Saturday, 10 September 2011

पीपीएससी की परीक्षा में कैलकुलेटर पर पाबंदी, ppsc, exams

उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
पंजाब पब्लिक सर्विस कमिशन (पीपीएससी) की 14 सितंबर को होने जा रही परीक्षा में कैलकुलेटर लेकर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, इससे कई उम्मीदवारों के माथों पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं।
पीपीएससी की ओर से जारी किए गए रोल नंबरों के साथ दी गई हिदायतों में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि उम्मीदवारों को कैलकुलेटर ले जाने की अनुमति नहीं है। 'दैनिक जागरण' के पास शुक्रवार को आए कई उम्मीदवारों ने बताया कि पीपीएससी की ओर से लगाया गया यह प्रतिबंध साइंस, इंजीनियरिंग और अकाउंट्स को विषय के रूप में अपाहिज कर रहा है। इससे इन विषयों के पेपर समय पर करना लगभग असंभव सा है।
उम्मीदवारों का कहना है कि यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन(यूपीएससी) की ओर से ली जाने वाली परीक्षाओं में भी साइंटिफिक नॉन प्रोग्रामेबल कैलकुलेटर ले जाने की अनुमति है। हालांकि इन परीक्षाओं में मोबाइल फोन व पेजर इत्यादि संचार के साधनों पर पाबंदी लगाई गई है। ऐसे में पीसीएस की परीक्षा में भी अनुमति दी जानी चाहिए अन्यथा लंबा समय गणनाओं में लगना तय है और इन विषयों के उम्मीदवार एक तरह से बाहर ही हो जाएंगे।
याद रहे कि आधिकारिक रूप से 1998 के बैच के बाद से पीपीएससी की परीक्षा अब ली जानी है। यद्यपि दस साल पहले भी इसी बैच की परीक्षा ली गई थी तथापि इसके बाद से कई उम्मीदवारों की उम्र गुजर जाने के बाद 188 पदों के लिए ली जा रही परीक्षा दो बार पहले भी स्थगित हो चुकी है।
इस बार कोर्ट जाने की तैयारी तो किसी पक्ष की ओर से नहीं की जा रही पर पीपीएससी के सचिव को कैलकुलेटर ले जाने की अनुमति देने की गुहार जरूर लगाई गई है।

बारिश से धान की गुणवत्ता पर असर, bad weather, paddy, sept.


भूपेश चट्ठा, पटियाला दो दिन से लगातार हो रही बारिश ने धान की फसल को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। फसल कितने फीसदी खराब हुई है इसका आंकलन तो धूप निकलने के बाद ही हो पाएगा, लेकिन बारिश ने धान की गुणवत्ता पर सीधा असर डाल दिया है।
पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज डा. बीएस सोहल बताते हैं कि इन दिनों में होने वाली बारिश को ठीक कहा ही नहीं जा सकता। इसके बाद आने वाली बारिश और खतरनाक साबित होगी। धान के पौधे पर सीधे पड़ी पानी की बौछारें और हवा से बालियों से दाने झड़ जाते हैं और जहां पर दाने नहीं हुए हैं वहां पानी लगने से थोथे रह जाते हैं। अन्य फसलों पर तो विशेष असर नहीं होता पर प्रदेश की खरीफ की मुख्य फसल धान के मामले में पॉलीनेशन नहीं होने से दाने बालियों में पूरे नहीं पड़ते हैं। पौधे गिरने से दाने का छिलका बदरंग हो जाता है। इसका चावल भी बदरंग अथवा मटमेला भूरा होता है। जिसे मंडी में बेचने में भी खासी परेशानी आती है।
धर्मेहड़ी गांव के किसान हरभजन सिंह बताते हैं कि जिन किसानों ने धान की बिजाई और रोपाई देरी से की थी उन्हें इस बारिश में भी नुकसान नहीं हुआ है। पंजाब हरियाणा सीमा पर बाढ़ की मार तले आने वाले ज्यादातर क्षेत्र में कुछ ऐसा ही माहौल है।

