Thursday, 8 November 2012

जहां बिकती है, वहां भी जलती है पराली


जहां दाम हैं वहां भी बेदम करती पराली
जागरण एक्सक्लूसिव
-दो से ढ़ाई हजार रूपये प्रति एकड़ की अतिरिक्त कमाई पराली मात्र से ही की जा सकती है
-कंपनी दे रही मुफ्त मशीन, मिस्त्री, कटर, धागा और 70 रूपये क्विंटल के दाम
- प्लांट को पूरी पराली ना मिली तो गांवों का दायरा बढ़ाना पड़ा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
करे कौन?...आखिर मोल ही क्या है?, सरकार ले जाए खेतों से? खेत साफ करने आग तो फिर भी लगानी पड़ती है। जैसे बेतुके जुमले देकर किसान धान की पराली वहां भी जला रहा है जहां पराली बिक रही है। और तो और सरकार ने पराली जलाने से बचाने के साथ साथ खेत की उर्वरा शक्ति संजोए रखने, किसानों को सालों पहले ही उपाय देते हुए आय का अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध करवा दिया था।
बात पंजाब हरियाणा सीमा पर स्थित घनौर ब्लाक के बघौरा गांव की है। जहां पर 12 मेगावाट का बायोमॉस ईंधन चलित बिजली उत्पादन केंद्र चल रहा है और इस प्लांट में एक लाख टन से अधिक धान की पराली हर साल खप रही है। क्षेत्र के किसानों से इन दिनों में 70 रूपये क्विंटल की दर से पराली खरीद कर स्टोर कर ली जाती है और वर्ष भर बिजली का उत्पादन किया जाता है।
निजी क्षेत्र में लगे इस प्लांट से बिजली लेने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के अधिकारी बताते हैं वर्ष 2006-07 में शुरु किए इस प्लांट का उद्ेश्य 25 किलोमीटर की परिधि में मौजूद करीब सवा सौ गावों से पराली की खरीद करना। इससे बिजली बनाने के अलावा क्षेत्र के लोगों को बीमारियों से निजात मिलना, प्रदूषण से रोकथाम व धरती की उर्वरा शक्ति बनाए रखना और पर्यावरण में संतुलन कायम रखना अन्य लाभ मिलने तय थे। लेकिन अब प्लांट के फ्यूल मैनेजर दलजीत सिंह बताते हैं कि पराली खरीदने अब उनका दायरा बढ़ा है अब वे प्लांट से 40-50 किलोमीटर दूर भूनरहेड़ी क्षेत्र से भी पराली खरीद रहे हैं। प्लांट के लिए हर महीने 10 से 12 हजार टन पराली की जरूरत है तय इलाके से आपूर्ति ना होने की स्थिति में अब 160 से अधिक गांवों का रुख किया गया है।
दिलचस्प है कि मैसर्स पंजाब बायोमॉस की ओर से क्षेत्र में किसानों को एक सौ से अधिक बोलर मशीनें दी गई है। इसके साथ ही कटर व गट्ठे बांधने को धागा व खराब हुई मशीनों को ठीक करने मिस्त्री तक उपलब्ध करवाए गए हैं। किसान को ज्यादा दूर ना जाना पड़े इसके लिए दस कलेक्शन केंद्र भी बनाए गए हैं। इन तक पराली पहुंचाने पर 70 रूपये प्रति क्विंटल की दर से भुगतान भी किया जाता है।
दूसरी ओर सील गांव के प्रोग्रेसिव किसान हरदीप सिंह कहते हैं कि पांच-छह साल पहले कंपनी ने मशीनें देकर पराली खरीदनी शुरू की थी। दाम तब 60 रूपये क्विंटल रखे गए थे, तब से अब तक कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। जबकि धान के एमएसपी में खासी बढ़ोतरी हुई है और डीजल भी मंहगा हो गया है। हालांकि मुख्य रूप से सब्जी की काश्त करने वाले हरदीप सिंह यह भी कहते हैं कि अगर थोड़ी मेहनत कर ली जाए तो दो से ढ़ाई हजार रूपये प्रति एकड़ की अतिरिक्त कमाई पराली मात्र से ही की जा सकती है। दुनिया को प्रदूषण व जीव हत्या से भी बचा जा सकता है। धरती के नीचे प्राकृतिक रूप से चल रही खाद बनाने की फैक्ट्री भी नहीं जलेगी, जो अगली फसल की बिजाई में भी काम करेगी।



चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ा था पराली प्रदूषण अभियान
कृषि व कृषक हितैषी कही जाने वाली पंजाब सरकार पिछले साल पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम करने में पूरी तरह से असफल रही थी। कारण सिर्फ और सिर्फ चुनावी था। इस साल हुए विधान सभा चुनाव से ठीक पहले के सीजन में सरकार और प्रशासन ने किसानों को सिर्फ 'जागरुकÓ ही किया है। किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई करने से बचती रही।
बीते साल ही मोगा के गांव में खेत में जल रही पराली में एक आटो रिक्शा में बैठे तीन बच्चों के चपेट में आने से मौत हो गई थी। दिलचस्प है कि उन दिनों पंजाब सरकार के लिए धान की खरीद व लिफ्टिंग में जुटे विशेष सचिव दरबारा सिंह गुरु लगातार कहते रहे कि 'पहले लोगों को जागरुक करना जरूरी है।Ó हालांकि बाद में उन्होंने भी चुनाव लड़ा।
कांग्रेस के शब्दों में शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में चाहे कुछ ना किया हो लेकिन वर्ष 2007 से 2011 तक की सरकार ने पंजाब में सब सोयल एक्ट(धान की बिजाई 10 मई से और रोपाई 10 जून से करवाना) को सफलता पूर्वक लागू करने के अलावा पराली को जलाए जाने प्रति कड़ाई से कानून की पालना करवाना। दो महत्वपूर्ण कामों के लिए जाना जाएगा। फिर भी चुनावी साल में अपने सबसे बड़े वोट बैंक के आगे यह सरकार भी पिछले साल नतमस्तक हो गई थी।


पराली जलाने की रोकथाम पर कानून
 कानून अनुसार अभी तक केवल धारा 144 के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है। इसी के तहत पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सिफारिश पर जिले में तैनात डिप्टी कमिश्नर अपने जिला मैजिस्ट्रेट के अधिकारों का प्रयोग करते हुए प्रतिबंध लगाता है और इसी धारा के तहत कृषि अधिकारी व एसडीएम के माध्यम से पराली जलाए जाने वालों पर एफआईआर दर्ज करवाता है।

दो दशक में सफलता मात्र 20 फीसद 

90 के दशक में पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण का मुद्दा उठाने वाले पर्यावरण वैज्ञानिक और वर्तमान में पीपीसीबी में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत डा. चरणजीत सिंह नाभा कहते हैं कि दो दशक तक लोगों को समझाने के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाए हैं और आज भी केवल जागरुक ही कर रहे हैं। सफलता का परिणाम 20 फीसद से थोड़ा ही ज्यादा है।

क्या है विकल्प
पराली से गत्ता बनाने और बायोमॉस प्लांट लगा कर बिजली बनाने वाले कामर्शियल उपयोग के अलावा पराली को खेत में ही खुर्द-बुर्द कर खाद में तबदील करने वाले उपायों पर मुख्य कृषि अधिकारी  डा. बीएस सोहल कहते हैं कि अभी में मिनी टिल ड्रिल अथवा रोटावेटर ही चलन में। इससे किसान आंशिक तौर पर मोटे किरचे जला कर शेष को खेत में कुतर लेता है। पूरी तरह से जलाए बिना पराली को खेत में खपा देने वाले हैप्पी सीडरों की संख्या ज्यादा नहीं है। इनके सस्ता होने अथवा कंबाईन की तरह लोकप्रिय होने के बाद आपको पराली कहीं जलती हुई नहीं दिखेगी।



