Saturday, 18 June 2011

अनजान बन रहा जागरुक किसान, direct soawing, 16 may



जल संरक्षण


-पानी की खपत सीधी बिजाई में 40 फीसदी रह जाती है, सीधा लाभ छह से सात हजार रूपये प्रति एकड़

भूपेश चट्ठा, पटियाला

पंजाब के भूमिगत जल स्तर का दिवाला निकालने वाली धान की खेती में ही अब जल संरक्षण की किरण दिखाई देने लगी है। किसानों में बेहतरीन परिणाम दे रही धान की सीधी बिजाई तकनीक हर साल तीन सौ फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। शुरूआती झटकों के बाद इसकी लोकप्रियता की गति इतनी तेज हो गई है कि कृषि विभाग को सीधी बिजाई करने अथवा किराये पर मशीन दे करवाने के लिए इस साल मशीनों की संख्या को बढ़ा कर दो गुना करना पड़ा है। हालांकि धान का बीज छिड़ककर सीधी बिजाई अभी प्रोग्रेसिव हो चुके किसानों के गले नहीं उतर रही है। एक जून से शुरू हो गई सीधी बिजाई पर मुख्य कृषि अधिकारी सुभाष चंद्र खुराना बताते हैं कि बीते साल यहां रकबा 17 सौ एकड़ था जो इस बार पांच हजार एकड़ के पार जाना तय है। वे कहते हैं कि पिछले साल विभाग के पास मात्र तीन मशीनें थी लेकिन इस साल मांग को देखते हुए हर ब्लाक के लिए एक मशीन का प्रबंध कर इन्हें बढ़ा कर छह कर दिया गया है। आत्मा योजना के तहत खरीदी गई इस मशीन से बिजाई करवाने पर किसान से मात्र 50 रुपये प्रति एकड़ की वसूली की जाती है जबकि मजदूरों से रोपाई करवाने पर 15 सौ से दो हजार रुपये तक चुकाने पड़ते हैं। सीधी बिजाई का लाभ ही लाभ है। पर्यावरण के लिहाज से देखें तो 5500 लीटर पानी पी जाने वाला एक किलो चावल सीधी बिजाई से आधा ही पानी पीएगा। इस विधि से फसल में कमी बिलकुल नहीं देखी गई अलबत्ता इसके बढऩे की उम्मीद जरूर बन पड़ी है। खुराना के अनुसार 35-40 हजार रुपये की ड्रिल मशीन एक दिन में आठ से दस एकड़ में आसानी से बिजाई कर देती है। जून के पहले दो सप्ताह में यदि आप धान की पीआर अथवा पूसा किस्में लगा सकते हैं तो 15 जून के बाद से बासमती व 1121 जैसी अधिक मुनाफा देने वाली मंहगी किस्मों की बिजाई कर सकते हैं। खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त कहते हैं कि इस तकनीक से पानी की बचत होती है। यह साबित हो गया है। कई मामलों में तो पानी की खपत मात्र एक तिहाई ही रह रही है, लेकिन इसमें खरपतवार की समस्या है इसे दूर किया जाना है। वे कहते हैं कि खेत में अनावश्यक रूप से उगे वीड्स को समाप्त करने के लिए हमें वीड्ीसाइड डालने से बचना चाहिए। तकनीक चूंकि इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीटयूट मनीला से आई है। ऐसे में हमे इसे पंजाब लायक बनाने में थोड़े प्रयोग करने पड़ेंगे। इसके लिए जरूरी है कि राइस इंटेंसिफाई तकनीक का मिश्रण इसमें किया जाए। खेत में ही वीड्स की गुड़ाई करने से वे आर्गेनिक खाद के रूप में फसल के काम आएंगे और मंहगी तथा कथित दवाओं पर किसानों का खर्च भी नहीं होगा। इस तरह से बिजाई करने पर पौधा न केवल जल्दी पनपता और फसल पकती है, बल्कि धान के बाद गेहूं की बिजाई करने को समय भी अधिक मिलता है। पर्यावरण में मिथेन गैसों का रिसाव बहुत कम होता है। पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने मंगलवार से कृषि क्षेत्र को बिजली सप्लाई बढ़ा कर चार घंटे कर दी है, यह सप्लाई धान की इस तरह से बिजाई करने वालों के लिए कितनी फायदेमंद रहेगी इस पर कृषि विभाग तो खामोश पर अब यह मांग भी उठने लगी है कि सीधी बिजाई करने वाले किसानों को एक जून से ही आठ घंटे बिजली सप्लाई दी जाए, बोनस के रूप में दिया जाने वाला लाभ किसानों को इस ओर आकर्षित ही करेगा।

