Tuesday, 27 December 2011

एक्सट्रा धन बैंक में, लोग कानूनी फेरे में, code conduct, black money, income tex


उम्मीदवारों की ओर से सेकेंड लाइन लीडरों को बांटे जाने वाले काले धन को रोकने की कवायद

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला
आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद एक लाख रुपये से अधिक की नगदी लेकर चलने वालों पर की गई कार्रवाई से पकड़ा गया 'एक्सट्रा' धन जहां आयकर विभाग के माध्यम से फिर बैंक में चला गया, वहीं नगदी लेकर चलने वाले लोग कानून के फेरे में पड़ गए हैं।
आयकर विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि उनके पास केस आने के बाद पकड़ा गया धन बैंक में जमा करवा दिया जाता है। कंपनी अथवा संबंधित व्यक्ति के खातों की जांच की जाती है, कि क्या उक्त कंपनी ने नगद राशि अपनी किताबों में दर्ज करवाई है अथवा नहीं। इसके बाद विभाग कार्रवाई करता है।
दिलचस्प है कि पकड़ा गया ये पैसा विभाग की ओर से किए जाने वाले अन्य सर्वे अथवा छापेमारी से अलग है। इसमें मौके पर ही धनराशि का सरेंडर कर आरोपी अपने लिए पेनल्टी सहित टेक्स की राशि की जानकारी प्राप्त कर सकता है और जमा भी करवा सकता है। इसके साथ ही शेष राशि का प्रयोग एक नंबर के पैसे के रूप में कर सकता है। अधिकारी बताते हैं कि राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों व उनके समर्थकों पर चुनाव आयोग की ओर से चुनाव पर होने वाले क्षेत्रों में जारी किए गए निर्देश चुनावों में काला धन आने से रोकने और एक निश्चित सीमा से अधिक खर्च करने पर पाबंदी लगाने के लिए हैं। इसके तहत एक लाख रुपये से अधिक नगदी साथ लेकर चलने पर पाबंदी है।
वहीं एडवोकेट मनोज सोईन कहते हैं कि एक कानून तो यह कहता है कि 20 हजार रुपये से ऊपर का लेन-देन आप सिर्फ चेक से ही करेंगे, लेकिन बैंक से रकम इससे ऊपर की भी निकाली जाती है। कोई व्यक्ति ऐसा तभी करता है जब इमरजेंसी या कैजुअल्टी हो या फिर कोई सौदा करना हो। बैंक से निकले पैसों पर आयकर विभाग कुछ नहीं कर सकता। ठीक ऐसे ही यदि कोई व्यक्ति एक लाख या अधिक राशि के साथ पकड़ा जाता है तो पंजाब में उसका तर्क आढ़ती से पैसा लाने और उधारी चुकाने का होना लगभग तय है। ऐसे में व्यक्ति ने खुद ही विभाग के पास आढ़ती को बही सहित ले जाकर और एक ऐसे व्यक्ति को ले जाना होगा जो ये बताए कि हां उसने उधार दिया था और बस कहानी खत्म। हालांकि वे ये भी कहते हैं कि इस कानून से चुनाव दौरान सर्कुलेट होने वाला वो काला धन जरूर रुकेगा जो उम्मीदवार आगे सेकेंड लाइन लीडरों को बांटते हैं।
दूसरी और पटियाला डिवीजन के आयकर आयुक्त जीएस नेगी ने इस संबंध में किसी तरह की टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। कानूनी रूप से लगने वाली पेनाल्टी पर भी वे कुछ भी बोलने से इंकार करते हैं।