वक्त बदला मंजर नहीं

पटियाला के मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल अनुसार जिले में 2.33 लाख हैक्टेयर में धान की फसल लगी है। इसकी कटाई की शुरुआत हो चुकी है। मोटे अनुमान अनुसार धान का पौधा ठीक ठाक रहे तो प्रति हैक्टेयर 15-16 टन पराली पैदा होती है। ऐसे में साधारण गणित अनुसार 30 से 35 लाख टन पराली का बनना तय है।
वहीं पराली से उपजने वाली गैसों पर कृषि विज्ञानी बताते हैं कि पराली के जलाने से वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटीरियल, फास्फोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जलकर आसमान में चले जाते हैं हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें भी होती हैं, जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक सूर्य की किरणों को 33 फीसदी तक रोके रखती हैं।
इतना ही नहीं पराली जलने से खेत में मित्र कीटों के साथ धरती के नीचे खाद बनाने वाली प्राकृतिक फैक्ट्री को भी हर साल जल जाती हैं। पराली जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के अलावा धरती की उर्वरा शक्ति भी क्षीण होने लगी है।
पटियाला में अभी धान की कटाई शुरु ही हुई है और डिप्टी कमिश्नर जीके सिंह ने धारा 144 के तहत पराली का जलाया जाना प्रतिबंध कर रखा है। फिलहाल किसी तरह की दुर्घटना सामने नहीं आई है।

Tuesday, 6 November 2012

मंहगाई व मौसम के सहारे हुआ पीपीसीबी?


-पटाखों के प्रदूषण पर खामोशी
-बीते साल स्कूलों में चलाया था अभियान, विद्यार्थियों से भरवाए शपथ पत्र
-जागरुकता रैलियां बनी थी आकर्षण केंद्र
भूपेश चट्ठा, पटियाला
चूल्हा जलाने को गैस नहीं मिल रही ऐसे में मंहगाई की मार तले पिस रहे आम आदमी के बच्चे भला पटाखे कहां से जलाएंगे? इस पर मौसम भी साथ है। पिछले साल की तुलना में सर्द मौसम में आ रही दीवाली में प्रदूषण की संभावना वैसे ही कम है। संभावित रूप से इन दोनों 'उम्मीदोंÓ के सहारे इस साल सरकार, पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अथवा प्रशासन की ओर से पटाखों के चलाने से होने वाले प्रदूषण प्रति 'जागरुकÓ करने कम से कम अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।  
पटाखों से हर साल होने वाले प्रदूषण पर इस प्रकार की 'खामोशीÓ पर पीपीसीबी के ही एक अधिकारी बताते हैं कि पिछले साल स्कूलों में महीना भर पहले ही अभियान शुरु कर दिया गया था। दीवाली पर 'ग्रीन प्लैजÓ के नाम से विद्यार्थियों से शपथ पत्र भरवाए गए थे। यह बड़े शहरों से आगे निकलते हुए कस्बों तक में भी चला था। इसके अलावा शहरों में निकाली गई जागरुकता रैलियां भी आकर्षण का केंद्र बनी थी हालांकि रैलियों का सिलसिला पिछले कई सालों से चलता आ रहा है, पर इस बार यह भी नहीं हुआ है।
दूसरी ओर सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि पंजाब में दीवाली धान के बोनस व गेहूं के घोषित होने वाले एमएसपी पर निर्भर करती है। इस बार दोनों तो गायब ही हैं। उस पर ब्याज दरों में कमी ना आने से मकान, मोटर से लेकर हर तरह के लोन की किश्त का कम ना होना... घी, तेल, चीनी, दाल सब्जी के बाद घरेलू गैस, डीजल-पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी और उस पर पड़ी मंहगी बिजली की मार के बीच झूल रहा इंसान इस दीवाली पटाखों पर भला क्या फूंकेगा?
इसी प्रकार पिछले साल दीवाली के रोज चली तेज हवा में पटाखों का रहा सहा प्रदूषण वैसे ही उड़ गया था। इस बार तो पिछले साल के 26 अक्टूबर की तुलना में दीवाली 17 दिन देरी से है। नवंबर मध्य में होने के चलते धान की पराली से होने वाला प्रदूषण खत्म होने को होगा और खेतों में गेहूं की बिजाई शुरु हो चुकी होगी। दीवाली पर ठंड बढऩे से स्मोक व फोग के मिलने से बना स्मोग तो बनेगा लेकिन ज्यादा देर तक आसमान पर नहीं टिक सकेगा और जल्द ही नीचे आ जाएगा। ऐसे में जहरीली गैसों से लेकर रेस्पीरेटरी सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल तक सभी के आंकड़ों में गिरावट दर्ज होनी तय है। ऐसे में हर कोई आराम से है कि हो जाएगा।