कट नहीं पर आंख मिचौली शुरू, tripping, 15 may



बिजली

-जिन थोड़े से क्षेत्रों में बढ़ी लाइनें नहीं डली हैं सिर्फ वहां है दिक्कत माना पावरकाम ने

-बठिंडा थर्मल प्लांट की ट्रिप हुई ईकाई चालू, पंजाब ने बेची 48 लाख यूनिट बिजली

भूपेश चट्ठा, पटियाला

पंजाब के पास हाल फिलहाल बिजली की कोई कमी नहीं है। राच्य में बिजली का प्रबंधन देखने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने अभी तक आधिकारिक रूप से किसी भी वर्ग पर कोई कट घोषित नहीं किया है, लेकिन पारे 43 पार होते ही बिजली की आंख मिचौली शुरू हो गई है।

पावरकाम के पास तो बताने के लिए कई तकनीकि कारण है पर आम आदमी बिजली गुल होने की स्थिति में खुद को समझा नहीं पाता कि आखिर अब क्यों बत्ती गुल हो रही है। दिलचस्प है कि हर 24 घंटे में दो मिनट से लेकर दो घंटे तक बिजली का जाना जनमानस को सता रहा है। बिजली के वर्तमान हालात पर फैक्ट्री एरिया में डीटीएच कनेक्शन के कारोबारी हरविंदर सिंह कूक्कू कहते है कि यह ठीक है कि बिजली के हालात पहले जैसे बुरे नहीं है पर अचानक इसका चले जाना और फिर तेज वोल्टेज के साथ आ जाना कई इलेक्ट्रानिक उपकरणों के लिए नुकसान दायक साबित हो रहा है। वहीं अर्बन एस्टेट के गुरप्रीत सिंह कहते है कि दो चार मिनट कोई खास बात नहीं है लेकिन दो घंटे तक बिजली का गायब रहना तो बच्चे, बीमार, बूढ़े सभी को तंग करने वाला है।

उधर पावरकाम के प्रवक्ता कहते है कि अधिकतर क्षेत्रों में बड़ी लाइनें डाली गई है। शहर में भी 11 किलोवाट की लाइनें, छोटे के स्थान पर बढ़े कंडक्टर और जरूरत अनुसार ट्रांसफार्मर बदल दिए गए है। लेकिन जिन थोड़े से क्षेत्रों में बढ़ी लाइनें नहीं डली हैं सिर्फ वहां दिक्कत है। बढ़ा हुआ लोड समस्या नहीं है, अचानक मांग बढऩे से ट्रिपिंग होती है। तेज हवा और आंधी जैसे प्राकृतिक व्यवधान नहीं रोके जा सकते।



बाक्स

बठिंडा थर्मल प्लांट की ट्रिप हुई ईकाई चालू

बठिंडा स्थित श्री गुरू नानक देव थर्मल प्लांट की शार्ट सर्किट के चलते बंद हुई ईकाई को चालू कर लिया गया है। हालांकि इस चार नबंर ईकाई के अलावा दो अन्य ईकाईयां अभी बंद चल रही हैं। इनमें एक को पूर्ण जीर्णोद्वार के चलते बंद रखा गया है जबकि दूसरी वार्षिक मरम्मत की वजह से बंद है। पावरकाम का कहना है कि राच्य के पास 1350 लाख यूनिट बिजली उपलब्ध है जबकि मांग करीब 13 सौ पर है। ऐसे में पंजाब ने बीते 24 घंटों में 48 लाख यूनिट बिजली बेची भी है।