सर्दी से रुका गेहूं के पौधे का विकास, wheat, weather, winter,


गेहूं पर पीली कुंगी का खतरा अभी तक नहीं  यूरिया संयम से डालने की सलाह

भूपेश चट्ठा, पटियाला : पंजाब में फसलों के लिए वरदान कहे जाने यहां के मौसम में थोड़ी सी भी गड़बड़ देश की विकास दर को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। दिसंबर मध्य के बाद भी बारिश न होने से पड़ रही सूखी सर्दी से फसल को नुकसान पहुंच रहा है। इससे गेहूं के पौधे का विकास मानो थम सा गया है।
इन दिनों होने वाली बारिश से पौधे की हल्की सिंचाई हो जाती है। इससे पत्ते पर जमा कोहरा व गर्द धुलने के साथ ही जड़ों को आक्सीजन मिल जाती है। इससे पौधे का विकास होता है। जबकि 'नक्का' तोड़ लगाए जाने वाले पानी से सिंचाई जरूरत से ज्यादा हो जाती है। जिससे जड़ों में पानी जमा हो जाता है और दम घुटने से पौधे का विकास तेजी से नहीं हो पाता।
कृषि विकास अधिकारी डा. एएस मान कहते हैं कि इन दिनों में ऐसा हर साल होता है। इसमें घबराने की जरूरत नहीं है। कई बार फसल के पीला पड़ते ही किसान ज्यादा मात्रा में यूरिया डाल कर अतिरिक्त प्रयास करते हैं। इससे पौधे झुलस जाते हैं। इस साल बीच-बीच में धूप निकलने से गेहूं की फसल पीली नहीं पड़ी। कुछ दिन में पारा चढ़ने पर हालात बदलने की पूरी संभावना है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया चलेगी और फिर जनवरी में पारा चढ़ने पर गेहूं की फसल खिल उठेगी। उनका कहना है कि जल्द आई बारिश अगेती बिजाई वाली गेहूं के लिए तो ठीक रही पर पछैती को मार सहनी पड़ रही है।
कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज, डा. बीएस सोहल बताते हैं कि गेहूं की फसल को प्रदेश में सबसे अधिक मार पहुंचाने वाली बीमारी पीली कुंगी का खतरा अभी तक कहीं भी देखने को नहीं मिला है। धुंध के बाद अगले दिन मौसम के खुल जाने के चलते दिन का तापमान बढ़ जाता है, जिससे नुकसान नहीं हुआ है। अगर इन दिनों बारिश हो जाए तो सोने पे सुहागा होगा। गेहूं के अभी तक बचे रहने के अलावा अन्य फसलों पर पड़ने वाले प्रभाव पर वह कहते हैं कि सीजन में सब्जियों विशेष रूप से आलू-मटर पर कोहरा भारी पड़ सकता है।

Saturday, 24 December 2011

पिछड़ा शुतराणा और पिछड़ता चला गया, shutrana, punjab election, 2012,



भूपेश चट्ठा, पटियाला
रेल मार्ग व किसी बड़े शहर से च्यादा दूरी होने के चलते शुतराणा विधान सभा क्षेत्र को वास्तविक  रूप से पिछड़ा क्षेत्र कहें तो गलत नहीं होगा। पंजाब हरियाणा सीमा पर बसे इस क्षेत्र में कोई बड़ा शहर भी नहीं आता। जिस घग्गर को सामने रख कर चुनाव लड़े जाते हैं वो तो जहां का तहां रहता है। अलबत्ता दोनों ही प्रमुख दलों के नेता अंतत: भावनात्मक मुद्दों की तलाश में रहते हैं। कौन क्या भला करेगा? इस पर चर्चा कम होती है जबकि किसके साथ कितना धक्का हुआ? इसे सामने जरूर रखा जाता है। हालांकि पिछले चुनाव में सबसे उपर डेरे का मुद्दा ही छाया रहा है।
वहीं इस क्षेत्र में बादशाह पुर बैल्ट के डेढ़ दर्जन गांव बाढ़ की मार तले हर साल आते हैं लेकिन बाढ़ नियंत्रण के उपाय नहीं किए गए, घग्गर नदी की बाढ़ के अलावा आम दिनों में नदी के प्रदूषित पानी से फसलों को होते रहे नुकसान के बारे में तो कभी विचार चर्चा ही नहीं हुई। हालांकि भूमिगत जल के प्रदूषित होने पर आरओ सिस्टम दिखने लगे है। इसी तरह पटियाला से समाना-पातड़ां-टोहाना होते हुए जाखल हरियाणा तक रेलवे लाइन बनाने का मुद्दा कांग्रेस ने उठाया जरूर पर अभी लगता है कि दिल्ली दूर है। हालांकि यहां की पातड़ां मंडी आटो मोबील क्षेत्र में प्रदेश की सबसे बड़ी मंडी कही जा सकती है लेकिन वह भी निजी क्षेत्र के दम पर सरकार का इसमें कोई योगदान नहीं है।

निसंदेह दूर दराज का क्षेत्र है: घग्गा
शिरोमणि अकाली दल से चुनाव लड़े व कांग्रेस की बेअंत सिंह सरकार में मंत्री रहे हमीर सिंह घग्गा कहते हैं कि दूर दराज का यह क्षेत्र खासा पिछड़ा है और जन प्रतिनिधत्व के साथ जब वे सत्ता में आए थे तब काफी विकास हुआ। लेकिन घग्गर की बाढ़ नियंत्रण दो राच्यों का मामला है और ऐसे ही रेलवे लिंक में कई अन्य मंत्रालय भी उलझे हैं। मुद्दा लगातार उठाया गया है।



