Monday, 29 October 2012

96 लाशें खोजी, खर्च 72 हजार, वो भी 'पुलिस की उधारी'


लोगो: दास्तान-ए-गोताखोर
- नहर से लाश निकालने का मेहनताना मछली पकडऩे से कम
- हम वो गली सड़ी लाशें निकालते हैं, जिनके रिश्तेदार हाथ लगाना तो दूर, देख मुंह पर कपड़ा रख लेते हैं: आशू
- 2006 में विस्फोटक निकाले तो तत्कालीन रेल मंत्री लालू यादव, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, मनिंदरजीत बिट्टा से मिले प्रशंसा पत्र पर नौकरी नहीं
भूपेश चट्ठा, पटियाला
रेहड़ी पर एक पाव मछली खानी हो तो कीमत 150-200 रूपये अदा करनी पड़ती है, संभव है कि पांच सात किलो की मछली की कीमत चार अंकों में होनी तय है, पर नहरों से इंसान की डेड बॉडी निकालनी हो तो मेहनताना छोटी मछली पकडने से भी कम रह जाता है। बात यहां पर पंजाब पुलिस की आ जाए तो यह काम भी 'उधारीÓ में ही चल जाता है।
पंजाब के रोपड़ से डाउन स्ट्रीम निकलने वाली नहरों पर पंजाब पुलिस के लिए हरियाणा, राजस्थान व दिल्ली तक में लाशें तलाशने का काम करने वाले एकमात्र डाइवर आशू मलिक की दास्तान खासी चौंका देने वाली है। क्षेत्र में डूबने की कोई बड़ी घटना होती है तो चारों तरफ वायरलेस गूंज उठते हैं और जिप्सियां उसे लेने दौड़ पड़ती हैं। पुलिस डूबे लोगों की खोज करने उसे ठेका दे देती है। हाल ही के महीनों में बस्सी पठाना में एक साथ छह लोगों को नहर में फेंक देने अथवा डूब जाने की घटना के बाद हुई 'आउट सोर्सिंगÓ में आशू मलिक ने 96 लाशें तलाश ली। इन सभी की वीडियो रिकार्डिंग की, फोटो खींचे तो 16 लापता लोगों का खुलासा हो गया। यानी पुलिस के 16 केस एक ही झटके में हल हो गए, शेष पर पुलिस ने 174 सीआरपीसी की कार्रवाई कर ली। आशु मलिक ईमानदारी से स्वीकार करते हैं कि अक्सर पुलिस इस सारे झमेले से बचने लाश का पता चलने के बावजूद लाश को रोकती या निकालती नहीं है, बस आगे जाने देती है। यह क्रम नंगल से शुरु हो हरियाणा सीमा पर खनौरी तक चलता है, लेकिन एक बार राजस्थान फीडर में जाने के बाद वे कभी नहीं लौटते।
हालांकि इस बार आशु मलिक की निकाली लाशों का पंजाब में खनौरी, हरियाणा में हांसी, हिसार, कुरूक्षेत्र और राजस्थान तक में मिली इन अज्ञात लाशों का पीजीआई रोहतक व दिल्ली के बाबू जगजीवन राम अस्पताल तक में पोस्टमार्टम हुआ और संस्कार भी। कम मेहनताना होने की दुहाई के साथ ही आशु मलिक कहते हैं कि इसी मामले में 72 हजार तो फतेहगढ़ साहिब पुलिस का ही बकाया है। इसके अलावा 40 हजार की एक अलग राशि है। फ्री में काम के सवाल पर वे बताते हैं कि जिन लोगो का बंदा मिल जाता है उनसे मदद जरूर मिल जाती है पर यह नियमित नहीं है। हालांकि लाशों की सूचना संभालने किसी एसएसपी ने लैपटाप दिया तो किसी ने रिकार्ड करवाने कैमरा पर वेतन कहीं से नहीं मिला।
आशु कहते हैं कि 'हम वो गली सड़ी लाशें निकालते हैं... रिश्तेदार हाथ लगाना तो दूर... देख मुंह पर कपड़ा रख...हाथ लगाते ही हड्डीयों का ढ़ांचा हाथ में...Ó। सरकार के लिए काम में 2006 में सरहिंद के फलोटिंग रेस्टोरेंट के पास से विस्फोटक व हथियारों का जखीरा निकाला तो तत्कालीन रेल मंत्री लालू यादव, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, मनिंदरजीत बिट्टा से प्रशंसा पत्र मिले सभी ने कहा काम देंगे पर नौकरी इस बार भी नहीं मिली। 2007 में दिल्ली के पास इंडियन आयल के टैंकर के साथ डूबे 27 मजदूरों को निकाला, इसी प्रकार 2006 में छह स्कूली बच्चों को निकाला पर खाली प्रशंसा मिली।
आशु सवाल करते हैं कि पानी में तैरने वालों को सरकार डीएसपी बना रही है...दो दो करोड़ रूपये सरकारें दे रही हैं, पर यहां किराए के मकान में बख्शीश में पिछले 22 सालों से गुजारा कर रहे हैं।

बाक्स
अगर योग्यता है तो सरकारी नीति अनुसार मदद होगी: डीआईजी


पंजाब पुलिस के डीआईजी एलके यादव ने कहा है कि ऐसे लोगों की पुलिस में जरूरत है। अगर व्यक्ति में योग्यता है और सरकार की नीति अनुसार अनुमति देती है तो पुलिस में अवश्य जगह मिलेगी। मामला अब तक उनके नोटिस में नहीं है। उम्र आदि की वजह से अगर नौकरी ना भी दे पाए तो किसी अन्य तरीके से पुलिस के साथ जोड़ा जाएगा।

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