Thursday, 8 September 2011

नहर से नहीं है मतलब, बाढ़ नहीं आनी चाहिए, hansi-butana, dhermehri, flood protection, farmer's agitation,

-क्षेत्र के हर किसान के पास है बाढ़ रोकने योजना
-नहर बनने से रोकना सरकार का काम, हमे साइफन व घग्गर की समुचित व्यवस्था चाहिए: पंजाब व हरियाणा के किसानों की एक आवाज
भूपेश चट्ठा, धर्मेहड़ी (पटियाला)
'मारकंडा का पानी घग्गर में ना डाला जाए, इसे एक पुरानी प्राकृतिक ड्रेन को जिंदा करते हुए निकाला जाए और सिंचाई के काम में लिया जाए...Ó। 'चीका से होकर निकलने वाली घग्गर नदी की ब्रांच को फिर से चलाया जाए ताकि पानी का बंटवारा हो और एक जगह पर बाढ़ ना आए...Ó। साइफन चौड़े हों..., 'हांसी बुटाना नहर को चार किलोमीटर तक भूमिगत कर दिया जाए...Ó, घग्गर नदी को एक हजार फुट चौड़ा करने के साथ गहराई तीस फुट की जाए...इत्यादि। 
 पंजाब हरियाणा की सीमा पर पटियाला-चीका रोड पर रहने वाले हर किसान के पास क्षेत्र में बाढ़ रोकने की योजना है। उसने ड्रेनेज सिस्टम पर ये महारथ पीढिय़ों से आती रही बाढ़ से जूझने के बाद सीखी है। उसका अनुभव उसे कहता है कि बाढ़ रोकने के यही कारगर तरीके हैं। इनके विपरीत यदि कुछ किया जाता है तो बाढ़ ज्यादा आएगी और नुकसान कम होने की बजाए बढ़ जाएगा।
दिलचस्प है कि नहर के साथ बन रही दीवार के विरोध में उतरे किसानों से 'दैनिक जागरणÓ की बातचीत में सामने आया कि किसानों को नहर से कोई 'एतराजÓ नही हंै, लेकिन उनके क्षेत्र में बाढ़ नही आनी चाहिए। 


'बाढ़ रोकने के कई उपाय हैं लेकिन सरकारें हैं कि अपनी-अपनी अड़ी पर ही अड़ी हैं हमारी सुनी ही नहीं जा रहीÓ
हरभजन सिंह चट्ठा गांव धर्मेहड़ी, पंजाब


'सरकारें आती हैं, फोटो खिंचवा कर चली जाती हैं, सदियों से संताप झेल रहे हैं, बाढ़ का उपाय तो किया नहीं अब एक और जिन्न ला कर खड़ा कर दिया है, अब उसके भी पंख लगाए जा रहे हैंÓ
गुरनाम सिंह गांव धर्मेहड़ी, पंजाब



'नहर तो बन गई है, उसे हटाना या रखना सरकार का काम है, पर बाढ़ रुकनी ही चाहिए, ये दोनों से ज्यादा जरूरी हैÓ
मुख्तयार सिंह गांव खमेहड़ा हरियाणा




'हम नहर के विरोधी नहीं है पर हट जाए तो अच्छा। सबसे ज्यादा जरूरी है कि पानी की निकासी प्राकृतिक तरीके से ही होनी चाहिए। ये सरकारें चाहे हरियाणा की है या केंद्र की प्राकृति से लड़ रही हैं ओर हमें दांव पर लगा रखाÓ
महल सिंह पूर्व सरपंच




'घग्गर नदी को चौड़ा और गहरा करने के अलावा मानसून के दिनों में आने वाले फ्लैश फ्लड के हिसाब से हांसी बुटाना नहर पर साइफन बनाए जाएं और ये सब हर उस जगह पर हों जहां पिछले सीजनों में नहर टूटी हैÓ
सोहन सिंह गांव राम नगर, पंजाब

पौंग बांध से बिजली उत्पादन गिरा, गलती उजागर, pong, dam reservior , electricity, hydel, flood protection,





भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून के दिनों में उफनती ब्यास की बाढ़ को रोकने के लिए बना पौंग बांध ही इस सीजन में बाढ़ का कारण बना है। बांध से छोड़े गए अतिरिक्त पानी के बाद अब न केवल बांध के जलाशय का जल स्तर गिरना शुरू हो गया है, बल्कि बांध से होने वाले पन बिजली उत्पादन में भी गिरावट आ गई है।

याद रहे कि 'दैनिक जागरण' ने दो सितंबर के संस्करण में ही बता दिया था कि गलती हो चुकी है और बिजली के 49 करोड़ यूनिट बहाने के अलावा अनावश्यक रूप से छोड़े गए पानी की वजह से कई इलाकों में बाढ़ का कारण भी यही पानी बना है।
गौरतलब है कि बांध के स्पिल-वे गेटों को 14 अगस्त को खोला गया और 31 अगस्त तक इन्होंने 5.4 लाख क्यूसिक पानी नदी में उड़ेल दिया। इस पानी के साथ ही 396 मेगावाट क्षमता के बांध से बिजली के करीब 27 करोड़ यूनिट भी बह गए। पौंग पावर प्लांट से पानी नहीं गुजरा तो मुकेरियां हाइड्रो प्रोजेक्ट से भी 22 करोड़ यूनिट बनने थे, जो नहीं बने।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड(बीबीएमबी) का यह पौंग बांध का ऊपर वाला हिस्सा 1430 फीट पर है, जबकि इसके डिजाइन के अनुसार अधिकतम भराव क्षमता 1421 फीट रखी गई है, जबकि पूर्ण जलाशय 1400 फीट पर है। टर्बाइन के सभी छह यूनिट पूरी क्षमता पर चलाने के लिए इससे 17हजार 500 क्यूसिक पानी छोड़ा जाता है। पूरी क्षमता पर बिजली उत्पादन लेने वाला स्तर 1480 फीट पर आता है, जबकि 207 मेगावाट क्षमता के मुकेरियां हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए डिस्चार्ज 11हजार 500 क्यूसिक चाहिए।
आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के इंजी.पदमजीत सिंह की ओर केंद्रीय ऊर्जा सचिव पी. उमा शंकर को लिखा गया है कि वर्ष 2010 में बांध को 1394.5 फीट तक भरा गया और 15 से 18 सितंबर के बीच बहुत कम पानी छोड़ा गया, जबकि इस साल अगस्त मध्य में ही 1480 फीट के आंकड़े से पहले ही डैम से पानी रिलीज करना शुरू कर दिया गया, जबकि बांध का भराव सीजन 21 सिंतबर तक है।
इंजी. पदमजीत कहते हैं कि गलती हो चुकी है। पानी का बहाव कम हो गया है। उम्मीद थी कि जल स्तर सात सितंबर तक 1386 फुट पर आ जाएगा लेकिन यह 1378 फुट रह गया है। बीबीएमबी को अब भी पानी को सहेजना चाहिए। किसी तरह से 26 सितंबर तक पानी भरने दिया जाए।
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किस दिन कितना हुआ उत्पादन?
पटियाला : 396 मेगावाट क्षमता के बांध से पन बिजली उत्पादन एक सितंबर को 396 मेगावाट, दो को 368 मेगावाट, तीन को 370 मेगावाट, चार को 370 मेगावाट, पांच को 370 मेगावाट और छह सितंबर को 295 मेगावाट रह गया है।

Saturday, 3 September 2011

जामुन नहीं रहेंगे सिर्फ जामुनी,होंगे लाल, सफेद, काले...agriculture, trees, trend, farmer, blackberry