सरकार मांग के विपरीत काम करती है: विधायक शुतराणा
कभी शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर चुनाव जीतते रहे निमर्ल सिंह शुतराणा आजकल कांग्रेस से विधायक हैं। क्षेत्र में विकास के नाम पर कहते हैं कि इस सरकार से जो कह दो ठीक उसका उल्टा करती है। केंद्र से बाढ़ नियंत्रण को जो पैसे आते हैं उसका प्रयोग भी नहीं कर पा रही और क्षेत्र हर साल बाढ़ की मार से जूझता है। बड़ी इंडस्ट्री तो दी नहीं जबकि मंडियों को भी नहीं सुधार सके।

क्या नहीं हुआ
-पटियाला से जाखल तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना सिरे नहीं चढ़ी
-घग्गर की बाढ़ का हल नहीं
-मंडियों के हालात में विशेष बदलाव नहीं
 

हम प्राकृतिक कानून के विपरीत काम कर रहे हैं: डा. आजाद, water supply and sanitation



भूपेश चट्ठा, पटियाला
हम यूरोप से डेढ़ सौ साल पीछे हैं, जिस इंडस्ट्री को वहां प्रदूषण के चलते बंद कर दिया गया उसे हमारे यहां भेजा जा रहा है और हम प्राकृतिक कानून के विपरीत काम कर रहे हैं, यही वजह है कि पर्यावरण में सुधार की बजाए प्रदूषण का ग्राफ बढ़ रहा है। कम्यूनिटी मेडिसन के विशेषज्ञ व जाने माने पर्यावरणविद् डा. अमर सिंह आजाद पंजाब में पेयजल कि स्थिति पर अब तक की हर सरकार के साथ प्रदूषण नियंत्रण करने की जिम्मेदार संस्था को जम कर कोसते हैं।
कहते हैं कि पंजाब के अलावा हरियाणा व हिमाचल प्रदेश की इंडस्ट्री का टॉक्सिक जल, कई तरह के हैवी मैटल व रसायनिक ततवों के साथ और यहां के शहरों का सीवरेज लगातार दरिया व बरसाती नालों में उड़ेला जा रहा है। जो प्राकृति के नियम के विपरीत है। जो पानी एक बार ले लिया जाता है, उसे वापिस नदी अथवा नाले में नहीं डाला जाता, उस पानी का शोधन कर खेती में सिंचाई के लिए प्रयोग करना होता है। लेकिन यहां पर सारी इंडस्ट्री लगाई ही नदी किनारे जाती है, सरकार सोई रहती है और खुद अनुमति देती और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी सारी उम्र में एक भी इंडस्ट्री अथवा प्रदूषण फैलाने वाले को सजा नहीं दिलवा पाता।
डा. आजाद कहते हैं कि जिस पानी की कसमें खाई जाती थी और जिस पर गीत लिखे जाते थे, वो बहता पानी तो कई साल पहले गंदा कर दिया अब तो रिस कर धरती के नीचे पहुंचा पानी बीमारियां दे रहा है।
सरकार को परामर्श

डा. आजाद सलाह देते हैं कि सरकार को हर दिशा में काम करना होगा। नियम कानून को सख्ती से लागू करने के अलावा, घटिया और पुरानी पड़ चुकी तकनीक को पंजाब आने से रोकना होगा। जिससे शराब फैक्ट्रीयों की बाढ़ ना आए, कोयला आधारित थर्मल प्लांट ना आएं। पेस्टीसाइड व रसायनिक खादों का प्रयोग कम कर प्राकृतिक खेती की ओर जाना और शहरों में बड़े पैमाने पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने होंगे। तभी जीवन चक्र में प्रवेश कर चुके टॉक्सिक ततव निकाले जा सकेंगे अन्यथा कैंसर के रूप में ये फूटते रहेंगे।


