Monday, 29 October 2012

बारिश बनने लगी प्रकोप, चावल के बदरंग होने के आसार


- प्रकृति के साथ चले किसान रहे फायदे में, देरी से रोपाई करने वालों को हो रहा फायदा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
खरीफ की फसल को सबसे अधिक पानी की जरूरत बुआई के समय पड़ती है और यही दिन भीषण गर्मी के भी होते हैं, लेकिन इस साल जून महीना पूरी तरह से सूखा निकला जुलाई में चार-पांच बारिशें जरूर हुई। आंकडों के लिहाज से 62 फीसद तक मानसून पिछड़ा रहा। अगस्त से लगातार हो रही बारिश ने मानसूनी आंकड़ों में सुधार कर दिया, लेकिन सितंबर के इन दिनों में हो रही बारिश ने धान से बनने वाले चावल के बदरंग होने के आसार बढ़ा दिए है।
कृषि के जानकार बताते हैं कि बारिश से होने वाला नुकसान किसान के साथ शैलर मालिकों तक भी पहुंचेगा और ज्यादा बारिश होने की स्थिति में निर्यात के साथ विदेशी मुद्रा लाने वाला मंहगा चावल भी कम सफेद रहा तो असर दूर तक होगा। इसी प्रकार शीट ब्लाइट व होपर जैसी बीमारियों से जूझ रही धान की फसल पर बारिश के साथ तेज हवा भी चल गई तो नुकसान उपज की शक्ल में भी होगा। धान का पौधा अब इतना बड़ा हो चुका है कि हल्की हवा से भी झूलने लगा है। बल्लियां पूरी तरह से खिल चुकी हैं और दानों से भारी भी हो गई हैं। इस स्थिति में हवा व बौछारों से पौधे के गिरने की सूरत में झाड़ कम रहना तय है।
दिलचस्प है प्रकृति के साथ चले किसान इस सीजन में फायदे में रहे हैं। नाभा रोड स्थित रौणी गांव के अमरीक सिंह बताते हैं कि देरी से रोपाई करने वालों को इन बारिशों से फायदा हो रहा है। इन लोगों ने पहले भी रोपाई के समय मंहगा डीजल नहीं जलाया और मौसम के साथ ही देरी से रोपाई की, जिससे ऐसे किसानों को दोहरा फायदा हो रहा है। जुलाई में जिन लोगों ने रोपाई की अब उनकी फसल पर बारिश टॉनिक का काम कर रही है।

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मौसम साफ होने से पहले दवा का स्प्रे ना करें: कृषि विभाग
वहीं मौसम की मार पर सिर्फ और सिर्फ 'अरदासÓ करने की सलाह देने वाले कृषि विभाग के मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि किसी भी तरह की दवा का स्प्रे करने से पहले किसान पूरी तरह से सुनिश्चित कर लें कि मौसम साफ है। हालांकि भादों के इन दिनों में यह जांचना खासा मुश्किल है, ऐसी स्थिति में किसान को चाहिए कि कम से कम एक दिन पूरी तरह से धूप लगने के बाद ही फसल पर बीमारी अथवा कीड़े मार दवा का छिड़काव किया जाए।

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