-पायलेट प्रोजेक्ट के तहत महाराष्ट्र और गुजरात से मंगवाए गए पौधे
-छोटी गुठली और बहुतयात में होता है गुदा, तीन साल में फल देने लगता है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बैंगन जब बैंगनी नहीं रहा और सफेद होते ही ये 'बै-गुणÓ से 'ताज वालीÓ एकलौती सब्जी हो गया ऐसे में जामुन भला क्यों जामुनी ही रहने वाली थी। आने वाले सालों में पंजाब में लाल, सफेद, काले और यहां तक की नीले रंग में भी दिखाई देंगी। संभवत तब भी इन्हें जामुन ही कहा जाएगा, लेकिन रस और गुदे के मामले में पेड़ों पर लगने वाली ये जामुनें किसी हलवाई की जामुनों को भी पीछे छोड़ती नजर आएंगी।    

पंजाब में इन रंग बिरंगी जामुनों को लाने के पीछे भी मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की दिखाई गई दिलचस्पी है। प्रदेश वन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि प्रकाश सिंह बादल के बीते साल गुजरात व महाराष्ट्र में किए गए दौरे के दौरान उनका सामना रंग बिरंगी जामुनों से हुआ तो पंजाब में ऐसी ही जामुने उगाने की इच्छा जताई गई।

अधिकारी बताते हैं कि हार्टीकल्चर विभाग की तुलना में वन विभाग को जिम्मी सौंपा गया जिसके तहत पायलेट प्रोजेक्ट बनाया गया और महाराष्ट्र और गुजरात से एक हजार पौधे लाए गए। बीते साल लाए गए पौधों में से ज्यादातर का प्रयोग सिंबल के रूप में हुआ, वीवीआईपी की ओर से कहीं स्मृति के रूप में लगवाने के अलावा गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस पर बांटे भी गए हैं। याद रहे कि फलों के पौधे लगाने फरवरी के अलावा सितंबर ही बेहतरीन महीना होता है।

प्रोजेक्ट की शुरुआत करने वाले व वर्तमान में कंजरवेटर के पद पर तैनात धर्मेंद्र शर्मा ने 'दैनिक जागरणÓ को बताया कि  इन जामुनों का बीज अथवा गुठली खासी छोटी होती है और गुदा बहुतयात में होता है। आम जामुन की तुलना में इसका पेड़ जल्द फल देने लगता है। तीन साल में ही ये अच्छा खासा फल देने लगता है।
रंग बिरंगी जामुने हाईब्रिड वेरायटी में आती है। आमतौर पर ये विदेशी किस्मों की श्रेणी में ही रखी जाती है, जिसे ग्राफटिंग से तैयार किया जाता है। धर्मेंद्र शर्मा याद करते हैं कि पंजाब में साधारण तय जमोए हुआ करते थे जिनकी गुठली खासी बड़ी होती है। बड़े साइज में ज्यादा गुदे और छोटी गुठली के साथ फिरोजपुर क्षेत्र में ऐसी ही एक किस्म पाई जाती है लेकिन उसकी रंग जामुनी ही होता है

याद रहे कि महाराजा पटियाला के पास भी ऐसी ही किस्म के जामुनों के प्लांट रहे हैं। जिनकी कलमें चोरी छिपे मोती बाग से बाहर जाती रही लेकिन जामुनों की उक्त रसभरी वेरायटी भी अब ज्यादा नहीं दिखाई देती है।

गिदड़बाहा पावर प्लांट पर भी लटकी तलवार!, giderbaha, thermal, power , plants, electricity, generation


- एनटीपीसी ने करना है निर्माण, रेल व कोल लिंकेज के अलावा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेनी है क्लीयरेंस
- एनटीपीसी ने अपनी क्षमता से ज्यादा कर रखे है सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर, पंजाब खुद बनाए प्लांट: इंजी. एसो.
भूपेश चट्ठा, पटियाला
राज्य में बिजली की सप्लाई व खरीद के अलावा उत्पादन के प्रबंध का जिम्मा रखने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन पावरकाम को राज्य के गिदड़बाहा क्षेत्र में लगने वाले पावरप्लांट पर भी तलवार लटक रही है।
 केंद्र सरकार के संस्थान नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन की ओर से स्थापित किए जाने वाले इस प्लांट पर जहां एक ओर आंदोलन की छाया मंडराने लगी है वहीं पंजाब सरकार और एनटीपीसी के बीच हुए समझौते को एक साल होने को है और निर्माण की दिशा में एक इंच भी प्रगति नहीं हुई है।