पेय जल व सेनीटेशन :-पटियाला
कुल आबादी-18 लाख 92 हजार 282
शहरी- सात लाख, 62 हजार, तीन
ग्रामीण-11 लाख 37 हजार 130
-विश्व बैंक के प्रोजेक्ट के तहत पीने के स्वच्छ पानी की एक्सलरेटेड रूरल वाटर सप्लाई प्रोग्राम एआरडब्ल्यूएसपी के तहत हर ब्लाक में चार से पांच प्रोजेक्टों पर काम चल रहा है। कुल कमयूनिटी डिवेलपमेंट सीडी नाम से आठ ब्लाक हैं पांच सौ प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं 33 पर काम चल रहा है।
प्रोजेक्ट नाम-ओवर हैड वाटर रिजरवायर जिसे पानी की टंकी भी कह देते है। औसतन 30 लाख में बन रही है और एक टंकी से औसतन एक हजार की आबादी वाले गांव को सप्लाई,
- पीने के पानी का प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में सीवरेज का काम चालू होगा, अभी इक्का दुक्का पायलेट प्रोजेक्ट हैं। कुछ शर्तो के साथ इस पर काम होगा, तीन एकड़ जमीन हो, सैल्फ ससटेनेबल हो, पंचायत अथवा कमेटी के पास उचित आया हो, 70 फीसदी आबादी सेप्टिक टैंक का प्रयोग कर रही हो तभी सीवरेज की शुरुआत होगी
-टोबे को दुरुस्त करने के प्रोजेक्ट में हर ब्लाक में 25-25 गांव किए गए हैं
-पीने के पानी की व्यवस्था 2012 के अंत तक पूरी हो जाएगी, शहरी क्षेत्र में आबादी कवर है, लेकिन नहरी पानी राजपुरा में आता है। शेष में भूमिगत जल का ही प्रयोग होता है।
-पटियाला में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का वायदा पूरा नहीं हुआ, 131 करोड़ के सीवरेज प्रोजेक्ट पर दोनों ही पार्टियां दावे प्रति दावे कर रही हैं। भूपेश चट्ठा

चुनावी चटकारे:-chunavi chtkare


भूपेश चट्ठा, पटियाला

नेता जी का पर्सनल नंबर

-चुनाव सिर पर हैं और कई नेताओं का टिकट भी लगभग पक्का है पर पांच साल के आराम से पीछा नहीं छूटा है और ना ही पुराना हैंग ओवर उतर रहा है। ऐसे में एक पुराने कार्यकर्ता के मन में नेता जी के साथ पुराना प्यार जागा तो किसी तरह से रूटीन वाले नंबर पर ट्राई करने के बाद बात ना बनी तो नए मोबाइल नंबर का जुगाड़ कर लिया।
वहीं जब नंबर देने वाले ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी और नेता जी का पर्सनल नंबर दे कर कह डाला ये पर्सनल नंबर है, खुद ही उठाएंगे, अगर जाग रहे हुए तो...

ये क्या मुसीबत है?

जिले के दक्षिणी हिस्से का एक विधान सभा क्षेत्र का कुछ हिस्सा किसी के जुगाड़ के चलते शहर के उत्तरी क्षेत्र तक आ गया है। चूंकि नेता जी क्षेत्र नया था ऐसे में नए लोगों के बीच तुरंत ही जाना पड़ा। खाली आने जाने का अब जमाना नहीं रहा ऐसे में आखिरी साल में काम करवाने भी जरूरी हैं, सो ईशारा मिलने के अगले ही दिन से भाग दौड़ शुरु हो गई। नेता जी ने सैंकिड लाइन की तलाश कर उनसे जरूरतें पूछी और अपने रसूख का इस्तेमाल कर संपर्क भी दे दिए पर सैकिंड लाइन के अपने मुद्दे होते हैं। बैठक में जब भी बात सिरे चढऩे को हो सैकिंड लाइन का प्रतिनिधि अपनी चला दिया करे। थोड़ी  ही देर में अफसरों को लोकतंत्र की शक्ति का अहसास हुआ तो नेताजी को भी लगा कि ये क्या मुसीबत है? पर साथ ही अपनी मजबूरी भी सामने आ गई तो कहने लगे ईनू हजे कर लेण दे।

चुनावी चटकारे

विवाह में नेता जरूर पर गनमैन घटे

विधान सभा चुनावों से पहले आए आखिरी  विवाह सीजन में नेता जी को अपने ही विधान सभा क्षेत्र की एक से दो हजार की गैदरिंग आराम से मिल रही है, और नेता जी ने भी अपने बंदे लगा रखे हैं कि किसी के यहां शगुन देने का काम रह ना जाए। ऐसे में जहां पिछले सीजन तक घर के ही अन्य लोग हाजरी लगाने जा रहे थे और ऐसे समारोहों में गनमैन कुछ च्यादा ही चमकते थे पर अब इसमें बदलाव आ गया है। समझदार हुए नेता जी कहते हैं कि अच्छा नहीं लगता, क्यों? दिलचस्प है कि अब लगभग हर निमंत्रण पत्र पर नेता जी खुद पहुंच रहे हैं और वो भी बिना या कम फौज के। इसके साथ ही साथ रहने वाले लोगों का पूरा ध्यान रखते हुए कैडर के कद के अनुसार पूरा समय दिया जाता है। गनमैनों को अब शक्ति प्रदर्शन के रूप में ना दिखा कर सुरक्षा के लिहाज से जरूरी तो बताया जाता है पर दूर खड़ा कर आम पब्लिक को मिलने देने में किसी तरह की परेशानी ना हो इस तरह की हिदायतें भी दी गई हैं। पर ये पब्लिक है सब जानती है...