कुदरत है मेहरबान, बांधों में भराव सीजन एडवांस में शुरू, 13 may, dam reservior



...बिजली

- चारों बड़े बांधों में भरपूर पानी, थर्मल प्लांटों में नहीं कोयले की कमी

- पिछले साल के मानसून का असर, स्थिति सामान्य रही तो भाखड़ा इस साल भी  छुएगा खतरे का निशान

भूपेश चट्ठा, पटियाला

उत्तर भारत के चारों बड़े बांधों में पानी की कोई कमी नहीं है। कुदरत की इस मेहरबानी के चलते इन बांधों से सिंचाई का पानी लेने वाले पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पीने के पानी की जरूरतें पूरी करती राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कम से कम मानसून तक पानी की किल्लत नहीं होने वाली। ठीक इसी तरह इन बांधों के पानी से बनने वाली पन बिजली से उक्त राज्यों के अलावा हिमाचल प्रदेश को भी राहत मिलने जा रही है। पिछले साल के शानदार मानसून का असर इस साल भी जारी है।

दिलचस्प है कि इस साल गर्मी के जल्द दस्तक देने और यौवन पर बने रहने के चलते बांधों का भराव सीजन भी तकनीकि दृष्टि से एडवांस में शुरू हो गया है। पन बिजली उत्पादन के लिए इन बांधों के पानी पर नजर रखने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड मान कर चलता है कि बांधों का भराव सीजन 15 मई से शुरू होता है, लेकिन इस बार चार में से तीन बांधों का जल स्तर एक सप्ताह पहले ही बढऩा शुरू हो गया है। तेज गर्मी के चलते पहाड़ों की बर्फ पिघलने से भाखड़ा को छोड़ अन्य तीन रावी नदी पर बने रणजीत सागर बांध, सतलुज -ब्यास नदियों के पौंग और डेहर में जलस्तर ऊपर उठने लगा है।

पावरकाम के आंकड़े बताते हैं कि भाखड़ा बांध का जल स्तर पिछले साल 13 मई की तुलना में इस साल 48 फीट उपर 1577.80 फीट पर है। यहां पानी की आवक भी बीते साल की तुलना में चार हजार क्यूसिक ज्यादा है और ये 24 हजार क्यूसिक पर बनी हुई है, हालांकि बांध से 31 हजार क्यूसिक पानी छोड़ा भी जा रहा है।

इसी प्रकार पौंग बांध का जल स्तर 1298.88 की तुलना में 50 फीट उपर है और यहां पानी 1348.76 फीट पर है। बीते साल के तीन हजार की आवक पर इस साल 54 सौ क्यूसिक पानी आ रहा है, जबकि 28 सौ क्यूसिक पानी ही छोड़ा जा रहा है। रणजीत सागर बांध का स्तर 510.20 मीटर पर है, पिछले साल यहां 499.70 मीटर पर पानी था। यहां 9838 क्यूसिक पानी आ रहा है, ये पिछले साल से तीन हजार क्यूसिक ज्यादा है। यहां से 91 सा क्यूसिक पानी छोड़ा जा रहा है।

डेहर बांध का स्तर बीते साल से मात्र सात फीट उपर 2929 फीट पर है, लेकिन 86 सौ क्यूसिक की आवक पर 64 सौ क्यूसिक पानी छोडऩे से यहां भी स्तर ऊपर उठ रहा है। बीते साल आवक इन दिनों 53 सौ पर ही थी।

नार्मल और समय पर मानसून की स्थिति में माना जा रहा है कि जिस तरह से बीते साल 1680 फीट पर भाखड़ा के आ जाने से तीन बार लड गेट खोले गए ठीक उसी तरह से इस बार भी बांध लबालब होंगे।