एसजीपीसी से भी आतिशबाजी का समय कम करवाया

अपने फैसलों पर अडिग रहने वाली सिखों की सर्वोच्च संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने भी पटाखों से होने वाले प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए अमृतसर स्थित श्री हरिमंदिर साहिब परिसर से होने वाली आतिशबाजी का समय कुछ कम कर इसमें अपना योगदान दिया था। पीपीसीबी के तत्कालीन चेयरमैन केएस पन्नू ने दीवाली के बाद विशेष रूप से एसजीपीसी का इस पर धन्यवाद भी किया था।

बाक्स
विज्ञापन दे रहे हैं मीडिया में: चेयरमैन

पीपीसीबी के चेयरमैन रविंदर सिंह कहते हैं कि विभिन्न समाचार पत्रों व मीडिया में दीवाली पर होने वाले प्रदूषण से संबंधित विज्ञापन जारी कर लोगों को जागरुक करने जा रहे हैं। पिछले साल के समान स्कूली विद्यार्थियों से शपथ पत्र दायर करवाने अथवा किसी अन्य प्रकार का अभियान चलाए जाने के सवाल पर वे कहते हैं कि अभी फाइनल नहीं हुआ है। एक दो दिनों में पूरा अभियान सामने होगा और लोगों से अपील की जाएगी कि पटाखे ना चालाएं।

Saturday, 3 November 2012

किडनी रैकेट की आरोपी मंजू की मौत


-विचाराधीन महिला कैदी को दो दिन पहले लाया गया था अस्पताल
-परिवार ने लगाया जेल प्रशासन पर लापरवाही का आरोप
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
केंद्रीय कारागार पटियाला में बंद किडनी  रैकेट की आरोपी मंजू की बीती रात  तबीयत बिगडऩे से राजिंदरा अस्पताल में मौत हो गई है। इसी साल चंडीगढ़ में हुए किडनी कांड के मुख्य आरोपियों में से एक इस विचाराधीन महिला कैदी को दो दिन पहले ही जेल से अस्पताल लाया गया था। वहीं मृतक के परिवार वालों जेल प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया है।
प्राप्त जानकारी अनुसार किडनी  रैकेट की आरोपी 50 वर्षीय मंजू पांडे की तबीयत ज्यादा खराब होने के बाद बुधवार शाम को ही अस्पताल लाया गया। अस्पताल में ठीक से उपचार शुरु हो पाता इससे पहले ही उसकी मौत हो गई। मृतक के परिवार को टेलीफोन पर इसकी सूचना दी गई। वीरवार रात को अस्पताल पहुंचे उसके परिवार के सदस्यों में से मृतक के लड़के अभिजीत व जंवाई मनीष ने बताया कि मंजू काफी समय से बीमार चल रही थी और उनकी ओर से दी जा रही दवाएं भी जेल प्रशासन मंजू तक समय रहते नहीं पहुंचा रहा था। जिसके चलते ये नौबत आई है। परिवार के दोनों ही सदस्यों का यह भी आरोप है कि मंजू की मौत अस्पताल लाने से पहले ही जेल में हो गई थी।