चुनावी फीवर है नहीं उतरेगा
ावी लोकतंत्र में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने वालों को चुनावी फीवर होना आम है। दिलचस्प है पंजाब में विधान सभा के चुनाव लगाता
चुनावों में नेताओं कम से कम चुनाव सर्दियों में ही होते आ रहे हैं। इस बार के चुनाव के अलावा पिछले दो में भी सर्दी की भूमिका रही है। याद रहे कि इक्का दुक्का नेताओं को छोड़ दें तो शेष सभी वही हैं जो नब्बे के दशक के अंत में थे पर अब उनकी सेहत वैसी नहीं है जो तीन-चार चुनाव पहले हुआ करती थी। ऐसे में चुनावी फीवर का असर इस बार कुछ च्यादा है। शुगर-ब्लड प्रैशर-युरिक एसिड की कभी कभार होने वाली जांच अब दिनचर्या का हिस्सा बन गई है। परहेज भी पूरे हैं पर फीवर शरीर के उपरी हिस्से में है ऐसे में दवाओं का असर नहीं हो रहा जो फीवर उतार सके पर चैकअप जारी है।  


500 का शगुन 100 में चलता रहा

चुनावी चटकारे

मैं प्रधान हां

हाल ही में हुई एक के बाद एक रैली से उत्साहित एक नेता जी अपने चंद चुने हुए दोस्तों की टीम को लेकर थकान उतारने शॉपिंग माल में जा पहुंचे, पहले बात फिल्म देखने तक थी पर चूंकि थकान कुछ च्यादा थी सो शक्ति वाटर का इस्तेमाल करने की सलाह दे दी गई जिसे स्वीकार भी कर लिया गया। चूंकि मामला प्रधान जी का था तो माल में कुछ कायदे कानून किनारे कर सप्लाई कार तक सुनिश्चित कर दी गई। इतने में भीड़ में से गुजर रहा एक मोटर साइकिल कार से टकरा गया। बस फिर क्या था प्रधान जी पुरानी फार्म में आ गए और बंदा धुन दिया गया। पब्लिक भी आजकल जागरुक है ऐसे में विपक्ष भारी पड़ा तो प्रधान जी के दोस्त भी पिछली कार से आ गए, सत्ता समीकरण पूरे ना बैठे तो नेता जी ने पुलिस बुलवा ली अब नेता जी पहचाने नहीं जा रहे थे तो बताना पड़ा के मैं प्रधान हां। बताया जा रहा है कि देर रात बुजुर्गों ने बीच बचाव कर समझौता करवा दिया।

ये आचार संहिता कब लागू होगी?

एक ओर फटाफट काम निपटाए जा रहे हैं तो दूसरी ओर से एक ही सवाल उठ रहा है कि ये चुनाव आचार संहिता कब लागू होगी? बात इसी महीने से शुरु होती है। फिर अंतिम सप्ताह तक जाती है, थोड़ी गणना और अपने चंडीगढ़ के खास बंदे का हवाला दिया जाता है, फिर एकदम से बताया जाता है कि 15 को हो जाएगी, जबकि सामने वाला अगर थोड़ा भी प्रशासन से जुड़ा हुआ है और पुराने चुनाव देख चुका है तो सेफ प्ले में बताया जाता है कि 20 से 24 दिसंबर के बीच लागू हो जाएगी। इस आंकड़े को मान भी लिया जाता है। अरे भई जो पांच साल में नहीं हुआ वो पांच दिन में क्या बदल जाएगा। कर लेने दो किसी के तो पल्ले पउ़ रहा है। बाकि कोड कंडक्ट ये अगर किसी को पता है तो वो अकेला चुनाव आयोग।

पांच दिन बाद पिक्चर क्लीयर होगी

विधान सभा चुनावों की तारीख तय नहीं हुई, चुनाव आचार संहिता लागू नहीं हुई, यहां तक की राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों को टिकट भी अलाट नहीं किए हैं लेकिन विधायक तो अलग, सरकार और मुख्यमंत्री तक के नामों की घोषणा हो रही है। हर दिन, हर गली मुहल्ले के साथ ही सरकार बदल भी रही है। ऐसे में अब एक नया जुमला चल निकला है कि नौकरशाही अभी नहीं बोल रही पर आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के पांच दिन बाद में पूरी पिक्चर क्लीयर हो जाएगी। दिलचस्प  है कि बाजारू विश्लेषकों को किसी तरह के सहायक आंकड़ों की भी जरूरत नहीं है।

