में मौजूद नियम पर बताते हैं कि 'किसी भी सूरतÓ में पास होने का प्रयास करने वाला परीक्षार्थी अगर री अपियर की परीक्षा में धरा जाता है और यूएमसी केस बन जाता है तो पुर्न मुल्यांकन में पास होने की मान्यता नहीं रहती पर यूएमसी का केस जरूर चलता है। ऐसे में दोधारी तलवार पर चलना होता है।
वहीं चीफ कंट्रोलर परिक्षाएं पवन सिंगला कहते हैं कि पुर्न मुल्यांकन का री-अपियर से कोई संबंध नहीं है। विद्यार्थी के जिसमें अधिक नंबर आते हैं वही जुड़ जाते हैं। रिजल्ट मेंं देरी व पुर्न मुल्यांकन का परिणाम पहले आया होता तो डबल फीस ना लगती जैसे सवालों पर भी वे कहते हैं कि दोनों अलग अलग चीजें हैं। लेकिन अगर पुर्न मुल्यांकन में पास होने पर री-अपियर का तगमा स्वत: हट जाता है। लेकिन अगर छात्र गड़बड़ी करता पकड़ा जाए तो यूएमसी जरूर बनता है, फिर पुर्न मुल्यांकन का कोई महत्व नहीं रहता।
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डुप्लीकेट रोल नंबर लेना हो तो फिर फीस
यूनिवर्सिटी में किसी भी परीक्षा के लिए फीस जमा करवाने पर परीक्षार्थी एक प्रकार से उपभोक्ता बन जाता है। ऐसे में रोल नंबर पहुंचाना भी यूनिवर्सिटी की ही जिम्मेदारी बनती है। दिलचस्प है कि साधारण भारतीय डाक व्यवस्था चाहे सदियों का अनुभव रखती हो पर समय से डाक पहुंचाने के लिए चंद ज्यादा रूपये, मात्र 20 रूपये में रजिस्टर्ड डाक की व्यवस्था भी इसी के अधीन की गई है। लेकिन यूनिवर्सिटी साधारण डाक का ही प्रयोग करती है और रोल नंबर ना पहुंचने की सूरत में उम्मीदवार ना केवल भटकता है अपितु 250 रूपये जमा करवा कर फिर से डुप्लीकेट नंबर जारी करवाता है वो भी परीक्षा की तैयारी करना छोड़, ठीक एक दिन पहले।
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