तबीयत बिगडऩे पर भेजा गया: सुपरडेंट

इसी संबंध में जेल सुपरीटेंडेंट प्रेम सागर शर्मा का कहना है कि मंजू पांडे पिछले काफी समय से बीमार थी। बुधवार को तबीयत ज्यादा बिगडऩे पर ही उसे जेल से अस्पताल इलाज के लिए भेजा गया था। जहां डाक्टरों ने इलाज के दौरान ही मृतक घोषित किया है। जिसके बाद डाक्टरों ने ही मंजू की मौत की सूचना दी है। अब लाश को पोस्टमार्टम के बाद परिवार के हवाले किया जाएगा।

क्या था मामला

11 मई 2012 को चंडीगढ़ के सेक्टर 45 में स्थित सूर्या किडनी अस्पताल से एक लैब टेक्निशियन को गिरफ्तार किया गया था। जिसकी इतलाह पर 12 मई को पिंजोर के रहने वाले मां-बेटे 50 साल की मंजू व 30 साल के अभिषेक को गिरफ्तार किया गया। अभिषेक का नाम रैकेट में शामिल होने और मंजू का रैकेट में मदद करने वालों के रूप में शामिल किया गया। इन लोगों पर मोहाली के फेज आठ के थाने में आईपीसी की धारा 419, 420, 471, 474, 468 व 120 बी के तहत आरोप दर्ज किए गए हैं।

शिक्षा का अधिकार, आधे के थोड़ा पार


-स्कूल की कुल क्षमता का 25 फीसद हिस्से में गरीब छात्रों को देना होगा प्रवेश
-शपथ पत्र ना दायर करने वालों की मान्यता अगले शैक्षणिक सत्र से होगी रद्द
-अभी ब्लाक स्तर से रिपोर्ट आनी है, फिर आंकड़ा और बढ़ेगा: शिक्षा अधिकारी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
रोटी कपड़ा और मकान की बुनियादी जरूरतों के पार जा रहे भारतीय लोकतंत्र में शिक्षा का अधिकार चाहे तकनीकि रूप से संविधान ने आम आदमी को दे दिया हो लेकिन जमीनी हकीकत में यह अभी आधे के थोड़ा पार ही निकल पाया है। राज्य में शिक्षा का हब कहे जाने वाले पटियाला जिले के नौ से कुछ अधिक स्कूलों में से साढ़े पांच सौ ने ही तय समय में जिला शिक्षा अधिकारी के पास शपथ पत्र दिए हैं कि वे अपने यहां पर प्रवेश दिए जाने वाले बच्चों में से एक चौथाई सीटों पर गरीब बच्चों को ही प्रवेश देंगे।
इसी संबंध में जिला शिक्षा अधिकारी प्राथमिक हरिंदर कौर कहती है कि उन्होंने ब्लाक स्तर पर स्कूलों से उक्त परफार्मा भरवाने को कहा था। 550 से अधिक का आंकड़ा जिला मुख्यालय का है। 12 अक्टूबर की अंतिम तिथि के बाद आज पहला कार्य दिवस आया है, ऐसे में अभी ब्लाक स्तर से रिपोर्ट आनी है। इसके बाद आंकड़ा और बढ़ेगा। शिक्षा अधिकारी का कहना है कि जल्द ही प्रदेश को सारी रिपोर्ट भेज दी जाएगी।
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार की ओर से शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत हर स्कूल में गरीब बच्चों को प्रवेश देने की बात कही गई है। अधिनियम अनुसार स्कूल की कुल क्षमता का 25 फीसद हिस्सा गरीब विद्यार्थियों के लिए आरक्षित रखा जाएगा। ऐसा ना करने वालों की मान्यता अगले शैक्षणिक सत्र से समाप्त कर दी जाएगी।
 स्कूलों विशेष रूप से मोटी फीस वसूलने वाले निजी व पब्लिक स्कूलों ने गरीब की परिभाषा को लेकर अड़ंगा लगा दिया और सवाल उठाया कि यह कौन तय करेगा कि गरीब कौन है? इसी बीच स्कूलों की ओर से शपथ पत्र दायर करने की अंतिम तिथि निकल गई, हालांकि इस तिथि को एक बार फिर बढ़ा कर 12 अक्टूबर कर दिया गया है।
वहीं यह भी सामने आया है कि स्कूलों में 25 फीसद गरीब बच्चों को प्रवेश देना सुनिश्चित करने के लिए जो कार्य अथवा होमवर्क शिक्षा अधिकारियों अथवा शिक्षा विभाग की ओर से किया जाना था वो पूरी तरह से नहीं हो पाया है। समाज सेवी संस्थाओं की ओर से चलाए जाने वाले कई ऐसे भी स्कूल हैं जो गरीब बच्चों की मदद करना चाहते हैं लेकिन उन्हें बताया ही नहीं गया कि किस बच्चे को प्रवेश देना है। राच्य सरकार के शिक्षा विभाग के अलावा सेंट्रल बोर्ड आफ स्कूल एजूकेशन की ओर से भी स्कूलों को परफार्मे भेजे गए हैं।
इसी क्रम में डीएवी स्कूल के प्रिंसिपल एसआर प्रभाकर कहते हैं कि वे तो पहले से ही 11 लाख रूपये की मदद अपने स्कूल के बच्चों की कर रहे हैं। उनकी संस्था स्वेच्छा से ही मदद करती रही है। उन्हें खुशी होगी अगर वे कुछ होनहार बच्चों की मदद कर सकें जो पैसों की वजह से पढ़ाई जारी ना रख सकता हो।