भाई साहब मुझे भी एडजस्ट करो

आजकल नेताओं का खुद मिन्नत करने का दौर चल रहा है। जो कभी आलाकमान से सीधे व पारिवारिक संबंधों की बात करते थे इन दिनों में मिलने के लिए तरस रहे हैं। जिस किसी को इशारा हुआ है उसकी बांछे खिली हुई हैं, लेकिन जिस किसी के सामने इशारा हुआ है उसे लग रहा है कि वो दुनिया का सबसे सताया हुआ आदमी है, उसे लग रहा है कि पार्टी ने उसके साथ न्याय नहीं किया। दिलचस्प है कि इन लोगों में सबसे च्यादा संख्या उनकी है जिन्होंने अच्छे कैरियर के अवसर तलाशने पार्टी व नेता बदले हैं। इस पंक्ति के नेता जी का आलम ये है कि सूझ ही नहीं रहा कि किससे मदद के लिए कहें और किससे नहीं बस एक ही गुहार लग रही है कि भाई साहब मेरी मदद करो, ऐंवे तां धक्का है।

चुनावी चटकारे
प्रस्तुति:- भूपेश चट्ठा, पटियाला

फोटो बड़ी करवा लो
चुनावी सीजन में हर तरफ प्रचार तंत्र की बल्ले बल्ले हो रही है, मीडिया से लेकर सड़क किनारे हो रही पब्लिसिटी अब ड्राइंग रूम तक पहुंच गई है। छोटा हो या बड़ा पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, सिर गिनने वाले लोकतंत्र में हर कोई अपने मतलब के संपर्क सूत्र साधने में लगा है। इसमें सबसे च्यादा भूमिका तस्वीरें निभा रही है। बड़े नेता जी आपके पिताजी के भोग में आए या आपकी बहन की शादी में हर वो तस्वीर कीमती हो गई है जिसमें आपके सबसे करीब बैठे नेता जी आपसे बात करते दिखाई दे रहे हैं। दिलचस्प है कि लेमीनेशन पुरानी हो चुकी तस्वीरों को अब ना केवल बड़ा करवाया जा रहा है, बल्कि उन्हें ऐसे स्थान पर लगाया जाता है, जहां नेता जी से मिलने आने वाला पहले कुछ देर बैठ कर मन बना ले।

दो का टाइम था डेढ़ बजे आ गए रोटी भी...

शहर में एक बड़े नेता जी ने आना था समय भी व्यक्तिगत रूप से घोषित किया गया तो फोन सुनने वालों को लगा कि उन्हें च्यादा महत्वपूर्ण कार्यकर्ता समझ किसी विशेष चुनावी मुद्दे पर चर्चा के लिए बुलाया जा रहा है हो सकता है कि टिकट संबंधी ही चर्चा हो जाए ऐसे में दो का टाइम था तो जनता लंच छोड़ अगली पंक्ति में बैठने के लिए डेढ़ बजे ही पहुंचनी शुरु हो गई। बात तीन-चार बजे तक तो खास नहीं रही पर शाम साढ़े पांच बजे बैठक स्थल पर लाइटें लगनी शुरु हुई तो भूख भी बढऩे लगी और सर्द मौसम में रोटी और किसी पेय पदार्थ की याद आने लगी। इतना ही नहीं एक स्पष्ट वादी ने तो राजनीति को जलालत तक बता डाला और कहा कि की करिए बीओओएस बॉस हैं।

हुण साडी यारी सिधी पै गई ए

पटियाला: हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते। लेकिन ये भी कहा जाता है कि जब वो दिन नहीं रहे तो ये भी नहीं रहेंगे। ठीक ऐसे ही हालात आजकल आनन फानन वाली राजनीतिक रिश्तेदारी में हो गए हैं जहां पहले करीबी रहे बंदे को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया जाता है और जब बात सीधी हो जाए तो सीढ़ी को हटा भी दिया जाता है, मानों सीढ़ी की कभी जरूरत ही नहीं पड़ेंगी। 'हुण साडी यारी सिधी पै गई एÓ के सिद्यांत पर चलने वाले  सेकंड लाइन नेतागिरी करने वाले के कुछ लोग अक्सर भूल जाते हैं कि अगर सीढ़ी ना रही तो उतरने  पर गिरने के चांस च्यादा रहेंगे।

कभी लिफाफे बांट पब्लिसिटी तो कभी फोन ना उठाना  

पटियाला : जिले के एक कद्दावर कहे जाने वाले नेताजी हर काम पैसे के दम पर ही करवाना चाहते हैं, हालांकि उनकी यही आदत पिछली बार छह महीने के लिए उन्हें कोप भवन में ले गई थी और अफसोस से ही बाहर नहीं निकल पाए थे। पर पुरानी आदतें हैं देरी से जाएंगी, जाएंगी भी या नहीं कहा नहीं जा सकता। अब भी नेता जी को जब जरूरत महसूस होती है तो वे लिफाफे बांट कर पब्लिसिटी की उम्मीद करते हैं तो कभी फोन भी खुद उठाना  पसंद करते, ऐसे में नेताजी के बंदों की तो मौजें हैं पर नेताजी का क्या होगा? कुछ नहीं कहा जा सकता पर इससे इतना तो तय है कि अपनी बात कहने हर बार लिफाफा भारी करना ही पड़ेगा नहीं तो...  