नहीं है थर्मल प्लांटों में कोयले की कमी

पावरकाम के पंजाब में तीनों थर्मल प्लांटों में समुचित मात्रा में कोयला है। तय मापदंड अनुसार कम से कम 15 दिन का कोयला होना चाहिए, जबकि बठिंडा में 25, रोपड़ में 21.5 और लहरा महोब्बत में 22.20 दिन का कोयला मौजूद है। बठिंडा की एक इकाई जीर्णोद्वार पर है तो रोपड़ की एक इकाई वार्षिक मर मत पर चल रही है। पावरकाम का कहना है कि सभी  इकाईयों की वार्षिक मर मत समय रहते निपटा ली जाएगी।

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Friday, 17 June 2011

बारिश से धान को आराम विविधीकरण को नुकसान, weather, diversification, crop,

मौसम की मार
30 नॉटीकल मील की गति से आए एक अंधड़ ने बागों पर कहर बरपाया
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला : जेठ-हाड़ तपे तां सौण-भादों हंसे.. बुजुर्गो की कही ये बात इस साल कहीं सही साबित न हो जाए। यह आशंका आज हर किसी के मन में उपज रही है। कारण स्पष्ट है कि इस बार जून में ही पंजाब में पारा कम से कम दो बार दस डिग्री से नीचे लुढ़क चुका है। हालांकि यह 40 डिग्री के पार भी जा रहा है और तकरीबन हर सप्ताह हो रही बारिश ने जहां धान की फसल को आराम दे दिया है। वहीं, विविधीकरण वाली हर दूसरी फसल को नकारात्मक रूप से प्रभावित भी किया है। कृषि विशेषज्ञ डा.बीएस सोहल कहते हैं कि पंजाब में चूंकि इन दिनों में अधिकतर हिस्से में धान की ही रोपाई की जा रही है। ऐसे में कुल मिलाकर तो फायदा ही है। किसान को सिंचाई के लिए कम पानी का प्रबंध करना पड़ रहा है। मौसम में नमी की वजह से वाष्पीकरण भी तुलनात्मक रूप से कम हो रहा है। वहीं, खेतों में खड़ी मक्की और सूरजमुखी की फसलें आंधी से प्रभावित हुई हैं। इनके पौधे गिरने से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। ठीक इसी तरह से कपास तो एक बारगी पूरी ही उजड़ चुकी है। बेमौसमी बारिश और उस पर 30 नॉटीकल मील की गति से आए एक अंधड़ ने बागों पर भी बुरी तरह से कहर बरपाया है। डा.सोहल कहते हैं कि हार्टीकल्चर के ही क्षेत्र में नुकसान है। कच्चे अचारी आम आपको बाजार में सस्ते व ढेरों में दिखाई दे रहे हैं। इसका साफ मतलब है कि पेड़ पर पकने से पहले ही ये आंधी से नीचे आ गिरे हैं। ऐसे ही जो नाशपाती मानसून के दिनों में बाजार में आनी थी, वे फल भी पूरी तरह से विकसित होने से पहले ही झड़ गए हैं। जामुन का बौर शुरुआती आंधी में गिरा, तो झाड़ कम होना तय हो गया। अमरूद जैसे हर उस बाग को नुकसान हुआ है, जहां अभी फूल निकलने की स्टेज चल रही थी। मौसम में आ‌र्द्रता व उमस का स्तर इन दिनों में बारिश आने पर 100 तक भी जा पहुंचा, जबकि अन्य दिनों में ये 25 तक भी गिरा है। पारे के सात से 44 डिग्री के बीच झूलने और उमस के ऊपर नीचे होने ने पौधों को इस तरह से असमंजस में डाला कि सुबह फूल खिलता है और शाम होते होते गिर जाता है। सब्जियों की काश्त करने वाले सील गांव के हरदीप सिंह कहते हैं कि आंधी का आलम यह रहा है कि कद्दू की जमीन से लगी बेल भी उथल पुथल में फंस गई। उलझी बेलें व टूटे फूलों से अब झाड़ पिछले साल से आधा भी हो जाए तो गनीमत है। नींबू टमाटर व मिर्च के यही दिन होते हैं जब इनसे कमाई होती है, बारिशों के बाद मिर्च तीखी हो जाती है और पालक में कीड़ा पड़ जाता है जबकि नींबू-टमाटर की मांग गिर जाती है।