गन्ने का बकाया बाकी, फसल बिजाई उधारी से


-हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद हजारों किसानों के अटके करोड़ों
-देरी करने पर 15 फीसद ब्याज के साथ होगा भुगतान: गन्ना कमिश्नर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
गेहूं-धान की फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद 72 घंटों में किसान को उपज भुगतान का दावा करने वाली सरकार एक ओर जहां किसानों को इसी फसलीय चक्र से निकाल कर डाइवरसीफिकेशन का नारा लगा रही है वहीं डाइवरसीफिकेशन वाली प्रमुख फसल गन्ने के बकाया का भुगतान ही नहीं किया गया है। ये भुगतान एक या दो सप्ताह अथवा महीने दो महीने का नहीं अलबत्ता पूरी एक फसल का है और अगर अब किसान गन्ने की ओर रुख करना चाहता है तो अगली बिजाई उधारी से करनी तय हो गई है।
आढ़ती के ब्याज व बाजार की उधारी से जूझ रहा किसान डाईवरसीफिकेशन वाली इस फसल से मुंह मोड़ सकता है। रबी के सीजन में इन दिनों में 'स्यालू गन्नेÓ की बिजाई करने जा रहा है। ऐसे में किसान की दिलचस्पी कितनी होगी? इस पर कंसोरटियम आफ इंडियन फार्मस एसोसिएशन के प्रधान सतनाम सिंह बहरू कहते हैं कि गन्ने का फसल वैसे ही चार-छह महीनों की बजाए एक साल लगाती है। उस पर एक साल से किसानों का 93 करोड़ 40 लाख का बकाया छोड़ा गया। अब भुगतान होने लगा है, लेकिन यह अभी भी हजारों किसानों के करोड़ों का बकाया पड़ा है। ऐसे में किसान कैसे अपना परिवार पालेगा? और कहां से बिजाई करेगा? बिना मेहनताने के अफसर दो महीने नहीं निकाल पाते, किसान के दो साल भी कुछ नहीं लगते।
याद रहे कि सरकार एक ओर कम पानी का प्रयोग करने वाली फसलों की ओर किसान को लेजाने का प्रयास कर रही है दूसरी ओर गन्ने का भुगतान नहीं किया गया।
वहीं गन्ना कमिश्नर डा. रणजीत सिंह स्वीकार हैं कि किसानों को उनकी फसल की अंतिम किश्त नहीं मिली है, लेकिन अब हाई कोर्ट के आदेशों के बाद किसानों को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए, आदेश अनुसार किसानों को बकाये के भुगतान में देरी होने पर 15 फीसद के हिसाब से ब्याज दिया जाएगा। ये काम भी मिलों ने ही करना है। सरकार की ओर से ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। अलबत्ता सरकार इन्हें लोन दे सकती है।