घग्गर की बाढ़, नियंत्रण दूसरे ही चरण में अटका, issues, punjab election, 2012, river ghagger,


...घग्गर का मुद्दा
सरकारें बदलती रहीं पर नहीं बदले हालात
-मात्र 17.5 किलोमीटर ही हो पाया चैनेलाइजेशन का काम
-अब केंद्र ने पटियाला, फतेहगढ़ साहिब और संगरूर के 12 शहरों के लिए घोषित किया 296.96 करोड़ का प्रोजेक्ट
 भूपेश चट्ठा, पटियाला
पक्ष-विपक्ष में रहने वाला क्षेत्र का चुनाव लडऩे वाला हर वो नेता घग्गर की बाढ़ से निजात दिलाने की बात करता रहा है और ये सिलसिला संभव है कि आजादी के बाद से चला आ रहा है। सरकारें, विधायक और सांसद बदलते रहे पर घग्गर के आस पास रहने वालों के हालात नहीं बदले हैं।
हिमाचल प्रदेश के डग्शई से शुरु हो पाकिस्तान तक बहने वाली इस नदी से पंजाब-हरियाणा के अलावा राजस्थान भी प्रभावित होता है लेकिन सबसे ज्यादा मार पटियाला व संगरूर जिलों में करीब दो सौ किलोमीटर क्षेत्र पर पड़ती है। इस सबके बावजूद घग्गर की बाढ़ नियंत्रण का कार्य दूसरे ही चरण में अटक गया है। पहले चरण में खनौरी से मकरोड़ साहिब के बीच मात्र 17.5 किलोमीटर नदी के चैनेलाइजेशन का काम मुक म्मल हुआ है।
दूसरे चरण के 21.7 किलोमीटर में मकरोड़ साहिब से पंजाब के कड़ैल अथवा हरियाणा के जाखल तक चैनेलाइज करने के बाद अन्य सहायक नदियों के किनारे पक्के करने के प्रोजेक्ट शुरु होने थे। इसी क्रम में हरियाणा राज्य की ओर से अपने क्षेत्र में बांध बनाने को पंजाब ने सुप्रीम कोर्ट में 70 गांवों के आठ फीट पानी में डूबने का हवाले दे आपत्ति जताई गई तो केंद्र की ओर से फरवरी में प्रोजेक्ट रोकने पर उपमुख्य मंत्री सुखबीर बादल ने इसी साल फरवरी में मूणक में लोगों के साथ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया।
इसके बाद केंद्र ने पटियाला, फतेहगढ़ साहिब और संगरूर के 12 शहरों के लिए 296.96 करोड़ का प्रोजेक्ट दिए जाने की घोषणा कर रखी है। इसमें डेरा बस्सी, बनूड़, राजपुरा, घनौर, पातड़ां, खनौरी, लहरा गागा, मूणक, फतेह गढ़ साहिब, नाभा, बसी पठाना, मंडीगोबिंद गढ़ के नाम शामिल हैं।

केंद्र सिर्फ बातें करता है: सेखों

पंजाब सरकार के सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों कहते हैं कि ये लोग इजाजत ही नहीं दे रहे। केंद्र में बैठे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के मंत्री ही आगे नहीं बढऩे देते। केंद्रीय केबिनेट मंत्री जय राम रमेश से मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की मुलाकात के बाद हुई घोषणा पर वे कहते हैं कि सिर्फ बाते ही हैं। पौने तीन सौ करोड़ का प्रोजेक्ट बना कर भेजा था अभी तक मंजूरी नहीं आई है।

हमने पहला चरण पूरा करवाया: लाल सिंह

पूर्व सिंचाई मंत्री लाल सिंह कहते हैं कि पहले चरण के लिए नाबार्ड से 72 करोड़ रूपये मंजूर करवा और दस करोड़ अपनी सरकार से लगाने के बाद उन्होंने पहला चरण पूरा करवाया। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए प्रोजेक्ट की नींव पत्थर रखा और पूरा भी करवाया। जिसमें दो पुल और दोनों ओर बांध पक्के करवाए। पंजाब में खनौरी से हरियाणा के जाखल तक कुल 40 किलोमीटर तक चैनेलाइज करने का कार्य था जिसे मौजूदा सरकार आगे नहीं बढ़ा सकी।