नाबार्ड से पंजाब को नहीं मिला धेला, flood protection, nabard, river ghagger,

नाबार्ड से मांगे थे 101 करोड़ रुपये
 राज्य ने अपने संसाधनों से 26 करोड़ जुटाए, 30 तक निपटाएगा काम
उप-मुख्य संवाददाता, पटियाला : नहरी पानी व ट्यूबवेलों से सिंचाई की व्यवस्था के चलते पंजाब में बहुत कम किसान हैं, जिन्हें बारिश की ज्यादा चिंता रहती है, लेकिन ऐसे किसानों की संख्या खासी ज्यादा है, जिन्हें मानसून में बाढ़ का फिक्र ज्यादा सताता है। ऐसे हालात में पंजाब व पंजाबियों को नेशनल बैंक फार एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) से करारा झटका मिला है। पंजाब की ओर से मानसून पूर्व बाढ़ रोकथाम के लिए किए जाने वाले उपायों के लिए मांगी गई धन राशि में से एक धेला भी नहीं मिला है। गौरतलब है कि मई-जून के दिनों में उत्तर भारत के ज्यादातर क्षेत्रों में खेत खलिहान खाली रहते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मुहैया करवाने की दिशा में पेयजल योजनाओं में कुआं और तालाब खोदने से लेकर सड़क निमार्ण तक के कार्य नाबार्ड की ओर से करवाए जाते हैं, जबकि पंजाब में टोबों से लेकर नदी नालों की साफ सफाई और उनके तटबंध मजबूत करने का काम होता है। बाढ़ रोकने के उपाय भी इनमें शामिल हैं। पंजाब ने अपनी जरूरतें बता नाबार्ड के पास इस बार बाढ़ रोकथाम उपायों के लिए 101 करोड़ रुपये के एस्टीमेट भेजे, लेकिन मानसून आने में एक पखवाड़े से भी कम समय रहने के बावजूद एक पैसा भी पंजाब के लिए जारी नहीं किया गया है, जबकि हर काम के लिए विज्ञापन से टेंडर जारी कर पूरी प्रक्रिया अपनानी होती है और इसमें खासा समय लगता है। उधर, बाढ़ रोकथाम के लिए ड्रेनेज विभाग की ओर से किए जा रहे उपायों पर शुक्रवार को पूछे जाने पर सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर पीएस भोगल कहते हैं कि विभाग प्रदेश में नदियों के उफान व बाढ़ का समय एक जुलाई से 20 सितंबर तक मानकर चलता है, बाढ़ रोकथाम के उपाय 30 जून तक निपटा लिए जाएंगे। राज्य सरकार ने इसके लिए 26 करोड़ रुपये की राशि विभाग को आवंटित की है। इसमें से पिछले साल बुरी तरह से प्रभावित होने वाले पटियाला जिले के लिए चार करोड़ रुपये रखे गए हैं। पटियाला की राव, टांगरी, मारकंडा का कुछ हिस्सा, मीरांपुर चौ सहित घग्गर में सफाई चल रही है। जहां जरूरत है वहां पत्थर भी लगाए जा रहे हैं और कमजोर कडि़यों को पक्का करने के लिए किनारों को मजबूती दी जा रही है। वे कहते हैं कि घग्गर नदी में ही पिछले साल 30 कटाव आए थे। ये सभी पूरी तरह से बंद कर लिए गए हैं। संगरूर जिले में एक दो स्थानों पर काम चल रहा है, उसे भी निपटा लिया जाएगा।