इनसेट
सी रंगराजन कमेटी की सिफारिश चीनी हो डी-कंट्रोल
हाल ही में सी रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट में चीनी का डी-कंट्रोल करने की सिफारिश के साथ ही बाजार भाव पर तय होने वाले दाम से मिले लाभांश में से बड़ा हिस्सा किसान को देने की बात कही गई है। ऐसे में भुगतान गन्ने की पिड़ाई के बाद तैयार हुई चीनी के बिकने के बाद ही होगा। किसान एक ओर बाजार के दामों से उत्साहित हैं तो दूसरी ओर भुगतान की संभावित देरी से भी डरे हैं।

ठंडा है एथनाल, बिजली बनने में भी समय

गन्ने से एथनाल बनाने के सवाल पर आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि हाल ही में डाइवरसीफिकेशन पर हुई बैठक में शूगर मिलों में एथनाल बनाने की मात्रा बढ़ाने का प्रस्ताव लाया जरूर गया है पर निर्णय नहीं हुआ। केवल पांच फीसद तक की अनुमति है। जो चल रहा है। राच्य में 16 मिले काम कर रही है इनमें सात निजी और नौ सहकारी क्षेत्र की हैं। इनमें से इक्का दुक्का को छोड़ शेष का जीर्णोद्धार कर बिजली बनाने का प्रस्ताव भी अभी ठंडा है।

अब टयूबवेलों पर लगेंगे बिजली मीटर


-कितनी बिजली गई कृषि क्षेत्र को? और कृषि के नाम पर खपी? पता करेगा पावरकाम
-11.60 लाख टयूबवेलों में से पहले चरण पर दस फीसद पर लगेंगे
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में कृषि क्षेत्र को बिजली चाहे मुफ्त में दी जा रही हो लेकिन इस अनुदान पर कितना खर्च हो रहा है इसकी जानकारी जुटाने का सिलसिला अब शुरु होने जा रहा है। पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने निर्णय लिया है कि कृषि क्षेत्र को दी जा रही बिजली का आंकलन किया जाए,। इसके लिए अब खेतों में लगे टयूबवेलों पर बिजली मीटर लगाए जाएंगे।
उल्लेखनीय है कि बिजली अधिनियम 2003 के तहत किसी भी क्षेत्र को दी जाने वाली बिजली चाहे वह मुफ्त ही क्यों ना हो, उस बिना गणना के नहीं दिया जा सकता पंजाब में उक्त अधिनियम लागू हुए दो साल हो गए हैं। अब पावरकाम की ओर से आटोमेटिड मीटरिंग सिस्टम के तहत देखा जाएगा कि कृषि क्षेत्र को कितनी बिजली दी जा रही है? और कृषि क्षेत्र के नाम पर कितनी बिजली खपाई जा रही है। पावरकाम के अधिकारिक सूत्र बताते हैं कि राच्य के खेतों में लगे 11.60 लाख टयूबवेलों पर मीटर लगाए जाएंगे  इनमें से पहले चरण में दस फीसद कनेक्शनों पर मीटर लगाए जाएंगे।
दिलचस्प है कि पावरकाम के इंजीनियरों पर आरोप लगते रहे हैं कि ट्रांसमिशन एंव डिस्ट्रीब्यूशन लासेज के नाम पर होने वाली बिजली की चोरी को कृषि क्षेत्र के नाम पर डाल दिया जाता है। राच्य में गिरते भूमिगत जल स्तर के चलते हर चार-पांच साल पर मोटर बड़ी लगानी पड़ रही है। जिसके चलते बिजली की खपत लगातार बढ़ रही है।