पावरकाम के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि बीते साल अक्टूबर में एनटीपीसी के साथ 15 हजार करोड़ रूपये की राज्य की सबसे बड़ी बिजली परियोजना के समझौते के तहत राज्य ने केवल जमीन का अधिग्रहण करना था और प्लांट के चालू होने पर बिजली की खरीद करनी थी। इसके अलावा सभी निर्माण कार्य और प्लांट के लिए रेल व कोल लिंकेज की क्लीयरेंस के अलावा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से स्वयं मंजूरी लेनी थी। सूत्र कहते हैं कि इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

जबकि इंजीनियर्स एसोसिएशन के प्रदेश प्रधान इंजी. बेदी कहते हैं कि वे पहले दिन से कह रहे हैं कि प्रदेश के पास प्लांट स्थापित करने की पूरी विशेषज्ञता है और पूर्व में बिजली बोर्ड ने प्लांट लगाए भी हैं। ऐसे में प्लांट एनटीपीसी के हवाले किए जाने का कोई तुक नहीं है। वैसे भी 37 हजार मेगावाट उत्पादन क्षमता वाले एनटीपीसी ने पिछले साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच 40 हजार मेगावाट और उत्पादन के समझौते कर लिए जिन्हें सिरे चढ़ाना संभव नहीं है। एनटीपीसी ने अपनी क्षमता से ज्यादा सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर कर रखे हैं।
वहीं उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की ओर से एनटीपीसी के साइन किए गए एमओयू को रद्द करने के दिए गए वक्तव्य पर पावरकाम के अधिकारी खामोश हैं। नाम ना प्रकाशित करने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि पावरकाम के कागजों में अभी प्लांट पर काम चल रहा है, पर कई तरह की क्लीयरेंस अभी कंपनी को नहीं मिली है, चाहे ये केंद्र का ही संस्थान है।

दिलचस्प है कि चुनावी साल में जमीन को लेकर हर ओर तेज हो रहे किसान आंदोलनों से सहमे अकाली थिंक टैंक को समझ नहीं आ रहा कि तीन गांवों की 2350 एकड़ जमीन में से आधी एक साल पहले तक सैम की मार तले थी, पर अब दाम लगातार बढ़ रहे हैं। आधी जमीन का अधिग्रहण करने के बाद राज्य सरकार दोबारा दूसरे चरण में शेष आधी जमीन पुराने दाम पर खरीदने की स्थिति में नहीं है। और एनटीपीसी को अभी से दाम ज्यादा लगने लगे हैं।

Thursday, 1 September 2011

बाढ़ रोकने बने बांध से निकली बाढ़, बिजली गई बेकार, dam, flood protection, reservior , pong, hydel,