Thursday, 16 June 2011

राज मिस्त्री-ड्राइवर हो गए खेत मजदूर, paddy soawing, trends, rural employment


चलो पिंड चल्लिये

पंजाबी मजदूरों को लुभाने लगा पुराना काम धान की रोपाई में मोटी कमाई के चलते पंजाबी परिवारों की बनी टीम
घर में दो सौ की बजाय आ रही दो हजार रुपये दिहाड़ी
भूपेश चट्ठा पटियाला
 धान की रोपाई के शुरुआती दिनों में हो रही बारिश और लेबर रेट के आसमान छूने के साथ ही पंजाब के किसानों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं धान की रोपाई कम मजदूरी के चलते छोड़ चुके पंजाबी खेत मजदूर को पुराना काम लुभाने लगा है। पांच सालों में साढ़े पांच गुणा बढ़ चुके धान की रोपाई के रेट से पंजाबी मजदूरों की टीमें बनने लगी हैं। पूर्ण रूप से टकसाली पंजाबी तकनीक व जुमलों से लैस 10 से 12 बंदों की टीमों में ज्यादातर वह नए लड़के शामिल हैं, जिनके बुजुर्ग बीते जमाने में धान की रोपाई करते रहे हैं। यह लोग गांव छोड़ चुके हैं। सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते हैं कि पहले शहर का ग्लैमर खींच रहा था। अब महंगाई में जरूरतों को पूरा करने के लिए गांव की ओर लौट रहे हैं। इनमें राज मिस्त्री से लेकर, खराद पर काम करने वाले मैकेनिक तक सब शामिल हैं। इसके अलावा कुनबे अथवा बेहड़े की महिलाएं भी टीमें बना कुछ ऐसे ही उपाय कर रही हैं, जो दिहाड़ी चार सौ रुपये तक ले रही हैं। बत्ता गांव के सरपंच व प्रोग्रेसिव किसान अश्वनी बत्ता कुछ अलग कारण बताते हैं। कहते हैं कि यह काम पूरी तरह से पारिवारिक है। आम दिनों में घर का एक पुरुष सदस्य शहर जा कर 150 से 200 रुपये की दिहाड़ी ला पाता है, जबकि खेत मजदूरी करने वालों का ठीक वही सीजन है, जो व्यापारियों व कंज्यूमर डयूरेबल बनाने वाली कंपनियों के लिए दिवाली के दिनों में होता है। इन दिनों में पूरा परिवार, जिसमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग व अपाहिज भी शामिल हैं। सभी एक टीम के रूप में काम करते हैं। पांच से सात सदस्य मिल कर एक दिन में एक एकड़ में रोपाई कर लेते हैं, ऐसे में घर की दिहाड़ी दो हजार के पार हो जाती है। दिलचस्प है कि राज्य सरकार के कृषि विभाग ने चीन से लेकर जापान तक से पैडी ट्रांसप्लांटर आयात किए निजी क्षेत्र में भी ठीक ठाक सब्सिडी दे दी, लेकिन इनकी राज्य में कुल संख्या छह सौ भी पार नहीं कर पाई है और 70 लाख एकड़ में धान की रोपाई की जानी है। एक मशीन दिन भर में चार से छह एकड़ में ही धान की पनीरी लगा पाती है। ट्रांसप्लांटरों की गिनती का कम होना और इनके लिए पनीरी लगाने की विशेष तकनीक सीखने में पंजाब के किसानों की दिलचस्पी ना होना, परंपरागत तरीके प्रति बढ़ा आकर्षण है। कृषि विशेषज्ञ डा.बीएस सोहल कहते हैं कि आप तीन साल पहले के 15 सौ रुपये प्रति एकड़ की बात भूल जाएं। इससे भी दो साल पहले तो दाम मात्र छह सौ रुपये प्रति एकड़ ही थे। इस साल ढ़ाई हजार पर भी आ जाए तो गलत नहीं होगा। पंजाब के लिए एक महीने चलने वाला यही नरेगा है।