मंहगी हुई चीनी की मिठास पर सरकारी मिल रही ठंडी, issues, punjab election, 2012, patiala,


मुद्दा:- कोआपरेटिव चीनी मिल
-कर्मियों को नहीं मिला 23 महीनों से वेतन
भूपेश चट्ठा, पटियाला
नाभा रोड़ स्थित जिले की इकलौती  कोआपरेटिव शुगर मिल पिछले चुनावों में समाना विधान सभा क्षेत्र के लिए खासी महत्वपूर्ण थी कारण था ढ़ाई सौ से च्यादा कर्मियों के परिवारों की वोटें, जिन्हें उन दिनों वेतन नहीं मिल रहा था, हालांकि गेहूं-धान से अलग हट गन्ना उत्पादन करने वाले किसानों के बारे में किसी ने नहीं सोचा पर कर्मियों के धरने प्रदर्शन पर वायदे होते रहे। दिलचस्प है कि कोआपरेटिव क्षेत्र की रखड़ा शुगर मिल समाना विधान सभा क्षेत्र से बाहर हो कर पटियाला ग्रामीण का हिस्सा हो गई और चीनी की मिठास भी मंहगी होती रही पर सहकारी क्षेत्र की यह मिल ठंडी ही रही।
मिल के कर्मियों का 23 महीनों से वेतन अब भी बकाया है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने काम नहीं किया पर मिल फिर भी नहीं चल पाई।

कब क्या हुआ?
 इसी सरकार के सहकारी मंत्री स्व. कैप्टन कंवलजीत सिंह 19 जनवरी 2008 को हुई बैठक में रखड़ा सहित राच्य की तीन मिलों को लीज पर देने निर्णय लिया था 30 सितंबर 2009 तक काम निपटा देना था। इसी साल कर्मियों को वेतन व दिवाली का बोनस भी मिला और यह इआदेश भी दजारी हुआ कि पुराने लोन की किश्त इसमें से ना काटी जाए। मिलों को शुगर हाउस बना कर यहां से एथनाल बाजार में बेचने और इनकी क्षमता को बढ़ाने का निर्णय हुआ। लेकिन कैप्टन कंवलजीत की 29 मार्च 2009 को मृत्यु के बाद मिलें एक बड़े अकाली नेता के हवाले हो गई और अब फिर बीओटी के आधार पर देने का निर्णय इसी दिसंबर में कैबिनेट की बैठक में लिया गया है।

बीओटी आधार पर देने का हुआ है निर्णय : रखड़ा

पूर्व विधायक व जिला योजना बोर्ड के चेयरमैन सुरजीत सिंह रखड़ा कहते हैं कि वे इस मिल के चेयरमैन रहे हैं और 2002 में कांग्रेस सरकार आने तक यही मिल डेढ़ सौ फीसदी क्षमता पर लाभ में काम कर रही थी लेकिन कांग्रेस सरकार के आने के बाद गन्ना गायब हो गया और मिल ठप्प हो गई। अब अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार ने कर्मियों को वीआरएस दे कर इस मिल को बिल्ट ओन आपरेट के सिद्यांत पर देने का निर्णय लिया है। कर्मियों के वेतन के सवाल पर वे कहते हैं कि करीब सौ लोगों का एक मामला न्यायालय में चल रहा है, जो बीओटी में तकनीकि अड़ंगा नहीं है।


दो बार उठाया विधान सभा में मुद्दा: ब्रहम महिंदरा

कांग्रेस के समाना से विधायक ब्रहम महिंदरा कहते हैं कि सरकार को चाहिए कि किसानों को गन्ने पर अधिक समर्थन मूल्य दें जिससे किसानों का भला हो और चीनी मिलों को भली प्रकार से चलाए जाने के अलावा आम आदमी को सस्ती चीनी मिलने का रास्ता भी कुछ कदम तय हो। वे कहते हैं कि उन्हें समझ नहीं आता कि प्राइवेट सेक्टर में चीनी मिलें आराम से चल रही हैं जबकि कोआपरेटिव सेक्टर में कर्मियों को महीनों से वेतन ही नहीं दिया जा सका है। विधान सभा में कर्मियों के वेतन ना मिलने और मिल के बंद होने का मुद्दा वे दो बार उठा चुके हैं। क्षेत्र कि रखड़ा मिल पर पे कहते हैं कि इसे तो बेचने का प्रावधान भी सरकार ने एकबार कर दिया था, फिर ना जाने क्या हुआ कि ना मिल चली ना बिकी।