-पौंग बांध से बहा दिए 49 करोड़ बिजली यूनिट, बाढ़ आई सो अलग
-बांध 1430 फीट का, अधिकतम भराव क्षमता 1421 फीट, रिजरवायर 1400 फीट पर पानी छोड़ दिया 1380.4 फीट पर
-बीते साल बांध को 1394.5 फीट तक भरा गया था
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून के दिनों में उफनती ब्यास नदी की बाढ़ को रोकने बना पौंग बांध ही इस सीजन में बाढ़ का कारण बना है। बांध से छोड़े गए पानी के आंकड़े बताते हैं और कहते हैं कि भराव के पिछले इतिहास को  देख थोड़ा संयम बरता होता तो ना केवल पौंग बांध से बही 49 करोड़ यूनिट बिजली बची होती अपितु सिंचाई के लिए पानी भी। वहीं अनावश्यक रूप से पानी छोड़े जाने से बाढ़ आई सो अलग।
दिलचस्प है कि बांध के स्पिल-वे गेटों को 14 अगस्त को खोला गया और 31 अगस्त तक इन्होंने 5.4 लाख क्यूसिक पानी नदी में उड़ेल दिया। इस पानी के साथ ही 396 मेगावाट क्षमता के बांध से करीब 27 करोड़ बिजली के यूनिट भी बह गए। पौंग पावर प्लांट से पानी नहीं गुजरा तो मुकेरिंयां हाइड्रो प्रोजेक्ट से भी 22 करोड़ यूनिट बनने थे।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड का यह पौंग बांध का उपरी हिस्सा 1430 फीट पर है जबकि इसके डिजाइन अनुसार अधिकतम भराव क्षमता 1421 फीट रखी गई है जबकि पूर्ण रिजरवायर 1400 फीट पर है। सभी छह यूनिट पूरी क्षमता पर चलाने इससे 17500 क्यूसिक पानी छोड़ा जाता है, पूरी क्षमता पर बिजली उत्पादन लेने वाला स्तर 1480 फीट पर आता है, जबकि 207 मेगावाट क्षमता के मुकेरिंयां हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए डिसचार्ज 11500 क्यूसिक चाहिए।
आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फैडरेशन के इंजी. पदमजीत सिंह की ओर केंद्रीय ऊर्जा सचिव सहित सभी संबंधित पक्षों को भेजे गए श्वेत पत्र में लिखा गया है कि वर्ष 2010 में बांध को 1394.5 फीट तक भरा गया और 15 से 18 सितंबर के बीच बहुत कम पानी छोड़ा गया, जबकि इस साल ये शुरुआत ना केवल अगस्त मध्य में ही 1480 के आंकड़े से पहले ही रिलीज करना शुरू कर दिया गया। जबकि बांध का भराव सीजन 21 सिंतबर तक है, इसके बाद पानी बहुत कम रिलीज किया जाता रहा है।
बाक्स : मापदंड 
महीना,   मिलीयन यूनिट,  लोड, स्तर
-अक्टूबर 10 को,140, 52 फीसदी, 1388 फीट
-नवंबर, 172, 66 फीसदी, 1379 फीट
-दिसंबर, 170, 63 फीसदी, 1368 फीट
-जनवरी 11 को, 114, 43 फीसदी, 1361 फीट
-फरवरी, 165, 68 फीसदी, 1351 फीट
-मार्च,    103,38 फीसदी, 1345 फीट
-अप्रैल,  12,  पांच फीसदी, 1349 फीट
-मई,     71,  27 फीसदी,  1350 फीट
-जून,    135, 52 फीसदी,  1351 फीट

पौंग बांध का न्यूनतम जल स्तर 1260 फीट है इसके अब तक के सबसे कम जल स्तरों में 26 अप्रैल 1982 में 1311 फीट, 25 जून 1978 में 1315 फीट रहा है। इसके बाद मानसून के दिनों में बांध फिर से भरने लगता है। इस साल जुलाई में प्लांट 81 फीसदी लोड फैक्टर पर चला, जबकि एक से 12 अगस्त के बीच इसे 65 फीसदी कर दिया। 14 अगस्त को सुबह नौ बजे गेट खोलने के बाद दोपहर तीन बजे 100 फीसदी लोड पर चलाया गया। 
बांध से 70 हजार क्यूसिक तक पानी छोड़े जाने ने भारी तबाही मचाई। 15 से 19 अगस्त के बीच प्रदेश भर में भारी बारिश हुई और 17 अगस्त से 21 अगस्त के बीच जल स्तर 1388.02 फीट से गिरता हुआ 1386.83 फीट पर आ गया। जबकि 1400 फीट तक का गैप भविष्य की बाढ़ की संभावनाएं रोकने के लिए होता है। इंजी. पदमजीत कहते हैं कि उन्होंने लगातार ऊर्जा मंत्रालय के अलावा बीबीएमबी को 22, 23, 25, 29, 30 अगस्त को ईमैल किए हैं कि बांध को पिछले साल के स्तर तक भरने दो पर नहीं हुआ। कम से कम चार रूपये यूनिट की 50 करोड़ यूनिट बिजली के अलावा बहुमूल्य पानी बह गया।