इस बार नहीं लगेगा बिजली का झटका, save electricity, pspcl, demand and supply, paddy



बिजली की मांग 1900 लाख यूनिट तक जाने की उम्मीद
 1875 लाख यूनिट का प्रबंध
 इंडस्ट्री पर अनिवार्य साप्ताहिक अवकाश के अलावा कोई कट नहीं लगाया जाएगा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड की मानें तो इस बार बिजली झटके नहीं देगी। प्रदेश भर में बिजली के हालात बेहतर रहने वाले हैं। राज्य में इंडस्ट्री पर भी कोई विशेष कट नहीं लगने जा रहा है। पावरकॉम के विशेषज्ञों की ओर से एकत्रित आंकड़ों केमुताबिक राज्य में बिजली की अधिकतम मांग जुलाई महीने में 1900 लाख यूनिट प्रतिदिन तक जाने की उम्मीद है, जबकि जुलाई व अगस्त के महीनों में क्रमश: 1875 व 1870 लाख यूनिट प्रतिदिन का प्रबंध कर रखा है। हालांकि ओपन एक्सेस के तहत निजी क्षेत्र करीब एक सौ लाख यूनिट प्रतिदिन बिजली अपने स्तर पर ले रहा है। राज्य में बिजली की आंकड़ों पर आधारित मांग से यह हिस्सा अब बाहर हो गया है। पावरकॉम के उच्चाधिकारी बताते हैं कि यदि मानसून धोखा नहीं देता है तो किसी भी वर्ग पर कोई घोषित कट नहीं लगाया जाएगा। मरम्मत अथवा रखरखाव के लिए लगने वाले कट हालांकि इससे अलग ही रहेंगे। सबसे पहले कटों की मार तले आने वाली इंडस्ट्री के सवाल पर अधिकारी कहते हैं कि इस पर अनिवार्य साप्ताहिक अवकाश के अलावा कोई कट नहीं लगाया जा रहा। यह अवकाश भी लेबर कानूनों के तहत किसी भी फैक्ट्री में होना जरूरी है। इसके अलावा साल भर चलने वाला सांयकालीन समय में तीन घंटे का पीक लोड प्रतिबंध ही जारी रह सकता है। अगर कोई बड़ी तकनीकी रुकावट न आए तो पंजाब का अपना उत्पादन- जून में 750 लाख यूनिट प्रतिदिन, जुलाई व अगस्त में 700 लाख यूनिट, सितंबर में 650 लाख यूनिट और अक्टूबर में 600 लाख यूनिट रह सकता है। जबकि भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड से पंजाब को जून, जुलाई में 200 लाख यूनिट प्रतिदिन, अगस्त में 175 लाख यूनिट व इसके बाद 110 लाख यूनिट प्रतिदिन बिजली मिलती रहेगी। इसी प्रकार पंजाब को मिल रही बैंकिंग की बिजली जून में 100 लाख यूनिट प्रतिदिन है तो जुलाई में 200 से 225 लाख यूनिट, अगस्त में 200, सितंबर में 175 लाख यूनिट और अक्टूबर में 60 लाख यूनिट प्रतिदिन मिलेगी। लंबी अवधि के खरीद समझौतों के तहत 250 से 350 लाख यूनिट बिजली हर रोज मिलेगी तो शार्ट टर्म के खरीद समझौतों के तहत 24 लाख यूनिट से हुई शुरुआत जून में 220 लाख यूनिट और जुलाई अगस्त में 260 और सितंबर में 240, अक्टूबर में 200 लाख यूनिट प्रतिदिन रहेगी। गैर परंपरागत स्रोतों से करीब नौ लाख यूनिट बिजली लगातार मिलती रहेगी। सेंट्रल पूल से पंजाब को नियमित रूप सेमिलने वाला हिस्सा इससे अलग है।