कहीं मूषक ना भोग लगा ले गेहूं के बीजों का!


-रबी के सीजन की शुरुआत से पहले खेत को चूहों से मुक्त करना होता है
-कृषि विभाग के पास चूहे मारने की दवा जिंक फास्फेट खरीदने का फंड नहीं
-विभाग तकनीकि जानकारी उपलब्ध करवाता है: डायरेक्टर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
भारतीय सभ्यता में हर काम से पहले गणेश जी को याद किया जाता है। शायद इसीलिए काम की शुरुआत को ही 'श्री गणेशÓ करना कह दिया गया है। त्यौहारों के दिनों में आस्था चाहे बढ़ती हो लेकिन उत्तर भारत में रबी फसलों की बिजाई से पहले और विशेष रूप सीजन की प्रमुख फसल गेहूं की खेती से पहले भगवान गणेश के वाहन को खेतों से मुक्ति दिलवानी होती है। इस साल मूषक मुक्त खेत करने कृषि विभाग के पास फंड नहीं है और बाजार में गैर सरकारी दवाओं में दवा कम और बीमारी ज्यादा बिक रही है।
विभागीय सूत्र बताते हैं कि चूहे मारने में प्रयोग होने वाली दवा जिंक फास्फेट खरीदने का प्रबंध नहीं हो पाया है। हर साल गेहूं की खेती होती है और हर साल इसी साल्ट की दवा का छिड़काव किया जाता है, लेकिन अलग से कोष ना होने की सूरत में अब 'इधर-उधरÓ से फंड का बंदोबस्त करने में विभाग जुटा है।
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि धान की फसल लेने के बाद और गेहूं की बिजाई से ठीक पहले खेत को इन मूषकों से मुक्त करवाना होता है। बीज को धरती में डालने से पहले उसे तैयार करते समय प्रिजर्व करने की किसी भी जरूरी प्रक्रिया के समान ही यह भी अति आवश्यक कार्य होता है। अन्यथा अंकुरित होने तक गेहूं का बीज ही चूहे चट कर जाते है और दोबारा बिजाई करने तक समय निकल जाता है।
उल्लेखनीय है कि गोदामों में स्टोर किए गए अनाज पर भारी छिड़काव होता है और खेतों में से धान की कटाई के बाद यहां पर राज करने वाले चूहे खाने के लिए इधर उधर मुंह मारते हैं। इसी दौरान किसान का मंहगा बीज इन चूहों का आसानी से टार्गेट बनता है।
कृषि विभाग के डायरेक्टर डा. मंगल सिंह संधू कहते हैं कि रैट कंपैन इन दिनों के लिए बेहद जरूरी है लेकिन विभाग के पास इस क्षेत्र में करने को च्यादा कुछ नहीं है। विभाग के पास इस कार्य के लिए किसी तरह का फंड नहीं है। प्रदेश का कृषि विभाग किसानों को तकनीकि जानकारी उपलब्ध करवाता है। इस अनुसार 40 किलो बीजों में एक किलो जिंक फास्फेट मिला कर खेत में डालने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा खेत में मौजूद चूहे की बिलों को पहले बंद करना होता है। हर स्तर पर चूहे का प्रबंध करना होता है। फसल की बिजाई से लेकर कटाई तक ये सिलसिला चलता है।